सोशल मीडिया का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव विषय पर भाषण सम्माननीय मुख्य अतिथि, आदरणीय शिक्षकगण, मेरे प्रिय साथियों और यहां उपस्थित सभी महानुभावों,
सोशल मीडिया का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव विषय पर भाषण
सम्माननीय मुख्य अतिथि, आदरणीय शिक्षकगण, मेरे प्रिय साथियों और यहां उपस्थित सभी महानुभावों, आज मैं आपके समक्ष "सोशल मीडिया का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव" विषय पर अपने विचार रखने जा रहा हूं। आज की डिजिटल दुनिया में सोशल मीडिया हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है, जहां फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म्स हमें दुनिया से जोड़ते हैं, लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि ये प्लेटफॉर्म्स हमारे मन और मस्तिष्क पर किस तरह का प्रभाव डाल रहे हैं? एक ओर जहां सोशल मीडिया हमें सूचनाओं का खजाना प्रदान करता है, दोस्तों से जुड़ने का माध्यम बनता है और यहां तक कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी जागरूकता फैलाता है, वहीं दूसरी ओर यह चिंता, अवसाद और अकेलेपन की वजह भी बन सकता है, जिससे हमें इसकी दोधारी तलवार की हकीकत को समझना जरूरी हो जाता है।
सबसे पहले बात करते हैं सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभावों की, जो आजकल की युवा पीढ़ी को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहे हैं। कल्पना कीजिए, आप सुबह उठते हैं और सबसे पहले अपना फोन उठाकर इंस्टाग्राम खोलते हैं, जहां हर कोई अपनी परफेक्ट जिंदगी की तस्वीरें पोस्ट कर रहा है – छुट्टियां, पार्टियां, फिट बॉडी और सफलताएं। यह सब देखकर अनजाने में ही हमारे मन में एक तुलना की भावना जाग जाती है, जो फीयर ऑफ मिसिंग आउट या FOMO के रूप में जाना जाता है, जहां हमें लगता है कि हमारी जिंदगी दूसरों से कमतर है, और यह भावना धीरे-धीरे चिंता और तनाव को जन्म देती है। अध्ययनों से पता चलता है कि ज्यादा समय सोशल मीडिया पर बिताने वाले लोग अवसाद के शिकार होने की संभावना दोगुनी हो जाती है, क्योंकि लगातार स्क्रॉलिंग से हमारा दिमाग डोपामाइन की लत में फंस जाता है, जो एक तरह का इनाम सिस्टम है, लेकिन जब लाइक्स या कमेंट्स नहीं मिलते तो निराशा हावी हो जाती है। इसके अलावा, साइबर बुलिंग एक बड़ी समस्या है, जहां अनजान लोग या यहां तक कि जान-पहचान वाले भी अपमानजनक कमेंट्स करते हैं, जो व्यक्ति की आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाते हैं और कभी-कभी आत्महत्या जैसी गंभीर स्थितियों तक ले जा सकते हैं। विशेष रूप से किशोरों और युवाओं में बॉडी इमेज की समस्या बढ़ रही है, जहां फिल्टर्ड तस्वीरें और एडिटेड वीडियोज देखकर लोग अपनी असली शक्ल-सूरत से असंतुष्ट हो जाते हैं, जिससे ईटिंग डिसऑर्डर जैसे एनोरेक्सिया या बुलिमिया जैसी बीमारियां पनपती हैं। नींद की कमी भी एक बड़ा मुद्दा है, क्योंकि रात देर तक सोशल मीडिया पर समय बिताने से ब्लू लाइट हमारी नींद के चक्र को बिगाड़ देती है, और नींद की कमी से मानसिक स्वास्थ्य और भी खराब हो जाता है, जैसे कि एक्टिविटी में कमी, मूड स्विंग्स और एकाग्रता की समस्या।लेकिन सोशल मीडिया केवल नकारात्मक नहीं है, इसके सकारात्मक प्रभाव भी हैं जो हमें अनदेखा नहीं करना चाहिए। उदाहरण के लिए, महामारी के दौरान जैसे कोविड-19 में सोशल मीडिया ने लोगों को एक-दूसरे से जोड़े रखा, जहां ऑनलाइन सपोर्ट ग्रुप्स ने मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहे लोगों को मदद पहुंचाई, जैसे कि डिप्रेशन या एंग्जायटी से पीड़ित व्यक्ति अपनी कहानियां शेयर करके दूसरों को प्रेरित करते हैं। कई प्लेटफॉर्म्स पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ लाइव सेशन्स आयोजित करते हैं, जो दूर-दराज के इलाकों में रहने वालों के लिए एक वरदान साबित होते हैं, जहां वे बिना किसी स्टिग्मा के सलाह ले सकते हैं। सोशल मीडिया जागरूकता फैलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जैसे कि विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर हैशटैग्स के माध्यम से लाखों लोग अपनी कहानियां साझा करते हैं, जिससे समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर खुली चर्चा होती है और लोग मदद मांगने से नहीं हिचकिचाते। इसके अलावा, यह प्लेटफॉर्म्स क्रिएटिविटी को बढ़ावा देते हैं, जहां लोग अपनी कला, संगीत या लेखन शेयर करके सकारात्मक फीडबैक पाते हैं, जो उनके आत्मविश्वास को मजबूत करता है और अकेलेपन को दूर करता है।
कुल मिलाकर, सोशल मीडिया एक टूल है जो सही इस्तेमाल से हमारे मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बना सकता है, लेकिन गलत इस्तेमाल से इसे कमजोर भी कर सकता है।अब सवाल यह उठता है कि हम इस प्रभाव को कैसे संतुलित करें? हमें समझना होगा कि सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का हिस्सा है, लेकिन पूरी जिंदगी नहीं। हमें समय सीमा निर्धारित करनी चाहिए, जैसे कि दिन में एक निश्चित समय ही स्क्रॉलिंग करना, और बाकी समय प्रकृति, व्यायाम या असली रिश्तों पर ध्यान देना। पैरेंट्स को बच्चों की निगरानी करनी चाहिए, ताकि वे साइबर बुलिंग से बच सकें, और स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा को शामिल करना चाहिए। सरकार और कंपनियां भी अपनी जिम्मेदारी निभाएं, जैसे कि एल्गोरिदम को ऐसे डिजाइन करें जो नकारात्मक कंटेंट को कम दिखाए और सकारात्मक को बढ़ावा दे। अंत में, मैं कहना चाहूंगा कि सोशल मीडिया का प्रभाव हमारे हाथ में है – इसे एक दोस्त बनाएं, दुश्मन नहीं। अगर हम जागरूक रहें और संतुलन बनाए रखें, तो यह हमारे मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने के बजाय मजबूत बनाने में मदद कर सकता है।
धन्यवाद, जय हिंद!


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