आधे अधूरे नाटक पारिवारिक विघटन की गाथा है मोहन राकेश मानसिक तनाव और महानगरीय जीवन की खोखली होती जा रही संवेदनाओं की एक बेहद सजीव और मार्मिक गाथा है
आधे अधूरे नाटक पारिवारिक विघटन की गाथा है | मोहन राकेश
आधे अधूरे, नाटक वास्तव में पारिवारिक विघटन, मानसिक तनाव और महानगरीय जीवन की खोखली होती जा रही संवेदनाओं की एक बेहद सजीव और मार्मिक गाथा है। मोहन राकेश द्वारा रचित यह नाटक आधुनिक हिंदी नाट्य-साहित्य का एक मील का पत्थर माना जाता है।
मोहन राकेश कृत नाटक आधे अधूरे एक पारिवारिक मनोवैज्ञानिक समस्या प्रधान नाटक है।प्रस्तुत नाटक समकालीन परिस्थितियों का सटीक विवरण प्रस्तुत करता है।नाटक के पात्रों के रूप में महेन्द्रनाथ का परिवार विघटन की त्रासदी से पीड़ित है। यदि समसामयिक सन्दर्भ में देखा जाए तो नाटक उन परिवारों की समस्या प्रस्तुत करता है, जहाँ घर का खर्चा एक पत्नी चलाती है। एक ही घर-परिवार में रहने वाले सभी सक्षम एक-दूसरे से पृथक होने का दुस्साहस कर रहे हैं, कारण कहीं न कहीं परिवारी जनों के सम्बन्धों की प्रगाढ़ता का ह्रास होना ही है।
मोहन राकेश का नाटक 'आधे अधूरे', एक मध्यमवर्गीय भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता है। इस सम्पूर्ण परिवार के व्यक्ति एक-दूसरे से अलग होने का कुत्सित कार्य कर रहे हैं। प्रस्तुत नाटक वास्तव में पारिवारिक विघटन की गाथा ही है।
नाटक में पारिवारिक विघटन-मोहन राकेश-कृत नाटक ' आधे-अधूरे' एक परिवार को मानवीय मूल्यों के विघटन का स्वरूप प्रस्तुत करता है।परिवार के मुखिया के रूप में महेन्द्रनाथ, उसकी पत्नी सावित्री, बड़ा पुत्र अशोक, उससे छोटी पुत्री बिन्नी तथा सबसे छोटी पुत्री किन्नी।परिवार के पाँचों सदस्य एक-दूसरे से इस तरह कटे हुए हैं कि परिवार, परिवार नहीं, अपितु आश्रयस्थल बन गया है। परिवार का प्रदूषित वातावरण इस सब के लिए दोषी है। सभी एक-दूसरे से अलगाव रखने के लिए तत्पर हैं। यदि इन पात्रों का पृथक्-पृथक् विश्लेषण किया जाय तो स्पष्ट होगा कि ये सभी पात्र एक-दूसरे को किन्हीं कारणों से बस 'झेल' रहे हैं।
सर्वप्रथम यदि परिवार के मुखिया के बारे में ज्ञात किया जाए तो स्पष्ट होता है कि वह स्वयं भी प्रत्येक व्यक्ति से उखड़ा-उखड़ा रहता है। वह अपनी बेकारी के प्रभाव तथा पत्नी के पुरुष-मित्रों से बहुत परेशान रहता है और स्वयं को परिवार से अलग करने की सोचता है।इस नाटक में पारिवारिक विघटन को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से गहराई से समझा जा सकता है:
पारिवारिक विघटन की गाथा
मोहन राकेश-कृत नाटक 'आधे-अधूरे' एक परिवार के विघटन की कहानी प्रस्तुत करता है। जिसमें प्रत्येक पारिवारिक सदस्य आकाश-सुमन के रूप में खुशी को घर से पृथक् देखता है। नाटक में आद्योपान्त झुंझलाहट, कड़वापन तथा कसैलापन व्याप्त है । पारिवारिक सदस्य इन सबसे ग्रस्त हैं।
आधे-अधूरे' नाटक में मोहन राकेश ने जिस परिवार को लिया है, वह मध्यम श्रेणी का परिवार है। मध्यम श्रेणी के परिवारीजन या तो उत्तम श्रेणी के होना चाहते हैं अथवा अपने आपको उत्तम श्रेणी का प्रदर्शित करते हैं। महेन्द्रनाथ का मित्र जुनेजा एक सम्पन्न एवं व्यापारिक समझ वाला व्यक्ति है। महेन्द्रनाथ पर उसका पूर्ण विश्वास था। जुनेजा महेन्द्रनाथ का घनिष्ठ मित्र भी था। जुनेजा ने जो परामर्श दिया, महेन्द्रनाथ ने उसे मान लिया। जुनेजा ने जो भी व्यापार आरम्भ किया, महेन्द्रनाथ उसी में पैसा लगाकर बराबर का हिस्सेदार बन गया। व्यापार में लाभ हुआ तो महेन्द्रनाथ और उसके मध्यवर्गीय परिवारी की अतृप्त इच्छाएँ जोर मारने लगीं। वह अपने को प्रथम श्रेणी के परिवार का सदस्य प्रदर्शित और प्रचारित करने का प्रयत्न करने लगा। उसकी आर्थिक स्थिति तो प्रथम श्रेणी के धनी परिवारों के समान नहीं हुई थी, पर उसने रहन-सहन अथवा जीवन-स्तर से अपने को प्रथम श्रेणी का दिखाना आरम्भ कर दिया। वह चार-सौ रुपये मासिक किराये के मकान में रहने लगा। उसने अपने बच्चों को कॉन्वेंट में पढ़ाना आरम्भ कर दिया। वह और उसका परिवार टैक्सी से आने-जाने लगा। शराब का खर्च बढ़ गया। उसके घर खर्चीली पार्टियाँ दी जाने लगीं। सारा पैसा व्यापार से आ रहा था। अन्त में हिसाब हुआ तो पता चला कि महेन्द्रनाथ ने अपनी लागत का सारा पैसा और अपने हिस्से का लाभ अपने ठाट-बाट में उड़ा दिया है, जबकि जुनेजा ने मूल और लाभांश दोनों को सुरक्षित रखा। ऐसा एक बार नहीं अनेक बार हुआ! परिणाम यह हुआ कि महेन्द्रनाथ के पास जो पैसा था, वह उसके हाथ से निकल गया। यही कारण था कि जुनेजा सम्पन्न बनता गया और महेन्द्रनाथ निर्धन होता गया।
दूसरों पर दोषारोपण
महेन्द्रनाथ ने जो ठाट-बाट का जीवन व्यतीत किया। उसका सुख सावित्री ने उठाया और एक प्रकार से इस सब में उसकी सहमति भी रही। बाद में सावित्री ने सारा दोषारोपण जुनेजा पर कर दिया। उसने एक प्रकार से जुनेजा को बेईमान ठहराया कि उसके हिसाब में गड़बड़ी है। साथ ही सावित्री ने अपने पति महेन्द्रनाथ पर निकम्मे, लापरवाह और दूसरों पर आवश्यकता से अधिक विश्वास करने का आरोप भी लगाया। महेन्द्रनाथ से बार-बार यह कहा जाने लगा कि तुमने जो भी काम किया, उसी में तुम्हें न केवल घाटा रहा, अपितु मूलधन भी डूब गया। इस प्रकार महेन्द्रनाथ का आत्मविश्वास समाप्त कर दिया गया।
सावित्री का घर से निकलना
महेन्द्रनाथ तो किसी काम का नहीं रहा था, इसलिए घर का खर्च चलाने के लिए सावित्री को नौकरी करनी पड़ी। सावित्री सुन्दर थी, इसलिए उसे सरलता सेकरी मिल गयी। इसका एक परिणाम तो यह हुआ कि सावित्री का आत्मविश्वास बढ़ा। घर का खर्च उसके वेतन से चलने लगा तो वह घर की मुखिया बन गयी और महेन्द्रनाथ रबर स्टाम्प के समान केवल कहने भर के लिए बच्चों का पिता और सावित्री का पति रह गया। सावित्री ठाट-बाट, भड़काऊ और प्रथम श्रेणी का जीवन बिता चुकी थी, इसलिए उस श्रेणी का जीवन स्वीकार न करके अनुचित साधन अपनाने आरम्भ कर दिये। उसने अपने कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी अर्थात् बॉस पर अपने रूप का जादू चलाकर विशेष सुविधाएँ प्राप्त कीं और दुश्चरित्र होकर भड़कीला जीवन बिताने लगी। इस प्रकार के बड़े अधिकारी सावित्री और महेन्द्रनाथ के घर पर भी आने लगे। महेन्द्रनाथ इनका विरोध करने की स्थिति में नहीं था, क्योंकि घर का खर्च न चला पाने के कारण वह घर का मुखिया नहीं रह गया था। सावित्री अपने ऑफिस के बॉस के अतिरिक्त अन्य प्रसिद्ध व्यक्तियों से भी अपने सौन्दर्य और यौवन के बल पर सम्पर्क बढ़ाने लगी।
बिन्नी का घर से भागना
सावित्री के जीवन की सबसे बड़ी असफलता मनोज से घनिष्ठता बढ़ाना है। मनोज के पास बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ और विदेश घूमने का अनुभव था । सावित्री ने उसे अपना प्रेमी समझकर उससे सम्पर्क बढ़ाया। वह एक प्रकार से सावित्री के घर ही रहने लगा। एक दिन जब वह रात में सावित्री की बड़ी लड़की को लेकर भाग गया, तब भी सावित्री की आँखें नहीं खुलीं। उसने जगमोहन से सम्बन्ध स्थापित किया। सावित्री को किसी से सन्तोष नहीं हुआ। सभी में उसे कोई-न-कोई न्यूनता प्रतीत होने लगी। वह एक के बाद एक प्रेमी बदलने लगी।
सावित्री की अन्तिम निराशा
सावित्री का आवारापन घर में किसी को पसन्द नहीं था। वह घर का खर्च चलाती थी, इसलिए कोई कुछ कहता नहीं था। बड़ा लड़का अशोक आवारा हो गया था। उसने पढ़ना छोड़ दिया था। छोटी लड़की किन्नी बारह वर्ष की अवस्था में ही स्त्री-पुरुष के आन्तरिक सम्बन्धों की बातें करने लगी थी। सावित्री को ऐसा लगा कि कोई न तो उसका आदर करता है और न घर का खर्च चलाने में उसका हाथ बँटाना चाहता है। अतः उसने सदा-सर्वदा के लिए यह घर छोड़ने का निश्चय किया। जगमोहन की पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी वह दुबारा स्थानान्तरित होकर दिल्ली आ गया था। वह सावित्री का प्रेमी रह चुका था। उसने जगमोहन से बात करके उसके साथ जीवन बिताने का निश्चय किया। उसने सबसे सुन्दर साड़ी पहनी। चेहरे पर जो झुर्रियाँ थीं, उन्हें क्रीम, पाउडर और लोशन आदि से छिपाना चाहा। सिर के बाल सफेद होने लगे थे, उन्हें काले बालों में छिपाया। जब जगमोहन ने उसे अपना बनाना अस्वीकार कर दिया तो वह उदास-निराश-सी अपने घर लौट आयी यही इस परिवार की टूटन की कहानी है।
'आधे अधूरे' केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि यह आधुनिक समाज के उस कड़वे सच को उजागर करता है जहाँ व्यक्ति अपनी निजी आकांक्षाओं, अहम और स्वार्थ के आगे परिवार की धुरी को खो देता है। नाटक का अंत भी किसी समाधान पर नहीं, बल्कि उसी अंतहीन बिखराव और ठहराव पर होता है, जो यह साबित करता है कि यह नाटक पूरी तरह से पारिवारिक विघटन की एक त्रासद गाथा है।


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