आधे अधूरे नाटक में सिंघानिया का चरित्र चित्रण मोहन राकेश सिंघानिया का चरित्र समाज के उस शोषक और अवसरवादी उच्च वर्ग को बेनकाब करता है, जो मजबूरियों का
आधे अधूरे नाटक में सिंघानिया का चरित्र चित्रण | मोहन राकेश
मोहन राकेश द्वारा रचित 'आधे अधूरे' नाटक समकालीन हिंदी नाटक का एक मील का पत्थर है। यह नाटक मध्यवर्गीय परिवार की विघटन, मानसिक तनाव और अधूरेपन को दर्शाता है।नाटक में सिंघानिया उन पाँच पुरुषों में से एक है (जो 'पुरुष-एक' यानी महेंद्रनाथ, 'पुरुष-दो' यानी सिंघानिया, 'पुरुष-तीन' यानी जगमोहन और 'पुरुष-चार' यानी जुनेजा के रूप में एक ही अभिनेता द्वारा अभिनीत किए जाते हैं)। सिंघानिया मुख्य पात्र सावित्री का बॉस (चीफ एग्जीक्यूटिव) है।
नाटक के इस पात्र का महत्त्व इस बात से प्रकट होता है कि महेन्द्रनाथ सावित्री की पारिवारिक स्थितियों, विषमताओं और वैमनस्यों का उद्घाटन नाटक में इसका नाम आते ही होने लगता है। नाटककार ने इसे आज की नौकरशाही के प्रतीक में प्रस्तुत किया है। वह अपने-आप में किसी सीमा तक, शायद अपनी अधिकार और सामाजिक उच्चवर्गीय स्थिति में सन्तुष्ट है, फिर भी उखड़ा-उखडा-सा रहने वाला व्यक्ति है, क्योंकि उसका चित्त स्थिर नहीं है और न कोई सामाजिक चरित्र है। वह अपने उच्चाधिकार और सत्ता का उपयोग अपनी स्वार्थ पूर्ति या कामना पूर्ति के लिए जैसे बड़े निर्विकार रूप में करता है, परन्तु निर्विकार है नहीं। अपने अधीनस्थ काम करने वाली नारियों को अनेक प्रकार के झाँसे देकर, उनके रिश्तेदारों या अपनों को काम दिलवाने के वायदे करके, अपनी वासनाओं और कामुकताओं का परिहार करना उसे चरित्र और व्यवहार की वर्गीय प्रतिनिधित्व करने वाली विशेषता, गुण या दोष, जो कुछ भी कह लो, इसके चरित्र में पूर्णतया विद्यमान है। महेन्द्रनाथ और अशोक दोनों ही उसका अपने घर में आना पसन्द नहीं करते। महेन्द्रनाथ तो यहाँ तक दुःखी और चिन्तित दिखाई देता है कि अब लोगों को पता चल गया है कि सिंघानिया उनके घर में आया करता है। जब सावित्री कहती है कि, "लोग तो ईर्ष्या करते हैं मुझसे, कि दो बार मेरे यहाँ आ चुका है। तीसरी बार आयेगा ।" तो महेन्द्रनाथ जैसे चौंककर कह उठता है, "तो लोगों को भी पता है वह आता है यहाँ ? और जब सावित्री सिंघानिया के बारे में कहती है कि वह अशोक की नौकरी के लिए ही उसे अपने यहाँ बुलाती है, तो व्यंग्य के विद्रूप में महेन्द्रनाथ कह उठता है- “हाँऽऽ, सिंघानिया तो लगवा ही देगा जरूर। इसीलिए बेचारा आता है यहाँ चलकर ।" महेन्द्रनाथ के कथन का यह जो ढंग है वह वास्तव में सिंघानिया के आन्तरिक स्वरूप को बड़ी तीव्रता से हमारे सामने उद्घाटित करने वाला है।
सिंघानिया के बड़प्पन में जो फूहड़पन है, वह निश्चित रूप से आधुनिक नौकरशाही का ऐसा लक्षण है, जिसे अधिकारी सत्ता का भोग करने वाला वर्ग इसलिए स्वाभाविक रूप से प्रदर्शित करते देखा जाता है, ताकि अधीनस्थ लोग उसे भी बड़प्पन का गुण मानकर उसकी प्रशंसा करें। उसके फूहड़ व्यवहार और चेष्टाओं का उद्घाटन नाटककार ने अशोक के मुख से भली प्रकार करवाया है। अशोक अपनी माँ से सिंघानिया के बारे में एकदम स्पष्ट रूप से कहता है- "मुझे नहीं चाहिए नौकरी। कम-से-कम उस आदमी के जरिये हरगिज नहीं।" और फिर वह सिंघानिया की घिनौनी वास्तविकता को उजागर करते हुए, अपनी माँ के प्रश्नों का उत्तर देते-बल्कि उन्हें काटते हुए कहता है - "चुकन्दर है, वह आदमी है? जिसे न बैठने का शऊर है, न बात करने का? पाँच हजार तनख्वाह है, पूरा दफ्तर सँभालता है, पर इतना होश नहीं कि अपनी पतलून के बटन ।" और फिर ऐसे व्यक्ति के प्रति नितान्त घृणा प्रकट करते हुए अशोक कहता है-"तुम्हारा बॉस न होता, तो उस दिन मैंने कान से पकड़कर घर से निकाल दिया होता। सोफे पर टाँग पसारे आप सोच कुछ रहे हैं, जाँघ खुजलाते देख किसी की तरफ रहे हैं, और बात मुझसे कर रहे हैं (उसकी नकल उतारता है)-'अच्छा यह बतलाइये कि आपके राजनीतिक विचार क्या हैं?' राजनीतिक विचार हैं मेरे-खुजली और उसकी मरहम।" सिंहानिया का चरित्र इन शब्दों में पूरी तरह झलकता है। अशोक के मुख से जिन शब्दों में नाटककार ने उसे प्रदर्शित कराया है, यह लेखक की अद्भुत संवाद संयोजन की कला का परिचायक है।
अपनी आर्थिक और वर्ग-सम्पन्न-प्रभुता, जैसी कि नौकरशाहों को उपलब्ध होती है और जैसा आत्मप्रदर्शन करने का अभ्यास इन लोगों को होता है, वह सब सिंघानिया के चरित्र में है। इसी कारण वह बातचीत करते समय बार-बार बात को अपनी प्रशंसा के केन्द्र-बिन्दु पर लाकर ही केन्द्रित करने की चेष्टा करता रहता है। वह अपने विश्व-भ्रमण की चर्चाएँ बार-बार करता है और इसी संदर्भ में अपने व्यापक ज्ञान का परिचय देने का लोभ संवरण नहीं कर पाता। इस प्रकार के व्यापक ज्ञान के प्रदर्शक, प्रशंसा पाने की उत्सुकता वाले कथन देखिये- "अन्तर्राष्ट्रीय सम्पर्क हैं न कम्पनी के, सो सभी देशों के लोग मिलने आते रहते हैं। जापान से तो एक पूरा प्रतिनिधिमण्डल ही आया हुआ था, पिछले दिनों कुछ भी कहिए, जापान ने इन सब की नाक में नकेल कर रखी है आजकल ।
अभी उस दिन मैं जापान की पिछले वर्ष की औद्योगिक सांख्यिकी देख रहा था..." इसी प्रकार वह इटली, अमेरिका तथा अन्य यूरोपीय देशों की चर्चा भी करता है। रूस, जर्मनी के नाम भी लेता है। शीत युद्ध की चर्चा और उसे रोकने में भारत की देन भी उसकी चर्चा में अछूती नहीं रहती। ये सारी बातें वास्तव में सिंघानिया को एक आत्म-प्रशंसक और प्रदर्शन-प्रिय व्यक्ति ही प्रमाणित करती हैं। इन्हीं सब बातों को देखकर, सिंघानिया के चरित्र एवं व्यक्तित्व का सही मूल्यांकन करते हुए अशोक ठीक ही कहता है-"पहले पाँच सेकण्ड आदमी की आँखों में देखता रहेगा। फिर होठों के दाहिने कोने से जरा-सा मुस्कुरायेगा। फिर एक-एक लफ्ज को चबाता हुए पूछेगा (उसके स्वर में ) - आप क्या सोचते हैं, आजकल युवा लोगों में इतनी अराजकता क्यों है? ढूँढ-ढूँढ़कर सरकारी हिन्दी के लफ्ज को लाता है-युवा लोगों में! अराजकता !" नाटककार ने यह दर्शाया है कि युवा लोगों में अराजकता का एक बहुत बड़ा कारण सिंघानिया जैसे व्यावहारिक दृष्टि से अराजक लोग ही हैं जो कोई भी अच्छा आदर्श युवा लोगों के सामने नहीं रख पाते।
वास्तव में वह स्वयं क्या है, किसी औद्योगिक या सरकारी तन्त्र के ऐसे उपकरण जो समाज में अपने व्यवहार से घिनौना वातावरण पैदा करते हैं मध्यम वर्ग के बीच होते हैं तो चाहते हैं कि हर कोई उन्हें श्रृद्धा से देखें, लेकिन जब अपने से बड़े नौकरशाह के सामने होते हैं, तो उसके सामने कुत्ते की तरह पूँछ हिलाते हैं। इकाई के रूप में उनका चरित्र बड़ा ही अनिश्चित, टूटा हुआ और प्रभावहीन होता है, परन्तु उसका वह ऐसे प्रदर्शन करते है मानो जैसे राष्ट्र और समाज के वही सबसे बड़े सहारे हों।सिंघानिया ऐसी ही नौकरशाही का प्रतिनिधि प्रतीक है। वह यह भी भली भाँति जानते हैं कि उनके आचरण लोगों में वितृष्णा पैदा करते हैं, जो अशोक के उद्गारों के रूप में प्रकट होते हैं, परन्तु वह इस बात से विचलित न होकर आनन्द लेते हैं।
सिंघानिया इस नाटक का एक हास्यास्पद-सा, फूहड़-सा और असाधारण चरित्र वाला पात्र भी है। वास्तव में नाटक की घुटन एवं तनावपूर्ण स्थितियों में सिंघानिया अपने व्यवहार से सामान्य हास्य की सृष्टि भी करता है। इस रूप में सामान्यतः कहा जा सकता है कि उसका चरित्र-व्यवहार अपने हास्यपूर्ण व्यवहार से घुटन-तनाव को कुछ क्षणों के लिए कम करने वाला भी प्रमाणित होता है। उसने इस प्रकार की चरित्र-सृष्टि अवश्य ही नौकरशाही पर कटाक्ष करने के लिये की है। अपनी ही हीनताओं से घिरा सिंघानिया को नाटककार ने दिखाकर ऐसे लोगों के आन्तरिक व्यक्तित्व को प्रकट करने की चेष्टा की है, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि सिंघानिया का यह हीनत्व दिग्दर्शन नहीं, उसका बनावटी आचरण है, जैसे कि वह 'स्मृति लोप' करता हुआ सावित्री द्वारा बिन्नी का परिचय प्राप्त करने के बाद कहता है-"अच्छा-अच्छा यही है वह लड़की! तुम चर्चा कर रही थी इसकी। इसी का आपरेशन हुआ था न पिछले साल? अरे नहीं! वह तो मिसेज माथुर की लड़की का हुआ था।... (आँख सिकोड़े) मिसेज माथुर की लड़की का? नहीं शायद “पर हुआ था किसी की लड़की का ।"
ऐसा स्पष्ट लगता है कि सिंघानिया को इस तरह प्रस्तुत करके नाटककार कुछ हास्य-व्यंग्य की स्थितियाँ नाटक में प्रकट करना चाहता है, लेकिन वह ऐसा करने में सफल नहीं हुआ है। इस उदाहरण द्वारा यह बात स्पट की जा सकती है। एक स्थान पर तो वह यह भी कह देता है कि, "बहुत से लोग एक-दूसरे जैसे होते हैं। हमारे अंकल हैं एक पीठ से देखो-मोरारजी भाई लगते हैं।"और झट से सिंघानिया को बनाने के लिए, व्यंग्य-विद्रूप से भरकर अशोक कह उठता है-"हमारी आँटी है एक।गरदन काटकर देखो-जीना लोलो व्रिजिदा नजर आती हैं।"सामान्यतः सिंघानिया नाटक का एक सशक्त पात्र है।
इस प्रकार सिंघानिया का चरित्र समाज के उस शोषक और अवसरवादी उच्च वर्ग को बेनकाब करता है, जो मजबूरियों का सौदा करता है। मोहन राकेश ने सिंघानिया के माध्यम से कॉरपोरेट संस्कृति के खोखलेपन, पुरुष प्रधान समाज की कुंठा और स्त्रियों के प्रति उनके वस्तुवादी (Objectifying) दृष्टिकोण को बेहद सजीवता से चित्रित किया है।


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