मोहन राकेश द्वारा रचित आधे अधूरे नाटक समकालीन हिंदी साहित्य की एक युगांतकारी कृति है, जो आज छह दशक बीत जाने के बाद भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी अपन
आधे अधूरे नाटक वर्तमान समय में भी प्रासंगिक है | मोहन राकेश
मोहन राकेश द्वारा रचित 'आधे अधूरे' नाटक समकालीन हिंदी साहित्य की एक युगांतकारी कृति है, जो आज छह दशक बीत जाने के बाद भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी अपने रचनाकाल (1969) में थी। यह नाटक केवल एक मध्यवर्गीय परिवार के विघटन की कहानी नहीं है, बल्कि मानव मन की सनातन अतृप्ति, महानगरीय जीवन के खोखलेपन और पारिवारिक संबंधों में आती दरारों का एक जीवंत दस्तावेज है। वर्तमान समय में उपभोक्तावादी संस्कृति और तीव्र महानगरीय होड़ ने इंसानी जीवन को और अधिक जटिल बना दिया है, जिसके कारण इस नाटक में उठाए गए मुद्दे आज हमारे समाज के और अधिक निकट प्रतीत होते हैं।
'आधे-अधूरे' में नाटककार एकदम नये सृजक एवं कल्पनाशील व्यक्ति के रूप में प्रकट हुआ है। इस नाटक की वस्तु-योजना आज के अधिकांश मध्यवर्गीय परिवारों के जटिल द्वन्द्व की कथा बनकर उभरी है। अतः 'आधे-अधूरे' का वस्तु-संगठन आज के जीवन का तथ्यपरक यथार्थ कहा जा सकता है। इसकी विशेषताएँ, आधुनिक जीवन की युगबोधात्मक अन्तर्द्वन्द्विक बाह्य और आन्तरिक परिस्थितियों से घटनाक्रम का विकास हैं।
मोहन राकेश का 'आधे-अधूरे' नाटक सर्वप्रथम 'धर्मयुग' साप्ताहिक के तीन-चार अंकों में सन् 1969 में प्रकाशित हुआ था। बाद में पुस्तकाकार में प्रकाशित हुआ। जिन दिनों यह नाटक रचा जा रहा था, उन दिनों ऐसा प्रतीत होता है कि नाटककार व्यवहार और भावना दोनों के स्तर पर एक ओर तो स्वच्छन्द यौनाचारों के प्रवाह, बल्कि बाढ़ की अनुभूति में भर रहा था, जबकि दूसरी ओर परिवारों में विशेषतः पुरुषों के निष्क्रिय और नारियों के सक्रिय हो जाने के कारण आने वाले आर्थिक वैषम्यों के कारण उत्पन्न गहनतम स्थितियों का निरीक्षण एवं अनुभव कर रहा था। राकेशजी ने युग को विशेषकर मध्य वित्त-वर्ग के सामाजिक-आर्थिक मानों-मूल्यों को एक परिवार पर केन्द्रित करके पारिवारिक एवं मानव-मूल्यों के विघटन को अपनी वस्तु-योजना का मूल आधार बनाया है। इसमें नाटककार ने अर्थ और काम की दृष्टि से महानगरीय जीवन की घुटन का चित्रण अत्यधिक यथार्थवादी ढंग से किया है। इस नाटक के कथानक का समूचा बोध युग का यथार्थ बोध है, समग्र एवं सम्पूर्ण बोध-पूर्ववर्ती नाटकों के समान 'क्षण-बोध' नहीं।
वस्तु विधान में नाटककार ने एक मध्यवर्गीय परिवार को अपना केन्द्र-बिन्दु बनाया है। एक परिवार है जिसकी मध्यवर्गीय वित्त-स्थिति मध्यवर्गीय पारिवारिक स्थिति जैसी भी नहीं है, परन्तु स्तरीय दृष्टि से उसे मध्यमवर्गीय परिवारों के मध्यक्रम स्तर पर ही माना जा सकता है। परिवार का मुखिया पुरुष पात्र अकर्मण्य, निकम्मा और आत्मविश्वास से हीन है। वह अपनी इस स्थिति का अनुभव तो करता है, पर सिवाय छटपटाहट के कुछ भी कर पाने में समर्थ नहीं हो पाता। इसी कारण परिवार के मुखिया के रूप में वह सम्मानजनक नहीं रह पाता। उसे आर्थिक दृष्टि से एकदम अपनी कमाऊ पत्नी पर आश्रित होकर रह जाना पड़ता है। अतः उसकी स्थिति का दयनीय हो जाना नितान्त स्वाभाविक ही कहा जायेगा। उस पर कमाऊ पत्नी के व्यंग्य, बड़ी ही दयनीय पर विचित्र परिस्थिति का विधान कर देते हैं। इन्हीं स्थितियों में नारी-पुरुष (पति-पत्नी) दोनों ही अपने जीवन को ढोते प्रतीत हो रहे हैं, इसका प्रभाव उनके बच्चों पर कैसा पड़ा है, पड़ रहा है, यह बात भी नाटक का विशिष्ट आधार है। बड़ी लड़की बिन्नी अपनी माँ के प्रेमी के साथ भाग जाती है, पर वहाँ भी उसे मायके के परिवार जैसी टूटन का अनुभव करना पड़ता है। परिवार का लड़काअ अशोक और छोटी लड़की किन्नी भी उसी प्रकार की असमर्थताओं एवं वैषम्यों का शिकार होकर टूटते-बिखरते दिखाई देते हैं। छोटी लड़की जिद्दी है और लड़का, आवारगी को ढोता हुआ किसी तरह जी रहा है। बस, यही उस मध्यवर्गीय परिवार का केन्द्र-बिन्दु है, जिस पर 'आधे-अधूरे' नाटक की समूची वस्तु-योजना आधारित है। अर्थ की भूख के साथ फिर जब काम (Sex) की भूख भी मिल जाती है, तब तो स्थिति संस्कारों को भी डसने लगती है। विघटन की जो अनवरत प्रक्रिया अर्थ-काम के आस-पास हो रही है, उसी की सजीव योजना को साकार करने की नाटककार ने चेष्टा की है। यह समझने की बात है कि प्रायः सभी ऐसे परिवारों की दशा ऐसी नहीं होती, क्योंकि पूर्ववर्ती संस्कार और परम्पराओं का आधुनिकता पर दवाब किसी न किसी रूप में बना रहता है।
नगरीय परिवार की आत्म-कुण्ठाओं, हीनताओं आदि से भरे खट्टे एवं कड़वे जीवन का चित्रण प्रस्तुत करती है। इस वर्ग की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि यहाँ अपनी गलती कोई भी स्वीकार नहीं करना चाहता। स्वयं के अधूरेपन को न तो कोई स्वीकारना ही चाहता है, और न उसे दूर कर अन्यों के अस्तित्व को स्वीकार करना चाहता है। वह स्वयं अधूरा है, पर उसे दूसरे का अधूरापन सह्य नहीं है। महेन्द्रनाथ का प्रस्तुत परिवार भी ऐसा ही है, जो इस नाटक की वस्तु-योजना का वर्ण्य विषय एवं केन्द्र है। लगता है कि यहाँ सभी अधूरे व्यक्तित्व, अपने अधूरेपन को विस्मृत करके किसी पूरे आदमी और व्यक्तित्व की तलाश में अनवरत भटक रहे हैं अर्थात् जो थोड़ा-बहुत सही है भी, इस तलाश में उससे भी हाथ धोते जा रहे हैं। इसी कारण उनका जीवन एक जीवन्त नरक बनता जा रहा है। नाटक की नायिका सावित्री अपने पति महेन्द्र नाथ को अधूरा मानकर एक स्थल पर कहती है-"असल में आदमी होने के लिए क्या यह जरूरी नहीं है कि उसमें अपना एक माद्दा, अपनी एक शख्सियत हो।" पर वह यह भूल जाती हैं कि अधूरे स्त्री-पुरुष मिलकर ही जीवन को पूरा बना सकते हैं। इसी कारण वह महेन्द्रनाथ को अधूरा मानकर, अपनी ही तरह का जीवन जीने की साध लेकर अन्य अनेक अधूरे आदमियों के व्यामोह में उलझकर और अधिक घुटन टूटन सहने के लिए बाध्य होती रहती है। इस टूटन और घुटन को मिटाने के लिए ही वह क्रमशः शिवजीत, जगमोहन, जुनेजा और बॉस सिंघानिया के आस-पास मँडराती है, पर कहीं भी उसे वह पूरापन दिखाई नहीं देता, जिसे वह एक साथ, एक ही स्थान पर प्राप्त करना चाहती है। उसकी इसी धारणा एवं चिन्तन का ही पूर्ण विकास वस्तु-योजना में मूलतः चित्रित किया गया है, बाकी सब तो इसी की परिणति एवं परिणाम हैं।
नाटक की यह एक विशिष्टता है कि उभरती हुई नव-संस्कृति का कटु सत्य बड़े ही निर्मम रूप में उभरता है और नाटककार उसे अत्यन्त कलात्मक ढंग से पूरी निर्भयता से चित्रित भी करता है। मानव के बौद्धिक विकास की जो धारा स्वच्छन्द रूप में फैलकर सामाजिक चेतना को घेर लेना चाहती है। उसकी आर्थिकता और वैयक्तिकता में काम - प्रेरणायें जिस प्रकार उभर रही हैं, उनको जिस प्रकार नाटककार ने प्रस्तुत है, वह निश्चय ही सराहनीय है, वह दर्शक को झकझोरती भी है, और उसके रसतत्व से गुदगुदाती भी है।
आधुनिक विघटित होते समाज का संशयग्रस्त, अतृप्त और हीनताओं से आक्रान्त एक सर्वव्यापी मानव यहाँ एक परिवार के परिवेश में टूटता-सा दिखाई देता है परन्तु विडम्बना यह भी है कि वह अपने आपको ही अपने अधूरेपन और हीनताओं में नकार डालना चाहता है, तभी तो नाटक में जिस परिवार का प्रतीक के रूप में चित्रण हुआ उसके सभी सदस्य पूर्णतया खण्डित ही प्रतीत होते हैं।
यहाँ विवाह नामक सामाजिक संस्था भी न केवल विघटित होती, बल्कि एक नकार से भरती हुई दिखाई देती है, तभी तो सावित्री बेधड़क रूप से एक के बाद एक पुरुष को बदलती जाती है। अन्त में वह घर-परिवार तक से अलग हो जाने का निर्णय कर लेती है। वह तो जगमोहन है जो कि सब परिस्थितियों एवं आयु आदि से इस स्थिति तक पहुँच जाने पर उसे नकार देता है, फिर जुनेजा के यहाँ कभी न आने के लिए गया महेन्द्रनाथ भी लाठी टेकता हुआ लौट आता है, जिस कारण सावित्री को कुर्सी थामकर उसी पर बैठ जाने के लिए बाध्य हो जाना पड़ता है, नहीं तो विवाह, घर-परिवार आदि के नाम पर शेष कुछ भी नहीं रह गया। अपने पति को अधूरा मानकर उसकी तरफ से वितृष्णा का भाव लेकर सावित्री यद्यपि अपने घर-परिवार को आर्थिक दृष्टि से चलाने का प्रयत्न करती है, और इस प्रयत्न में ही वह अनेक पूर्ण समझे जाने वाले पुरुषों के सम्पर्क में भी आती है, इस प्रकार उसके जीवन के बाईस वर्ष बीत जाते हैं; पर वह अपने पति और अपनी परिस्थितियों के साथ समझौता नहीं कर पाती।
वह वस्तुतः आधुनिक संस्कृति में महत्वाकांक्षा पीड़ित महिला का प्रतिनिधित्व करती है, जो सामाजिक सामंजस्य के प्रति वितृष्णा से भरी हुई है। उसकी सन्तान का भी यही हाल है। इन स्थितियों में ही कथावस्तु का विकास होता है। उसका एक प्रेमी उसकी लड़की को ही भगा ले जाता है। मानसिक असन्तुलन के कारण उसका क्रोध एवं क्रूरता बढ़ जाती है। उसका सीधा प्रभाव महेन्द्रनाथ और अशोक पर तो पड़ता है ही, छोटी लड़की किन्नी भी उससे नहीं बच पाती। युवक अशोक इस सारी स्थिति को भली प्रकार समझता है।
आज की परिस्थितियों में इस वर्ग की अन्य कोई नियति भी तो दिखाई नहीं देती। इसी नियति को ओढ़कर आज सभी को जीना है, पुरुष को भी और उनसे प्रभावित होकर उनकी अपनी ही सन्तानों को जीवन के बोझ को, बल्कि अपनी ही लाशों को ढोना है। यही आधुनिक वस्तु-योजना और उसके विकास की चरम परिणति है और यही उसका सार तत्व है।
'आधे अधूरे' की प्रासंगिकता इस बात में भी है कि यह किसी एक कालखंड या परिस्थिति तक सीमित नहीं है। मोहन राकेश ने यह स्थापित किया है कि अधूरापन किसी बाहरी परिस्थिति के कारण नहीं, बल्कि मानव स्वभाव की आंतरिक कमजोरी और अंतहीन इच्छाओं के कारण होता है। जब तक मनुष्य अपनी सीमाओं को स्वीकार नहीं करता और दूसरों में पूर्णता ढूंढता रहता है, तब तक वह 'आधा-अधूरा' ही रहेगा।यही सार्वभौमिक सत्य इस नाटक को आज के दौर में भी एक प्रासंगिक, प्रभावशाली और कालजयी रचना बनाता है।


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