आषाढ़ का एक दिन नाटक की मूल संवेदना चेतना | मोहन राकेश

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आषाढ़ का एक दिन नाटक की मूल संवेदना चेतना मोहन राकेश नाटक महाकवि कालिदास के काल्पनिक जीवन को आधार बनाकर लिखा गया है, लेकिन इसकी मूल संवेदना पूरी तरह

आषाढ़ का एक दिन नाटक की मूल संवेदना चेतना | मोहन राकेश


मोहन राकेश द्वारा रचित 'आषाढ़ का एक दिन' (1958) आधुनिक हिंदी नाटक का एक मील का पत्थर है। यह नाटक महाकवि कालिदास के काल्पनिक जीवन को आधार बनाकर लिखा गया है, लेकिन इसकी मूल संवेदना पूरी तरह आधुनिक है। यह केवल एक ऐतिहासिक या जीवनीपरक नाटक नहीं है, बल्कि तीव्र अंतर्द्वंद्व, मानवीय संबंधों की जटिलता और महत्वाकांक्षा के बीच पीसते मनुष्य की त्रासदी है।

आषाढ़ का एक दिन, मोहन राकेश का पहला नाटक है।इस एक नाटक से मोहन राकेश ने वह ख्याति प्राप्त की, जिसे अन्य नाटककार अनेक नाटकों की रचना करके भी प्राप्त नहीं कर सके।यदि मोहन राकेश इस एक ही नाटक की रचना करते, तब भी उनका नाटक साहित्य में वही स्थान होता जो आज है।
 
आषाढ़ का एक दिन नाटक की मूल संवेदना चेतना | मोहन राकेश
मोहन राकेश के पहले नाटक का नाम है-आषाढ़ का एक दिन। यह नाटक वर्षा ऋतु के एक ऐसे दिन से आरम्भ होता है, जिस दिन बादल गरज रहे थे और वर्षा हो रही थी। इसी आधार पर इस नाटक का नामकरण किया गया है। इस नाटक के नायक कालिदास हैं और नायिका मल्लिका है। मल्लिका कालिदास की पत्नी नहीं है, वह उनकी प्रेमिका है। प्रेमिका को आजकल महिला मित्र कहा जाता है जो अंग्रेजी शब्द गर्लफ्रेंड का हिन्दी अनुवाद हैं। कालिदास हैं तो इस नाटक के नायक पर उन्होंने अपने ना पकत्व का अन्त तक निर्वाह नहीं किया। जब तक वे अपने मातुल अर्थात् मामा के गांव में रहे तब तक तो उनमें नायकत्व के गुण थे। वे विधवा अम्बिका की पुत्री मल्लिका से प्रेम करते थे। मल्लिका का कालिदास के प्रति प्रेम शारीरिक नहीं था, वासनात्मक नहीं था। जब उसकी माता अम्बिका ने बताया कि वे अग्निमित्र को जहां भेजा था वहां से लौट आया है अर्थात् अम्बिका ने मल्लिका के विवाह का संदेश लेकर अग्निमित्र को जहां भेजा था वहां के लोगों ने उसको अपनी कुलवधू बनाना स्वीकार नहीं किया। कारण है-मल्लिका का कालिदास के प्रति प्रेम । इस प्रेम के कारण मल्लिका से सम्बन्धित अपवाद उस ग्राम में ही नहीं, दूरवर्ती ग्रामों तक फैल चुका है। अन्य लोग तो दूर रहे पर मल्लिका की माता तक यह नहीं समझ पाती कि बिना शारीरिक सम्बन्ध वाला प्रेम भी होता है। मल्लिका को इस अपवाद की चिन्ता नहीं है। वह भाव प्रधान युवती है। वह वर्षा में बुरी तरह भीगकर आयी है पर उसकी माता समझती हैं कि वह कालिदास के साथ ही पर्वत की तलहटी में घूमकर आई होगी। मल्लिका कालिदास के प्रति अपने आकर्षण से निषेध नहीं करती, पर कालिदास के प्रति ही नहीं उनकी कविता के प्रति भी अत्यधिक आकर्षित हैं। वह इसे भावना से भावना का वरण कहती है जो न उसकी माता अम्बिका की समझ में आता है और न ग्रामवासियों की समझ में आता है।
 
कालिदास को उज्जयिनी नरेश के राजकवि होने का आमन्त्रण प्राप्त होता है तो कालिदास वहां जाने से मना कर देते हैं, वे राजमुद्राओं से नहीं बिकना चाहते। उन्हें मल्लिका ही जाने के लिए सहमत करती है। गांव के लोग और मल्लिका की माता अम्बिका से यह आग्रह करते हैं कि कालिदास के उज्जयिनी जाकर राजकवि बनने से पूर्व मल्लिका उनसे विवाह कर ले, पर मल्लिका इसका प्रबल विरोध करती है। उसे विश्वास है कि कालिदास उसके हैं और उसके ही रहेंगे।

कालिदास प्रेम के निकष पर खरे नहीं उतरते। वे वहां राजनन्दिनी प्रियंगुमंजरी से विवाह करके मातृगुप्त बन जाते हैं, अपितु काव्य रचना छोड़कर कश्मीर के शासक होना स्वीकार करते हैं। अपनी पत्नी प्रियंगुमंजरी के आग्रह पर उस गांव जाते हैं, जो मल्लिका का था पर मल्लिका से नहीं मिलते। मानिनी ही नहीं अभिमानिनी मल्लिका भी क्यों जाती कालिदास से मिलने । सम्भव है कालिदास के अपराधबोध ने उन्हें मल्लिका से मिलने नहीं दिया हो। कारण कुछ भी हो, कालिदास ने अपना नायकत्व बचा पाये और न अपना प्रेमी होना। या तो प्रियंगुमंजरी को कालिदास ने भेजा हो अथवा वह स्वयं आयी हो, पर वह प्रियंगुमंजरी के साहित्य के प्रति समर्पण और कालिदास के प्रति प्रेम से प्रभावित होकर आयी थी, वह अपना राजवैभव प्रदर्शित करने आयी थी। आर्थिक दरिद्रता का सामना करती हुई मल्लिका के पास कालिदास की सभी रचनाओं की प्रतिलिपियाँ हैं, इसके लिए धन कहां से आया, यह प्रश्न तो प्रियंगुमंजरी ने किया, पर मल्लिका का साहित्य के प्रति आकर्षण और प्रेम के प्रति समर्पण को नहीं समझा, उलटे राज्य के अधिकारी से विवाह और उसके घर का प्रतिसंस्कार करने के द्वारा अपने राजवैभव का प्रदर्शन किया।
 
माता अम्बिका की मृत्यु के बाद और आर्थिक अभाव से विवश होकर मल्लिका ने ग्रामीण युवक को अपना शरीर तो सौंपा, पर उसके मन पर कालिदास का ही अधिकार रहा। थके, हारे, भीगे और राज्यच्युत कालिदास उसके पास आये तो उन्होंने मल्लिका के अछूते प्रेम का आदर न करके अछूती देह को कामना की, जो उसकी अपवित्रता की घोषणा उसकी रोती पुत्री कर रही थी। कालिदास चाहते तो मल्लिका को भावनात्मक रूप से अथवा शारीरिक रूप से स्वीकारने की स्वीकृति से अपना नायकत्व बचा सकते थे, पर इस अवसर को उन्होंने गंवा दिया। मल्लिका पुकारती रही और वे वर्षा में भीगते चले गये।

इस प्रकार स्पष्ट है कि 'आषाढ़ का एक दिन' नाटक में मोहन राकेश की मूल चेतना अथवा मूल्य चेतना पुरुष की अपेक्षा नारी को महत्व प्रदान करने की रही है। नारी को वैभव से नहीं, भावना से खरीदा जा सकता है। इसका समर्थन निम्नलिखित नीति वचन करता है-

आलाने गृह्यते हस्ती अश्वो वल्गासु गृह्यते । 
हृदये गृहयते नारी, मदिदं नास्ति गम्यताम् ।।

(हाथी जंजीर से रोका जाता है, घोड़ा लगाम से रोका जाता है और नारी हृदय पर अधिकार करके वश में की जाती है। अगर ऐसा साधन नहीं है, तो प्रयत्न व्यर्थ है।)

निष्कर्ष रूप में, 'आषाढ़ का एक दिन' की मूल संवेदना मानवीय संबंधों के बिखराव, महत्वाकांक्षा के पीछे भागते हुए अपनी मूल पहचान को खो देने के बोध और समय की अपरिवर्तनीय क्रूरता को दर्शाती है।नाटककार की चेतना हमें यह संदेश देती है कि कोई भी रचनाकार या मनुष्य अपनी जड़ों, अपनी मिट्टी और अपने सहज प्रेम से कटकर कभी सुखी या पूर्ण नहीं हो सकता।अंत में कालिदास का मल्लिका के घर से चुपचाप निकल जाना इसी अधूरेपन और पराजय की अंतिम परिणति है।

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