आधे अधूरे नाटक में महेन्द्रनाथ का चरित्र चित्रण

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आधे अधूरे नाटक में महेन्द्रनाथ का चरित्र चित्रण महेन्द्रनाथ इस नाटक का एक केंद्रीय और बेहद जटिल पुरुष पात्र है। वह सावित्री का पति है, जो अपनी असफलताओ

आधे अधूरे नाटक में महेन्द्रनाथ का चरित्र चित्रण


मोहन राकेश द्वारा रचित आधे अधूरे (1969) आधुनिक हिंदी नाटक का एक मील का पत्थर है। यह नाटक मध्यवर्गीय परिवार के विघटन, मानसिक तनाव और वैयक्तिक कुंठा को दर्शाता है।महेन्द्रनाथ इस नाटक का एक केंद्रीय और बेहद जटिल पुरुष पात्र है। वह सावित्री का पति है, जो अपनी असफलताओं और हीनभावना के बोझ तले दबा हुआ है।

महेन्द्रनाथ मोहन राकेश के नाटक 'आधे-अधूरे' का प्रमुख पात्र है। नाटकीय कथावस्तु से इसका आद्यन्त सम्बन्ध है। वह नाटक और एक अनुशासनहीन परिवार का विवश मुखिया होने का भुक्तभोगी है। वह स्वयं परिवार में अपेक्षा का पात्र बनता है। नाटककार ने उसे उस वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया है जो अपने निठल्लेपन के कारण परिवार का मुखिया होते हुए भी अपमानजनक जीवन व्यतीत करने को विवश है। महेन्द्रनाथ के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपनी पत्नी सावित्री से कुढ़ता है। उसके आवारापन के कारण उसे अपमानित करता है और अन्तत: कुण्ठाग्रस्त होकर घर छोड़कर चला भी जाता है, फिर भी सावित्री को नहीं छोड़ पाता है। वह दिल का दौरा पड़ने की स्थिति में भी लँगड़ाते हुए फिर उसी घर में लौट आता है, जहाँ से उसे अपमानित होकर जाना पड़ा था। केवल एक घर छोड़ने वाले प्रसंग के अतिरिक्त कोई भी मानसिक घात-प्रतिघात उसके चरित्र में दृष्टिगोचर नहीं होता । वह नाटक के प्रारम्भ में ही एक टूटे हुए व्यक्ति के रूप में दिखाई देता है और अन्त में भी उसकी टूटन लँगड़ेपन के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो पाती। वह कुढ़नशील, ईर्ष्यालु, निठल्ला, शंकालु और अधूरे व्यक्तित्व वाले पुरुष के रूप में चित्रित हुआ है। वह पूर्व-परम्परागत नायक के गुणों से रहित एवं सर्वथा निकृष्ट चरित्रसम्पन्न व्यक्ति है, फिर भी वह इस नाटक का प्रधान पात्र है। महेन्द्रनाथ अपने वर्तमान जीवन की विसंगतियों का प्रत्यक्ष भोक्ता होने के साथ-साथ विगत की क्रूर विसंगतियों का शिकार भी है।महेन्द्रनाथ के चरित्र की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझी जा सकती हैं -
 

शंकालु व्यक्तित्व

आधे अधूरे नाटक में महेन्द्रनाथ का चरित्र चित्रण
महेन्द्रनाथ के चरित्र की एक मुख्य विशेषता- जिसका परिचय हमें नाटक के प्रारम्भ में ही मिल जाता है-उसका सशंक व्यक्तित्व है। वह अपनी पत्नी सावित्री को हृदय से प्रेम करता है, किन्तु उसके चरित्र के प्रति सदैव शंकालु रहता है। सावित्री जब कहती है कि अशोक को कहीं नौकरी पर लगवाने के लिए ही वह बड़े-बड़े लोगों से सम्पर्क साधती है, उन्हें अपने घर पर निमंत्रित करती है तथा स्वयं भी उनके घर जाती है, इसी कारण महेन्द्रनाथ का शंकालु मन सावित्री को चरित्रहीन समझने लगता है। सावित्री के सम्पर्क में आने के बाद जब-जब कोई आदमी घर पर आने लगा है, महेन्द्रनाथ का शंकालु हृदय जलकर रह गया है।

ईर्ष्या भाव

महेन्द्रनाथ शंकालु होने के साथ ही ईर्ष्यालु भी है। उसे सावित्री के चरित्र पर सदैव सन्देह बना रहता है, इसके साथ ही जो लोग सावित्री के सम्पर्क में आते हैं उनसे भी उसे ईर्ष्या होती है। जब-जब कोई व्यक्ति उसके घर आता है, वह जल उठता है और सावित्री को चूँकि वह रोक नहीं पाता, इसीलिए वह ऐसे लोगों की उपस्थिति में स्वयं घर से बाहर चला जाता है। बहाने बनाकर घर से चला जाना उसकी ईर्ष्यावृत्ति का ही परिचायक है।

कुढ़नशील व्यक्तित्व

महेन्द्रनाथ एक कुढ़ा हुआ व्यक्ति है। यह कुढ़नशीलता उसकी निराशा और असफलता का परिणाम है। वह स्वयं को सबसे छोटा और अपाहिज व्यक्ति अनुभव करता है, इसलिए प्रत्येक बात पर कुढ़ता रहता है। उसकी कुढ़न का प्रमुख कारण यह है कि उसके घर के सदस्य उसकी उपेक्षा करते हैं और बात-बात पर उसे अपमानित करते हैं। उसकी पत्नी सावित्री तो उसे पति के रूप में देखती-समझती ही नहीं हैं। वह इस भावना का प्रदर्शन भी बार-बार करती है। अपनी पत्नी की इस घोर उपेक्षा और प्रताड़ना के कारण ही वह ओछा बन गया है और न कहने योग्य बातें भी अपने बच्चों के सामने ही कह देता है। पत्नी की उपेक्षा से वह तिलमिला उठता है, किन्तु प्रतिरोध करने की शक्ति न होने के कारण केवल क्रोध करके ही रह जाता है।

निठल्ला और अधूरा व्यक्ति

महेन्द्रनाथ नाटक के प्रारम्भ में ही एक टूटे हुए व्यक्ति के रूप में हमारे सामने आता है। इसका कारण है उसका निठल्लापन । वह एक सम्पन्न घर का व्यापारी व्यक्ति था, किन्तु जब तक व्यापार चला, वह अय्याशी से भरा जीवन जीता रहा। उसी के शब्दों में- "चार सौ रुपये महीने का मकान था, टैक्सियों में आना-जाना होता था, किश्तों पर फ्रिज खरीदा गया था, लड़के-लड़कियों की कॉन्वेंट की फीसें जाती थीं ।" किन्तु इसके साथ ही "शराब आती थी। दावतें उड़ती थीं। उस सब पर पैसा तो खर्च होता ही था" और इसी अपव्यय के कारण धीरे-धीरे महेन्द्रनाथ की वित्तीय स्थिति बिगड़ती चली गयी और व्यापार बन्द होने के बाद परिवार का भरण-पोषण करने के लिए सावित्री को नौकरी करनी पड़ी। महेन्द्रनाथ को कोई काम न मिल सका, वह बेकार हो गया। बेकारी-भरे जीवन ने उसे निठल्ला, आरामतलब तथा घरघुसरा बना दिया। अपनी इस चारित्रिक विशेषता का प्रदर्शन वह स्वयं इस प्रकार करता है- "अपनी जिन्दगी चौपट करने का जिम्मेदार मैं हूँ। तुम्हारी जिन्दगी चौपट करने का जिम्मेदार मैं हूँ, इन सब की जिन्दगियाँ चौपट करने का जिम्मेदार मैं हूँ। फिर भी मैं इस घर से चिपका हूँ, क्योंकि अन्दर से मैं आरामतलब हूँ, घरघुसरा हूँ, मेरी हड्डियों में जंग लगा है।"

अपने इसी निठल्लेपन के कारण उसे बार-बार लांछित-प्रताड़ित किया जाता है, जिससे उसमें हीन ग्रन्थियाँ पनपने लगती हैं और वह अपने आपको छोटा समझने लगता है-न केवल छोटा वरन् दयनीय भी। वह जिससे भी बात करता है, ऐसा समझता है, जैसे उसके सामने वाला व्यक्ति उसे दयनीय दृष्टि से देख रहा है। इसकी प्रतिक्रिया भन की छटपटाहट के रूप में होती है, वह उसके शब्दों में तीर-जैसी वेधकता के साथ निकल पड़ती है। वह अपने छोटेपन, टूटन और निठल्लेपन को चबाता हुआ दिखाई देता है। उसका निम्नलिखित संवाद उसकी टूटन और निठल्लेपन का प्रमाण है- "किसे सुना सकता हूँ? कोई है जो सुन सकता है? जिन्हें सुनना चाहिए वे सब तो एक रबड़-स्टैंप के सिवा कुछ समझते ही नहीं मुझको, सिर्फ जरूरत पड़ने पर इस स्टैंप को ठप्पा लगाकर मैं इस घर में एक रबड़-स्टैंप भी नहीं, सिर्फ एक रबड़ का टुकड़ा हूँ-बार-बार घिसा जाने वाला रबड़ का टुकड़ा। इसके बाद क्या कोई मुझे वजह बता सकता है, एक ऐसी वजह, कि क्यों मुझे रहना चाहिए इस घर में ? नहीं बता सकता न ? यह आज तक बेकार क्यों घूम रहा है ? मेरी वजह से। यह बिना बतायें एक रात घर से क्यों चली गयी थी ? मेरी वजह से। और तुम भी इतने सालों से क्यों चाहती रही हो कि ? मुझे पता है, मैं एक कीड़ा हूँ, जिसने अन्दर ही अन्दर इस घर को खा लिया है। पर अब पेट भर गया है मेरा। हमेशा के लिए भर गया है। और बचा भी क्या है अब, जिसे खाने के लिए और रहता रहूँ यहीं ?"

एक ओर वह उपर्युक्त प्रतिक्रिया व्यक्त करता है और दूसरी ओर अपनी टूटन लांछन व अध् रेपन के कारण वह सावित्री के साथ अमानुषिक कृत्य करता है। बिन्नी के शब्दों में- "डैडी का चीखते हुए ममा के कपड़े तार-तार कर गुसलखाने में कमोड पर ले जाकर मैं तो बयान भी नहीं कर सकती कि कितने-कितने भयानक दृश्य इस घर में देखे हैं मैंने।"

महेन्द्रनाथ जानता है कि वह अपने आप में एक सम्पूर्ण व्यक्ति है। किसी न किसी सहारे की आवश्यकता उसे होगी ही। इसीलिए वह अपना व्यक्तित्व बनाने के लोभ में सावित्री को फटकारता है। मित्रों में दब्बू बने रहने वाला महेन्द्र घर पर आते ही दरिन्दा बन जाता है। सावित्री का बार-बार यह कहना कि वह पूरा आदमी चाहती है, महेन्द्रनाथ के इसी अधूरेपन की प्रतिक्रिया है। वह महेन्द्र के इस अधूरेपन को लेकर कहती भी है- "कोई यह न कह सके, जिससे कि वह अब पहले वाला महेन्द्र रह ही नहीं गया। और इसके लिए महेन्द्र घर के अन्दर रात-दिन छटपटाता है। दीवारों से सिर पटकता है। बच्चों को पीटता है। बीबी के घुटने तोड़ता है, वही महेन्द्र जो दोस्तों के बीच दब्बू-सा बना हल्के-हल्के मुस्कराता है, घर आकर एक दरिन्दा बन जाता है पता नहीं कब किसे नोंच लेगा, कब किसे फाड़ खायेगा, वह नफरत करती है इस सबसे-इस आदमी के ऐसा होने से। वह एक पूरा आदमी चाहती है अपने लिए-एक पूरा आदमी।"
 
इस प्रकार अपने निठल्लेपन और अधूरेपन के कारण महेन्द्रनाथ का व्यक्तित्व अपाहिज बन जाता है। सावित्री उससे घृणा करती है और वह स्वयं अपनी टूटन को सहेजे कभी घर से बाहर जाता है। कभी घर के अन्दर आ जाता है और यही अनुभव करता है- "हाँ, पूछकर ही जानना है आज। कितने साल हो चुके हैं। मुझे जिन्दगी का भार ढोते ? उनमें से कितने साल बीते हैं, इस परिवार की देख-रेख करते ? और उस सबके बाद मैं आज पहुँचा हूँ? यहाँ जिसे देखो वही मुझसे उल्टे ढंग से बात करता है? जिसे देखो वही मुझसे बदतमीजी से पेश आता है? हर एक के पास एक न एक वजह होती है। उसने इसीलिए कहा था। मैं जानना चाहता हूँ कि मेरी क्या यही हैसियत है, इस घर में कि जो जब जिस वजह से जो भी कह दे, मैं चुपचाप सुन लिया करूँ ? हर वक्त की दुत्कार, हर वक्त की कोंच, बस यही कमाई है यहाँ मेरी इतने सालों की ?" 

सहानुभूति का पात्र

महेन्द्रनाथ के चरित्र का सम्यक् अनुशीलन करने के उपरान्त यही कहा जा सकता है कि महेन्द्रनाथ के रूप में राकेशजी ने आधुनिक समाज के मध्यमवर्गीय निम्न-मध्यमवित्तीय परिवार के मुखिया के रूप में एक टूटे हुए व्यक्ति को 'आधे अधूरे' में प्रस्तुत किया है। वह नाटक का नायक है, किन्तु नाटक का सबसे दुर्बल और दयनीय पात्र भी वही है। वह सबकी भर्त्सना सहता है, किन्तु कुछ कह या कर नहीं पाता। वह अपमानित होकर घर छोड़कर चला भी जाता है, किन्तु अपनी चारित्रिक दुर्बलता के कारण पुनः अयाचित व्यक्ति के रूप में लौट भी आता है।

संक्षेप में, महेन्द्रनाथ का चरित्र आधुनिक समाज के उस पुरुष का प्रतिनिधित्व करता है जो पारंपरिक रूप से 'घर का मुखिया' बनना चाहता है, लेकिन आर्थिक लाचारी और अपनी कमजोरियों के कारण केवल एक 'कठपुतली' बनकर रह जाता है। मोहन राकेश ने महेन्द्रनाथ के माध्यम से मध्यवर्गीय पुरुष के मनोवैज्ञानिक बिखराव को बेहद सजीवता से चित्रित किया है।

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