अष्टक वर्ग और कुंडली विवेचना वैदिक ज्योतिष में अष्टक वर्ग किसी जन्म कुंडली का सूक्ष्म, व्यावहारिक और गणितीय विश्लेषण करने की एक अत्यंत सटीक और सरल
अष्टक वर्ग और कुंडली विवेचना
वैदिक ज्योतिष में अष्टक वर्ग किसी जन्म कुंडली का सूक्ष्म, व्यावहारिक और गणितीय विश्लेषण करने की एक अत्यंत सटीक और सरल प्रणाली है। इसके माध्यम से ग्रहों और भावों की वास्तविक शक्ति का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है। यह बेहद ही प्रभावशाली पद्धति है जिसमें गणितीय विधि का प्रयोग कर फलित किया जाता है। किसी भी व्यक्ति के जीवन में घटित होने वाली विभिन्न प्रकार की घटनाओँ के विषय में त्वरित जानकारी प्राप्त करने में अष्टक वर्ग बहुत ही सहायक सिद्ध होता है। जन्मकुंडली का सामान्य विश्लेषण और जातक के जीवन का सर्वांगीण स्वरूप जानने और उनके विषय में भविष्यवाणी करने में अष्टक वर्ग से विभिन्न राशियोँ/ भावोँ में प्राप्त संख्यायेँ अथवा बिंदु अर्थात अष्टक वर्ग बिंदु ही पर्याप्त आधार हैं। मूल रूप से देखा जाये तो अष्टक वर्ग अपने आप में एक सम्पूर्ण शास्त्र है। इसके माध्यम से जन्मकुंडली के उन गूढ रहस्योँ और सूक्ष्मतम जानकारियोँ को भी जाना समझा जा सकता है जिस विषय में आम तौर पर संदर्भ ग्रंथ और पारम्परिक शास्त्र बहुत ही कम जानकारी प्रदान करते हैं। अष्टक वर्ग की सार्थकता, उपयोगिता और महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहाँ अन्य शास्त्र गहराई तक जाकर सटीकता के परिणाम देने में समर्थ नही प्रतीत होते वहीँ जन्मकुंडली से जुडी बहुत सी ऐसी जानकारियाँ और फलित है जिसे केवल और केवल अष्टक वर्ग ही बताने में समर्थ और सक्षम होता है। शीघ्रता, सरलता, सुगमता और सटीकता के साथ जन्मकुंडली में निहित जानकारी प्राप्त करने में अष्टक वर्ग एक महत्वपूर्ण और उपयोगी विधा है।
आइये सबसे पह्ले यह समझने का प्रयास करते हैं कि अष्टक वर्ग है क्या?
होरा शास्त्र के प्राचीन ऋषि मुनियोँ द्वारा सभी प्रकार के कर्मोँ से उत्पन्न होने वाले शुभ और अशुभ फल जानने के लिए अष्टक वर्ग का विकास किया गया। महर्षि पाराशर जी के अनुसार जिस तरह विभिन्न भावोँ में ग्रहोँ की स्थिति के प्रभाव का आकलन जन्म लग्न और चंद्रमा से किया जाता है, उसी प्रकार दूसरे ग्रहोँ को भी लग्न की तरह मानकर उनसे भावोँ को गिनते हुए भी फलोँ का आकलन करना चाहिए। यहाँ अष्टक वर्ग के अंतर्गत सूर्यादि सात ग्रह और लग्न के समग्र प्रभाव को सम्मिलित कर इस आधार पर परिणाम प्राप्त किया जाता है। यहाँ राहु और केतु को सम्मिलित नही किया जाता है क्योंकि उन्हे अलग से किसी भी राशि का स्वामित्व प्राप्त नही होता है। अष्टक वर्ग का अध्य्यन मुख्यत: तीन वर्गोँ के आधार पर किया जाता है।
- प्रस्तारक/ प्रस्तार वर्ग/ प्रस्तर अष्टक वर्ग:- सात ग्रह और लग्न की स्थिति से बताये गये शुभ स्थानोँ के आधार पर प्रस्तारक तैयार किया जाता है। यह अष्टक वर्ग का विस्तार से आकलन बताता है। इससे यह जानकारी प्राप्त होती है कि ग्रह द्वारा भाव/राशि में बिंदु प्रदान किए गये हैं अथवा नहीं।
- भिन्नाष्टक वर्ग:- ग्रह के प्रस्तारक के आधार पर उस ग्रह का अलग अलग राशिवार बिंदुओँ का योग होता है। अलग अलग ग्रहोँ के प्रभाव का अध्य्यन उनका अलग अलग अष्टक वर्ग बनाकर किया जाता है जिसे उस ग्रह विशेष का भिन्नाष्टक वर्ग भी कहा जाता है। भिन्नाष्टक से हमें हर ग्रह का अलग अलग राशि वार बिंदुओँ का योग प्राप्त होता है।
- सर्वाष्टक वर्ग:- सभी सातोँ ग्रहोँ और लग्न के भिन्नाष्टक में प्राप्त बिंदुओँ का योग लेकर सर्वाष्टक तैयार किया जाता है। जब सातोँ ग्रहोँ और लग्न के समग्र प्रभावोँ से प्राप्त शुभ बिंदुओँ से बना वर्ग सर्वाष्टक के नाम से जाना जाता है।
भविष्यवाणी के लिए प्रस्तारक, भिन्नाष्टक और सर्वाष्टक का अपना अपना महत्व है। जहाँ तक अष्टक वर्ग बनाने का प्रश्न है तो इसकी एक गणितीय प्रक्रिया है परंतु आजकल विभिन्न कम्प्युटर सोफ्ट्वेयर के माध्यम से इन्हेँ आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।
अष्टक वर्ग में 7 ग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि) और लग्न को आधार माना जाता है। प्रत्येक ग्रह कुंडली के 12 भावों में गोचर करते हुए किसी अन्य ग्रह या भाव के सापेक्ष शुभ या अशुभ बिंदु (0 से 8 तक अंक) प्रदान करता है। गोचरवश शुभ भावोँ में गुजरने पर ग्रह बिंदु देते हैं और जहाँ से उनका गोचर शुभ नही बताया गया है उस भाव/राशि में कोई भी बिंदु नही दिए जाते। इस प्रकार एक ग्रह अधिकतम 8 अंक या बिंदु प्रदान कर सकता है। समस्त ग्रहोँ द्वारा प्रदत अष्टक वर्ग में अधिकतम 337 बिंदु हो सकते है। कुंडली के बारह भावोँ के आधार पर प्रत्येक भाव के लिए औसत 28 बिंदु निकलकर आते हैं। इस प्रकार 28 से अधिक अंक प्राप्त होने पर शुभ परिणाम; 25 से 28 अंक प्राप्त होने पर औसत/मध्यम परिणाम; 20 से 25 अंक आने पर संघर्ष और कष्ट और 20 से कम अंक आने पर अशुभ या विपरीत परिस्थिति बतायी जा सकती है।
सर्वाष्टक वर्ग के कुछ सामान्य सिद्धांत
1. कोई भी राशि या भाव जहाँ 28 से अधिक बिंदु प्राप्त हुए हैं शुभ फल प्रदान करेगा। व्यवहार में 25-30 के बीच बिंदु प्राप्त होने पर सामान्य फल बताया जाता है और 30 से ऊपर बिंदु प्राप्त होने पर भाव या राशि विशेष शुभ फल प्रदान करेगी।
2.उच्च, स्वक्षेत्री, केंद्र, त्रिकोण या लग्न से उपचय स्थानोँ जैसे 3,6,10,11 में स्थित होने के बाद भी ग्रह प्रभावहीन हो जाता है यदि उस भाव में कम बिंदु प्राप्त हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि इस ग्रह को अन्य ग्रहोँ द्वारा समर्थन प्रदान नही किया गया है।
3.नीच स्थान अथवा दु:ख स्थानोँ जैसे 6,8,12 में स्थित होने के उपरांत भी ग्रह शुभ फल प्रदान करेंगे यदि वहाँ अधिक बिंदु प्राप्त हैं।
4.यदि एकादश स्थान में दशम और द्वादश से अधिक साथ ही लग्न में भी द्वादश से अधिक बिंदु प्राप्त हैं तो जातक सुख समृद्धिपूर्ण जीवन यापन करेगा।
5.लग्न, नवम, दशम और एकादश स्थानोँ पर 30 से अधिक बिंदु होने पर जातक का जीवन समृद्धिपूर्ण होगा। वहीँ इसके विपरीत यदि बिंदु केवल 22 या और कम हैं और त्रिकोण स्थनोँ में अशुभ ग्रह विराजमान हैं तब जातक गरीबी या दरिद्रता में जीवन यापन करेगा।
6.21 बिंदुओँ से कम बिंदु प्राप्त भाव से किसी अशुभ ग्रह का गोचर उस भाव से सम्बंधित फलोँ की हानि करता है। इसके विपरीत 30 से अधिक बिंदु प्राप्त भाव से गोचर करने पर उस भाव से सम्बंधित शुभ फलोँ की प्राप्ति होती है जो उस ग्रह के कारकत्व और कुंडली में उसे प्राप्त भाव के स्वामित्व के अनुसार होगी।
7.ग्रह अपनी दशा अंतर्दशा में उन स्थानोँ के अच्छे फल प्रदान करते हैं जिन राशियोँ के स्वामी होते हैं और जिन राशियोँ/भावोँ में वे स्थित होते हैं।
8.जिस भाव में 30 शुभ बिंदु से अधिक हैं और एक साथ अनेक ग्रह गोचरवश विचरण कर रहे हैं तब ऐसी परिस्थिति में वे उस भाव के शुभ फलोँ में कई गुना बढोत्तरी करने में सक्षम होते हैं। फल किस प्रकार के होंगे यह इस बात पर निर्भर करता है कि सम्बंधित भाव कौन सा है साथ ही गोचर के ग्रहोँ का मूल लग्न में क्या स्थान हैं और उनके कारकत्व क्या हैं।
9.न्यूनतम बिंदु के साथ जिस दिन जिस राशि विशेष का उदय हो रहा होता है तो जहाँ एक ओर उस दिन चिकित्सक की सलाह पर रोगादि का उपचार शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है तो वहीँ दूसरी ओर यदि उस दिन ऋण लिया जाता है तो उसे चुकाने की क्षमता भी शीघ्र अर्जित हो जाती है।
10.कोई भी ग्रह अपना सबसे अधिक शुभ फल तब तब प्रदान करता है जब-जब वह जन्मकुंडली में अपनी स्थिति से एकादश स्थान पर गोचर करता है।
सर्वाष्टक बिंदुओँ का उपयोग करते हुए त्वरित भविष्यवाणी और फलादेश का विचार
जब भी अनिश्चय की स्थिति हो अष्टक वर्ग अवश्य ही देखा जाना चाहिए। कोई ग्रह शुभ ग्रहोँ से युक्त और दृष्ट होकर शुभ राशि, उच्च राशि अथवा मित्र राशि में स्थित हो तो अपने भाव से सम्बंधित फलोँ की वृद्धि करेगा। इस प्रकार यह एक सामान्य सिद्धांत है। परंतु हमेशा ऐसा ही हो ऐसा जरुरी नही है। साथ ही इससे इस बात की भी जानकारी नही प्राप्त होती कि फलोँ की वृद्धि किस अनुपात में होगी? शुभ अथवा अशुभ फल का अनुपात क्या होगा? इन सभी बिंदुओँ पर अष्टक वर्ग प्रणाली बेहद उपयोगी और निर्णायक साबित होती है।
1.हमें विदित है कि दशम भाव हमारे द्वारा किए जाने वाले कर्म, प्रयास या व्यवसाय/ प्रोफेशन का भाव है और एकादश ईक्षापूर्ति/ लाभ का स्थान है। यदि दशम भाव में एकादश भाव की तुलना में कम बिंदु हैं तब यह कहा जा सकता है कि ऐसे जातक को कम मेह्नत में अधिक लाभ मिलेगा। इसके विपरीत यदि दशम में बिंदु अधिक होते हैं तब जातक को प्रयास अधिक करना होगा परंतु परिणाम उस अनुरूप नही प्राप्त होंगे। मुख्य रूप से इस सिद्धांत को लग्न से एकादश के ऊपर लागू किया जाता है। परंतु अन्य भावोँ से एकादश भाव के संदर्भ में भी इस नियम को लागू किया जा सकता है और बेहद ही सटीक और अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।
2.यदि द्वादश भाव में एकादश से अधिक बिंदु प्राप्त हैं तब आय से अधिक व्यय की सम्भावना रहती है परिणाम स्वरूप जातक कर्ज में डूब जाता है। इसका एक अन्य पह्लू भी है। द्वादश भाव विदेशी स्त्रोतोँ से आय को भी दर्शाता है अत: ऐसा जातक विदेशी साधनोँ से आय का अर्जन कर सकता है। ऐसे जातक के सितारे अपनी मातृभूमि से बाहर अन्य किसी देश में चमकते हैं।
3.यदि द्वितीय भाव में द्वादश भाव की तुलना में अधिक बिंदु प्राप्त होते हैं तब ऐसे जातकोँ में धन के संचय करने की प्रवृत्ति देखी गयी है और वे आमोद प्रमोद पर व्यय करने से परहेज करते हैं। दोनोँ भावोँ में बिदुओँ का अंतर जितना अधिक होता है संचय करने के प्रवृत्ति उतनी ही अधिक देखने में आती है। ऐसे जातक खरीद्दारी करने में बडे ही मितव्ययी होते हैँ और बहुत सोच समझकर और मोलभाव कर ही वस्तुओँ का क्रय करते हैं। इसके विपरीत यदि द्वादश भाव को वित्त भाव की अपेक्षा अधिक शुभ बिंदु प्राप्त होते हैं तब ऐसे जातकोँ को अपने पारिवारिक व्यवसाय के स्थान पर विदेश से सम्बंधित कार्य उनके लिए अधिक अनुकूल रहता है और अधिक लाभ की सम्भावना बनती है। द्वितीय भाव वित्त/धन और द्वादश विदेश से सम्बंध को इंगित करता है। अत: द्वितीय और द्वादश का यह सम्बंध विदेश से धनार्जन को दर्शाता है।
आइये यहाँ एक अन्य तथ्य पर प्रकाश डालते हैं जिसमेँ दशम भाव में एकादश से अधिक बिंदु हैं।
अब यदि किसी जातक की जन्मकुंडली में दशम में एकादश की तुलना में अधिक बिंदु हैं उदाहरणार्थ दशम में 36 और एकादश में 28 तब इसका तात्पर्य यह हुआ कि जीवन भर उसे उसकी मेहनत का पूर्ण फल नही मिलने वाला है और वह संघर्षरत और बेहद परेशान रहने वाला है। अर्थात जन्म के समय ही उसका भाग्य निश्चित हो गया कि जीवन पर्यंत उसे अपनी इक्षापूर्ति के लिए संघर्षरत रहना पडेगा। नियमानुसार यह सही भी है परंतु ऐसा हमेशा ही होगा यह सत्य नही है। यहीँ ज्योतिष की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निकलकर सामने आती है। मुख्य रूप में देखा जाये तो ज्योतिष केवल भविष्यवाणी या फलकथन के लिए बनी विद्या नही है। यह जातक के कर्मोँ को सही दिशा में नियोजित करने और उनके सही प्रबंधन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जिससे उसे कम प्रयास और मेहनत के सफलता प्राप्त हो सके और उसकी ईक्षापूर्ति हो सके। ज्योतिष के अंतर्गत अष्टक वर्ग एक ऐसी ही विधा है जो हमें यह बताती है कि किस प्रकार सही समय पर, सही दिशा में सही प्रयास किए जाने से सफलता का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है। इसे इस प्रकार समझ सकते हैं:-
1.यदि किसी जातक के सर्वाष्टक में लग्न भाव में सर्वाधिक बिंदु प्राप्त हैं। लग्न भाव चूंकि तृतीय भाव से एकादश है अत: यह तृतीय भाव ही जातक की ईक्षापूर्ति का भाव बन जाता है। तृतीय भाव स्थान परिवर्तन को दर्शाता है अत: ऐसा जातक कार्य के दौरान अपना स्थान परिवर्तन करता रह्ता है या यात्रा में रहता है तब उसे कम प्रयासोँ में अधिक की प्राप्ति बतायी जा सकती है।
2.यदि अष्टक वर्ग में पंचम भाव में सर्वाधिक हैं तब पंचम भाव सप्तम भाव से एकादश है। सप्तम भाव विवाह को इंगित करता है। अत: ऐसे जातक को उसके विवाह के पश्चात सफलता प्राप्त होती है, उसकी उन्नति होती है और वह लाभ प्राप्त करता है। अकसर ऐसा देखने में आया है कि विवाह के उपरांत जातक का भाग्योदय होता है। कभी कभी तो उसे वह सब भी प्राप्त हो जाता है जिसकी उसने कभी कल्पना भी नही की होती है।
अष्टक वर्ग हमारा भली प्रकार से मार्गदर्शन करने में सक्षम होता है कि हमें अपने कर्मोँ को किस दिशा में लगाना चाहिए जिससे लाभ की प्राप्ति हो सके। इसके लिए सर्वप्रथम यह चिन्हित करेँ कि अष्टक वर्ग कुंडली में किस भाव में सर्वाधिक बिंदु प्राप्त हैं। अब उस भाव को चिन्हित करेँ जिस भाव से यह सर्वाधिक बिंदुओँ वाला भाव एकादश है। इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि इस दूसरे चिन्हित भाव के अनुरूप कर्म करने पर जातक को लाभ की प्राप्ति हो सकती है। इस प्रकार अष्टक वर्ग एक सर्वोत्तम मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है।
अष्टक वर्ग सिद्धांत जातक के जीवन में शीघ्र फलकथन और मार्गदर्शन में बेहद ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके कुछ महत्वपूर्ण उपयोग और महत्व को समझने का प्रयास करते हैं।
1.व्यवसाय में स्थिरता/अस्थिरता:- अष्टक वर्ग के माध्यम से हम इस बात की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं कि हमारे जीवन में कौन-कौन से क्षेत्र ऐसे हैं जहां हमें समस्याओं और कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. वैदिक ज्योतिष में जन्म कुंडली के अष्टम भाव से हम किसी भी व्यक्ति के जीवन में आने वाली कठिनाइयों और समस्याओं को देखते हैं। अष्टक वर्ग का यह सूत्र बेहद ही आसानी से हमें इस बात की जानकारी देने में सक्षम है। किसी भी जन्म कुंडली में लग्न से अष्टम भाव परेशानियां और कठिनाइयों को निरूपित करता है। लग्न जातक स्वयँ होता है उसका शरीर होता है अतः अष्टम भाव शारीरिक कष्ट पीड़ा और दुख दर्द को बताता है। यहां यदि अष्टक वर्ग ने पहले भाव में कम अंक दिए हैं और अष्टम में अधिक अंक दिए हैं तब उसे शारीरिक पीड़ा और कष्ट बताया जा सकता है और इसके ठीक विपरीत यदि लग्न भाव में अष्टम की तुलना में अधिक अंक हैं तो जातक शारीरिक रूप से स्वस्थ, निरोग और शारीरिक पीड़ा से मुक्त बताया जा सकता है। अष्टक वर्ग के इसी सूत्र का उपयोग हम दशम भाव में करते हुए जातक के व्यवसायिक करियर में आने वाले उतार चढ़ाव और स्थिरता का आसानी से आकलन कर सकते हैं। कुंडली का दशम भाव जातक के कर्म/प्रोफेशन या व्यवसाय को निरूपित करता है। इस प्रकार दशम भाव से अष्टम पंचम भाव निकल कर आता है। इस प्रकार हम दशम भाव और पंचम भाव में प्राप्त अंकों का तुलनात्मक अध्ययन कर जातक के कर्म/प्रोफेशन/व्यवसाय में आने वाली स्थिरता अस्थिरता या उतार चढाव का पता लगा सकते हैं। यहां विवेचना कर्म भाव को उदाहरण स्वरूप लेकर की गई है ठीक इसी प्रकार अन्य भावों के संदर्भ में भी व्याख्या की जा सकती है जो कि बेहद सटीक निकल कर आती है.
2.मेलापक:- मेलापक के विषय में अष्टक वर्ग हमें महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है। हम जानते हैं कि किसी भी प्रकार के सम्बंध के सफल होने की कुंजी व्यक्तियोँ के आपसी वैचारिक साम्य और उनमेँ सामंजस्यता होती है और विचारोँ का सीधा सम्बंध जातक के मन से होता है जिसका कारक ग्रह चंद्रमा है। अष्टक वर्ग बताता है कि किसी भी विवाह के सुखी और सफल होने के लिए वर और वधू के चंद्र राशियों के बिंदु एक दूसरे के जन्म कुंडली में 30 से अधिक होने चाहिए। वर्तमान समय में भी गुणोँ के मिलान कि तुलना में विचारोँ और मन के मिलने पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए जिससे वैवाहिक जीवन सुखपूर्वक निभ सके। यहाँ यदि वर की अष्टक वर्ग पत्रिका में चंद्रमा ने अपने अष्टक वर्ग में जिस राशि को सर्वाधिक बिंदु/अंक प्रदान किए हैं यदि वह राशि वधु की चंद्र राशि है तब यह कहा जा सकता है कि दोनोँ के मानसिक विचारोँ में समानता देखने में आयेगी, दोनोँ में मधुर सम्बंध बने रहेंगे और वैवाहिक जीवन सफल रहेगा। यह सिद्धांत केवल मेलापक के प्रकरण में ही नही अपितु हर प्रकार के सम्बंधोँ के लिए लागू होता है और बहुत ही अच्छी तरह से कार्य करता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि दो जातकोँ में मानसिक सामंजस्य और वैचारिक साम्य भली प्रकार से बना रहे इस बात को जानने के लिए चंद्रमा के भिन्नाष्टक का अध्य्यन किया जाता है। एक जातक की कुंडली में चंद्रमा ने अपने भिन्नाष्टक में जिस राशि में सर्वाधिक बिंदु दिए हैं यदि वही राशि दूसरे जातक की कुंडली में चंद्र राशि बनती है तो दोनोँ के बीच के सम्बंध में मानसिक साम्य की सम्भावना प्रबल बतायी जा सकती है। इस स्थिति में ना केवल वैवाहिक जीवन में सामंजस्यता और सद्भाव बना रहता है अपितु मित्रता, प्रेम, गुरु शिष्य, साझेदारी, जीवनसाथी, आदि सम्बंधोँ में भी समरसता बनी रहती है।
3.शनि का गोचर/ साढे साती:- वैदिक ज्योतिष में गोचर के महत्व को किसी भी प्रकार से काम करके आंका नहीं जा सकता है। जहां तक ग्रहोँ के गोचर का प्रश्न है तो मंदगामी ग्रहों का प्रभाव जातक के जीवन पर ज्यादा लम्बे समय तक पडता है। क्योंकि ऐसे ग्रह एक ही राशि में काफी लंबे समय तक गोचरवश रहते हैं। जब कोई मंदगामी ग्रह (शनि, गुरु, राहु, केतु आदि) गोचर में अधिक बिंदुओं वाली राशि से गुजरता है तब जातक के लिए वह समय अच्छा बताया जा सकता है और कम बिंदुओं वाली राशि से गुजरने पर समय कठिन, संघर्षपूर्ण और रुकावटें पैदा करने वाला बताया जाना चाहिए। यही कारण है कि शनि/गुरु के गोचर का फल हर व्यक्ति के लिए अलग होता है। एक राशि में शनि का गोचर लगभग ढाई वर्ष का होता है। हम जानते हैं कि जब शनि जन्मकुंडली में चंद्रमा की स्थिति से द्वादश, प्रथम और द्वितीय स्थान पर गोचर करता है तो साढे सात साल की यह अवधि साढेसाती के नाम से जाने जाते हैं। शनि के साढेसाती को हमारे कुछ ज्योतिषियोँ द्वारा अत्यधिक ऋणात्मक और भयावह रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस वजह से कुछ जातक तो मात्र यह सुनकर ही तनाव ग्रस्त हो जाते हैं कि उनकी साढे साती शुरु होने वाली है। जबकि वस्तुस्थिति इससे काफी भिन्न है। ज्योतिषों ने जनसामान्य के मन में साढेसाती के विषय में काफी भ्रम और तनाव सा पैदा कर रखा है जिस कारण अधिकतर लोग इस अवधि के आने पर अत्यधिक घबरा जाते हैं। अष्टक वर्ग कुंडली से प्राप्त बिंदुओँ के आधार पर इस बात का निर्णय किया जा सकता है कि जातक कि साढे साती वास्तव में किस प्रकार के परिणाम लेकर आने वाली है। जन्मकालिक चंद्रमा से द्वादश, प्रथम और द्वितीय भाव में प्राप्त बिंदुओँ का तुलनात्मक अध्य्यन हमें इस बारे में भली प्रकार से अवगत कराता है। चंद्रमा से तीनों स्थानों पर यदि औसत बिंदुओँ 28 से अधिक अंक/बिंदु प्राप्त हुए हैं तब जातक के साढेसाती अच्छी और शुभ फलदायक बतायी जा सकती है। अगर यह बिंदु औसत से बहुत कम हैं तो यह समय खराब जाएगा. तीन काल खण्डों में से जिस खंड में अष्टक वर्ग में अच्छे बिंदु होंगे वहां साढेसाती का फल उत्तम कहा जा सकता है और जहां औसत से कम बिंदु हैं वहां पर साढेसाती परेशानी पैदा कर सकती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि अधिक अंक वाले स्थान का समय अच्छा और कम अंक वाले स्थान का समय खराब जाएगा। शनि का चंद्रमा पर से गोचर अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि चंद्रमा हमारा मन होता है और शनि हमारे जीवन में आने वाली जिम्मेदारियां और कर्म का सूचक है जब जब शनि का गोचर चंद्रमा के ऊपर से होता है हमारे ऊपर जिम्मेदारियाँ और अधिक बढ जाया करती हैं।
4.अवस्था:- अष्टक वर्ग के माध्यम से हम जातक के जीवन की अच्छी या खराब जाने वाली अवस्था का पता भी लगा सकते हैं। इसके लिए हम जन्म कुंडली की चार चार राशियोँ के तीन समूहोँ में बांटते हैं। मीन से मिथुन तक प्रथम समूह बाल्यावस्था का सूचक है, कर्क से तुला तक द्वितीय समूह युवावस्था का और वृश्चिक से कुंभ तक तृतीय समूह वृद्धावस्था का सूचक बताया गया है। तीनों विभागों के बिंदुओं को अलग-अलग जोड़ने पर जीवन की अच्छी या संघर्षमय गुजरने वाली अवस्था की जानकारी प्राप्त होती है। जिस अवस्था में बिंदुओं का जोड सबसे अधिक होता है वह अवस्था सबसे अच्छी गुजरती है। कुछ विद्वान जीवन की अवस्थाओं की गणना लग्न से शुरू करना भी बताते हैं।
5.वास्तु:- वास्तु के क्षेत्र में भी अष्टक वर्ग अपनी महत्वपूर्ण दखल रखता है। हम सभी वास्तु में दिशाओँ की महत्ता को भली प्रकार समझते हैं। एक सामान्य प्रश्न जो सर्वप्रथम हमारे मस्तिष्क में आता है वह है कि हमारे लिए सबसे अच्छी दिशा या डायरेक्शन कौन सी होगी ? अष्टक वर्ग इस सम्बंध में बेहद सरलता से हमें जानकारी प्रदान करता है। हम जानते हैं की अग्नि तत्व राशियां 1,5,9 पूर्व दिशा को, पृथ्वी तत्व राशियाँ 2,6,10 दक्षिण दिशा को, वायु तत्व राशियाँ 3,7,11 पश्चिम दिशा को और जल तत्व राशियाँ 4,8,12 उत्तर दिशा को इंगित करती हैं। अष्टक वर्ग के माध्यम से राशियों को प्राप्त बिंदुओँ के आधार पर दिशावार राशियोँ का जोड निकालते हैं। इस प्रकार प्राप्त दिशावार राशियोँ के जोड में जिस दिशा में सर्वाधिक शुभ बिंदु प्राप्त होते हैं उस दिशा को जातक के लिए सर्वाधिक उपयुक्त बताया जा सकता है।
6.दशा अंतर्दशा:- दशा अंतर्दशा के अंतर्गत परिणामोँ की सटीक और स्पष्ट व्याख्या करने में अष्टक वर्ग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दशा अंतर्दशा के सम्बंध में इस तथ्य से भली प्रकार से परिचित हैं कि जब भी केंद्र त्रिकोण के स्वामियोँ की दशा अंतर्दशा आती है तब यह दशा जातक के लिए राजयोग लेकर आती है। यह राजयोग वाली दशा कैसे काम करने वाली है इस विषय में सामान्य अध्य्यन ज्यादा जानकारी नही दे पाता है। यहाँ अष्टक वर्ग हमें बताता है कि यह राजयोग वाली दशा अंतर्दशा किस प्रकार से काम करने वाली है। सामान्यत: यह देखा गया है कि जब भी दशाओँ में परिवर्तन आता है तब जनसामन्य यह जानने में ज्यादा उत्सुक होते हैं कि यह दशा उनके जीवन में क्या क्या बद्लाव और परिणाम लेकर आने वाली है। उनका मुख्य उद्देश्य इस बात का पता लगाने में होता है कि दशा अपने कालखण्ड में अच्छे परिणाम देगी अथवा परेशानियाँ, विपत्तियाँ या संघर्ष लेकर आयेगी। इस प्रकार यहाँ हम दशा के बारे में फलित पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे होते हैं जबकि अष्टक वर्ग के माध्यम से यदि हम दशा अंतर्दशा का विधिवत प्रबंधन करते हुए उसके अनुसार कर्म को ढालते हैं तब खराब दशा अंतर्दशा से भी संतोषजनक/अच्छे परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। अष्टक वर्ग की मदद से ज्योतिषी किसी भी ग्रह की महादशा या अंतर्दशा के अंतर्गत मिलने वाले सटीक परिणामों का व्यावहारिक और गणितीय निष्कर्ष निकालते है। कुछ विद्वान ज्योतिषी जातक की महादशा को लग्न बनाकर तदुपरांत सर्वाष्टक बिंदुओँ को प्रतिस्थापित करते हुए एक नवीन कुंडली का निर्माण करते हैं जिसे दशा लग्न कुंडली कहते हैं। अब इस नवीन दशा लग्न कुंडली के माध्यम से जातक की महादशा के परिणाम निकालते हैं। यह विधि भी बेहद ही सटीक परिणाम प्रदान करती है।
7.गोचर फलादेश: जब गोचर में कोई ग्रह किसी राशि से गुजरता है, तो उस गोचरीय राशि को अष्टक वर्ग में जितने अंक प्राप्त होते हैं, उसी अनुपात में जातक को अच्छे या बुरे फल प्राप्त होते है। जब भी कोई अशुभ ग्रह किसी ऐसे घर से गोचर करता है जिसमेँ 21 से कम बिंदु हैं तब उस भाव से सम्बंधित फलोँ की हानि बतायी गयी है। जबकि ऐसे घर से गोचर करने में जहाँ 30 से अधिक बिंदु प्राप्त हैं उस भाव से सम्बंधित शुभ फलोँ की प्राप्ति बतायी गयी है। ये शुभ फल उस ग्रह के कारकत्व और सम्बंधित कुंडली में उसे प्राप्त भाव विशेष के स्वामित्व के अनुरूप होना बताया गया है।
8.ग्रहों का वास्तविक बल: यदि कोई ग्रह कुंडली में उच्च, स्वक्षेत्री, केंद्र या त्रिकोण अथवा उपचय स्थानोँ में होने के बावजूद भी प्रभावहीन हो जाता है यदि वह ऐसी राशि/भाव में स्थित है जहाँ बिंदु औसत से कम हैं। इसका तात्पर्य होता है कि इस ग्रह को अन्य ग्रहोँ का समर्थन नही प्राप्त हुआ है। इसके विपरीत यदि कोई ग्रह पीडित भी है परंतु जिस भाव/राशि में वह स्थित है जहाँ 28 से अधिक अंक प्राप्त हैं तब वह शुभ फल प्रदान करेगा।
9.भावों का बल: ऐसी कोई भी राशि/ भाव जहाँ पर 28 से अधिक अंक प्राप्त हुए हैं शुभ फल प्रदान करेगा और जिन राशियोँ/भावोँ में कम अंक प्राप्त होने पर अशुभ फल की प्राप्ति बतायी गयी है। कुंडली के किस भाव में कितने अंक हैं, यह उस क्षेत्र में मिलने वाली सफलता (जैसे धन, करियर, विवाह) को तय करता है। उदाहरण के लिए, जिस भाव में जितने अधिक अंक होंगे, उस भाव से जुड़े कारकत्वोँ में उतनी ही अधिक सफलता मिलेगी।
10.नौकरी या व्यापार:- जातक को नौकरी अथवा व्यापार में से किसे चुनना चाहिए इसे भी अष्टक वर्ग के माध्यम से पता लगाया जा सकता है। इस हेतु कुंडली के बारह भावोँ को चार वर्गोँ बंधु, सेवक, पोषक और घटक में बांटा जाता है। बंधु वर्ग में 1,5,9; सेवक वर्ग के अंतर्गत 2,6,10; पोषक वर्ग में 3,7,11 और घटक वर्ग के अंतर्गत 4,8,12 भावोँ को रखा गया है। तत्पश्चात भावोँ में प्राप्त बिंदुओँ के आधार पर प्रत्येक वर्ग को प्राप्त कुल शुभ बिंदुओँ की गणना की जाती है। अब यदि बंधु वर्ग का योग सेवक वर्ग से अधिक है तब ऐसा जातक अपनी आजीविका स्वतंत्र रूप से अर्जित करेगा और वह व्यवहार कुशल होगा। ऐसे जातकोँ के दूसरे व्यक्तियोँ के साथ मधुर सम्बंध देखे गये हैं। इसके विपरीत यदि सेवक वर्ग में बिंदु अधिक हैं तब ऐसा जातक स्वतंत्र रूप से कार्य नही करेगा और दूसरोँ पर अवलम्बित रहेगा। इस प्रकार ऐसे जातक नौकरी के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करते हैं।
इस प्रकार अष्टक वर्ग का शास्त्र हमारे जीवन से जुडी समस्त घटनाओँ के विषय में बेहद ही सरलता, सूक्षमता, शीघ्रता और सटीकता के साथ परिणाम देने में सक्षम है। इस सिद्धांत के माध्यम से ना केवल सामान्य फलकथन अपितु विभिन्न दशा अंतर्दशा के अंतर्गत भविष्य में प्राप्त हो सकने वाले अशुभ परिणामोँ को उचित प्रकार से अपने कर्मोँ का प्रबंधन और सन्योजन कर उनकी अशुभता को कम करते हुए सफलता की दिशा में मोडा जा सकता है।
- इंजी.संजय श्रीवास्तव
बालाघाट मध्यप्रदेश 9425822488


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