मोहन राकेश द्वारा रचित ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित नाटक 'लहरों के राजहंस' मात्र एक ऐतिहासिक कथा नहीं है, बल्कि यह आधुनिक मनुष्य के अंतद्वंद्व, संशय
लहरों के राजहंस नाटक का उद्देश्य | मोहन राकेश
मोहन राकेश द्वारा रचित ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित नाटक 'लहरों के राजहंस' मात्र एक ऐतिहासिक कथा नहीं है, बल्कि यह आधुनिक मनुष्य के अंतद्वंद्व, संशय और मानसिक संघर्ष को उजागर करने वाला एक बेहद गंभीर उद्देश्यपरक नाटक है।
साहित्यकार की कोई भी कृति निरुद्देश्य नहीं होती। साहित्यकार की अपनी मान्यताएँ, विचार और सिद्धान्त होते हैं, जिनमें किसी न किसी रूप में मौलिकता पायी जाती है। यही कारण है कि वह इतिहास को आधार बनाकर भी इतिहास से भिन्न प्रस्तुति करता है। अपनी मान्यता से वह इतिहास को झुठलाना नहीं चाहता, अपितु अपनी मौलिक उद्भावना से साहित्य को जो निधि प्रदान करता है, वह बहुमूल्य होती है। 'लहरों के राजहंस' नाटक का आधार भी ऐतिहासिक है, परन्तु उतने ही अर्थ में जितना 'इस व्याख्या' में आता है।" 'इस व्याख्या' से तात्पर्य है-साहित्य इतिहास के समय से बँधता नहीं, समय में इतिहास का विस्तार करता है; युग से युग को अलग नहीं करता, कई-कई युगों को एक साथ जोड़ देता है।
इस तरह इतिहास के 'आज' और 'कल' उनके लिए 'आज' और 'कल' नहीं रह जाते, समय की असीमता में कुछ ऐसे जुड़े हुए क्षण बन जाते हैं, जो जीवन को दिशा-संकेत देने की दृष्टि से अविभाज्य हैं। इस तरह साहित्य में इतिहास अपनी यथातथ्य घटनाओं में व्यक्त नहीं होता, घटनाओं को जोड़ने वाली ऐसी कल्पनाओं में व्यक्त होता है, जो अपने ही एक नये और अलग रूप में इतिहास का निर्माण करती हैं।यह निर्माण रूढ़िगत अर्थ में इतिहास नहीं है।" मोहन राकेश के इस कथन के आलोक में इस नाटक का उद्देश्य निम्नवत् देखा जा सकता है -
समन्वयवादी जीवन दृष्टि की आवश्यकता की संस्तुति
नाटककार मोहन राकेश ने .. 'लहरों के राजहंस' में बौद्धकालीन और स्वातन्त्र्योत्तर काल के समाज, धर्म, राजनीति और संस्कृति का समन्वय कर समन्वयवादी जीवन दृष्टि की आवश्यकता पर विशेष बल दिया है। स्वाधीनता के बाद हमें यह आशा थी कि व्यक्ति वस्तुतः स्वाधीन हो जायेगा, वह विदेशियों की परतन्त्रता से मुक्त होकर अपनों की ही परतन्त्रता में नहीं बँध जायेगा। देश में सच्चे अर्थों में रामराज्य आयेगा। सत्य, अहिंसा और मानवीय करुणा, प्रेम, सहानुभूति, सहयोग, जैसे भावों पर आधृत समाज का निर्माण होगा। किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। रामराज्य की स्थापना नेताओं के भाषणों में होती रही, और ठोस रचनात्मक कार्य कुछ नहीं हुआ। ऐसी विषम परिस्थितियों में व्यक्ति की आस्था का अस्तित्व संकटप्रस्त हो गया। आस्था और अनास्था का द्वन्द्व समाज और व्यक्ति के लिए घातक था। व्यक्ति में संकीर्णता और आत्मकेन्द्रीयता की प्रवृत्ति घर कर रही थीं। समाज, राष्ट्र और मानव जीवन मूल्य का उसके लिए कोई महत्व नहीं रह गया था। परिवारों में पति-पत्नी, पिता-पुत्र, माँ-पुत्री, के सम्बन्ध टूट रहे थे। व्यक्ति कुण्ठाओं का शिकार होता जा रहा था। विवाह को स्त्री-पुरुष मात्र भोग का साधन मानते थे । ऐसी स्थिति में समाज को आवश्यकता थी कि उसे एक ऐसी जीवन दृष्टि प्राप्त हो, जो उसकी विषमता को दूर कर सके। भोग और कर्म के बीच में सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता अनुभव हो रही थी तो दूसरी ओर व्यष्टि और समष्टि के बीच समन्वय की महती आवश्यकता थी। आस्था और अनास्थाओं के बीच एक ऐसा सर्वसुलभ और सर्वस्वीकार्य मार्ग खोजना था, जो सबको सुविधाजनक हो। इस नाटक में नन्द और सुन्दरी का जीवन ऐसी ही विषमताओं से ग्रस्त है। नन्द पत्नी से जुड़कर भी अपना अलग अस्तित्व चाहता है और सुन्दरी भी नन्द से प्रेम करते हुए भी अपनी अलग पहचान बनाना चाहती है। अलका और श्यामांग की दिशाएँ भी उस धारा से अलग नहीं हैं। वे समाज के अंग होकर भी समाज से अलग अनुभव करते हैं, परिणामतः श्यामांग कुण्ठाग्रस्त हो गया है। नन्द की पत्नी सुन्दरी यथानाम तथागुण वाली है। इसके बावजूद वह उसे नहीं बाँध पाती है। सुन्दरी का आकर्षण उसने नहीं जाना ? यह प्रश्न है । यह प्रश्न नन्द को एक स्वतन्त्रजीवी व्यक्ति घोषित करता है। वह विरक्ति की ओर आकर्षित होते हुए भी विरक्त नहीं हो पाता। यह गौतम बुद्ध के आश्रम में जाता है, किन्तु दीक्षा लेने से विरोध करता है और जब जबरन उसे बौद्ध धर्म में दीक्षित कर दिया जाता है तो इसे वह सहर्ष स्वीकार नहीं कर पाता ।
समन्वय का सन्देश
नन्द और सुन्दरी का जीवन मानव जीवन में समन्वय की आशा का सन्देश प्रदान करता है। नन्द और सुन्दरी पति-पत्नी होते हुए भी उनके जीवन में कहीं भयंकर विषमता का साम्राज्य है. जिसके कारण वे अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन से सन्तुष्ट नहीं हैं। दोनों एक साथ रहकर भी ऐसी दो धाराओं में बहते हैं, जो वहीं मिलती नहीं हैं और यदि मिलती भी हैं, तो उनके रंग और गतियाँ अलग-अलग ही रहती हैं। 'लहरों 'के राजहंस' नाटक जीवन के अनेक क्षेत्रों में समन्वय का सन्देश देता है। भोग और त्याग का समन्वय जब तक नहीं होगा, तब तक जीवन में भोगों के आनन्द का सुख अनुभव नहीं होगा .त्याग भी तब तक सन्तोष का अनुभव नहीं करायेगा, जब तक भोगों की आसक्ति कम नहीं होगी। जीवन में निकम्मापन आनन्दप्रद कदापि नहीं हो सकता। जो व्यक्ति कर्मठ होता है, वही भोगों का आनन्द सही अर्थ में ग्रहण कर पाता है। व्यक्ति समाज का अंग है, इसलिए वह समाज के बिना जिन्दा नहीं रह सकता। उसे समाज के साथ मिलकर ही अपने व्यक्ति और व्यक्तित्व की रक्षा करनी होगी। राजा और व्यक्ति को मात्र पार्थिव आकर्षणों में ही बँधे नहीं रहना चाहिए बल्कि उससे ऊपर उठकर राष्ट्र की ओर भी देखना चाहिए ।
स्वतन्त्र अस्तित्व की आकांक्षा और नारी के प्रति आकर्षण
सामान्यतः नारी पुरुष की पूरक है, उसका अनिवार्य अंग है। प्राकृतिक रूप से नारी पुरुष को अपनी ओर आकर्षित करती है, किन्तु प्रश्न यह है कि जो नारी आकर्षित नहीं करती, तो इसमें पुरुष की कमी है या नारी की। एक ओर नारी (सुन्दरी) का आकर्षण नन्द को अपने बन्धन में बाँधता है, किन्तु वह बँधकर भी स्वतन्त्र अस्तित्व की कामना करता है। “पुरुष बँधना चाहकर भी उससे ऊपर उठकर, एक अपार्थिव जिज्ञासा में अपने लिए उपलब्धि ढूँढना चाहता है।" सुन्दरी का नारी आकर्षण के सम्बन्ध में कथन है कि, “नारी का आकर्षण पुरुष को पुरुष बनाता है, तो उसका आकर्षण उसे गौतम बुद्ध बना देता है।" वह मानती है कि कामनाओं को जीता जाना भी तो एक कामना है और जब यह कामना जागती है तो वह विरक्त कैसे हुआ ? तात्पर्य यह है कि काम और कामना संन्यासी होने के बावजूद पुरुष के साथ जुड़े रहते हैं तब भला संन्यासी होने से क्या लाभ ? यही कारण है कि उसकी दृष्टि में सिद्धान्त के बुद्धत्व और यशोधरा के दीक्षा ग्रहण कर संन्यासिनी होने का कोई महत्व नहीं है। लोगों में बुद्ध के प्रति जो आकर्षण है, उसका कारण वह यह मानती है कि लोग जब जीवन की एकरसता से ऊब जाते हैं तो नवीनता की पूर्ति की इच्छा से गौतम बुद्ध जैसे लोगों की ओर उमड़ते हैं। लोगों का यह उत्साह दूध के फेन के उबाल की तरह स्थायी नहीं होता। यह चार दिन बाद शान्त हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि सुन्दरी की मान्यतानुसार पुरुष का नारी के आकर्षण में बँधे रहना चाहिए।
एक ओर नारी के प्रति पुरुष का सहज आकर्षण और दूसरी ओर धर्मोपदेशकों का नारी से दूर रहकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने का उपदेश - पुरुष को दुविधाग्रस्त बना देता है। नन्द नाटक का एक ऐसा ही पात्र है जो मुक्त होना चाहकर भी मुक्त नहीं हो पाता, संन्यासी होना चाहकर भी संन्यास ग्रहण नहीं कर पाता। सामान्यतः प्रकृति पुरुष को बुद्ध होने के लिए अनुमति नहीं देती, इसलिए वह संन्यासी नहीं हो सकता। यदि वह संन्यासी बन जायेगा तो सामाजिक व्यवस्था भंग हो जाएगी, सृष्टि का क्रम रुक जायेगा। इसलिए नारी के प्रति आकर्षण प्रकृति की अनिवार्य माँग है, जिसका प्रतिनिधित्व सुन्दरी के द्वारा किया गया है।
जिजीविषा और जीवन संघर्ष
संसार का प्रत्येक प्राणी जीने के लिए संघर्ष करता है। उसके संघर्ष का कारण यह है कि जैसे भी हो उसके जीवन का अस्तित्व बना रहे। इस नाटक में इस भावना को मृग के माध्यम से व्यक्त किया गया है। नन्द जब मृग को मारने के लिए जाता है तो वह सुबह से शाम तक किसी भी मृग को मारने में सफल नहीं हो पाता। अन्त में पदकर जब अपने महल को वापस जाने लगता है, तो उसे एक हिरन दिखाई देता है, जो अपनी ही थकान के कारण मरा पड़ा है। उसने बाण से घायल मृग को देखकर जीवन में कुछ वित्र अनुभव नहीं किया, किन्तु इस स्वतः मरे पड़े मृग को देखकर उसके मन में विचित्र प्रकार के भाव आने लगते हैं। वह इसी भावना को अपने ऊपर आरोपित कर सोचने लगता है कि यदि यही अवस्था उसकी अपनी होती तो वह क्या करता। वास्तव में, उसकी अवस्था उसी तरह है भी। वह भी मृग की ही तरह जीने के लिए संघर्ष कर रहा है-गृहस्थ जीवन और संन्यास जीवन के दो छोरों के बीच झूल रहा है। अन्ततः वह निर्णय नहीं कर पाता है कि वह क्या करे कि उसके जीवन में सन्तुलन स्थापित हो जाय। इसलिए कभी वह रानी सुन्दरी की ओर आकर्षित होकर उसके मस्तक पर विशेषक बनाता है, दर्पण लेकर उसका शृंगार करता है और उस दिन रानी के कहने पर दिन-भर घर पर रहने के लिए वचनबद्ध होता है। दूसरी ओर न जाने किस अज्ञात प्रेरणा से वह गौतम बुद्ध के विहार में पहुँच जाता है, किन्तु जब उसे दीक्षा दी जाती है, तो उसे मन से स्वीकार नहीं करता। स्पष्ट नहीं होता कि वस्तुतः वह चाहता क्या है ? उसका यह असन्तुलन उसे एक कुण्ठाग्रस्त व्यक्ति सिद्ध करता है, जो कोई सही निर्णय लेने के लिए अपने को व्यवस्थित नहीं कर पाता ।
पार्थिव में अपार्थिव की खोज
आज मनुष्य मूलतः भौतिकवादी है। उसके अति भौतिकवाद ने उसे भोगों के बीच इतना अधिक जकड़ दिया है कि वह चाहते हुए भी उनसे मुक्त नहीं हो पा रहा है। वह आज व्यक्ति नहीं रह गया बल्कि भोगों के हाथ की कठपुतली मात्र बनकर रह गया है। उसने अपनी भोग-पिपासा में अपने जीवन-मूल्यों को इतना अधिक अनास्थावान बना दिया है कि वह सब कुछ भूल गया है। उसके लिए आज न तो परिवार का ही कोई मूल्य है न समाज की ही महत्ता, उसे न संस्कृति से मतलब है और न राष्ट्र के प्रति दायित्व की स्मृति से - सब कुछ भोगों पर स्वाहा हो रहा है। भोगों की आग में सब कुछ स्वाहा करके भी उसे चैतन्यता नहीं आयी है कि अन्ततः आज हमें क्या हो गया है कि हम सर्वस्व त्यागकर हमीं बने रहना चाहते हैं। वे जीवन-मूल्य जो कभी मानव जीवन के आधार थे, थाती थे, जीवन-सत्व थे-आज उनका कोई मूल्य नहीं रह गया है। आज जीवन-सत्व उसके लिए दूसरों को भाषण करने या पुस्तकें लिखने के लिए रह गये हैं। उन पर चलने के विषय में सोचने के लिए उसके पास अवकाश नहीं है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि अति भौतिकवाद से उत्पन्न भोगवाद ने उसे इतना अधिक आत्मकेन्द्रित और संकुचित बना दिया है कि वह सर्वथा निरंकुश हो गया है। नाटककार का इस सम्बन्ध में कंथन है- “नाटक का मूल द्वन्द्व पार्थिव और अपार्थिव मूल्यों का द्वन्द्व है।" नन्द नाटक का एक ऐसा पात्र है, जो पार्थिव और अपार्थिव व जीवन-मूल्यों के बीच झूल रहा है। वह पार्थिव जीवन में आसक्त और आकण्ठ लीन तो है, किन्तु वह अपार्थिव जीवन-मूल्यों की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील है, किन्तु उसकी विवशता यह है कि अपने सभी प्रयासों में असफल हो जाता है। वर्तमान युग में मानव भी. नन्द ही है, जो पार्थिव और अपार्थिव के मध्य द्वन्द्वरत है, परन्तु पार्थिव की अति आसक्ति उसे अपार्थिव की ओर ले जाने में सफल नहीं हो पाती। 'लहरों के राजहंस' में रानी सुन्दरी, कामोत्सव, मदिरा, नृत्य, आखेट, राग-रंग, भोग-विलास आदि पार्थिव मूल्यों के प्रतीक हैं, तो गौतम बुद्ध. के प्रति आकर्षण और वहाँ आश्रम में जाकर भी बौद्ध धर्म में मन से दीक्षित न हो पाना अपार्थिव, के प्रतिद्वन्द्व की स्थिति है, जिसकी न कोई पूर्णता है और न अन्त हो है।
अस्तित्व और अनस्तित्व का प्रश्न
संसार का प्रत्येक प्राणी जीने के लिए संघर्ष' करता है। उसे अपने अस्तित्व से प्रेम है। वह जीतना चाहता है और इसके लिए वह नित्तर संघर्षरत रहता है। यहाँ तक कि अपने अस्तित्व की रक्षा उसे सही और गलत, उचित और अनुचित, करणीय और अकरणीय, पाप और पुण्य का भेद भी भुला देती है और वह वही कार्य करता है, जिससे वह जीवित रह सके। नाटक में कई पात्र ऐसे हैं जो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मृग को अपने अस्तित्व से प्रेम है; इसलिए अन्तिम साँस तक आखेटक का विरोध करता है। सुन्दरी को अपने अस्तित्व से अत्यधिक लगाव है, जिसके लिए वह कामोत्सव मनाती है और अपनी कामनाओं की पूर्ति की आकांक्षा करती है। वह कहती है-“कामोत्सव कामना का उत्सव है आर्य मैत्रेय ! मैं अपनी आज की कामना कल के लिए टाल रखूँ क्यों ? मेरी कामना मेरे अन्तर की है।” उसकी कामना पूर्ति की आकांक्षा अस्तित्व रक्षा के लिए है। नन्द को अपने अस्तित्व से इतना अधिक प्रेम है कि वह न तो सुन्दरी के प्रेम-पाश में बँधा रहना ही स्वीकार कर पाता है और न ही बौद्ध-धर्म में दीक्षित होकर उसे उसमें विलीन करना चाहता है। इसी अस्तित्व और अनस्तित्व का द्वन्द्व पात्रों को विकल बनाए हुए है। सभी उसी के लिए चिन्तित हैं, व्यग्र हैं। नाटककार ने स्वयं इसे स्वीकार किया है — “ अस्तित्व और अनस्तित्व के बीच मेरी चेतना को एक प्रश्न-चिह्न केवल एक प्रश्न-चिह्न बनाकर छोड़ दिया गया है। सोच रहा था कि बस यही नन्द है : और यही उसकी परिणति । ” एक प्रश्न-चिह्न
इस प्रकार हम देखते हैं कि नन्द, सुन्दरी, श्यामांग, आदि प्रतीकों के माध्यम से नाटककार ने नाटक को वर्तमान सन्दर्भों से सम्बद्ध करते हुए प्रस्तुत किया है। नन्द को कुछ ऐसे दृष्टि-बिन्दुओं की खोज है, जहाँ पहुँचकर वह अपने को स्थिर कर सके। वह कहता है-“मुझे विश्वास है ! विश्वास है कि जब तक यहाँ हूँ, तब तक इसका केवल इतना ही अर्थ रहेगा ! क्योंकि यहाँ रहते मैं केवल उतना-सा ही हूँ, जितना-सा तुम्हारी दृष्टि मुझे देखना चाहती है। और उतने आकार का व्यक्ति यादे जीवन में कोई बिन्दु खोजना चाहे, तो कितनी दूर जा सकता है ?' इस पर सुन्दरी कहती है-“तुम : .. ! कितने-कितने बिन्दु खोजे हैं आज तक तुमने ! जाओ, एक बिन्दु और खोजो। कितने-कितने शब्दों में ढाँपा है उन बिन्दुओं को ? जाओ, कुछ और शब्द ढूँढो । परन्तु अन्त में कहाँ रह जाते हैं तुम्हारे वे सब बिन्दु ? कहाँ चले जाते हैं तुम्हारे वे शब्द ? फिर भी क्यों वहीं के वहीं बने रहते हो तुम ?” सुन्दरी का यह कथन मानव की नियति की ओर संकेत करता है कि आज का भोगवादी मानव पार्थिव मूल्यों से अलग होना चाहकर भी उससे अलग नहीं हो पाता और मछुआरे के जाल में बँधी मछली की तरह पड़ा-पड़ा साँस लेता रहता है, तड़पता रहता है। यही उसका अन्तिम बिन्दु है, यही उसकी चरम परिणति है।


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