लहरों के राजहंस नाटक में नंद का चरित्र चित्रण | मोहन राकेश

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मोहन राकेश का नाटक लहरों के राजहंस (1963, संशोधित 1968) एक द्वन्द्वप्रधान नाटक है, जिसका केंद्रीय पात्र नंद है।

लहरों के राजहंस नाटक में नंद का चरित्र चित्रण | मोहन राकेश


मोहन राकेश का नाटक लहरों के राजहंस (1963, संशोधित 1968) एक द्वन्द्वप्रधान नाटक है, जिसका केंद्रीय पात्र नंद है। नंद कपिलवस्तु का राजकुमार और गौतम बुद्ध का सौतेला भाई है। नाटक अश्वघोष के सौंदरनंद काव्य पर आधारित है, लेकिन राकेश ने इसे आधुनिक मनोवैज्ञानिक और अस्तित्ववादी परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया है। नंद युगों-युगों से चले आ रहे प्रवृत्ति (भोग-विलास, सांसारिक सुख) और निवृत्ति (वैराग्य, आध्यात्मिक शांति) के द्वन्द्व का प्रतीक है। राकेश स्वयं कहते हैं कि नंद अनिश्चित, अस्थिर और संशयी मानव मन का प्रतीक है, जो दो मूल्यों के बीच फटा हुआ है।

'लहरों के राजहंस' नाटक की कथा बौद्धकालीन है, क्योंकि नन्द स्वयं बुद्ध के विहार में बुद्ध से मिलने जाता है, जहाँ उसकी अनिच्छा से ही उसका सिर मुण्डित कर उसे जबरन संन्यासी बना दिया जाता है। वह नन्द कपिलवस्तु का वर्तमान राजा है और बुद्ध का सौतेला भाई है। नाटक में उसका व्यक्तित्व और चारित्रिक विशेषताएँ मनोयोगपूर्वक उभारी गयी हैं। एक ओर तो उसमें सहज मानवीय गुण विद्यमान हैं तो दूसरी ओर उसमें गहन अन्तःसंघर्ष भरा हुआ है। वह आसक्ति और विरक्ति के बीच झोंके खा रहा है। नाटक में नन्द का खण्डित व्यक्तित्व प्रदर्शित किया गया है। आन्तरिक भटकाव के कारण उसकी यह अवस्था हुई है। नाटककार ने नन्द को एक प्रतीक पात्र के रूप में ग्रहण किया है। मोहन राकेश का कथन है- “यहाँ नन्द और सुन्दरी कथा का एक आश्रय मात्र हैं, क्योंकि मुझे लगा कि इसे समय में परिप्रेक्षित किया जा सकता है।” इस नाटक के आद्योपान्त अध्ययन से नन्द के चरित्र - की जो विशेषताएँ उभरती हैं, वे इस प्रकार हैं -
 

सहनशीलता और संयत प्रेम का आदर्श

लहरों के राजहंस नाटक में नंद का चरित्र चित्रण | मोहन राकेश
नन्द परिस्थितियों से समझौता करके : आगे बढ़ने वाला व्यक्ति है। उसे अपनी पत्नी सुन्दरी से अत्यधिक प्रेम है। यदि वह कभी उच्छृंखलता करती है तो उसे सहन करने की क्षमता भी नन्द में है। यह उसकी कायरता नहीं है, बल्कि उसे अपने आवेश और आवेश पर नियन्त्रण करने का गुण प्राप्त है। अन्यथा अपने महल की इतनी अधिक तोड़-फोड़ को कौन पति सहन कर सकता है। वह अपने को सुन्दरी की मनःस्थिति में रखकर देखता है और मानता है कि यही स्वाभाविक था- “कितना विक्षोभ था सोने से पहले इसके मन में ! कुछ भी तो नहीं देखा इसने कि क्या कहाँ गिरा, क्या कैसे टूट गया ? ओह ! कैसा कैसा लगा था उस समय । मन होता था कि . परन्तु उसका विक्षोम अस्वाभाविक भी तो नहीं था। पहले दिन-भर के उत्साह की थकान, फिर अतिथियों के न आने की निराशा ।” सुन्दरी के कथन के माध्यम से यह प्रकट होता है कि उसे बहुत अधिक चाहता है, प्रेम करता है। वह कहती है-“स्वयं कुमार के मन में भी उसके लिए विशेष अनुराग नहीं ! जब भी अकेले होते हैं उसे पास बुलाकर देर-देर तक बातें करते रहते हैं।”
 

मदिरा सेवी

राजा नन्द समय-समय पर मदिरा का सेवन करता है। कभी अपनी शारीरिक थकान को भूलो, दूर करने के लिए तो कभी मानसिक अन्तर्द्वन्द्व से उन्मुक्त होने के लिए उसे मदिरा का सेवन करना पड़ता है। इस व्यसन को पूरा करने के लिए उसके महल में व्यक्त रूप से एक मदिरा कोष्ठ है, जिसमें आवश्यकता पड़ने पर वह जाता है और वहाँ जाकर चषक में मदिरा डालता है और पीता है। यही नहीं उत्सवों के अवसर पर भी उसके यहाँ अतिथियों के स्वागत के लिए मदिराओं की व्यवस्था की जाती है। कामोत्सव के समय सुन्दरा अलका को कई विशेष प्रकार की मदिराएँ एकत्र करने के लिए आदेश करती है।
 

आखेटप्रिय

नन्द कपिलवस्तु का क्षत्रिय राजा है। राजाओं का आखेट करना एक प्रसिद्ध व्यसन भी है। इसलिए यह सहज और स्वाभाविक है कि नन्द भी वैसा ही हो। जिस दिन सुन्दरी ने कामोत्सव का आयोजन किया है, उस दिन भी वह शाम को मृगया से लौटता है-किन्तु वह उस दिन मृग का शिकार नहीं कर पाता। वह अपनी पत्नी सुन्दरी से चर्चा करता है कि आज दिन भर एक मृग का पीछा करता रहा, किन्तु उस मृग को वह अपने बाण से मार नहीं पाया। आगे चलकर उसने उस समय, जब वह अपने महल की ओर लौट रहा था, देखा कि वही मृग अपनी पलान्ति से स्वयं मरा पड़ा है। इससे वह बहुत दुःखी होता है। बाण से घायल मृग को देखकर कभी उसे इतना अधिक दुःख नहीं हुआ किन्तु आज उसे स्वयं थकान के कारण मर जाने से बहुत दुःख हो रहा है। वह मानता है कि आखेट का वास्तविक आनन्द तो स्वयं मारने में है। यही कारण है कि स्वतः मरे मृग को वह हाथ नहीं लगाता और रिक्त हाथ महल को प्रत्यावर्तित हो जाता है।
 

नारी मनोविज्ञान का ज्ञाता एक सफल पति

नन्द नारी मनोविज्ञान से भली-भाँति परिचित है। यही कारण है कि विषम से विषम परिस्थिति में भी वह अपनी पत्नी को मना लेता है, यदि किसी कारणवश सुन्दरी रूठती या नाराज होती है, तो भी उसे मनाने की कला उसे खूब आती है। वह उन गुणों को जानता है जिनसे स्त्रियाँ सामान्यतः प्रसन्न हो जाती हैं और अपना आक्रोश थूक देती हैं। एक स्थान पर वह सुन्दरी से कहता है-“तुम्हारी कही बात तुम्हारे लिए उतना महत्व नहीं रखती जितना मेरे लिए। यह तुम नहीं जानतीं।” कामोत्सव का आयोजन सुन्दरी द्वारा किया गया है, जिसकी सफलता के लिए वह दिन भर लगी रहती है। नन्द भी उसे सफल बनाने के लिए यथाशक्ति प्रयास करता है। जब नन्द को यह ज्ञात होता है कि नगर के राजपुरुष किन्हीं कारणों से कामोत्सव में नहीं आना चाहते तो वह उत्सव को सफल बनाने लिए मृगया से लौटते समय स्वयं अतिथियों के घर जाता है और उनसे प्रेमाग्रह करता है कि वे उसके समारोह में सादर सम्मिलित हों। वह अपनी पत्नी सुन्दरी से कहता है — “मैं तुम्हारे उत्साह में बाधा नहीं डालना चाहता था। सोचा था कि इनमें से अधिकांश लोग एक बार जाकर कहने से ... 

कामोत्सव विफल हो जाता है। इससे तनावग्रस्त सुन्दरी क्रोधावस्था में महल का सामान उठाकर फेंक देती है और तोड़-फोड़ कर डालती है। इस पर उसे आक्रोश तो होता है, किन्तु उसे नियन्त्रित कर लेता है और मानता है कि, “विक्षोभ अस्वाभाविक भी तो नहीं था। पहले दिन भर के उत्साह की थकान, फिर अतिथियों के न आने की निशा ।” वह उसके शृंगार में सहायक होता है और उसके रूप की प्रशंसा कर उसको अपना लेता है। कहता हैं- " : परन्तु तुम मानवी नहीं हो। ऐसा रूप मानवी का नहीं होता ?” उक्त सभी प्रसंगों से यह स्पष्ट होता है कि नन्द एक सफल पति और वह अपनी पत्नी को प्रसन्न रखने की हर सम्भव कला में दक्ष है।

शालीनता और विनम्रता

राजा नन्द शालीनता और विनम्रता की प्रतिमूर्ति है। सुन्दरी के क्रोधित होने पर भी वह अपना नियन्त्रण नहीं खोता है। यह उसका विनम्र भाव ही है कि वह मृगया से लौटते समय अपने मित्र विशाखदत्त और सोमदत्त के यहाँ होकर ही महल को लौटता है, अन्यथा किसी राजा को क्या आवश्यकता है कि वह अपने अतिथियों को बुलाने के लिए जाये। यह निश्चय ही उसकी महानता है, उसका एक सद्गुण है। नन्द की विनम्रता उस समय देखते ही बनती है जब वह अपनी इच्छा के विरुद्ध गौतम द्वारा उसके केश कटवाकर जबरन बौद्ध भिक्षु बना दिया जाता है। वह गौतम बुद्ध के उस कठोर आदेश को भी सहन कर जाता है। यदि वह चाहता तो उसका सशक्त विरोध कर सकता था, किन्तु विनम्रतावश ही उसने ऐसा नहीं किया।
 

दयालुता

यद्यपि नन्द मृगया का शौकीन है, इसके बावजूद उसके सीने में एक दयालु हृदय धड़कता है। उसे स्वतः मरे हुए मृग के ऊपर दया आ जाती है और न जाने कैसे-कैसे विचारों में खो जाता है-“मैंने कभी सोचा तक नहीं था कि एक मरा हुआ मृग भी इतना सजीव लग सकता है। लग रहा था जैसे हाथ लगाते ही वह आशंका से काँप जायेगा और उठकर भाग खड़ा होगा आखेटकों ने उसे उठा लाना चाहा था, तो मैंने उन्हें मना कर दिया। बिना घाव अपनी ही क्लान्ति से मरे मृग को देखकर जाने कैसे लगा।”
 

चिन्तनशीलता

नन्द एक चिन्तनशील राजकुमार है। वह प्रत्येक स्थिति और परिस्थिति को समझने की योग्यता रखता है। यही कारण है कि सुन्दरी के द्वारा जब सामान उठाकर फेंक दिया जाता है तो सुन्दरी पर क्रोधित होने के बदले वह यही सोचता है कि उसका विक्षोभ अस्वाभाविक नहीं था। जब वह सुन्दरी से कहता है कि रात उसने जो सामान उठाकर फेंका है उसे दास-दासियाँ देखेंगे तो क्या सोचेंगे ? इस पर सुन्दरी कहती है कि उनके अन्तरंग जीवन को लेकर उन्हें कुछ भी सोचने का अधिकार नहीं। इस पर वह अपनी विवेकपूर्ण बात कहता है- “कहने का अधिकार तो नहीं किन्तु सोचने का अधिकार तो हर एक को रहता है।” एक अन्य स्थान पर उसकी गहन चिन्तनशीलता इस प्रकार देखी जा सकती है—“इतना समझ में आता है कि जिये जाने से जीवन धीरे-धीरे चुक जाता है, किन्तु हर उन्मेष का परिणाम एक निमेष है और काम के विस्तार में उन्मेष और निमेष दोनों अस्थायी हैं कि सुख, सुख नहीं, काई पर फिसलते पाँव का स्पन्दन मात्र है, मात्र रेत में डूबती बूँद की अकुलाहट।” गौतम द्वारा केश काट दिए जाने पर उसका चित्त खिन्न है—“उन्होंने केश काट दिए, तो क्या व्यक्ति रूप में मैं अधिक सत्य हो गया ? जीभ काट देते, हाथ-पैर काट देते, तो क्या और अधिक सत्य हो जाता ? कौन कह सकता है कि भ्रान्ति वस्तुतः किसे है- उन्हें या मुझे ? xxx परन्तु मैं पूछता हूँ जब होने न होने में कोई अन्तर नहीं है तो मेरे केश क्यों काट दिए ?” ये सभी विचार नन्द को एक उच्च कोटि के चिन्तनशील व्यक्ति के आसन पर आसीन करते हैं।
 

पार्थिव अपार्थिव मूल्यों का शोधकर्ता

नन्द का व्यक्तित्व एक ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व है, जो पार्थिव और अपार्थिव मूल्यों के बीच झूल रहा है। वह सांसारिक भोगों को भी भोगना चाहता है, इसलिए पार्थिव से आकर्षण कम नहीं होता। वह अपार्थिव को भी पाना चाहता है किन्तु मन में द्विविधा की स्थिति है, इसलिए उसे भी सहज रूप में ग्रहण नहीं कर पाता है। मूलतः वह एक भटके हुए व्यक्ति का प्रतिरूप है, जिसकी कोई निश्चित दिशा और गन्तव्य नहीं, बल्कि उनका तलाश में भटक रहा है। वह जीवन रूपी चौराहे पर खड़ा हुआ एक ऐसा व्यक्ति है, जिसकी कोई सुनिश्चित दिशा नहीं है और अपनी सुरक्षा के साधन भी जिसके पास उपलब्ध नहीं हैं। वह जिस किसी ओर कदम बढ़ाता है, उसे लगता है कि वह दिशा ही अपने स्थान पर अस्थिर है और यही सोचकर वह अपने मार्ग से विमुख हो जाता है। यह उसके मन की दुर्बलता और आत्म-शक्ति के अभाव को द्योतित करता है। वह एक ऐसे सुदृढ़ और स्थिर बिन्दु की खोज में है, जहाँ वह अपने को स्थापित कर सके। इसीलिए सुन्दरी उसे समझाती है—“कितने-कितने बिन्दु खोजे हैं आज तक तुमने । 'जाओ, एक और बिन्दु खोजो ! कितने-कितने शब्दों में ढाँपा है उन बिन्दुओं को ?” जाओ कुछ और शब्द ढूँढ़ो।” 

इस प्रकार हम देखते हैं कि नन्द एक खण्डित व्यक्तित्व लिए हुए जी रहा है। ऐसा नहीं है कि उसे अपने इस रूप का अभिज्ञान नहीं, वह जानता है, पहचानता है-"मैं कब से जानता हूँ कि मैं पूरा यहाँ जीने के लिए नहीं हूँ। यह भी कि पूरा यहाँ से हटकर जीने के लिए भी नहीं हूँ। कहाँ, कितना, किस बिन्दु पर जीने के लिए हूँ, इसका उत्तर मैं आज तक अपने को नहीं दे पाया।” वह चाहता है कि उससे कोई भी असन्तुष्ट न हो। वह एक ओर अपनी पत्नी को भी प्रसन्न रखना चाहता है, दूसरी ओर गौतम बुद्ध के आदेश का विरोध भी नहीं करता, जबकि वह मन से बौद्ध धर्म की दीक्षा लेने का इच्छुक नहीं है। उसकी यह मनोवृत्ति उसे एक रहस्यात्मक और उलझे हुए व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत करती है।

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