हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का योगदान युगांतरकारी माना जाता है।
इतिहास लेखन परंपरा में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का योगदान
हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का योगदान युगांतरकारी माना जाता है। उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतिहास दर्शन की रूढ़ियों को चुनौती दी और साहित्य को एक नई, अधिक व्यापक और मानवतावादी दृष्टि से देखने का मार्ग प्रशस्त किया।
इतिहास लेखन के क्षेत्र में आचार्य द्विवेदी का योगदान दो दिशाओं में प्राप्त होता है-एक तो उन्होंने अपने पूर्ववर्ती इतिहासकारों की न्यूनताओं को दूर करके साहित्य का इतिहास रचना-सम्बन्धी व्यापक एवं मौलिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया तथा दूसरा अपनी महत्वपूर्ण गवेषणा एवं अपने ऐतिहासिक अनुसंधान के द्वारा अनेक अज्ञात साहित्यिक रचनाओं का उद्धार किया। कुछ साहित्यिक प्रवृत्तियों एवं ग्रन्थों के सम्बन्ध में फैले हुए भ्रमों का निवारण भी आचार्य द्विवेदी ने किया। विचार का विषय यह है कि पूर्ववर्ती इतिहासकारों की सीमाएँ क्या थीं तथा उन्हें द्विवेदीजो ने किस रूप में विस्तृत किया ? इसका उत्तर निम्नलिखित बिन्दुओं का अध्ययन करके प्राप्त किया जा सकता है -
पूर्ववर्ती इतिहास लेखन की सीमाएँ
हिन्दी साहित्य का इतिहास कही जाने वाली कृतियों में सर्वप्रथम श्री शिवसिंह सेंगर की 'शिवसिंह सरोज' तथा ग्रियर्सन महोदय की 'माडर्न वरनाक्यूलर लिटरेचर ऑफ नार्दन हिन्दुस्तान' आती हैं। इन महानुभावों के सम्बन्ध में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है-"ये दोनों पुस्तकें बहुत थोड़ी सामग्री के आधार पर लिखी गयी थीं। इनमें कवियों और रचनाओं के विवरण संग्रह कर दिये गये थे पर उनको किसी एक ही जीवन्त प्रवाह के चिह्न रूप में देखने का प्रयत्न नहीं किया गया। उन दिनों वह बात संभव भी नहीं थी। इतस्ततः विक्षिप्त संयोग लब्ध पुस्तकों तथा सूचनाओं के आधार पर विचार प्रवाह की अविरल एवं अविच्छिन्न विचारधारा को खोज निकालना संभव नहीं था। अपने उत्कृष्ट रूप में वह अटकल की बात होती है और निकृष्ट रूप में गलत नतीजे तक जाने वाली। स्वर्गीय पंडित रामचन्द्र शुक्ल ने इन पुस्तकों को कविवृत्त संग्रह कहकर इनका बहुत ठीक परिचय दिया था।"
इस क्षेत्र में दूसरा महत्वपूर्ण प्रयत्न मिश्रबन्धुओं के द्वारा किया गया। नागरी प्रचारिणी सभा की खोज रिपोर्टों के आधार पर सन् 1913 में उन्होंने 'मिश्रबन्धु विनोद' की रचना की। इसके सम्बन्ध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कहा था-"भिन्न-भिन्न शाखाओं के हजारों कवियों की केवल कालक्रम से गुथी हुई उपर्युक्त वृत्तमालाएँ साहित्य के इतिहास के अध्ययन में कहाँ तक सहायता पहुँचा सकती थीं ? सारे रचनाकाल को केवल आदि, मध्य, पूर्व इत्यादि खण्डों में आँख मूँदकर बाँट देना-यह भी न देखना कि किस खण्ड के भीतर क्या आता है, क्या नहीं-किसी वृत्त-संग्रह का इतिहास नहीं बन सकता।"
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का इतिहास लेखन
हिन्दी साहित्य के इतिहास को कविवृत्त संग्रह की पिटारी से मुक्त करके उसे स्वस्थ रूप देने का प्रथम प्रयास आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने किया। इनके इतिहास में पहली बार श्वासोच्छवास का स्पन्दन सुनाई पड़ा। पहली बार वह जीवन जीवन्त मानव-विचार के गतिशील प्रवाह के रूप में प्रतीत हुआ। शुक्लजी ने साहित्य के इतिहास को शिक्षित समझी जाने वाली जनता की प्रवृत्तियों के परिवर्तन-निवर्तन के निर्देशक के रूप में देखा है। उनका कहना है-"शिक्षित जनता की जिन-जिन प्रवृत्तियों के अनुसार हमारे साहित्य के स्वरूप में जो-जो परिवर्तन होते आये हैं, जिन-जिन प्रथाओं की प्रेरणा से काव्य धारा की भिन्न-भिन्न शाखाएँ फूटती रही हैं, उन सबके सम्पर्क निरूपण तथा उनकी दृष्टि से किये गये सुसंगत काल विभाग के बिना साहित्य के इतिहास का सच्चा अध्ययन कठिन दिखाई पड़ता था।"
इस प्रकार सन् 1929 में पहली बार शिक्षित जनता की प्रवृत्तियों के अनुसार होने वाले परिवर्तन के आधार पर साहित्यिक रचनाओं के काल विभाजन का प्रयत्न हुआ। शुक्लजी ने सम्पूर्ण इतिहास को वीरगाथाकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल तथा आधुनिक काल के रूप में विभाजित करके उनकी प्रवृत्तियों तथा मुख्य कवियों का परिचय, उनकी कृतियों की आलोचना तथा मूल्यांकन के साथ प्रस्तुत किया।
जहाँ 'मिश्रबन्धु विनोद' में कवियों की तथा उनकी रचनाओं के उदाहरणों की सूची उपलब्ध होती है, वहाँ शुक्लजी ने प्रवृत्ति तथा युग, विशेष के अनुरूप कवियों को समुदायों में स्थान देकर सामूहिक प्रभाव डालने का प्रयास किया। उन प्रवृत्तियों के मूल में एक ऐतिहासिक प्रभाव प्रदर्शित करना चाहा। उन्होंने लोक-संग्रह की कसौटी पर समाजपरक तथा समाज विनिर्मुक्त रचनाओं में अन्तर निश्चित किया। इस प्रकार यह निस्सन्देह कहा जा सकता है कि आचार्य शुक्ल को जो इतिहास पंचांग के रूप में उपलब्ध हुआ, उसे उन्होंने मानवीय शक्ति से प्राणवन्त करके साहित्य बना दिया। शुक्लजी के इतिहास लेखन में भी कुछ दोष रह गये, जिन पर अनेक विद्वाओं ने आपत्ति की।
एक आपत्ति तो यह है कि शुक्लजी ने साहित्य को केवल शिक्षित समझी जाने वाली जनता की प्रवृत्तियों के परिवर्तन के निर्देशक के रूप में देखा, सम्पूर्ण मानव समाज के सामूहिक चित्त की अभिव्यक्ति के रूप में नहीं समझा। इस सम्बन्ध में हजारीप्रसाद द्विवेदी की आपत्ति इस प्रकार है–‘"वृत्त संग्रह की परंपरा (श्री शुक्लजी के इतिहास में) उसमें भी समाप्त नहीं हुई है और साहित्य को मानव समाज के सामूहिक चित्त की प्रवृत्तियों को परिवर्तन-विवर्तन के 'नर्देशक के रूप में देखा गया है। श्री शुक्लजी की यह विशेष दृष्टि थी और इस दृष्टि भंगिमा के कारण उनके इतिहास में भी विशिष्टता आ गयी है।
आचार्य शुक्ल के इतिहास लेखन में दूसरा विशेष दोष यह था कि उन्होंने साहित्य को केवल तत्कालीन परिस्थितियों की ही उपज स्वीकार किया। इसलिए उन्होंने साहित्य की प्रवृत्तियों के परिवर्तन में तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थितियों के प्रभाव का दर्शन किया तथा वह भी केवल 'शिक्षित जनसमूह पर ।' शुक्लजी की ऐतिहासिक दृष्टि साहित्य की अविरल तथा अविच्छिन्न धारा के दर्शन नहीं कर सकी। यही कारण है कि शुक्ल जी ने युग की परिस्थितियों के अनुरूप तथा अनुकूल पड़ने वाली प्रवृत्ति को ही मुख्य स्वीकार करके उसके आधार पर उस काल का नामकरण किया तथा उससे सम्बन्धित कवियों का विवरण उस काल के अन्तर्गत प्रस्तुत किया। शेष कवियों को चाहे वे श्रेष्ठ ही क्यों न हों, फुटकल खाते में स्थान दिया।
इस प्रकार परिस्थितियों के प्रभाव के रूप में साहित्य को देखने के कारण आचार्य शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के आदिकाल में यवन आक्रमणों से उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में उस समय केवल वीरगाथाओं तथा वीररस-प्रधान रचनाओं को ही प्रमुख स्वीकार किया तथा उस काल को वीरगाथा काल कहा। अन्य ग्रन्थों को आचार्य शुक्ल ने धार्मिक अथवा अप्रामाणिक प्रभाव मात्र कहकर त्याग दिया। अपभ्रंश साहित्य की विपुल संपत्ति को वे न देख सके जो कि सामान्य जनता की मनोवृत्तियों का प्रतिबिम्ब थी। यही दोष भक्तिकाल तथा रीतिकाल के सम्बन्ध में भी परिलक्षित होता है।
डॉ. नामवरसिंह ने इस सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है-"किसी विशेष युग-परिस्थितियों के होते हुए भी साहित्य की कई प्रवृत्तियाँ कैसे प्रचलित थीं? इसका कारण देने में वे असफल रहे, क्योंकि उन्हें उन परिस्थितियों में पलने वाली परस्पर विरोधी विविध सामाजिक शक्तियों के अन्तर्विरोध का पता नहीं था । इसलिए उन्हें अपने इतिहास के हर एक युग में फुटकल खाता खोलना पड़ा।"
शुक्लोत्तर इतिहास
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के बाद हिन्दी साहित्य के अनेक इतिहासों की रचना हुई। उन सबके रचयिताओं का लगभग यही दृष्टिकोण रहा। आचार्य शुक्ल के पश्चात् उनके समान मौलिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने वाला कोई इतिहास रचयिता नहीं हुआ। सब इतिहासकारों ने शुक्लजी की ही शैली को स्वीकार किया। हाँ, उनके द्वारा की गयी छोटी-मोटी भूलों को सुधारने का प्रयत्न किया।
आचार्य द्विवेदी का स्वस्थ दृष्टिकोण
उपर्युक्त समस्त इतिहासों में वह अन्तर्दृष्टि प्राप्त नहीं हो सकी, जिसके बिना साहित्य का आंकलन निष्फल हो जाता है-"प्रत्येक देश का साहित्य, समाज, संस्कृति और चिन्तन एक अविच्छिन्न विकास परंपरा और उसमें होने वाली क्रिया-प्रतिक्रियाओं का प्रतिबिम्ब हुआ करता है, जिसे गति देने में भौगोलिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक और वैयक्तिक कारण काफी हिस्सा लेते हैं। जब तक इन बातों का ज्ञान नहीं होता तब तक साहित्य के इतिहास को पढ़ने का डिक्शनरी को याद करने की अपेक्षा अधिक मूल्य नहीं हो सकता।"
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि आचार्य द्विवेदी का इतिहास लेखन इन्हीं मान्यताओं के प्रकाश में स्वस्थ रूप में पल्लवित हुआ।


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