रंगमंच और अभिनय की दृष्टि से आधे अधूरे नाटक का विवेचन

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रंगमंच और अभिनय की दृष्टि से आधे अधूरे नाटक का विवेचन रंगमंच केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समकालीन यथार्थ का दर्पण है। मोहन राकेश की यह कृति अभिनेताओं

रंगमंच और अभिनय की दृष्टि से आधे अधूरे नाटक का विवेचन


मोहन राकेश द्वारा रचित 'आधे-अध अधूरे' हिंदी नाटक के इतिहास में एक मील का पत्थर है, जो रंगमंच और अभिनय (रंगमंचीयता और अभिनेता के दृष्टिकोण) से बेहद सशक्त और व्यावहारिक रचना है। यह नाटक किताबी होने के बजाय पूरी तरह से मंच के अनुकूल है, जहाँ कम से कम साधनों का उपयोग करके मानवीय रिश्तों के गहरे बिखराव को पर्दे पर उतारा गया है।

'आधे-अधूरे' नाटक रंगमंच और अभिनय आदि की दृष्टि से किस सीमा तक सफल और सार्थक है, इसका विवेचन करते हुए हम प्रसिद्ध रंग-शिल्पी और पाट्क-अभिनेता ओम शिवपुरी के विचार प्रकट करते हैं। वे अपने 'जीवन्त सार्थक मुहावरा' नामक लेख में लिखते हैं- एक दूसरे स्तर पर यह नाटक मेरे लिए व्यक्तियों की विभिन्नता के बावजूद मानवीय अनुभव की समानता का दिग्दर्शक है। इसके लिए नाटककार ने एक ही अभिनेता द्वारा पाँच पृथक् भूमिकाएँ निभाये जाने की दिलचस्प रंग-युक्ति का सहारा लिया है। महेन्द्रनाथ की जगह पर जगमोहन को रख देने से या जगमोहन के स्थान पर जुनेजा को रख देने से स्थिति में कोई बुनियादी अन्तर नहीं पड़ता, क्योंकि परिस्थितियों के ढाँचे में व्यक्ति लगभग समान ढंग से बर्ताव करता है।इसी अनुभव पर बल देने के लिए कुछ-एक प्रदर्शनों में नाटक की शुरूआत के साथ एक स्याह कमरे में लगे मुखौटे को आलोकित करता था।"
 
रंगमंच और अभिनय की दृष्टि से आधे अधूरे नाटक का विवेचन
पात्र योजना की दृष्टि से नाटक के आरम्भ में किया गया 'नाटक-परिचय प्रयोग रंगमंच पर एक सजीव वातावरण तो पैदा करता ही है, साथ ही उत्सुकता को भी जन्म देता है। रंगमंच की योजना कितनी सरल, सुदृढ़, सीधी-सादी और सजीव है, प्रभाव है, इस दृष्टि से नाटककार ने स्वयं ही आरम्भ में कुछ इस तरह के रंग-संकेत दिये हैं कि वे मूल कथ्य की आत्मा को साकार करने में विशेष सहायक होते हैं। उन रंग-संकेतों के आधार पर, या उन्हें लक्ष्य बनाकर ओम शिवपुरी उपर्युक्त सन्दर्भ में ही लिखते हैं, "आधे-अधूरे का कार्य स्थल मकान का बैठने का कमरा है, जिसमें सोफे, कुर्सियाँ, अलमारी, किताबें, फाइलें आदि हैं। यह कमरा एक समय साफ-सुथरा रहा होगा, पर सालों की आर्थिक कठिनाइयों के कारण अब सब पर धूल की तह जम गयी है। क्रॉकरी पर चटखन है। दीवारें मटमैली हो गईं हैं। इस परिवार का हर सदस्य एक-दूसरे से कटा हुआ है, घर की हवा में स्थायी तल्खी की गन्ध है, जो पाँचों व्यक्तियों के मन में भरी हुई है- ऊब, घुटन, आक्रोश... विद्रूप...दम घोंटने वाली मनहूसियत जो मरघट में होती हैं।" यही वह है सफल, स्वाभाविक, संक्षिप्त और सरल रंग-योजना जो अभिनय को सहज-स्वाभाविक बनाने में विशेष सहायक प्रमाणित होती है। अपने 'समकालीन जिन्दगी और रंग-मूल्यों की तलाश' नामक लेख में एक स्थल पर महेश आनन्द लिखते हैं-

"इस नाटक की सफलता का सबसे बड़ा कारण नाटककार की रंग-चेतना है जो सारे नाटक में छायी हुई है। राकेश ने इस नाटक में यथार्थवादी रंगमंच को एक नया और आकर्षक रूप दिया है लेकिन किसी भी तरह की चकाचौंध को अपनाकर रंगमंच के 'अन्तर्निहत तर्क' को पराजित करने का प्रयास नहीं किया।" स्पष्ट है कि नाटककार 'आध् -अधूरे' नाटक में आधुनिक, सार्थक और सरल रंग-चेतना के प्रति विशेष रूप से सजग रहा है, इसी कारण मंचित करने के सभी सहज-स्वाभाविक तत्व नाटक में स्वतः ही समाविष्ट हो गये हैं। नाटक की दृश्य-सज्जा के बारे में उपर्युक्त सन्दर्भ में ही महेश आनन्द आगे लिखते हैं- "आधे अधूरे' की दृश्य-सज्जा बहुत ही सादगीभरी किन्तु सार्थकता लिए हुए हैं। सारे नाटक का कार्य स्थल केवल एक ही कमरा है 'जिसमें उस घर के व्यतीत स्तर के कई एक टूटते अवशेष -सोफासेट, डाइनिंग टेबल, कबर्ड और ड्रेसिंग टेबल' आदि पात्रों की छटपटाहट, बिखराव, आक्रोश और कडुवाहट को गहराई सेव्यंजित करते हैं। इन वस्तुओं की तरह ही परिवार के सदस्यों का एक-दूसरे से रिश्ता टूट चुका है।" इन टूटे रिश्तों, तनावों एवं आक्रोश-बिखराव को मंच पर साकार करने के लिए नाटककार ने कौन से माध्यम, प्रतीक आदि अपनाये हैं, उनके सम्बन्ध भी महेश आनन्द के शब्दों में ही पढ़िये "नाटककार ने इस टूटन और बिखराव को व्यक्त करने के लिए प्रकाश, ध्वनि और संगीत के माध्यम से वातावरण में व्याप्त तनाव और घुटन को उभारकर रंग और कौशल का परिचय दिया है। एक खण्डहर की आत्मा को व्यक्त करता हल्का संगीत, लड़के का काटी तस्वीर को बड़े-बड़े टुकड़ों में कतरना, प्रकाश-आकृतियों पर धुँधलाकर कमरे के अलग-अलग कोनों में सिमटता विलीन होता हुआ, अँधेरे के साथ-साथ संगीत का रुकना और कैंची की चक्चक् सुनाई देना- ये सब घर की जर्जरता और बिखराव के साथ मानवीय सम्बन्धों की निरर्थकता घोषित करते हैं। अन्त में केवल कैंची की चक्चक् वातावरण में करुणा का स्वर फैलाकर जीवन-मूल्यों के अन्त की ओर संकेत करती है।"
 
दृश्य-विधान, प्रभाव उत्पन्न करने के लिए प्रतीक प्रयोग, प्रकाश एवं रंगों की योजना में राकेशजी ने 'आधे-अधूरे' में एक विशेष प्रकार की प्रतिभा एवं कौशल का परिचय दिया है। इस सम्बन्ध में अपने 'रंग-कौशल' नामक लेख में डॉ. प्रेमप्रकाश गौतम लिखते हैं- "प्रकाश-व्यवस्था का उन्हें (मोहन राकेश को) अच्छा बोध है, इसमें सन्देह नहीं । दृश्य को प्रभावपूर्ण बनाने के लिए, अभीष्ट प्रभाव डालने के लिए दृश्य के किस और किन स्थलों पर कब, किस प्रकार, कितना प्रकाश डालना चाहिए, यह वे समझते हैं। ध्वनि-योजना के महत्व से भी वे परिचित हैं। वातावरण के अनुकूल ध्वनि-विधान करने का बोध उन्हें हैं।" हिन्दी, रंगमंच के विकास से और मोहन राकेश के नाटकों से जो तनिक भी परिचित है, वह सभी प्रकार से जानता है कि मोहन राकेश के सारे नाटक, विशेषतः 'आधे-अधूरे' रंग-शिल्प की दृष्टि से हिन्दी साहित्य की एक अद्वितीय निधि है।

आज तक 'आधे-अधूरे नाटक का मवन अनेक बार हो चुका है, और हर बार वह सराहा भी गया है। नाटक का रंगशिल्प और तकनीक आधुनिक रंगमंच एवं नाट्य-शिल्प की आवश्यकताओं के सर्वथा अनुरूप है। दृश्य-योजना का मंचीय या अभिनेय नाटकों में अत्यधिक महत्त्व हुआ करता है। 'आधे-अधूरे' नाटक की यह एक प्रमुख विशेषता है कि इसका समूचा दृश्य-विधान एक ही सैट पर किया गया है। वह भी बिना किसी यवनिका या विशेष सैट के सारा नाटक एक ही स्थान पर, एक ही दृश्य में समाप्त हो जाता है, यद्यपि एक मध्यान्तर इसमें विद्यमान है। केवल अन्धकार और थोडे से अन्तराल को ही दृश्य-परिवर्तन मानकर चला गया है। इस प्रकार इसका मंचन अत्याधुनिक तो हो ही गया है, तारतम्य की दृष्टि से भी सरल हो गया है। दृश्य-विधान के समान ही नाटककार ने एक ही पुरुष-पात्र द्वारा चार-पाँच भूमिकाएँ निभा ले जाने का भी एक सर्वथा नवीन प्रयोग किया है। एक ही पुरुष अभिनेता थोड़ी-सी वेशभूषा के परिवर्तन के साथ चार-पाँच पात्रों का चुनौतीपूर्ण अभिनय कर जाता है।
 
अभिनेय एवं मंचीय नाटकों की वरनु-योजना सरल और सहज होनी चाहिए। इस दृष्टि से जब हम 'आधे-अधूरे' की वस्तु-योजना पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि वस्तु-योजना सम्बन्धी इसमें कोई जटिलता नहीं है। मुख्य बात तो यह है कि इसमें, किसी स्थूल वस्तु का विधान किया ही नहीं गया है। उसके स्थान पर स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों प्रकार की स्थितियों को उभारने की सफल चेष्टा की गई है। उनके द्वारा व्यक्तियों के और एतदर्थ में एक विशिष्ट वर्ग के चरित्र का जो रूप सामने बनता है, वह अपने-आप में सम्पूर्ण एवं समग्र है। नाटककार जिन मध्यवर्गीय विसंगतियों को उजागर करना चाहता है, वे वस्तु-विधान के माध्यम से उजागर हो जाती हैं। प्रेक्षक उन सब स्थितियों को सरलता के साथ समझता हुआ, उसके साथ-साथ स्वतः ही आगे बढ़ता जाता है। वस्तु-विन्यास की दृष्टि से यहाँ एक और बात विशेष ध्यातव्य है । वह यह कि इसमें नाटक के आकार के समान ही कथा के आकार की योजना भी की गई है। इस कारण उसकी चरम परिणति या अन्विति में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं पड़ती। इसी कारण स्थान, समय और (संकलन-त्रय) की एकता का स्वतः ही निर्वाह हो जाता है। इसी प्रकार सम्वाद-योजना भी अभिनेयता की दृष्टि से एकदम उपयुक्त है। सम्बाद चुस्त, चुटीले, प्रायः संक्षिप्त, अर्थपूर्ण, सीधे और सरल हैं। उनके अर्थ या भाव-बोध में प्रेक्षक को किसी भी प्रकार का आयास नहीं करना पड़ता।

हालाँकि 'आधे-अधूरे' नाटक के सभी प्रकार के सम्वाद प्रेक्षकों को बाँधे रखने की पूर्ण क्षमता रखते हैं, परन्तु नाटक का आरम्भ लम्बे परिचय-कथन से शुरू हुआ है। नाटक के अन्त में आये लम्बे संवाद भी दृश्य को बोझिल कर देते हैं। फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि वह लम्बे संवाद पात्र की अपनी स्वाभाविक अभिव्यक्तात्मक आवश्यकता को प्रकट करने के लिये अनिवार्य समझे गये। इनका सम्प्रेक्षण अभिनय कौशल को चुनौती देने वाला है, ओर दर्शकों को कथा चरित्र से परिचित कराने वाला ही नहीं, पात्र की चारित्रिक गति को भी स्पष्टता देने वाला है।
 
'आधे-अधूरे' एक सामयिक परिवेश एवं युग-बोध वाला नाटक है, अतः इसमें साज-सज्जा, वेश-भूषा, मंच - शोभा सम्बन्धी कोई समस्या नहीं है। पात्रों की वेश-भूषा, साज-सज्जा, मंचीय-योजना सभी कुछ सहज तथा साधारण है। नाटककार ने स्वयं इस दिशा में विशेष सतर्कता अपनायी है। उसने नाटक के आरम्भ में ही जहाँ पात्र-परिचय प्रस्तुत किया है, वहाँ उनकी वेश-भूषा आदि का भी परिचय दिया है। इसके साथ-साथ उसने पात्रों के आन्तरिक स्वरूप विधान के लिए उनके स्वभाव, प्रकृति आदि भी बता दी। वह स्वभाव समूचे नाटक में यत्र-तत्र सर्वत्र स्पष्टतः उभरता हुआ दिखाई देता है। रंगमंच की योजना एवं सज्जा के लिए उचित निर्देश दिये ही हैं। प्रकाश की व्यवस्था कैसी होनी चाहिए, यह भी बता दिया गया है। ये सारी बातें, वर्णन एवं ब्यौरे सप्रयोजन, अर्थपूर्ण एवं प्रभावी हैं। इस प्रभावी योजना का जो रूप नाटककार ने प्रस्तुत किया है, उसी के शब्दों में प्रस्तुत है-

"परदा उठने पर सबसे पहले चाय पीने के बाद डाइनिंग टेबल पर छोड़ा गया अध-टूटा टी-सेट आलोकित होता है। फिर फटी किताबों और टूटी कुर्सियों आदि में से एक-एक। कुछ सेकण्ड बाद प्रकाश सोफे के उस भाग पर केन्द्रित हो जाता है, जहाँ बैठा काले सूट वाला आदमी सिगार के कश खींच रहा है। उसके सामने रहते प्रकाश उसी तक सीमित रहता है, पर बीच-बीच में कभी यह कोना और कभी वह कोना' आलोकित हो उठता है।'

इस प्रकार नाटक आरम्भ हो जाने के बाद भी प्रकाश आदि की मंचीय व्यवस्थाओं के लिए उचित निर्देश दिये गये हैं, जो कि अभिनेयता की दृष्टि से बहुत ही उचित, सम्पूर्ण एवं समग्र हैं। नाटक के अन्त में जो इस प्रकार की व्यवस्था दी गई है, वह कथ्य, कथानक, पात्र योजना और नामादि के कितने अनुरूप है, कितनी सार्थक है, यह भी नाटक के पढ़ने से पता चल जाता है। इस संकेत-योजना का स्वरूप भी देखें- "प्रकाश खण्डित होकर स्त्री और बड़ी लड़की तक सीमित रह जाता है। स्त्री स्थिर आँखों से बाहर की तरफ देखती आहिस्ता से कुर्सी पर बैठ जाती है। बड़ी लड़की एक बार उसकी तरफ देखती है, फिर बाहर की तरफ। हल्का मातमी संगीत उभरता है, जिसके साथ उन दोनों पर भी प्रकाश मद्धिम पड़ने लगता है। तभी लगभग अँप में, लडके की बाँह थामे पुरुष एक की धुँधली आकृति अन्दर आती दिखाई देती है।

लड़का : (जैसे बैठे गले से) देखकर डैडी, देखकर । 
उन दोनों के आगे बढने के साथ संगीत अधिक स्पष्ट और अँधेरा अधिक गहरा होता जाता है।"
 
इस प्रकार आरम्भ में सामान का बिखराव एवं टूटा-फूटा होना परिवार के टूटन एवं बिखराव का परिचायक है, तो अन्त में प्रकाश के क्रमशः क्षीण, हीन, मातमी संगीत के बजने और फिर अँधेरे के अधिक गहरा हो जाने की योजना पूरे परिवार की चेतनाओं में घिर आये असमर्थता के गहन अँधियारे की परिचायक बनकर प्रेक्षकों के सामने आती है। दर्शक भी इसी प्रकार की टूटन, बिखराव और अन्धकारमयी स्थितियों की अनुभूतियों से भरकर रह जाता है। इस प्रकार नाटककार ने नाटक के मध्यान्तर में खण्डहर की आत्मा को व्यक्त करने वाला जो ध्वनि-प्रभाव सँजोया है, वह भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस प्रकार की प्रतीक-योजना के माध्यम से नाटककार ने मध्यवर्गीय परिवार की आत्मा को ही नहीं, बल्कि आज के समूचे समाज की खोखली आत्म-विकलता को रूपायित करके मंच के प्रभाव को एक विशेष आयाम तक पहुँचा दिया है।

कुछ विवेचकों एवं आलोचकों ने अभिनेयता की दृष्टि से 'आधे-अधूरे की मंच-योजना की कुछ अनावश्यकताओं की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। ये लोग, नाटककार द्वारा रंग-योजना के अन्तर्गत आरम्भ में दिए गए निर्देशों के सम्बन्ध में ही अनावश्यकताओं का कुछ बोध कराते हैं। जैसे नाटककार ने लिखा है-"सामान में कहीं एक तिपाई, कहीं दो-एक मोढ़े, कहीं फटी-पुरानी किताबों का एक शेल्फ और कहीं पढ़ने की एक भेज-कुर्सी भी है। गद्दे, परदे, मेजपोश और पलंगपोश अगर हैं, तो इस तरह घिसे-फटे या सिले हुए कि समझ में नहीं आता कि उनका न होना क्या होने से बेहतर नहीं था।" परन्तु ऐसी बातें महत्वहीन हैं, क्योंकि नाटककार ने अपनी अभिव्यक्ति को जिस रूप में मूर्त किया है, वह केवल मंच-सज्जा के चरित्र को स्पष्ट करने के लिये है, निश्चित रूप से, लेखक का उद्देश्य नाटक-निर्माता के किसी अधिकार का व्यतिक्रम करने का नहीं है।

आजकल भाषा-योजना आदि की दृष्टि से ही प्रमुखतः मंचीय नाटको का अध् ययन- मूल्यांकन अकादमिक स्तर पर होने लगा है। ऐसे अध्ययन की कसौटी पर भी 'आधे अधूरे' नाटक निश्चित रूप से खरा उतरेगा, यह बात इसके सफल मंचन से गमझी जा सकती है।

इस प्रकार रंगमंच और अभिनय की दृष्टि से आधे अधूरे आधुनिक हिंदी नाटक की सफलता का प्रतीक है। यथार्थवादी मंच-डिजाइन जीवन की सच्चाई प्रस्तुत करता है, जबकि बहु-भूमिका प्रयोग नाटकीयता बढ़ाता है और थीम (अधूरापन, पुरुष-स्त्री संबंधों की विफलता) को प्रतीकात्मक गहराई देता है। पहले मंचन (1969) से लेकर आज तक विभिन्न प्रस्तुतियों (जैसे लिलेट दुबे, अन्य समूह) में यह लोकप्रिय रहा है।नाटक दर्शाता है कि रंगमंच केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समकालीन यथार्थ का दर्पण है। मोहन राकेश की यह कृति अभिनेताओं, निर्देशकों और दर्शकों दोनों के लिए समृद्ध अनुभव प्रदान करती है।

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