राशन के इंतज़ार में ठंडे होते चूल्हे

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भारत में खाद्य सुरक्षा केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि करोड़ों गरीब परिवारों के लिए जीवन रेखा है।

राशन के इंतज़ार में ठंडे होते चूल्हे


भारत में खाद्य सुरक्षा केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि करोड़ों गरीब परिवारों के लिए जीवन रेखा है। विशेष रूप से बिहार जैसे राज्यों के ग्रामीण इलाकों में, जहां बड़ी आबादी आज भी दिहाड़ी मजदूरी, कृषि कार्य और असंगठित रोजगार पर निर्भर है, वहां सरकारी राशन की दुकान से मिलने वाला अनाज परिवार के मासिक भोजन की बुनियाद बनता है। जब यही राशन समय पर नहीं मिलता, तो इसका असर केवल रसोई तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को प्रभावित करता है।

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मुसहरी प्रखंड स्थित नरौली गांव की स्थिति इस समस्या को बेहद स्पष्ट रूप से सामने लाती है। लगभग 250 से अधिक घरों वाले इस गांव में अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी अधिक है। आर्थिक रूप से पिछड़े इस गांव के अधिकांश परिवार दिहाड़ी मजदूरी, खेतिहर काम या छोटे-मोटे स्वरोजगार पर निर्भर हैं। यहां कई परिवार ऐसे हैं जिनकी आय इतनी सीमित है कि महीने का राशन खरीदने के लिए बाजार पर निर्भर रहना उनके लिए संभव नहीं है। सरकारी राशन की दुकान से मिलने वाला अनाज ही उनके घर का चूल्हा जलाता है। लेकिन जब किसी कारणवश राशन वितरण में देरी हो जाती है या एक-दो महीने तक नियमित आपूर्ति नहीं होती, तो परिवारों के सामने भोजन का संकट खड़ा हो जाता है।

राशन के इंतज़ार में ठंडे होते चूल्हे
नरौली गांव की महिलाओं का कहना है कि राशन नहीं मिलने पर उन्हें स्थानीय दुकानदारों से उधार पर अनाज लेना पड़ता है। कई बार दुकानदार भी लंबे समय तक उधार देने से मना कर देते हैं। ऐसे में परिवारों को भोजन की मात्रा कम करनी पड़ती है। बच्चों के हिस्से का दूध, फल और अन्य पोषक खाद्य पदार्थ सबसे पहले भोजन की थाली से गायब हो जाते हैं। गरीब परिवारों के लिए राशन की देरी केवल भूख का प्रश्न नहीं बल्कि पोषण, स्वास्थ्य और सम्मान का भी प्रश्न बन जाती है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत पात्र लाभार्थियों को प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलोग्राम खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाता है, जबकि अंत्योदय अन्न योजना के तहत परिवारों को प्रति माह 35 किलोग्राम खाद्यान्न मिलता है। केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के अंतर्गत यह खाद्यान्न वर्तमान में निःशुल्क उपलब्ध कराया जा रहा है। बिहार में कई स्थानों पर प्रति यूनिट 2 किलोग्राम गेहूं और 3 किलोग्राम चावल वितरण की व्यवस्था लागू है।

केंद्र सरकार के अनुसार देशभर में लगभग 81.35 करोड़ लोगों का नाम राशन कार्ड में दर्ज है। जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के तहत राशन का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। हाल ही में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए केंद्र सरकार ने हजारों करोड़ रुपये की नई योजना को भी मंजूरी दी है, जिसका उद्देश्य राशन वितरण व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाना है। बिहार देश के उन राज्यों में शामिल है जहां खाद्य सुरक्षा योजनाओं के लाभार्थियों की संख्या सबसे अधिक है। विभिन्न सरकारी आंकड़ों के अनुसार राज्य में लगभग 8.7 करोड़ से अधिक लोग राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत राशन प्राप्त करते हैं। हाल ही में राज्य सरकार द्वारा लाभार्थियों के सत्यापन अभियान के दौरान 5.5 लाख से अधिक अपात्र लाभार्थियों के नाम सूची से हटाए गए थे, जिससे यह भी स्पष्ट होता है कि राज्य में राशन प्रणाली का दायरा कितना व्यापक है।

ग्रामीण बिहार में राशन वितरण की अनियमितता के कई कारण सामने आते हैं। कभी खाद्यान्न की समय पर ढुलाई नहीं हो पाती, कभी तकनीकी समस्याओं के कारण ई-पॉस मशीनें काम नहीं करतीं, तो कभी प्रशासनिक स्तर पर देरी होती है। देश के विभिन्न हिस्सों से हाल के महीनों में ऐसी खबरें सामने आई हैं जिनमें सर्वर की खराबी, बायोमेट्रिक सत्यापन की समस्याएं और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के कारण लाभार्थियों को घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ा या कई दिनों तक राशन नहीं मिल सका। 

नरौली जैसे गांवों में समस्या इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि अधिकांश परिवारों के पास बचत नहीं होती। यदि किसी मजदूर को लगातार कुछ दिनों तक काम नहीं मिलता और उसी दौरान राशन वितरण भी बाधित हो जाए, तो परिवार दोहरे संकट में फंस जाता है। कई परिवारों को ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेना पड़ता है। कुछ लोग मजदूरी की तलाश में दूसरे क्षेत्रों की ओर पलायन करने को मजबूर हो जाते हैं। सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं और बच्चों पर पड़ता है, क्योंकि वे अक्सर भोजन की कमी का बोझ सबसे पहले झेलते हैं।

खाद्य सुरक्षा का उद्देश्य केवल अनाज बांटना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए। जब राशन वितरण नियमित और पारदर्शी होता है, तो गरीब परिवार अपनी सीमित आय का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यक जरूरतों पर कर पाते हैं। लेकिन वितरण में देरी उनकी पूरी आर्थिक योजना को बिगाड़ देती है। एक महीने का राशन रुकना किसी मध्यमवर्गीय परिवार के लिए असुविधा हो सकता है, लेकिन गरीब परिवार के लिए यह कई दिनों की भूख और अनिश्चितता का कारण बन सकता है।

सरकार ने डिजिटल निगरानी, बायोमेट्रिक सत्यापन और "वन नेशन, वन राशन कार्ड" जैसी पहल शुरू की हैं, जिनसे पारदर्शिता बढ़ी है। फिर भी अंतिम छोर तक समय पर और पूर्ण मात्रा में राशन पहुंचाना आज भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। जब तक गांव स्तर पर निगरानी समितियां सक्रिय नहीं होंगी, शिकायत निवारण प्रणाली प्रभावी नहीं होगी और राशन दुकानों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक गरीब परिवारों की परेशानी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाएगी।

राशन केवल अनाज नहीं है, बल्कि करोड़ों गरीब परिवारों की खाद्य सुरक्षा, सम्मान और जीवन का आधार है। इसलिए यह आवश्यक है कि सरकार, स्थानीय प्रशासन और समुदाय मिलकर यह सुनिश्चित करें कि प्रत्येक पात्र परिवार को हर महीने समय पर राशन मिले। किसी भी गांव की प्रगति का आकलन केवल सड़कों और भवनों से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि वहां कोई परिवार भूखा तो नहीं सो रहा। यदि भारत को वास्तव में खाद्य सुरक्षा के लक्ष्य को हासिल करना है, तो राशन वितरण में नियमितता और जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। तभी नरौली जैसे गांवों में रहने वाले परिवारों के घरों का चूल्हा बिना किसी चिंता के हर दिन जल सकेगा।(यह लेखिका के निजी विचार हैं)



- निशा कुमारी,
मुजफ्फरपुर, बिहार

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