लहरों के राजहंस नाटक के आधार पर अलका का चरित्र चित्रण

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मोहन राकेश द्वारा रचित प्रसिद्ध नाटक 'लहरों के राजहंस' में अलका एक अत्यंत महत्वपूर्ण, जीवंत और यथार्थवादी नारी पात्र है।

लहरों के राजहंस नाटक के आधार पर अलका का चरित्र चित्रण


मोहन राकेश द्वारा रचित प्रसिद्ध नाटक 'लहरों के राजहंस' में अलका एक अत्यंत महत्वपूर्ण, जीवंत और यथार्थवादी नारी पात्र है।वह सुंदरी (मुख्य नायिका) की प्रधान परिचारिका (दासी) है, लेकिन अपने प्रखर व्यक्तित्व, बुद्धिमत्ता और स्वतंत्र सोच के कारण वह केवल एक दासी न रहकर नाटक में एक विशिष्ट भूमिका निभाती है।

अलका नन्द की पत्नी सुन्दरी की परिचारिका (सेविका) है।कामोत्सव की तैयारी के समय उसका सर्वप्रथम परिचय मिलता है।अलका का व्यक्तित्व एक सहज नारी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसमें सरलता, विनम्रता, बुद्धिमता, व्यवहार कुशलता, भावुकता, प्रेम आदि भाव भरे हैं। अलका के चरित्र की विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
 

आज्ञाकारिणी सेविका

अलका आज्ञा का पालन करने वाली एक सेविका है। वह राजा नन्द और रानी सुन्दरी के आदेशों को पालन करने में अत्यन्त कुशल है । वह अपने कर्तव्य को अच्छी तरह जानती है। उसके लिए राजा और रानी की इच्छा ही आदेश होती है। वह कहती है- “ आदेश दें, तो मैं अभी जाकर।” जब उसे आदेश मिल जाता है तो कहती है- “ अभी जाकर कह देती हूँ।” नन्द जब स्वयं अग्निकाष्ठ जला रहा है तो कहती है- “मैं जला देती हूँ।"

विनम्रता एवं शिष्टता

लहरों के राजहंस नाटक के आधार पर अलका का चरित्र चित्रण
अलका एक विनम्र स्वभाव की शिष्ट युवती है। वह अपने और रानी सुन्दरी के बीच में जो दूरी है, उसे अच्छी तरह पहचानती है। जब वह स्वप्न देखती है कि सूखा सरोवर, पत्रहीन वृक्ष और धूल भरा आकाश तो वह इसे जाकर पहले रानी सुन्दरी को सुनाती है। स्वप्न बताने के साथ ही साथ वह कहती है, “प्रभात में नींद टूटने से पहले देखा था सपना । प्रभात के सपने सच नहीं होते, देवि ?” उसे यह चिन्ता है कि, “कल भिक्षुणी के वेश में देवी यशोधरा कैसी लगेंगी ?” 
अलका स्वभाव से अत्यन्त उदार है। श्यामांग द्वारा कमल-ताल में पत्थर फेंके जाने पर सुन्दरी श्यामांग को अन्धकूप में उतर जाने का दण्ड सुनाती है, तब अलका अत्यन्त शिष्ट और विनम्र विधि से कहती है-"नहीं देवि ! मैं केवल यह सोच रही थी कि उसने जो कुछ किया है, शायद जान-बूझकर नहीं किया।" उसका श्यामांग का पक्ष लेने का ढंग भी कितना विनम्र है। उसके इस प्रकार कहने पर भी सुन्दरी को विश्वास नहीं होता है और उसे लगता है कि अलका श्यामांग को प्रेम करने लगी है, इसीलिए वह इसका पक्ष ले रही है। वह वहाँ से हट जाती है और अपनी आँखें दूसरी ओर कर लेती है। यह उसकी शिष्टता का द्योतक आचरण है।
 

भावुकता

अलका एक कोमल हृदय वाली युवती है, अतः भावुकता उसका नारी स्वभावजन्य गुण है। जब वह देवी यशोधरा की भिक्षुणी वेश में कल्पना करती है, तो सिहर उठती है। वह कहती है-“मैं तो यही सोचकर सिहर जाती हूँ कि कल 'सच, कल, भिक्षुणी के वेश में देवी यशोधरा कैसी लगेंगी ?” उसकी भावुकता उस समय भी प्रकट होती है जब वह नन्द के गौतम के आश्रम में चले जाने पर श्वेतांग और नीहारिका से बातचीत कर रही है.। जब श्वेतांग अलका को बताता है कि, “कुछ क्षण स्थिर दृष्टि से वे कुमार की ओर देखते रहे। फिर उनसे अपने पास आने को कहकर विहार में चले गये।" इस पर अलका भावुक हो कह उठती है- “ ओह ! कैसे अन्तर्द्वन्द्व के क्षण रहे होंगे कुमार के लिए। विहार में कितना समय रहे वे उनके साथ ?”

प्रेयसी

अलका श्यामांग को प्रेम करती है, इसलिए सदैव उसका शुभ चिन्तन करती है, उसे बाधाओं से बचाने का प्रयास करती है। जब कमल ताल में पत्थर फेंकने के अपराध में सुन्दरी द्वारा श्यामांग को अन्धकूप में जाने का दण्ड दिया जाता है तो यह उससे सहन नहीं होता। उसके बचाव के भाव कि, “श्यामांग ने यह जान-बूझकर नहीं किया है”- से सुन्दरी यह अनुमान सहज ही लगा लेती है कि वह श्यामांग को प्रेम करती है। जब उससे इसके विश्वास के बारे में पूछा जाता है कि क्या तुझे सचमुच विश्वास है कि तू उससे प्रेम करती है ? तो वह लजाकर आँखें दूसरी ओर घुमा लेती है। उसका यह हाव-भाव श्यामांग के प्रति उसके प्रेम को व्यक्त करता है। वह श्यामांग को भी समझाती है कि, “सच क्यों नहीं कह देते कि तुमसे अनजाने में अपराध हो गया। अपराध के लिए क्षमा माँग लो तो ?” वह उसे बचाने के लिए बराबर उसकी तरफदारी करती है, जब श्यामांग नहीं मानता तो उसे प्रेम की डाँट पिलाती है-“क्यों फिर से वही बात किये जाते हो ? क्यों नहीं स्पष्ट कह देते कि तुम्हारा मन कहीं और था, और तुम्हें पता ही नहीं चला कि कब तुमने पत्थर उठाये और कब फेंकने लगे।” जब सुन्दरी द्वारा श्यामांग को अन्धकूप में उतारे जाने की सजा दी जाती है, तो उसकी मनःस्थिति बिगड़ जाती है। वह मन से उदास हो जाती है। यह उसकी विवशता है कि वह स्पष्टतः रानी सुन्दरी के आदेश का विरोध नहीं कर पाती है, क्योंकि ऐसा करना राजद्रोह होगा । इसलिए मौन रहकर ही उस कष्ट को राह जाती है, इसके बावजूद उसकी उदास मुद्रा से सुन्दरी भाँप लेती है कि वह उदास है। उसके पूछे जाने पर, “तुझे क्या हुआ है अलका ? तू वहाँ इस तरह क्यों खड़ी है ?" वह कहती है-"हुआ कुछ नहीं, देवि ऐसे ही बस ।” इससे स्पष्ट है कि वह श्यामांग की सच्ची प्रेयसी है। 

स्वामिभक्ति और सेवापरायणता

अलका अपनी स्वामिनी सुन्दरी और राजा नन्द की स्वाभक्त सेविका है। वह सेवा कार्य में लगा दिये जाने पर बराबर सेवा में संलग्न रहती है। वह सदैव अपने स्वामी के सुख-दुख की चिन्ता में रहती है। जब श्वेतांग द्वारा नन्द के जंगल की ओर जाने की उसे सूचना मिलती है तो वह विस्मयजनित दुःख से घबरा उठती है- “घने जंगल की ओर ? परन्तु अपने शस्त्रास्त्र उनके पास नहीं थे। फिर कैसे वे ? वह सदैव अपने स्वामी के लिए शुभ चिन्तन ही करती है। श्वेतांग से कहती है-“ अमंगल की बात मत सोचो। जंगली पशुओं के बीच निहत्थे जाकर भी कुमार का अनिष्ट नहीं हो सकता।'
 
अलका में सेवा-भाव की कमी नहीं है। जब श्वामांग को ज्वर आ जाता है तो वह प्रलाप करने लगता है। उस समय वह उसकी सेवा में रात भर दत्तचित्त रहती है। पल भर के लिए भी नहीं सोती। जब श्वेतांग पानी माँगता है, तो तुरन्त दौड़कर उसके लिए पानी लाती है।
 

निर्भीकता और साहस

निर्भीकता और साहस अलका में कूट-कूटकर भरे हैं। वह जब श्यामांग द्वारा कमल-ताल में पत्थर फेंके जाने ले विषय में बतलाती है तो इस बात की चिन्ता नहीं करती कि सुन्दरी उसकी स्वानिनी है, रानी है, बल्कि निर्भय भाव से कहने का साहस करती है-"मैं केवल यह सोच रही थी कि उसने जो कुछ किया है शायद जान-बूझकर नहीं किया।" इस पर अलका कहती है-"नहीं छाया की बात में मैं विश्वास नहीं करती, परन्तु कितने दिनों से देख रही हूँ कि धीरे-धीरे उसे कुछ होता जा रहा है.....अपनी मानसिक शक्तियों पर से उसका अधिकार उठता जा रहा है।" इससे स्पष्ट है कि अलका दब्बू नहीं है, आवश्यकता पड़ने पर उसमें निर्भीकतापूर्वक अपनी बात किसी के भी सामने कह देने का पूरा साहस है। निश्चय ही वह एक निर्भीक और साहसी युवती है।
 

सत्य और न्याय की पक्षधर

अलका यद्यपि दासी है, किन्तु जहाँ सत्य की रक्षा और न्याय की बात आती है, वह सत्य और न्याय की रक्षा का ही समर्थन करती है। जब श्यामांग को अन्धकूप में उतरने की सजा सुनायी जाती है तो वह उसे चुपचाप नहीं सुन लेती, अपितु उसका पूर्ण विरोध करती है। श्यामांग को भी समझाती है कि वह यह क्यों नहीं कहता कि मैंने जब पत्थर फेंके तो मैं अपने वश में नहीं था- "तुम सच क्यों नहीं कह देते कि मेरे अनजाने में अपराध हो गया है?" अलका हर प्रकार से श्यामांग की वकालत करती है और उसके लिए सत्य तथा मानवीय तथ्य प्रस्तुत करती है, मात्र मनगढ़न्त, झूठे और भ्रामक तथ्यों के आधार पर उसे बचाना उसका लक्ष्य नहीं है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि अलका यद्यपि नायिका नहीं है. तथापि उसके व्यक्तित्व के अनेक सद्गुण और मानवीय पहलू उभरकर सामने आते हैं। वह प्रत्युत्पन्नमति की स्वामिनी धैर्यवान युवती है।

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