खामोश हो गयी ठहाका रात के दस बजे थे। एक आलीशान रेस्टोरेंट में डोसा खाने का आर्डर दिया। जब साथ होती थी दिव्या। एक अलग खुशबू सी होती थी टेबल पर।
खामोश हो गयी ठहाका
रात के दस बजे थे। एक आलीशान रेस्टोरेंट में डोसा खाने का आर्डर दिया। जब साथ होती थी दिव्या। एक अलग खुशबू सी होती थी टेबल पर। एक भयंकर ठहाका गूंज उठता था। एक आवाज ऐसा उसका होता था। मन मयूर कर जाता। एक प्रेम की भावना उमड़ने लगती थी। एक दूसरे को निहारते फिर डोसा हम दोनों खाते। मजा आ जाता। आज बिल्कुल सूना सा टेबल है। कोई ठहाका नहीं। कोई आवाज नहीं। कोई स्पर्श नहीं। बस निर्जन सा लग रहा था रेस्टोरेंट।
जब साथ आती थी दिव्या तो मन करता था कि कई घंटों तक रेस्टोरेंट में बैठे रहे और दिव्या के रसीले होंठों को निहारता रहूँ और उसकी आंखों को बस देखता रहूँ और कुछ नई बातें और कुछ पुरानी बातें होती थी फिर बात-बात में एक भयंकर ठहाका हो जाता था। अक्सर वह गुलाबी साड़ी में होती थी। गुलाबी सी महक होती थी। खुशबू इतनी आती थी कि रेस्टोरेंट में बैठे लोग महक से वाह-वाह कर उठते थे कि क्या इत्र की खुशबू है।
"आज गुलाबी साड़ी में तो चौदहवीं की चांद लग रही हो तुम"--मैंने दिव्या से कहा। शरमा जा जाती थी। तिरछी चितवन से एक हल्की मुस्कान सी उड़ेल देती थी प्रेम का फुहारा। एक ताजगी भर जाती थी। मन की गहराइयों को छू जाती। फिर हल्के हाथों से उसके चमकीले बालों को सहलाते। खामोश सा प्रेम प्रगाढ़ हो जाता। एक तीव्र प्रेम के प्रवाह में बह जाते थे। दूर तक चले इस प्रवाह के बहाव में। सिर्फ एक प्रेम की तीव्र प्रवाह होता था।
जब मैं बी.ए कर रहा था। दिव्या भी बी.ए में थी। वह किसी दूसरे डिग्री कालेज में थी। दो बजे वह लंच करने आती थी। पहली बार मैंने उसको गुलाबी शूट में देखा था। सामने वाली टेबल पर मैं बैठ गया। दिव्या डोसा का आर्डर किया था। मैं भी डोसा का आर्डर दिया। दोनों अपने-अपने डोसा खाने लगे। मैं डोसा खाते-खाते उसको निहारता रहा और वह भी बीच-बीच में देख लेती थी।
अगले दिन वह आई फिर डोसा खाने का आर्डर किया। मैं भी आर्डर दिया। चुपके-चुपके निहारने लगा था। दिव्या जैसे ही पैसे देने के लिए पर्स खोला तो देखा कि पर्स में एक पैसा नहीं है। लगता है कोई कागज निकालते वक्त पैसा कहीं गिर गया। बहुत हैरान थी दिव्या कि कैसे बिल करेगी? वह पर्स देखती फिर चुपके हमें देख लेती। चेहरे पर मायूसी छा गयी थी।
"क्या हुआ " -- मैंने दिव्या से पूछ लिया। उसकी घबड़ाहट बढ़ गयी थी। भय का कंपन सा महसूस किया। वह कुछ बोलना चाह रही थी। पर आवाज नहीं निकल पा रही थी। इतने में वेटर बिल पे करने के लिए टोकन आगे बढ़ाया। मैं हालातों को समझ गया था। वेटर को अपने पास बुलाया। अपना तथा दिव्या का पैसा मैंने अदा कर दी।
"थैक्स भैया आपका,, मेरा पैसा पता नहीं कहीं गिर गया। कल इसी समय पर आना। पैसा वापस कर दूंगी" -- इतना कहकर दिव्या हल्का सा हाथ हिलाकर मुस्कराते हुए रेस्टोरेंट से बाहर चली गयी।
अगले दिन दिव्या रेस्टोरेंट पहुँच गयी थी। दस मिनट तक मेरा इंतजार किया। जब मैं पहुँचा तो दिव्या ने मुझे अपने ही टेबल पर बैठने के लिए कहा और उसने दो डोसा का आर्डर दिया।
"तुम बहुत अच्छे लडके हो, मुसीबत में फंसे व्यक्ति की मदद करना एक इंसानियत का काम है। तुम्हारे इस व्यवहार से बहुत खुश हूँ। जो मुझसे मांगना चाहते हो मांग सकते हो। जरुर पूरा करुंगी"----बिना रुके एक ही सांस में सब कह दिया। बेधड़क लड़की, होशियारी कूट-कूट कर भरी थी।
एकदम सीधी लड़की लेकिन बातूनी। बातों का लहजा फर्राटेदार था। बिना रुके बोलने वाली लड़की तो मेरे ह्रदय में समा सी गयी थी। हंसमुख चेहरा, खुले बालों में निर्भीकता से भरी थी। इंसान को पहचानती है। कौन कैसा है? नाप जोख लेती है।
"तुम्हारा जीवनभर का साथ चाहिए था। यही मेरी मांग है।"
मैं भी आज खोलकर अपनी बातें रख दी।
"मैं तो रह लूंगी पर तुम नहीं रह पाओगे" ---दिव्या ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा। हम दोनों ने एक दूसरे को गौर से देखने लगे।
"बिल्कुल साथ रहूंगा"--- मैंने उसको पूर्ण भरोसे में लिया। हम दोनों का प्रेम नजदीकियों की ओर बढने लगा।
एक नया एहसास जागृत होने लगा। प्रेम का प्रथम प्रस्फुटन से दूरियाँ बिल्कुल कम होने लगी।
अब हम दोनों का मिलना शुरू हो गया। कभी कालेज के बाहर मिलते, कभी रेस्टोरेंट में लंच करने चले आते। कभी तो संगम पर मिलते तो कभी किसी गार्डन में एक सहज बातों से शुरूआत होती। कभी-कभी सिनेमा देखने साथ- साथ जाते। भावों से भरा मिलन होता था।लालची प्रवृत्ति की नहीं थी। कभी किसी चीज की खरीददारी करने के लिए नहीं कहा। एक स्वाभिमानी लड़की थी।
बहुत उदारता से भरी थी। किसी को मजबूरी में देखती तो उसकी जरूरत के हिसाब से मदद करने लगती। कोई भिखारी मिलता तो उसको पैसे देती या खाना किसी होटल से दिला देती। एक दिन सडक पर देखा एक बुजुर्ग महिला सड़क नहीं पार कर पा रही थी। झट से पहुंच कर सड़क पार करा दी। कभी अस्पतालों में पहुंच कर मरीजों का हाल चाल लेती और फल भी दे देती थी।
इन्हीं खुबियों को देखकर मैं उसके प्रति संवेदनशील होता गया। अब मैं आश्वस्त हो गया कि दिव्या मेरे जीवन की संगिनी बनने के लिए एक योग्य लड़की रहेगी। मेरी तरह यह भी संवेदनशील है। मैं भी संवेदना से भरा लड़का हूँ। लोगों की मदद करना मेरे अंदर भी वही खून उबलता है।हम दोनों की विचारधारा एक जैसी रही। यही वजह थी कि हम दोनों एक दूसरे के बहुत करीब पहुंच गये।
एक बार मेरी तबियत बहुत खराब हो गयी। जीने की उम्मीद खत्म सी हो गयी थी। मम्मी-पापा बहुत निराश हो गये थे। दिव्या भी आयी। हालातों को देख भगवान से प्रार्थना की। मेरे लिए व्रत रखा। ईश्वर से प्रार्थना शुरू कर दी। रात-दिन मेरे करीब रहकर मेरी सेवा की। ईश्वर उसके निश्छल प्रेम से पिघल गया। कुछ दिनों में सुधार होने लगा और मैं स्वस्थ हो गया। अब मेरे मम्मी-पापा को भी उसपर पूर्ण भरोसा हो गया कि इस घर की वह एक बहू बनने की योग्यता रखती है।
समय के साथ अब हम दोनो ने शादी कर ली। शादी के बाद भी उसी रेस्टोरेंट में डोसा खाने जाते। एक दिन रात को अकेले डोसा खाने आई थी। अचानक भयंकर रेस्टोरेंट में आग लग गयी। सब लोग बाहर भागकर निकल गये। लेकिन किसी की एक लड़की आग के घेरे में फंस गयी थी। किसी की हिम्मत नहीं हुई कि आग की लपटों से उसे बचाया जा सके। यह कार्य दिव्या ने अपने सिर पर उठाया और आग की लपटों को फांदते हुये बच्ची को लेकर भागी। दुर्भाग्य से दिव्या बहुत बुरी तरह से जल गयी थी। आखिर दिव्या इस दुनिया से कूंच कर गयी।
अब मैं अकेली जिंदगी जी रहा हूँ। खामोश सी हो गयी है जिंदगी। एक झोंके तरह आयी थी। कितना खूबसूरत इरादा था। किसी जरूरत मंद की जरूरत समझ कर प्राणों की परवाह किये बिना मदद करती थी। कितनी दिलेर थी और मै इतना भाग्यशाली था कि मैं उसका हो गया।
अब दिव्या नहीं है। टेबल सूना है। उसकी याद सी है। एक खामोशी है। कोई अब वह ठहाका वापस नहीं ला सकता। गुलाबी साड़ी में जब होती थी तो बहुत बेहतरीन सौंदर्य का पुट झलकता था। आर्डर वही करती थी। एक डोसा में हम दोनों निपट जाते थे।
बहुत कोशिश की। डोसा खाने की पर खा न सका। केवल दिव्या की शोहरत, उसके साथ बिताये पल। उसका बोलने का अंदाज़। एक ही सांस में कई वाक्य बोल जाती थी। सब याद है लेकिन अब टेबल पर मेरे साथ डोसा खाने का साथ देने वाले की सिर्फ याद बाकी है।
डोसा नहीं खा सका और सीधे काउंटर पर जाकर बिल पे किया। शांत भाव लिये हुए मैं खामोश होकर रेस्टोरेंट से बाहर आ गया।
- जयचन्द प्रजापति 'जय'
प्रयागराज


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