लहरों के राजहंस नाटक का सारांश | मोहन राकेश

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लहरों के राजहंस नाटक का सारांश मोहन राकेश यह नाटक अश्वघोष के महाकाव्य 'सौन्दरानन्द' पर आधारित है। इसमें महात्मा बुद्ध के सौतेले भाई नन्द के अंतर्द्वंद

लहरों के राजहंस नाटक का सारांश | मोहन राकेश


हरों के राजहंस, हिंदी के प्रसिद्ध नाटककार मोहन राकेश द्वारा रचित एक ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक नाटक है, जिसका प्रकाशन सन् १९६३ (1963) में हुआ था। यह नाटक अश्वघोष के महाकाव्य 'सौन्दरानन्द' पर आधारित है। इसमें महात्मा बुद्ध के सौतेले भाई नन्द के अंतर्द्वंद्व (मन के संघर्ष) को दर्शाया गया है, जो भौतिक सुख-सुविधाओं (काम) और आध्यात्मिक शांति (अध्यात्म) के बीच फंसा हुआ है।

नाटक की कथावस्तु तीन अंकों में विभाजित है और मुख्य रूप से नन्द और सुन्दरी के महल के इर्द-गिर्द घूमती है:

पहला अंक

कामोत्सव की तैयारी - 'लहरों के राजहंस' नाटक का आरम्भ महाराज नन्द के भवन में सुन्दरी के कक्ष में क्रामोत्सव की तैयारी से होता है। रात उतरने का समय है। श्वेतांग, श्यामांग, अलका आदि कर्मचारी साज-सज्जा में व्यस्त हैं। कोई फूल सजा रहा है तो कोई कोष्ठों को व्यवस्थित कर रहा है और कोई मुद्राएँ अंकित करने में व्यस्त है। श्यामांग पत्तियों के ढेर में उलझा हुआ है और श्वेतांग अग्नि काष्ठ से दीपक जला रहा है। श्वेतांग ही प्रधान कर्मचारी - है। इसलिए वह अन्य कर्मचारियों के काम के प्रति भी सचेत है। नागदास, नीहारिका, शेफालिका, बीजगुप्त और मन्दारक आदि दास-दासियाँ सज्जा सम्बन्धी कार्यों में संलग्न हैं।
 
सुन्दरी की आकांक्षा और आदेश- जिस समय कर्मचारीगण कामोत्सव की साज-सज्जा में व्यस्त हैं, उसी समय अलका के साथ बातचीत करती हुई नन्द की रानी सुन्दरी आती है और अलका को बताती है कि कामोत्सव इस प्रकार मनाया जाना चाहिए कि लोगों को भोजन, आपानक और नृत्य वर्षों तक याद रहें। उत्सव रात के अन्तिम प्रहर तक होना चाहिए। उसकी इस बात पर अलका के मन में कुछ आशंकाएँ उठती हैं किन्तु उसकी शंकाओं का निवारण करते हुए सुन्दरी उससे कहती है कि जब नगरवधू चन्द्रिका के चरणों की गति से भवन की हवा रात भर काँपती रहेगी तो फिर शंका किस बात की है। वह दृश्य ऐसा होगा कि तू देखेगी और विश्वास नहीं कर पाएगी। किन्तु जो नहीं देखेंगे वे तो इसकी कल्पना भी नहीं कर पायेंगे।
 
इसी समय सुन्दरी साज-सज्जा से सम्बन्धित कतिपय आदेश देती है। शशांक को विशेष मदिराएँ प्रस्तुत करने के लिए नियुक्त किया गया है। साज-सज्जा में अनेक प्रकार की सुगन्धियों, पुराने रसों और आसवों को मिलाकर तैयार किये गये अनेक प्रकार के मिश्रणों, भोज और पान आदि की पूरी तैयारी के लिए अलका को आदेश दिया जाता है। इसी स्थान पर श्यामांग सूचना देता है कि कल प्रातः देवी यशोधरा भिक्षुणी के रूप में दीक्षा ग्रहण करेंगी। ऐसा प्रतीत होता है कि श्यामांग एक ओर कामोत्सव और दूसरी ओर यशोधरा द्वारा दीक्षा ग्रहण करने से खिन्न-सा हो गया है। 
लहरों के राजहंस नाटक का सारांश | मोहन राकेश

अलका का स्वप्न-सुन्दरी और अलका की बातचीत के अन्तर्गत अलका उसे बताती है कि प्रभात में नींद टूटने से पहले उसने स्वप्न में देखा-सूखा सरोवर, पत्रहीन वृक्ष और भरा धूल आकाश। इस पर सुन्दरी कहती है कि यह भरा-पूरा यौवन और हृदय में धूल भरा आकाश। इसका कुछ उपाय करना होगा। अलका की इस शंका पर कि प्रभात के सपने सच नहीं होते हैं, सुन्दरी बताती है—सुना है, सच होते हैं। यदि जल्दी ही तेरा भी उपाय न किया गया तो कल तू भी भिक्षुणी बनने की सोचने लगेगी।

नारी विषयक सुन्दरी की मान्यता-अलका सोचती है कि कल भिक्षुणी के वेश में देवी यशोधरा कैसी लगेंगी ? सुन्दरी की मान्यता है कि नारी का आकर्षण पुरुष को पुरुष बनाता है, तो उसका आकर्षण उसे गौतम बुद्ध बना देता है। चूँकि यशोधरा सिद्धार्थ को अपने आकर्षण में नहीं बाँध सकी, इसलिए सिद्धार्थ बुद्ध बन गए। वह यह भी मानती है कि गौतम के प्रति प्रजा में जो आकर्षण है, वह उनकी बोध-प्राप्ति के कारण नहीं है, बल्कि जीवन की एकरसता से ऊबे हुए लोगों को नवीनता चाहिए, इसलिए वे दूध-फेन के उत्साह की तरह उमड़ पड़ते हैं। यह उत्साह अस्थायी है और चार दिन बाद समाप्त हो जाएगा।

कमल-ताल में पत्थर गिरना और हंस-क्रन्दन-सुन्दरी और अलका बातचीत कर रही हैं कि तभी कमल-ताल' में किसी के पत्थर फेंकने की आवाज आती है। हंस पंख फड़फाड़ने लगते हैं और क्रन्दन करने लगते हैं। इस पर अलका और सुन्दरी को यह चिन्ता हो जाती है कि आखिर उन पर पत्थर कौन फेंक रहा है। वे सोचती हैं कि यह एक आकस्मिक घटना है या जान-बूझकर किया जा रहा है। बाद में पता लगता है कि श्यामांग ताल में दिखाई देने वाली किसी छाया पर पत्थर फेंक रहा है। पूछने पर स्वयं श्यामांग बताता है कि उसने एक बहुत डरावनी और बराबर लम्बी होती जा रही छाया पर पत्थर फेंके थे। श्यामांग द्वारा यह सारा विवरण बताने पर सुन्दरी यह मानती है कि वह बे-सिर-पैर की बातें करता है और उसकी ये बातें विश्वसनीय नहीं हैं।

श्यामांग छाया को हटाना अपराध नहीं मानता। किन्तु अलका कहती है कि तुम्हारा मन कहीं और था तुम्हें पता ही नहीं चला कि कब तुमने पत्थर उठाए और कब फेंकने लगे। किन्तु उसकी बात को श्यामांग नहीं मानता। सुन्दरी भी श्यामांग पर आरोप लगाती है कि उसका मन कहीं और था। जब वहाँ काम कर रहा था तब वह छाया उसके सिर पर मँडरा रही थी। सुन्दरी आदेश देती है कि श्यामांग को अन्ध कूप में उतार दिया जाए। वह कहती है कि वहाँ तुम्हें पूरा अवकाश रहेगा और वह छाया तु इारे पास फटकने नहीं पाएगी।

श्यामांग की सज्जा पर अलका की चिन्ता-जब सुन्दरी श्यामांग को अन्धकूप में उतरने का आदेश देती है तो अलका चिन्तित हो जाती है और उसकी चिन्ता के विह्न उसके चेहरे पर स्पष्टतः दिखाई देने लगते हैं। इस पर सुन्दरी उससे पूछती है कि क्या तू स्थान के अपशकुन के कारण चिन्तित है। इस पर अलका बताती है कि श्यामांग ने जो कुछ किया है, वह शायद उसने जान-बूझकर नहीं किया। मैं छाया की बात में विश्वास नहीं करती। उसे धीरे-धीरे कुछ होता जा रहा है। वह अपनी मानसिक शक्तियों पर अब अपना अधिकार खोता जा रहा है। वह अन्दर ही अन्दर कहीं खोता-सा जा रहा है, उसके मन में कुछ प्रन्थियाँ-सी उलझ गयी हैं, जिनके कारण उसे सजा नहीं, सहानुभूति की आवश्यकता है। इस पर सुन्दरी उससे कहती है कि ऐसा तो नहीं है कि तू उससे प्रेम करने लगी हो। तभी तो तू चाहती है कि उसे दण्ड न दिया जाये। अलका सुन्दरी से अपना आदेश बदलने के लिए निवेदन करती है। 

कामोत्सव- प्रायोजन विषयक नन्द-सुन्दरी वार्ता-सुन्दरी और अलका की उक्त वार्ता के बीच ही नन्द का आगमन होता है, किन्तु सुन्दरी उसका आना लक्ष्य नहीं कर पाती । नन्द दो घूँट मदिरा पीकर चषक रख देता है तभी सुन्दरी का ध्यान नन्द की ओर जाता है। नन्द आखेट से लौटा है किन्तु आज कोई मृग आदि का शिकार नहीं कर पाया है। मृग की चर्चा के बाद. कामोत्सव में आमन्त्रित लोगों के आने के सम्बन्ध में बातचीत करते हैं। नन्द बताता है कि वह मार्ग में आने वाले कुछ लोगों से मिलकर आया है। वह यह भी कहता है कि देवी यशोधरा ने यह कहला भेजा कि वे कल से भवन में नहीं रहेंगी। तभी वहाँ श्वेतांग आता है और सुन्दरी उससे कहती है कि उसने श्वेतांग को क्षमा कर दिया है और उसे कर्मचारियों वाले कक्ष में रखा जा सकता है। नन्द श्यामांग का अपराध जानने का प्रयास करता है तो सुन्दरी क्रोधावेश में आ जाती है और नन्द द्वारा बार-बार पूछने पर कहती है कि जब मैंने उसे क्षमा कर दिया तो बात समाप्त हो जाती है। नन्द का श्यामांग के प्रति विशेष अनुराग है, इसलिए सुन्दरी उसे व्यंग्य करती है कि उसकी बातों में आपको अपने अन्तर्मन की छाया झलकती दिखाई देती है ।

नन्द चूँकि आखेट से लौटते समय बहुत से आमन्त्रित लोगों के यहाँ होकर आया है, इसलिए उसका कहना है कि अधिकांश लोग नहीं आयेंगे। इधर नन्द का आमन्त्रित मित्र मैत्रेय सूचना देता है कि रविदत्त, अग्निवर्मा, नीलवर्मा, ईषाण, शैवाल- सभी ने आने में असमर्थता प्रकट करते हुए क्षमा-याचना की है। इस पर मैत्रेय का सुझाव है कि आज का आयोजन यदि आज के स्थान पर कल रखा जा सकता तो. । नन्द का भी यही विचार है। उनका यह प्रस्ताव सुन्दरी स्वीकार नहीं करती और कहती है, “कामोत्सव कामना का उत्सव है, आर्य मैत्रेय ! मैं अपनी आज की कामना कल के लिए टाल रखूँ "क्यों ?' मेरी कामना मेरे अन्तर की है। मेरे अन्तर में ही उसकी पूर्ति भी हो सकती है। बाहर का आयोजन उसके लिए उतना महत्व नहीं रखता, जितना कुछ लोग समझ रहे हैं। वह मैत्रेय से कहती है कि वह जिन-जिनके यहाँ होकर आये हैं, उनसे कह दें कि वे मेरे यहाँ आने के लिए कल की प्रतीक्षा में न रहें। वह कल अब उनके लिए कभी नहीं आयेगा।” इसके बाद वह कोई बात नहीं सुनती और मैत्रेय लौट जाता है।

दूसरा अंक

श्यामांग का प्रलाप—दूसरे अंक का दृश्य पहले दृश्य के कक्ष से ही प्रारम्भ होता है रात का अन्तिम प्रहर है । सुन्दरी झूले में सो रही है और नन्द अस्थिर भाव से कक्ष में टहल रहा है। अन्धेरे में उसकी आकृति एक चलती-फिरती छाया की तरह दिखाई देती है । नेपथ्य से श्यामांग का ज्वर-प्रलाप सुनाई दे रहा है। वह कह रहा है—“कहाँ हूँ मैं ? क्यों हूँ यहाँ ? मेरा स्वर, पानी की लहरों का स्वर, संब-कुछ एक आवर्त में घूम रहा है। एक चील एक चील सब कुछ झपटकर लिए जा रही है। इसे रोको। इसे रोको ।" कभी कहता है-“अन्ध कूप में पानी नहीं है। इसका पानी कहाँ गया ? इसका पानी कौन ले गया ? मुझे पानी ला दो पानी।” तभी अलका उसे पानी देती है। अलका को नन्द के द्वारा उसकी सेवा के लिए नियुक्त किया गया है। 

नन्द की व्यग्रता — एक ओर श्यामांग का प्रलाप सुनायी देता है तो दूसरी ओर नन्द अत्यन्त व्याकुल है, क्योंकि उसकी पत्नी कामोत्सव की असफलता के कारण अत्यन्त व्यग्र होने के साथ सोई हुई है। एक ओर वह श्यामांग के प्रलाप से व्यथित है तो दूसरी ओर भी चिन्ता है कि कहीं सुन्दरी जग न जाये। उसके प्रलाप के कारण और सुन्दरी की व्यग्रता के कारण उसे नींद नहीं आ रही है। वह श्यामांग के प्रलाप को रोकना चाहता है किन्तु असमर्थ है। अनायास सुन्दरी हल्की-सी अँगड़ाई लेकर आँख खोल देती है और नन्द के न सोने का कारण पूछती है। नन्द कक्ष में चारों ओर बिखरा हुआ सामान देखता है जो सुन्दरी ने उत्तेजनावश फेंक दिया है। वह सोचता है कि उसका यह विक्षोभ स्वाभाविक ही था। इसलिए नन्द उससे कहता है कि दास-दासियाँ सब कुछ इस तरह पड़ा देखेंगी तो क्या सोचेंगी। इस पर सुन्दरी कहती है कि हमारे अन्तरंग जीवन को लेकर कुछ भी सोचने का अधिकार नहीं है। नन्द बिखरी हुई वस्तुओं को सहेजता हुआ कहता है कि कहने का अधिकार न हो, परन्तु सोचने का अधिकार तो हर एक को रहता ही है।

सुन्दरी की नन्द से क्षमा-याचना-अपने रात के व्यवहार के लिए सुन्दरी नन्द से क्षमा-याचना करती है कि उसने उस व्यवस्था में सब कुछ उलट-पलटकर रख दिया। इस पर नन्द कहता है कि तुम्हें मन में खेद नहीं लाना चाहिए क्योंकि इस मनःस्थिति में तो शायद मैं भी वही करता जो तुमने किया। अन्त में पति-पत्नी इस बात पर समझौता कर लेते हैं कि कल की बात पर कोई नहीं सोचेगा। सुन्दरी अपना सौन्दर्य प्रसाधन कर रही है और नन्द को परिहासपूर्ण दण्ड देने का आदेश देती है।

गौतम का भिक्षाटन और नन्द का दर्पण भंजन—जब राजा नन्द अपनी रानी सुन्दरी के माथे पर विशेषक लगा रहा है कि अचानक भिक्षुओं का प्रभाती स्वर सुनाई देता है और तभी नन्द का हाथ हिल जाने से उसका दर्पण गिरकर चूर-चूर हो जाता है। इस पर नन्द अत्यन्त व्याकुल हो जाता है और सुन्दरी रानी रूठकर एकान्त में चली जाती हैं।
 
उसी समय नन्द के पास अलका भागती हुई आती है और बतलाती है कि उनके दरवाजे पर गौतम भिक्षा लेने आये थे, किन्तु दो बार याचना करने पर भी कोई उनके पात्र में भिक्षा डालने नहीं आया। वह कहती है कि मैं आपको अपनी ओर से वचनमुक्त कर रही हूँ। तो नन्द कहता है कि मैं नदी तट पर जाकर घड़ी भर में लौटकर आता हूँ। सुन्दरी बताती है कि मैं अपने माथे के सूर्य को सूखने नहीं दूँगी और शेष प्रसाधन भी आपके आने पर ही करूँगी।

तीसरा अंक

तीसरे अंक में भी कपिलवस्तु में राजकुमार नन्द के भवन में उसकी पत्नी सुन्दरी के कक्ष का चित्रण किया गया है जिसमें अगली रात के बीच का पहर है। कक्ष में सब कुछ अव्यवस्थित है । वहाँ एक सूनेपन का आभास होता है। वहाँ कोई व्यक्ति नहीं है। सामने का द्वार बन्द है, उद्यान की ओर से सुन्दरी और अलका बात करती हुई आती हैं, सुन्दरी के बाल अब भी खुले हैं। उसके भाव में कठोरता है और वेष दूसरे अंक के अन्त का है।

हंसों का पलायन - अलका और सुन्दरी की बातचीत से स्पष्ट होता है कि राजहंस सरोवर से गायब हो गये है। इसके विषय में किसी को कोई जानकारी नहीं है कि यह घटना दिन की है या रात की । सुन्दरी को यह विश्वास नहीं होता कि राजहंसों को कमल ताल से कोई चुराकर ले गया है। इधर सुन्दरी कुमार नन्द के न लौटने से व्याकुल है और उसकी प्रतीक्षा कर रही है। अलका के पूछने पर वह कहती है कि मैं अब उनके (नन्द) लौटने की प्रतीक्षा नहीं कर रही हूँ। यदि ऐसा होता है तो अपने माथे का बिन्दु सूख जाने न देती। मुझे खेद है कि जितने समय तक इसे गीला रखना चाहिए था, उससे कहीं अधिक समय तक मैंने गीला रखा।
 
नन्द के विषय में श्वेतांग की सूचना-तभी श्वेतांग आ जाता है और अलका के पूछे जाने पर वह नन्द के सम्बन्ध में सूचना देता है। चूँकि इस समय सुन्दरी अपने झूले में सो चुकी है इसलिए वह श्वेतांग के आते ही उसके पास धीरे से चली जाती है और धीमे स्वर में बात करने का संकेत करते हुए उससे नन्द के विषय में पूछती है। श्वेतांग बताता है कि जिस समय नन्द वहाँ पहुँचे, तथागत लोगों से घिरे थे। इसलिए नन्द उनसे नहीं मिल सके। अवसर मिलते ही उन्होंने तथागत को प्रणाम किया और एक बार अपने यहाँ उनसे आतिथ्य स्वीकार करने को कहा । तथागत ने कुछ देर तक स्थिर दृष्टि से कुमार को देखा और अपने पीछे आने का संकेत करके विहार में चले गये। वहाँ कुमार को दीक्षित करने का आदेश हुआ । किन्तु कुमार के विरोध के बावजूद दीक्षित कर दिया गया। उनके केश कटते रहे और तथागत उन्हें भोग और अभोग, कामना और अकामना के सम्बन्ध में बताते रहे। दीक्षा के बाद तथागत ने अपना रक्षा पात्र उनके हाथ में देना चाहा, किन्तु कुमार ने वह पात्र अस्वीकार कर दिया और तथागत को बिना प्रणाम किये हुए ही विहार से निकलकर घने जंगल की ओर चले गये, श्वेतांग ने यही बताया कि मैत्रेय भी दीक्षित हो गये हैं।
 
नन्द की सुन्दरी से भेंट-वन से लौटकर नन्द जब यह देखता है कि सुन्दरी सो रही है और उसका विशेषक सूख गया है तो वह झूले के पास सुगन्धित जल की कटोरी उठाकर उसका विशेषक गीला करने लगता है। उँगली का स्पर्श पाते ही सुन्दरी अचानक अर्द्ध-चेतनावस्था में चौंक जाती है। अलका और श्वेतांग सुन्दरी को नन्द के विषय में दीक्षा लेने और व्याघ्र से जूझने के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं बताते। फिर भी नन्द की मुखाकृति और भावों से सुन्दरी व्याकुल हो जाती है। नन्द तो सुन्दरी को सारी बात बताना चाहता है, किन्तु उसकी उदासीनता उसे खलती है। उधर सुन्दरी न कुछ कहना चाहती है और न कुछ सुनना चाहती है। वह बस अकेली रहना चाहती है। इस पर नन्द कहता है कि तुम्हें कोई ऐसी बात नहीं करनी चाहिए कि मैं सदा तुमसे दूर हो जाऊँ। इस विषय पर दोनों में दीर्घ दार्शनिक वार्तालाप होता है और इसी बीच नाटक समाप्त हो जाता है। 

निष्कर्ष - लहरों के राजहंस नाटक का आधार ऐतिहासिक है। यह विचार प्रधान नाटक है। नाटक का अन्त एक विशेष भाव की सृष्टि करता है। नन्द की भटकी हुई मनःस्थिति यह प्रकट करती है कि यह स्थिति सामान्य रूप से सभी की होती है। वह अनुभव करता है कि वह एक ऐसा व्यक्ति है जो चौराहे पर नंगा खड़ा हुआ है और जिसे सभी दिशाएँ निगल लेना चाहती हैं। उसके पास अपने तन को ढकने के लिए कोई वस्त्र नहीं है, उसका जीवन निरुद्देश्य है। वह जिस ओर कदम बढ़ाता है, उसे लगता है कि वह दशा स्वयं अपने ध्रुव पर डगमगा रही है। वह अपने लिए कोई ऐसा दृष्टि-बिन्दु खोजना चाहता है जहाँ पहुँचकर वह अपने को स्थिर कर सके। सही दृष्टि-बिन्दुओं के अभाव की खोज ही इस नाटक की मूल समस्या है। नाटक की कथा का आधार अश्वघोष का 'सौन्दरनन्द' काव्य है किन्तु समय के विस्तार में स्थितियों का प्रक्षेपण करने के कारण यह काल्पनिक भी है।

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