लहरों के राजहंस नाटक की मूल संवेदना चेतनामोहन राकेश मूल चेतना व्यक्ति के मन की अस्थिरता, सांसारिक सुख और आत्मिक शांति के बीच की अंतहीन खोज, तथा अपने
लहरों के राजहंस नाटक की मूल संवेदना चेतना | मोहन राकेश
लहरों के राजहंस, नई कहानी आंदोलन के प्रमुख हस्ताक्षर मोहन राकेश द्वारा रचित एक युगांतकारी नाटक है, जिसका प्रथम प्रकाशन वर्ष 1963 है (बाद में अभिनेता और रंगमंच की ज़रूरतों को देखते हुए लेखक ने 1968 में इसका संशोधित रूप भी प्रकाशित किया था)। यह नाटक महाकवि अश्वघोष के महाकाव्य 'सौन्दरानन्द' की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित है। यद्यपि इसका कथानक ऐतिहासिक है, परंतु इसकी मूल संवेदना और चेतना पूरी तरह आधुनिक युग के मनुष्य की मानसिक स्थिति को बयां करती है।
कुछ आलोचकों का नत है कि आषाढ़ का एक दिन का कालिदास ही 'लहरों के राजहंस' का नन्द बनकर आया है। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार का द्विविधाग्रस्त और अनपेक्षित जीवन कालिदास का रहा उसी प्रकार का नन्द का है। नन्द की पत्नी भी कालिदास की प्रेमिका मल्लिका के समान अपरूप सुन्दरी थी।अन्तर केवल इतना है कि कवि कालिदास की प्रेयसी मल्लिका भाव प्रधान थी और नन्द की पत्नी सुन्दरी रूपगर्विता।उसे अपने सौन्दर्य का ही नहीं, अपने राजमद भी गर्व था। उसके कामोत्सव में कपिलवस्तु के किसी राजपुरुष ने यदि न आने की धृष्टता की तो इस राजभवन के द्वार उसके लिए सदा-सर्वदा के लिए बन्द हो जायेंगे। कालिदास की प्रेयसी मल्लिका ने भावना से एक भावना का वरण किया है। वह यह जानकर परम प्रसन्न है कि उसने उस तत्व को उस सौन्दर्य को जान लिया है जो भावना को कविता का रूप देता है। कालिदास सच्चे प्रेमी सिद्ध नहीं हो सके और नन्द सच्चा पति सिद्ध नहीं हो सका। वचन भंग दोनों ने किया। मल्लिका ने जिस विश्वास के साथ कालिदास को उज्जयिनी भेजा था कि यदि उसका हृदय कालिदास को नहीं भूलेगा तो कालिदास का हृदय भी उसे स्मरण रखेगा। मल्लिका ने अपना कहा हुआ वचन निभाया, पर कालिदास अपना अनकहा वचन नहीं निभा सके। वे मल्लिका के प्रणय और त्याग दोनों का मूल्य नहीं आंक सके। उन्होंने प्रियंगुमंजरी से विवाह कर लिया और अपना नाम बदलकर मातृगुप्त रख लिया तथा कवि कर्म का क्षय करने वाली राजनीति स्वीकार कर ली।
नन्द ने भी अपनी पत्नी के प्रति अपने प्रेम आकर्षण का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए कहा था कि विवाह उसका वंशवद है, उसका रूप इतना अधिक सुन्दर है, जैसा किसी मानवी का नहीं होता। नन्द ने स्वीकृति दी थी कि वह दर्पण लेकर दीपाधार के समीप तब तक खड़ा रहेगा, जब तक सुन्दरी अपना श्रृंगार नहीं कर लेती। कुछ ही क्षण बीते कि उसे अपने ज्येष्ठ बन्धु महात्मा बुद्ध और उनके संघ का शब्द सुनायी देता है-
धम्मं शरणं गच्छामि
संघं शरणं गच्छामि
बुद्धम् शरणं गच्छामि।
यह स्वर सुनकर नन्द अस्थिर हो जाता है, उसके हाथ का दर्पण हिल जाता है। अपने बड़े भाई और आध्यात्मिक प्रतिष्ठा प्राप्त बुद्ध का अपने निवास के समीप से निकलना उसे न जाने कैसा प्रतीत होता है। अपनी पत्नी के ऐन्द्रजालिक पाश में घोषणाएँ करते हुए न थकने वाले नन्द के मन में वैराग्य और श्रेय के प्रति भी आकर्षण है। वह वासना और प्रेम के प्रति पूर्णतया समर्पित नहीं है। नन्द का अपने वचन से फिरना यहीं समाप्त नहीं होता, वह अगली परीक्षा में भी असफल और अनुत्तीर्ण हो जाता है। दर्पण नन्द की श्वाँस से मैला हो जाता है तो सुन्दरी अपने भस्तक पर विशेषक न बनाने की घोषणा करती है। भिक्षुओं का समवेत स्वर बहुत समीप आकर रुक जाता है तो नन्द का हाथ दर्पण नहीं संभाल पाता। दर्पण गिरकर टूट जाता है। बाद में बहुत प्रयत्न और अनेक मनुहारों से नन्द सुन्दरी को इस बात के लिए तहमत कर पाता है कि वह उसके हाथ से. अपना श्रृंगार करा ले। सहसा अलका आकर नंद और सुन्दरी को बताती हैं कि स्वयं गौतम भिक्षा की याचना करने आये थे। किसी ने ध्यान नहीं दिया इसलिए चले गये। नन्द सुन्दरी से यह कहकर जाता है कि तुम्हारे माथे का विशेषक जब तक सूखेगा, मैं उससे पहले ही अपने बन्धु से क्षमा-याचना करके आ जाऊँगा ।
नन्द चला जाता है और रातभर नहीं लौटता। सुन्दरी अनेक बार अपना विशेषक पानी से भिगाकर गीला कर चुकी है। अन्त में निराश होकर सो जाती है। नन्द सबेरे के समय मुंडित शिर लौटता है। उसके न चाहते हुए भी गौतम बुद्ध ने उसके केश कटवा दिये थे। सुन्दरी उसका यह रूप सहन नहीं कर पाती।नन्द यह कहकर चला जाता है कि मैं तथागत से अपने केश माँगने जा रहा हूँ। कहूँगा कि मेरी पत्नी को उनकी आवश्यकता है।
स्पष्ट है कि नन्द ने दिनभर अपनी पत्नी के पास से कहीं न जाने का जो वचन दिया था उसको भंग किया, शीघ्र लौटकर आने का जो वचन दिया उसको भी भंग किया। यह बात दूसरी है कि वह प्रेम को त्यागकर श्रेय की ओर गया, पर रूपगर्विता पत्नी क्या करे, कैसे जीवित रहे ? वह गौतम बुद्ध के संन्यासी बनने का कारण उनकी पत्नी यशोधरा में आकर्षण का अभाव बता चुकी थी।
आषाढ़ का एक दिन' और 'लहरों के राजहंस' दोनों ही नाटक वचनबद्ध प्रेम और पति के द्वारा समर्पित प्रेयसी और पत्नी को छले जाने और वचनबद्धता को रेखांकित करने वाले हैं। 'लहरों के राजहंस' में पुरुष बौना हो गया है और नारी की महत्ता बढ़ गयी है। वास्तव में इन दोनों नाटकों का मूल स्वर अथवा मूल्य स्वर नारी को पुरुष की अपेक्षा महीयसी, गरीयसी और वरीयसी सिद्ध करना है।
कालिदास का व्यक्तिगत परिचय तो किसी ग्रन्थ में प्राप्त नहीं होता पर नन्द का परिचय अश्वघोष द्वारा रचित दूसरे महाकाव्य 'बुद्ध चरितम्' तथा 'धम्मपद की टीका' में लहरों के राजहंस से भिन्न है। इससे स्पष्ट है कि मोहन राकेश के इन दोनों ही नाटकों में पुरुष की हीनता का प्रतिपादन है।
इस प्रकार 'लहरों के राजहंस' की मूल चेतना व्यक्ति के मन की अस्थिरता, सांसारिक सुख और आत्मिक शांति के बीच की अंतहीन खोज, तथा अपने अस्तित्व को परिभाषित करने की छटपटाहट की कहानी है। मोहन राकेश ने यह दिखाया है कि जब तक व्यक्ति भीतर से किसी मार्ग को पूरी तरह स्वीकार नहीं करता, तब तक वह परिस्थितियों की लहरों पर डोलते हुए राजहंस की तरह भटकता ही रहेगा।


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