आधे अधूरे नाटक में पात्र योजना मोहन राकेश पात्रों के माध्यम से किसी बाहरी खलनायक को खड़े करने के बजाय, इंसानी स्वभाव के भीतर छिपे अधूरेपन, महत्वाकांक्
आधे अधूरे नाटक में पात्र योजना | मोहन राकेश
मोहन राकेश द्वारा रचित 'आधे अधूरे' नाटक समकालीन भारतीय समाज के मध्यवर्गीय परिवार की आंतरिक विसंगतियों, बिखराव और मानसिक अंतर्द्वंद्व को पूरी शिद्दत से अभिव्यक्त करता है। इस नाटक की पात्र योजना अत्यंत अनूठी, प्रतीकात्मक और मनोवैज्ञानिक है, जो मानव जीवन की अपूर्णता और खोखलेपन को उजागर करती है। नाटक के सभी पात्र किसी न किसी स्तर पर अपने जीवन में अधूरे हैं और एक-दूसरे से जुड़कर भी पूरी तरह अकेले हैं। इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पुरुष पात्रों के रूप में एक ही अभिनेता पांच अलग-अलग भूमिकाएं निभाता है, जो इस बात का प्रतीक है कि चेहरे बदलने से पुरुष की मूल प्रवृत्ति और उसकी कमियां नहीं बदलतीं।
पात्र योजना-साहित्य के क्षेत्र में कहानी, उपन्यास, एकांकी, नाटक, खण्ड-काव्य, महाकाव्य आदि विधायें पात्रों की चरित्र-क्रीड़ा को घटनाक्रम के सामंजस्य से मुखरित करती हैं या उसे कुण्ठित भी कर देती हैं। भाषा, भाव, रस, छन्द, अलंकार आदि भी इसी सामंजस्य विधान के सूत्रों में अपना प्रभाव पैदा करते हैं। कलाकार के पास कथा-तत्व के पटल पर यदि इस सामंजस्य के लिए विविधता उत्पन्न करने की शक्ति है तो उसकी कृति सामाजिक प्रतिबिम्ब भी बन सकती है तथा मानवीय भावों और घटनाक्रम की परिस्थितियों के तालमेल को ऐसा स्वाभाविक संयोजन दे सकती है कि मानव मात्र का हृदय भी उससे झंकृत हो सके। मानव हृदय की इसी झंकार को प्राप्त करने के लिए उपर्युक्त सभी विधाओं में आधुनिक साहित्य जगत् में विश्व स्तर पर अनेक प्रयोग किये गये हैं और किये जा रहे हैं। पात्रों का नियोजन साहित्यिक कलाकार का वह आधार-तत्व है, जिस पर वह अपनी बात के प्रासाद की रचना करता है तथा अपनी बात की व्याख्या करने को घटनाओं को जन्म देता है और स्वयं पात्रों के मुख से घटनाक्रम की परिस्थितियों में बोलता है और विचार करता है।
कला-साहित्य कलाकार की रचनात्मक शक्ति को अपने पात्रों द्वारा ही प्रकट करता है, अतः पात्र योजना का विन्यास रचनाकार की पहली सफलता या असफलता का द्योतक हो जाता है। मोहन राकेश के नाटक 'आधे-अधूरे' में पात्र योजना की अपनी निजी विशेषता है, एक नया प्रयोग है-समाज के मनुष्य-रूप की स्थिति को एकाकारिता देने के लिए ही उन्होंने अपनी पात्र योजना में चार पुरुष पात्रों को रंगमंचीय कला का सहारा लेकर नाटक विधा के द्वारा एक मनुष्य के रूप में प्रकट किया है। स्त्री-रूप के विभिन्न आयामों को उन्होंने स्त्री-रूप की एकाकारिता देने की आवश्यकता नहीं समझी, क्योंकि स्त्री पात्र के रूप में, जिस चरित्र-वैभिन्य का वह चित्रण करना चाहता है-वह और कुछ नहीं, परिस्थितियों की मारी स्त्री की स्थितियों का निरूपण है, जिन्हें वह एक ही स्त्री पात्र द्वारा प्रकट करने में समर्थ रहा है। वास्तविक बात यह है कि नाटक की नायिका एक ऐसी सामाजिक स्त्री के रूप में उपस्थित की गई है, जो आधुनिक जीवन की त्रासदी में जी रही विभिन्न स्त्रियों का एकरूपित प्रतिनिधित्व करती है।
जीवन के जिन विभिन्न परिच्छेदों की पात्रा के रूप में नाटककार ने सावित्री को देखा है, वह परिच्छेद विभिन्न स्त्रियों के हो सकते हैं। उनके वैचारिक तथा भावात्मक मोड़ क्या-क्या रूप ले सकते हैं, इसकी पूरी आख्या नाटककार ने इस पात्रा (सावित्री) द्वारा की है। अतः वास्तव में इस नाटक की पात्र योजना के दो स्तम्भ पात्र हैं, और वह हैं- स्त्री तथा पुरुष, न कि सावित्री और महेन्द्रनाथ, सिंघानिया, जगमोहन आदि। अपने इस मन्तव्य को कि उनकी काम योजना केवल स्त्री और पुरुष के रूप में है, न कि नामधारी पात्रों के रूप में, मोहन राकेश इस बात को सशक्त ढंग से स्थापित करने में सफल हुए हैं। यह किसी नाटक की पात्र योजना का विशिष्ट रूप है। यह बहुत कठिन कार्य था, क्योंकि पात्रों के चरित्र को उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को, उनके अन्तः बाह्य स्वरूपों को सजग-साकार, ग्राह्य या त्याज्य बनाने में ही किसी पात्र के चरित्र की सफलता अंकित की जाती है।
मानव की गहन अन्तश्चेतनाओं को समझकर ही कोई सजर्क कलाकार उनके चरित्रों को सम्प्रेषणीय बना सकता है। सम्भक्तः इन्हीं समस्त बातों का ध्यान रखते हुए ही आज के प्रमुख नाटककार और रंगकर्मी श्री लक्ष्मीनारायण लाल ने 'रंगमंच और नाटक की भूमिका' नामक कृति में एक स्थल पर लिखा है- "चरित्र के माध्यम से ही कथावस्तु बनती है। चरित्र का व्यक्तित्व, उसकी इच्छा-शक्ति ही नाटक का दूसरा कार्य-व्यापार है। नाटक के अन्य तत्वों के चरित्र-निर्माण के विभिन्न शिल्प नाट्य-साहित्य में देखने को मिलते हैं।" स्पष्ट है कि ही अनुरूप नाटक के अन्य तत्त्वों के अनुरूप ही पात्रों की योजना एवं उनका चरित्र-चित्रण आवश्यक हुआ करता है। मोहन राकेश के नाटकों, विशेषकर 'आधे-अधूरे' नाटक में इस अनुरूपता का जितना सशक्त निर्वाह हुआ है, वह प्रशंसनीय है।
कथा-तत्व को विकसित करने के लिए प्रायः तीन प्रकार के प्रात्र योजित किये जाते हैं। एक मुख्य पात्र; दूसरे विरोधी पात्र, तीसरे, सहायक पात्र । परम्परागत पारिभाषिक शब्दावली में इन्हें क्रमशः नायक, प्रतिनायक या खलनायक और सहनायक अथवा सहायक नायक आदि कहा जाता है। इसी प्रकार नारी पात्रों के सम्बन्ध में नायिका, प्रतिनायिका या खलनायिका, सह या उप-नायिका आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है, परन्तु साहित्यिक क्षेत्र की कथा-विधा को मानव जीवन की विभिन्न तरह से व्याख्या करने की आधुनिक रचनाकारिता भी पात्रों को उनके कृतित्व-विशेष के क्षेत्र से बाहर करके भी उनकी पात्रता निश्चित करने की चेष्टा की है और कला-प्रवाह में प्रकट होने वाले पात्रों की विशिष्ट उपस्थिति, कर्मठता, घटनाक्रम पर प्रभावात्मकता, उनकी बहुकोणीय प्रमुखता आदि बातें ऐसी हैं, जो उनको नये-नये नामों से इंगित करने वाली हैं, परन्तु स्थूलरूप में पात्रों को उनकी परम्परागत तीन श्रेणियों से अलग नहीं किया जा सकता ।
अतः निश्चित रूप से 'आधे-अधूरे' नाटक के मुख्य पात्र महेन्द्रनाथ और पात्रा सावित्री ही हैं जो मानव जाति के आदिमानव 'आदम' और 'हव्वा' के रूप को इंगित करते हैं। इनका उपयोग नाटककार ने नाटक के अन्य सभी पात्रों के प्रति विरोधात्मक प्रवृत्ति देकर. किया है। जो मानवीय स्वभाव की व्याख्या करने के लिये उसके मूल तत्व के रूप में जानी जा सकती हैं। यदि गहराई से मानव स्वभाव की व्याख्या की जाये तो उसके अहं का कारण आक्रामक ही होता है। वह अपने अनुकूल व्यवहार तथा उदारता में भी आक्रामक होता है। सामान्य व्यवहार में वह सांसारिक सम्बन्धों का केवल अपने स्वार्थ, अपनी मानसिक वृद्धि और दम्भ प्रदर्शन के लिये ही सहायक की भूमिका का निर्वाह करता है। मोहन राकेश शायद इस बात को भी इस नाटक द्वारा स्पष्ट करना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने नाटक की पात्र योजना भी वैसी ही की है। इस नाटक के पात्र भीतर से टूटकर भी, आन्तरिक दृष्टि से एक-दूसरे से ऊबकर भी, साथ-साथ रह रहे हैं, सहज तात्कालिक सुख-सुविधाओं की माँग के आधार पर ही, न कि अन्तःप्रेरणाओं या आन्तरिक रिश्ते की उत्प्रेरणा से।
नाटक के सभी पात्रों की नियति ही कुछ इस प्रकार की है कि अनिश्चित परिस्थितियों, प्रवृत्तियों एवं रुचियों से ग्रस्त होकर यहाँ कोई भी व्यक्ति अपने से बाहर और किसी के व्यक्तित्व, अस्तित्व एवं महत्व को स्वीकार नहीं करना चाहता। ऐसी स्थितियों में 'आधे-अधूरे' नाटक के पात्रों की योजना को हम किसी या किन्हीं परम्परागत श्रेणियों में विभाजित करके, उनका चरित्र-चित्रण नायक, उप-नायक, खल-नायक आदि के रूप में तो नहीं किया जा सकता, परन्तु उनमें से प्रत्येक को व्यक्ति के एक अलग खण्ड- चित्र के रूप में ही देखा जा सकता है, जो नाटककार के उद्देश्य को पूरा करता है।
इस प्रकार, मोहन राकेश ने 'आधे अधूरे' में पात्रों के माध्यम से किसी बाहरी खलनायक को खड़े करने के बजाय, इंसानी स्वभाव के भीतर छिपे अधूरेपन, महत्वाकांक्षा और कुंठा को ही मुख्य संघर्ष बनाकर पेश किया है।


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