आधे अधूरे नाटक में व्यक्त आधुनिक युगबोध | मोहन राकेश

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आधे अधूरे नाटक में व्यक्त आधुनिक युगबोध मोहन राकेश महानगरीय जीवन की विसंगतियों और मध्यवर्गीय परिवार के विघटन को अत्यंत गहराई से उजागर करती है

आधे अधूरे नाटक में व्यक्त आधुनिक युगबोध | मोहन राकेश


मोहन राकेश द्वारा रचित 'आधे अधूरे' नाटक हिंदी साहित्य की एक युगांतकारी कृति है, जो आधुनिक युगबोध, महानगरीय जीवन की विसंगतियों और मध्यवर्गीय परिवार के विघटन को अत्यंत गहराई से उजागर करती है। यह नाटक पारंपरिक नाट्य शैलियों से हटकर आधुनिक मानव की आंतरिक और बाहरी दुनिया के द्वंद्व को सामने लाता है। आधुनिक युगबोध का सबसे सशक्त रूप इस नाटक में 'अधूरेपन' की त्रासदी के माध्यम से व्यक्त हुआ है। नाटक का प्रत्येक पात्र—चाहे वह सावित्री हो, महेंद्रनाथ हो, या उनके बच्चे—अपने आप में अधूरा है और किसी न किसी अभाव से जूझ रहा है।यह अधूरापन केवल आर्थिक या सामाजिक नहीं है, बल्कि यह एक गहरा मानसिक और भावनात्मक खालीपन है, जो आधुनिक जीवन की एक बड़ी विशेषता बन चुका है।

यह एक स्वाभाविक यथार्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति जिस युग में जन्म लेता है, बड़ा होता है, ने परिवेश और आस-पास के सामयिक जीवन-परिस्थितियों और वातावरण में जीकर उसका भोग करता है, वह सब कुछ उसकी अन्तश्चेतना को प्रभावित करता है। यही युगबोध कहलाता है। अतः जब वह किसी भी रूप में साधना या सृजन-प्रक्रिया, जिसकी ओर भी वह प्रवृत्त होता है। 

अपनी अभिकल्पना में युगबोध को रूपान्तरित कर दिया करता है। मनुष्य की सृजनात्मक क्रियायें और मान्यताएँ अपने युगबोध का स्वयं विश्लेषित रूप होती हैं, जिन पर इतिहास, संस्कृति और परम्पराओं का भी प्रभाव रहता है, जिसका परिणाम होता है---उसके द्वारा शाश्वत मूल्यों का विश्लेषण । इसे वह कितनी गहराई तक करता है। यह उसकी अपनी अभिकल्पनात्मक मनश्चेतना का विषय है। इसे जीवन-बोध कहा जाता है, जो वह संसार को देना चाहता है। युगबोधात्मक अभिकल्पनाओं में उसकी अपनी स्वान्तः सुखाय प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं, या फिर यदि उसकी ऐसी प्रवृत्ति का कोई सामाजिक मूल्य प्रकट होने लगे, तो वह समाज में मान्यता भी प्राप्त कर लेता है और वह उससे समयानुकूल लाभान्वित होता है।
 
आधे अधूरे नाटक में व्यक्त आधुनिक युगबोध | मोहन राकेश
सृजक कलाकार के रूप में मोहन राकेश का हिन्दी-साहित्य में पदार्पण एक महत्वपूर्ण घटना थी। उन्होंने अपने युग से पूरी तरह तादात्म्य स्थापित किया और सृजन किया। विशद् व्यापक और मूलरूप में उन्होंने अपनी सभी कृतियों में भोगे जा रहे जीवन के बोध को, उसकी वितृष्णाओं, तितीक्षाओं और विघटनशील प्रवृत्तियों को उद्घाटित करने का प्रयत्न किया। उनकी कृतियाँ, विशेषतः नाट्य-कृतियाँ चाहे ऐतिहासिक भूमि पर रची गई हैं, चाहे विशुद्ध आधुनिक सामाजिकता की भूमि पर सिरजी गई हैं, उनमे युग-चेतना, युग के भोगे जा रहे आधे-अधूरे क्षण ही सम्पूर्ण उग्रता के साथ अवतरित हुए हैं। उन्होंने ऐतिहासिक नाटकों की भी रचना की, उनका यह प्रयत्न युगबोध में अतीत का आरोपण था, इतिहास और दर्शन के माध्यम से उन्होंने अपने युगबोध को जीवनबोध से मिलाने की चेष्टा की थी। उन्होंने यही माना कि वह क्षण जिनको मोहन राकेश ने अपने नाटकों में उतार, वह एक शाश्वत बोध की धरती पर अमिट रूप से अंकित है, अतः वह उन्हें अपने ऐतिहासिक नाटकों के पात्रों (कालिदास, मल्लिका, नन्द, सुन्दरी आदि) को भी भोगते हुए दिखाते हैं, परन्तु वर्तमान की सम्वेदनात्मक प्रक्रिया वर्तमान के ही परिप्रेक्ष्य में अधिक एवं प्रत्यक्ष रूप से मुखरित हुई। इसी कारण मोहन राकेश के नाटकों के ऐतिहासिक पात्र भी उतने ऐतिहासिक प्रतीत नहीं होते, जितने कि आज के जीते-सुलगते हाड़-माँस के पुतले 'आधे-अधूरे' नाटक के पात्र जिन जीवन-प्रक्रियाओं को भोगते-गुजरते दिखाये गये हैं, जिस परिवेश में चित्रित किये गये हैं, उनकी जिस अन्तःचेतना एवं वेदना का अंकन किया गया है; वह तो है ही सम्पूर्णतः एवं समग्रतः आधुनिक युग-बोध की प्रक्रिया अतीत के साथ उस युगबोधित तत्व को जोड़ने की भी उन्होंने चेष्टा की, शाश्वत मानवीय वितृष्णा, हृदय की पीड़ा और टूटन को भी उन्होंने युगान्तरहीन सम्वेदना की गहराई तक अनुभव किया, लेकिन युग-परिवेशीय जीवन-दर्शन को वह आधे-अधूरे' में ही व्यक्त कर सके, क्योंकि वह इस युगदृश्य की संत्रासात्मकता को वहाँ नहीं ले जा सकते थे। सुदूर एवं व्यापक दृष्टि से, मानवता के ऐतिहासिक विकास-क्रम की दृष्टि से मानवीय पीड़ा, टूटन, विक्षोभ, बिखराव आदि तो चिरंतन हैं ही, परन्तु हर युग में वितृष्णात्मक स्थितियों, जिनमें यह प्रकट होते हैं, निश्चय ही हर युग की अपनी ही देन होती है और उनका महत्व चिरन्तन होते हुए भी उनकी युगबोधित रचनाओं के रूप में सदा ही अभिनव होते हैं।

मोहन राकेश के 'आधे-अधूरे' में जो द्वन्द्व उभरता है, जो प्रश्न उठाये गये हैं, उनकी कड़ियों को चाहे अतीत के खण्डहर प्राय इतिहास - जीवन से जोड़ने का प्रयत्न किया गया हो, पर वे द्वन्द्व और प्रश्नयुगीन संचेतनाओं की अकुलाहट को, ऊब और झुंझलाहट को ही व्यक्त करने वाले हैं, जिनमें 'आषाढ़ का एक दिन' का कालिदास 'आधे-अधूरे' में आकर अपनी मूल संवेदना से कटकर, बौद्धिक विवशताओं के घेरों में महेन्द्रनाथ बन गया है। वहाँ कालिदास की अहमण्यताओं से पीड़ित मल्लिका यहाँ बौद्धिक-यांत्रिक संचेतनाओं एवं आत्म-बोध के अहं से पीड़ित होकर, एक प्रकार की प्रतिकार की भावना से परिचालित होकर सावित्री बन गई है। अपने अधूरेपन के अहं का अहसास न कर जिस मल्लिका को एक ही विलोम के समक्ष अन्ततोगत्वा महज़ जीने के लिए आत्म-समर्पण करना पड़ा था, यहाँ युग-बोध के कारण पूरी तरह और के साथ जीने के लिए सावित्री को जगमोहन, जुनेजा, सिंघानिया आदि अनेक पुरुषों (विलोमों) के सामने घुटकर आत्म-समर्पण करने के लिए विवश होना पड़ रहा है। वितृष्णा-पल्लवित मानवीय सम्बन्धों की परिणति वह नारी को उसका आधुनिक परिवेश में ही दे पाये, क्योंकि जिस अनुभूति से वह विकल थे, वह ज्यों-की-त्यों वर्तमान युग-बोधात्मक थी। यही हाल 'लहरों के राजहंस' की सुन्दरी का है, उसे भी राकेश तब सावित्री के रूप में जन्म नहीं दे पाये, 'नन्द' को महेन्द्रनाथ के रूप में वह कैसे देख सकती थी।
 
मोहन राकेश मूलतः आधुनिक युग-बोध के विक्षोभ से विकल नाटककार थे, यह एक स्पष्ट यथार्थ है, जो उनकी कृतियों का मूल तत्व है। उन्होंने घुमा-फिराकर अपने सभी नाटकों में आज के घुटन-भरे व्यक्ति-जीवन का ही चित्रण किया है। उनके सभी मुख्य नाटकीय पात्र घुमा-फिराकर एक ही आन्तरिक द्वन्द्वग्रस्त चेतनाओं से ग्रस्त एवं परिचालित हैं । युग की परिस्थितिजन्य विवशताओं ने सभी को व्यवहार की वास्तविक स्थितियों का सामना कर पाने में असमर्थ होकर पलायनवादी बना दिया है। अंतः सभी इधर-उधर भागकर अपनी युगीन स्थितियों के, संत्रास विक्षोभ, आन्तरिक पीड़ा, उब आदि का ही परिचय दिया है। युग-परिवेश में उनकी झुंझलाहट और छटपटाहट का स्तर-रूप अन्य हो सकता है, परन्तु मूल-भावना में कोई अन्तर नहीं है।
 
'आधे-अधूरे' नाटक आज के मध्य और निम्न-मध्यवर्गीय जीवन में आधे-से अपने ही अधूरेपन के बोध को अन्यों पर आरोपित करके देखने की प्रक्रिया को व्यक्त करने वाला नाटक है। अपने ही अधूरेपन से संत्रस्त, ऊबा और घुट रहा व्यक्ति किन परिस्थितियों में, दबावों में और यन्त्रणाओं में जी रहा है, यह एक कटु सत्य है। उस कटु-सत्य को राकेश ने निकट से न केवल देखा है, बल्कि भोगा भी है। भोग की उस प्रक्रिया का बोध ही इस नाटक का कथ्य एवं कथानक बनकर हमारे सामने आया है। वर्गीय स्तरों पर, अपने-अपने ढंग से, अपने परिवेश, परिस्थितियों एवं स्तरों में सारा समाज ही संत्रस्त एवं पीड़ित है। काम और अर्थ के दबावों ने महत्वाकांक्षाओं से भरे मध्य एवं निम्न-मध्यवर्गीय जीवन को तो और भी अधिक विपर्यस्त, विडम्बनामय एवं संत्रस्त पीड़ित बनाकर रख दिया है। आधुनिक युग के इसी बोध को नाटककार ने एक टूटकर बिखर रहे परिवार में साकार किया है। 

आज का व्यक्ति-महेन्द्रनाथ, सावित्री और इनके आश्रितों के रूप में एक अप्रत्यक्ष टूटन, घुटन की अनुभूति से भरकर दर्द से कराह रहा है, परन्तु वह खुलकर कराह पाने की स्थिति में भी नहीं रह पा रहा है। उसकी चेतनाएँ कुण्ठित होकर ऊब से भर रही हैं। इस ऊब और कुण्ठाओं के मूल कारण क्या हैं, प्रसिद्ध कहानीकार कमलेश्वर के शब्दों में यह कुण्ठा और ऊब "अस्तित्व के संकट का परिणाम नहीं टूटते परिवार से उद्भूत है आर्थिक सम्बन्धों के दबाव से अनुस्यूत।" यह अनुस्यूति इस सीमा तक हो चुकी है टूटन के सिवाय आज के व्यक्ति की अन्य कोई नियति नहीं रह गई, परन्तु विडम्बना यह भी है कि जुड़ी हुई-सी बनी रहने को विवश भी है, जिसे तात्कालिक एवं सामयिक सुविधाओं की विवशता भरी असुविधा कह सकते हैं. तभी तो 'आधे-अधूरे' का महेन्द्रनाथ घर से जाकर भी लौट आता है, सावित्री टूटकर भी घर से टूट नहीं पाती और गहराते अँधेरे में भी उसी मनहूस-मातमी संगीत से भरे घर की कुर्सी पर बैठ जाने के लिए विवश हो जाती है। घर से भागी लड़की बिन्नी प्रकाश के हुँधले पड़कर अँधेरे के रूप में गहराने पर भी बाहर की ओर मात्र देखकर ही विवश-सी रह जाती है। अन्तः-बाह्य रूप से विद्रोही बन गये अशोक को जैसे बैठे-गले से कहना पड़ता है- "देखकर डैडी, देखकर ।"
 
'आधे-अधूरे' की ज़िन्दगी में जो कटाव है, भागते हुए भी जो ठहराव है, भीड़ में रहते हुए भी अकेलेपन का जो अहसास है, बौद्धिकता और ज्ञान-विज्ञान के साधनों के बल पर अपने-आपको 'पूरा' समझते हुए भी आन्तरिक एवं एकान्त के क्षणों में नितान्त अधूरेपन का अनुभव कर रहा है; भावात्मक सम्बन्धों की असहनीयता, अविश्वास, असन्तोष, असुरक्षा की दुर्दान्त भावनाएँ उभर रही हैं। युग या आधुनिकता का बोध इस नाटक में कहाँ तक हो पाया है, डॉ. मदान के शब्दों में देखिये- यह नाटक एक खाका है, तस्वीर नहीं है, महज एक टूटते हुए परिवार का खाका है, तस्वीर नहीं बन सकी।" तस्वीर बन भी कैसे सकती थी! तस्वीर में एक रंग, एक रूप रहता है, जबकि नाटक में व्यक्त जीवन में कोई रंग, कोई रूप रह ही नहीं गया है। 

वितृष्णा और विद्रूप से भरे चेहरों को हम रंग-रूप वाले ऐसे चेहरे नहीं बना सकते, जिनकी कि कोई स्पष्ट तस्वीर बन सके, उनका तो आधा-अधूरा मात्र खाका ही बन सकता है, जो नाटककार मोहन राकेश ने बनाया है। वे आगे लिखते हैं-"इसके सारे चित्र रूढ हैं. जिनकी निजता नहीं है, इसमें संत्रास का बोध नहीं होता, स्थितियाँ चरित्रों के बने-बनाये व्यक्तित्व को तोड़ती नहीं है, इनकी खुद की जिन्दगी नहीं हैं, परिवेश की जिन्दगी है ।" जब जिन्दगी ही अपनी न होकर महज़ परिवेश की हो तो फिर कोई पूरा चित्र कायम किया ही कैसे जा सकता है ? वास्तव में नाटक आज की अनवरत बिखर रही परिस्थितियों और प्रवृत्तियों को अंकित करने के लिए रचा गया है। इस दृष्टि से कुछ आलोचक जो इसमें समग्रता एवं एकतानता के अभाव का आरोप लगाते हैं, उनके विचार अपनी ही समझदारी के परिचायक हैं, 'आधे-अधूरे की बोध आत्मक संयोजना के नहीं।आज का जीवन अनिश्चितताओं की संज्ञा एवं अभिहिती बनकर रह गया है। नाटककार को आन्तरिक स्तर पर इसका अहसास है और वास्तव में जीवन और व्यक्ति का यही अधूरापन भी है। इसी कारण नाटककार ने युग-सापेक्षता के साथ नाटक के आरम्भ में ही कहलवा दिया है- 

"परन्तु मैं अपने सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कह सकता-उसी तरह जैसे इस नाटक ('आधे-अधूरे) के सम्बन्ध में नहीं कह सकता, क्योंकि नाटक भी अपने में मेरी ही तरह अनिश्चित है। अनिश्चित होने का कारण यह है कि परन्तु कारण की बात करना बेकार है। कारण हर चीज़ का कुछ-न-कुछ होता है, हालाँकि यह आवश्यक नहीं कि जो कारण दिया जाय, वास्तविक कारण वही हो और जब मैं अपने ही सम्बन्ध में निश्चित नहीं हूँ, तो फिर किस चीज के कारण अकारण के सम्बन्ध में निश्चित कैसे हो सकता हूँ ?"

अंततः, 'आधे अधूरे' नाटक किसी पारंपरिक सुखांत या दुखांत पर समाप्त नहीं होता, बल्कि एक अंतहीन चक्र की तरह वहीं लाकर छोड़ देता है जहाँ से शुरू हुआ था। यही इस नाटक का वास्तविक आधुनिक युगबोध है, जो मनुष्य को उसकी नियति, अधूरेपन और निरर्थकता के बोध के साथ आमने-सामने खड़ा कर देता है।

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