आज भी दुनिया के कई हिस्सों में शिक्षा व्यवस्था एकरूप मूल्यांकन मानकों, कठोर पाठ्यक्रमों और इस अपेक्षा पर आधारित है कि हर छात्र को सभी विषयों में न्यून
मूल्यांकन पर पुनर्विचार : रुचि-आधारित और तनावमुक्त शिक्षा की ओर
आज भी दुनिया के कई हिस्सों में शिक्षा व्यवस्था एकरूप मूल्यांकन मानकों, कठोर पाठ्यक्रमों और इस अपेक्षा पर आधारित है कि हर छात्र को सभी विषयों में न्यूनतम योग्यता प्राप्त करनी ही चाहिए। यद्यपि इस मॉडल का उद्देश्य सामान्य ज्ञान का एक आधार सुनिश्चित करना है, फिर भी यह मानव विकास के एक मूलभूत सत्य को अक्सर नज़रअंदाज़ कर देता है: प्रत्येक व्यक्ति अपनी रुचियों, क्षमताओं और सीखने के तरीकों में स्वाभाविक रूप से भिन्न होता है। इस विविधता को न पहचानने वाली शिक्षा प्रणाली सृजनात्मकता को कुंद कर देती है, अनावश्यक तनाव उत्पन्न करती है और मानव क्षमता को सीमित कर देती है।
इस समस्या का मूल कारण सभी विषयों में न्यूनतम उत्तीर्ण अंक अनिवार्य करने की प्रवृत्ति है। यह धारणा इस विचार पर आधारित है कि हर छात्र, अपनी प्राकृतिक रुचियों और क्षमताओं की परवाह किए बिना, हर क्षेत्र में संतोषजनक प्रदर्शन करे। लेकिन इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो इस सोच को चुनौती देते हैं।महान गणितज्ञ Srinivasa Ramanujan ने अन्य शैक्षणिक क्षेत्रों में सीमाओं के बावजूद गणित में अपनी अद्वितीय प्रतिभा से विश्व में स्थान बनाया। इसी प्रकार प्रसिद्ध साहित्यकार Kamala Das किसी एकरूप अकादमिक उत्कृष्टता पर आधारित प्रणाली से नहीं उभरीं। उनकी सफलता का कारण मानकों में ढलना नहीं, बल्कि अपनी रुचियों का गहराई से अनुसरण करना था।
रुचि-आधारित शिक्षा मॉडल छात्रों की कमजोरियों को दंडित करने के बजाय उनकी शक्तियों को विकसित करने पर जोर देता है। ऐसी व्यवस्था छात्रों को उनकी क्षमताओं के अनुरूप विषयों में प्रारंभिक अवस्था से ही दक्षता प्राप्त करने का अवसर देती है और उन्हें उन क्षेत्रों में गहन ज्ञान अर्जित करने के लिए प्रेरित करती है, जिनमें उनकी वास्तविक रुचि होती है। इसका अर्थ यह नहीं कि बुनियादी शिक्षा को पूरी तरह छोड़ दिया जाए; बल्कि इसका आशय यह है कि साक्षरता और गणनात्मक कौशल जैसे मूलभूत ज्ञान को सुनिश्चित करते हुए उच्चस्तरीय शिक्षा को व्यक्तिगत रुचियों के अनुसार ढाला जाए।
वर्तमान व्यवस्था के मनोवैज्ञानिक प्रभावों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। सभी विषयों में न्यूनतम योग्यता प्राप्त करने का दबाव छात्रों में चिंता, आत्मविश्वास की कमी और सीखने से दूरी पैदा करता है। जब छात्रों को उन विषयों में अधिक समय लगाना पड़ता है जिनमें उनकी रुचि या क्षमता कम होती है, तब शिक्षा खोज की यात्रा न रहकर सहनशीलता की परीक्षा बन जाती है। इसके विपरीत, रुचियों के अनुरूप शिक्षा आंतरिक प्रेरणा को बढ़ाती है और सीखने को अधिक सार्थक और आनंददायक बनाती है।
कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि न्यूनतम उत्तीर्ण अंक हटाने से बौद्धिक असंतुलन या समग्र विकास की कमी हो सकती है। किंतु “समग्र व्यक्तित्व” का अर्थ सभी विषयों में समान दक्षता होना नहीं है। इसे बुनियादी ज्ञान और विशिष्ट कौशल के संतुलन के रूप में पुनर्परिभाषित किया जा सकता है। अंततः समाज की प्रगति एकरूपता से नहीं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्टता प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के योगदान से होती है।
इसके अतिरिक्त, आधुनिक दुनिया में सामान्य क्षमताओं की अपेक्षा गहन विशेषज्ञता को अधिक महत्व दिया जाता है। तकनीक से लेकर कला तक, नवाचार उन्हीं लोगों से उत्पन्न होता है जो अपनी रुचियों का दृढ़ता से अनुसरण करते हैं। इसलिए, ऐसी शिक्षा व्यवस्था जो इस प्रकार के अनुसरण को प्रोत्साहित करे, वर्तमान समय की आवश्यकताओं के अधिक अनुकूल है।
अंततः, सभी विषयों में न्यूनतम उत्तीर्ण अंक अनिवार्य करने की सोच शिक्षा और मानव क्षमता के बारे में पुरानी धारणाओं का प्रतिबिंब है। रुचि-आधारित शिक्षा प्रणाली की ओर परिवर्तन एक अधिक मानवीय, तनावमुक्त और प्रतिभा-विकास के लिए प्रभावी व्यवस्था का मार्ग प्रशस्त करेगा। शिक्षा का उद्देश्य सभी को एक ही साँचे में ढालना नहीं होना चाहिए; बल्कि यह एक जीवंत भूमि होनी चाहिए, जहाँ प्रत्येक शिक्षार्थी अपने मार्ग की खोज कर सके और विकसित हो सके।
- Binoy.M.B,
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