न्याय में देरी न्याय न मिलने के बराबर है यह एक ऐसी कालजयी उक्ति है जो न्याय व्यवस्था की मूल भावना को एकदम स्पष्ट करती है। जब किसी व्यक्ति को उसका हक़
न्याय में देरी न्याय से वंचित करने के समान है
न्याय में देरी न्याय न मिलने के बराबर है यह एक ऐसी कालजयी उक्ति है जो न्याय व्यवस्था की मूल भावना को एकदम स्पष्ट करती है। जब किसी व्यक्ति को उसका हक़ मिलता तो है, परंतु इतनी देर से कि उस हक़ की कोई कीमत या महत्व ही न रह जाए, तो वह वास्तव में न्याय प्राप्त नहीं करता—बल्कि अन्याय का ही शिकार होता है। यह विचार केवल एक कहावत नहीं, बल्कि मानव जीवन की पीड़ा, सामाजिक विश्वास और लोकतंत्र की नींव से जुड़ा हुआ एक गहरा सत्य है।
न्याय का अर्थ
न्याय का अर्थ केवल फैसला सुनाना नहीं होता। न्याय का असली मकसद पीड़ित को त्वरित राहत देना, अपराधी को दंड देना और समाज में कानून का भय पैदा करना होता है। जब कोई मामला वर्षों, दशकों तक अदालतों में लटका रहता है तो पीड़ित की पीड़ा बढ़ती जाती है, उसकी आर्थिक स्थिति बिगड़ती है, मानसिक स्वास्थ्य खराब होता है और कई बार तो जीवन ही समाप्त हो जाता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति के विवाद में फँस जाता है और फैसला आने में २०-३० वर्ष लग जाते हैं, तो उस दौरान उसकी पूरी पीढ़ी बूढ़ी हो जाती है, कई सदस्य मर जाते हैं, और जब फैसला आता है तो उसका लाभ उठाने वाला कोई नहीं बचता। ऐसे में मिला हुआ 'न्याय' मात्र कागजी होता है—वास्तविक न्याय नहीं।इसी तरह आपराधिक मामलों में देरी और भी घातक साबित होती है। कल्पना कीजिए कि किसी महिला के साथ बलात्कार हुआ और आरोपी को सजा मिलने में १५-२० वर्ष लग गए। इस दौरान पीड़िता को समाज की नज़रों में अपमानित होना पड़ता है, बार-बार अदालत में गवाही देने की मजबूरी होती है, आर्थिक तंगी झेलनी पड़ती है और कई बार वह हताश होकर आत्महत्या तक कर लेती है। जब सजा मिलती है तो पीड़िता या तो जीवित नहीं होती या उसका जीवन पूरी तरह बर्बाद हो चुका होता है।अपराध रोकने का संदेश
अपराधी को सजा मिलने से समाज में अपराध रोकने का संदेश भी कमजोर पड़ जाता है क्योंकि लोग देखते हैं कि अपराध करने के बाद भी वर्षों तक खुले घूम सकते हैं। इस तरह देरी अपराध को बढ़ावा देती है और कानून के प्रति अविश्वास पैदा करती है।भारत की न्याय व्यवस्था में यह समस्या आज बहुत गंभीर रूप ले चुकी है। करोड़ों मामले अदालतों में लंबित हैं, जिनमें से अधिकांश निचली अदालतों में वर्षों से पड़े हुए हैं। न्यायाधीशों की कमी, अदालतों में स्टाफ की अपर्याप्तता, बार-बार स्थगन, गवाहों की अनुपस्थिति, जटिल प्रक्रियाएँ और कई बार वकीलों द्वारा जानबूझकर मामले को लंबा खींचना—ये सभी कारण मिलकर न्याय को धीमा बनाते हैं। गरीब और सामान्य वर्ग के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि उनके पास महंगे वकील रखने, बार-बार अदालत आने और प्रक्रिया को तेज करने की आर्थिक क्षमता नहीं होती। प्रभावशाली लोग तो स्टे ऑर्डर लेकर, उच्च अदालतों में अपील करके या राजनीतिक दबाव बनाकर मामले को लंबा खींच लेते हैं, जबकि आम आदमी इंतजार में ही जीवन काट देता है।देरी का प्रभाव केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं, बल्कि पूरे समाज और लोकतंत्र पर पड़ता है।
अदालत के बाहर फैसला
जब लोग देखते हैं कि न्याय मिलने में इतनी देरी है तो वे अदालत के बाहर ही फैसला करने लगते हैं—पंचायतों में, गैंगस्टरों के माध्यम से या तोड़-फोड़ करके। इससे कानून का राज कमजोर होता है और अराजकता बढ़ती है। कई बार तो लोग पुलिस या अदालत पर ही भरोसा छोड़ देते हैं और स्वयं न्याय करने की कोशिश करते हैं, जो और भी खतरनाक स्थिति पैदा करता है।न्याय में देरी को केवल प्रशासनिक समस्या मानना गलत होगा। यह एक नैतिक संकट भी है। संविधान हमें अनुच्छेद १४, २१ के तहत समानता और जीवन-स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें त्वरित न्याय का अधिकार भी निहित है। जब न्याय समय पर नहीं मिलता तो यह मौलिक अधिकारों का हनन होता है। कई देशों में त्वरित न्याय के लिए विशेष अदालतें, समय-सीमा निर्धारित करना और वैकल्पिक विवाद समाधान जैसे उपाय अपनाए गए हैं, लेकिन भारत में अभी भी सुधार की गति बहुत धीमी है।अंत में यही कहा जा सकता है कि न्याय समय पर मिले, यही सच्चा न्याय है। देरी से मिला न्याय केवल एक औपचारिकता भर रह जाता है। पीड़ित को उसकी पीड़ा के साथ-साथ इंतजार की सजा भी नहीं दी जानी चाहिए।
समस्या का समाधान
समाज और सरकार दोनों को मिलकर इस समस्या का समाधान ढूँढना होगा—अधिक न्यायाधीश नियुक्त करना, प्रक्रिया को सरल बनाना, तकनीक का उपयोग बढ़ाना और सबसे महत्वपूर्ण—न्याय को तेज करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी। क्योंकि जब तक न्याय में देरी रहेगी, तब तक यह उक्ति केवल किताबों में नहीं, बल्कि लाखों-करोड़ों लोगों के दर्द में जीवित रहेगी—"न्याय में देरी न्याय न मिलने के बराबर है"।


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