होमबाउंड फिल्म समीक्षा | Homebound Movie Review

SHARE:

होमबाउंड फिल्म समीक्षा | Homebound Movie Review ऑस्कर के लिए नामांकित होमबाउंड नीरज घेवान की फिल्म होमबाउंड को इस बार भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए भेज

होमबाउंड फिल्म समीक्षा | Homebound Movie Review


स्कर के लिए नामांकित होमबाउंड नीरज घेवान की फिल्म होमबाउंड को इस बार भारत की तरफ से ऑस्कर के लिए भेजा गया है। नीरज घेवान की फिल्में मसान से लेकर गीली पुच्ची तक जाति वर्ग और लिंग से संबंधित सामाजिक व्यवस्था को गहराई से उघाड़ती हैं।

यह फिल्म दो दोस्तों की कहानी है। एक सच्ची घटना पर आधारित ये फिल्म कुछ तीखे और चुभते हुए अनुभव के माध्यम से दर्शकों को बांधे रखने में सफल है।

प्लेटफॉर्म पर परीक्षार्थियों की खचाखच भीड़ - रेलगाड़ी में चढ़ने के लिए मारामारी -

परीक्षा केंद्र तक पहुंचना ही पहली लड़ाई है- परीक्षा हो भी जाए तो उसके बाद परिणाम के लिए सालों तक इंतजार करना- हुनर की कद्र नहीं है; जातीय भेदभाव हावी है। गफलत भरा बीतता समय बहुत सुंदरता से दिखाया है; परिणाम में भी जातिगत भेदभाव; तीर से चुभने वाले डायलॉग सशक्त समसामयिक, सहज, मार्मिक पीड़ा व अपमान को दर्शाते दृश्य आपको सीट से चिपके रहने को विवश करते हैं। हुनर की कद्र नहीं है; जातीय भेदभाव हावी है।

खपरैल के गडढों  में से आसमान देखना आसान नहीं, 

जितना ईंटा गारा डाल खुद को खड़ा करते हैं- लोग दूसरी तरफ से धक्का मार कर गिरा देते हैं 

गेंद का असली वजूद हवा में ही है दोस्त, जमीन पर तो बस पड़ी ही रहती है- 

खुद की कद्र करना स्वार्थ नहीं होता एक दूसरे को चाहने का मतलब यह नहीं कि हम खुद को ही भूल जाऐं-

बोरी से उठकर कुर्सी तक का सफर हमें खुद ही तय करना है होगा-  

कब तक नाखून से बर्तन कुरेद कुरेद खाएं- 

चाची से कहकर बिरयानी बनवाओ बढ़िया; भिगौने के अंदर बैठकर खाएंगे-

होम बाउंड फिल्म देखने के बाद मैंने महसूस किया प्लेटिनम जुबली मना चुके भारत का निम्न जाति समुदाय आज भी भेदभाव की ज़ंजीरों से मुक्त नहीं हुआ है; वह घर में कैद होने को मजबूर है या फिर सड़क पर पहचान बदलकर जीने को मजबूर है। फिल्म इतनी जीवंत है कि मैं फिल्म में खो जाती हूँ; कई बार अश्रु धारा बहने लगती है; भेदभाव करने वाली पीढ़ियों पर शर्म आने लगती है; फिल्म में सोच बदलने देने की शक्ति है।

बहन का भाई से कहना तुम्हें चुनने का अवसर मिला मुझे क्या मिला... भाई को कुछ ना कुछ करने के लिए उद्वेलित करता दृश्य सोच बदलने पर मजबूर कर देता है।  

आखिर में चप्पलों को थामे मां की अंतर्नाद सिसकियां स्तब्ध कर अश्रु धारा बहा देती हैं। कहानी समाज की तंग सोच लिपटे समाज को ले आगे बढ़ती है। निम्न सामुदायिक संघर्ष, धार्मिक तनाव सामाजिक संरचना और व्यवस्थागत उपेक्षा आपको सन्न कर देते हैं। जीवंत और खूबसूरत सशक्त अभिनय दिल में बस जाता है। हर किरदार अपनी छाप छोड़ता है।

होमबाउंड फिल्म समीक्षा | Homebound Movie Review
होमबाउंड केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि उस पीड़ा का दस्तावेज़ है जिसे समाज ने सामान्य मान लिया है।

प्लेटफॉर्म पर परीक्षार्थियों की खचाखच भीड़, रेलगाड़ी में चढ़ने की मारामारी— परीक्षा केंद्र तक पहुँचना ही पहली लड़ाई है। परीक्षा हो भी जाए, तो परिणाम के लिए वर्षों का इंतज़ार और तब भी— परिणामों में जातिगत भेदभाव, तीर की तरह चुभते संवाद— सहज, सम-सामयिक, मार्मिक पीड़ा और अपमान को इस तरह उकेरते हैं कि आप अपनी सीट से हिल नहीं पाते।

हुनर की नहीं, जाति की कद्र। फिल्म गफलत में बीतते समय को इतनी सुंदरता से रचती है कि दर्शक के मन को भीतर तक मथ जाती है। 

खपरैल के गड्ढों से आसमान देखना आसान नहीं— यह पंक्ति पूरी फिल्म का सार बन जाती है।

जितना ईंट-गारा जोड़कर खुद को खड़ा करने की कोशिश करते हैं, लोग दूसरी ओर से धक्का देकर गिरा देते हैं-

गेंद का असली वजूद हवा में ही है दोस्त, ज़मीन पर तो बस पड़ी रहती है— ये संवाद व्यवस्था की सच्चाई को नंगा कर देते हैं।

फिल्म आत्मसम्मान की बात करती है— खुद की कद्र करना स्वार्थ नहीं और किसी से प्रेम करने का अर्थ यह नहीं कि हम खुद को ही भूल जाएँ।

बोरी से उठकर कुर्सी तक का सफ़र हमें खुद ही तय करना होगा— यह वाक्य संघर्ष की पूरी दर्शनशास्त्र रच देता है।

व्यंग्य और कड़वी सच्चाई साथ-साथ चलती है— कब तक नाखून से बर्तन कुरेद-कुरेद खाएँ?

चाची से कहकर बिरयानी बनवाओ… भिगौने में बैठकर खाएँगे- हँसी के भीतर छिपा यह दर्द गहरे तक चुभता है।

फिल्म देखने के बाद यह अहसास और तीखा हो जाता है कि प्लैटिनम जुबली मना चुका भारत आज भी अपने निम्न जाति समुदाय को भेदभाव की ज़ंजीरों से मुक्त नहीं कर पाया है या तो वे घरों में कैद हैं या सड़क पर पहचान बदलकर जीने को मजबूर।

फिल्म इतनी जीवंत है कि दर्शक उसमें खो जाता है। कई बार अश्रुधारा स्वतः बहने लगती है। भेदभाव करती पीढ़ियों पर शर्म आती है। यह फिल्म संवेदनशील समाज की सोच बदलने की ताकत रखती है।

बहन का भाई से कहना—

“तुम्हें चुनने का अवसर मिला, मुझे क्या मिला?”

यह दृश्य केवल एक संवाद नहीं, एक सवाल है जो व्यवस्था से टकराता है और सोच को झकझोर देता है।

और अंत में—

चप्पलों को थामे माँ की अंतर्नाद सिसकियाँ।

वह दृश्य स्तब्ध कर देता है, आँखें भर आती हैं।

होमबाउंड तंग सोच में लिपटे समाज को जगाने की कोशिश है।

निम्न सामुदायिक संघर्ष, धार्मिक तनाव, सामाजिक संरचना और व्यवस्थागत उपेक्षा— सब कुछ इतनी सच्चाई से सामने आता है कि दर्शक सन्न रह जाता है।

हर किरदार का सशक्त और जीवंत अभिनय दिल में बस जाता है; अपनी गहरी छाप छोड़ता है। यह फिल्म देखी नहीं जाती— महसूस की जाती है।


नील मणि प्रखर लेखिका एवं कार्टूनिस्ट हैं जो अपनी लेखनी और रेखाचित्रों के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक व पारिवारिक जीवन के विविध रंगों को जीवंत करती हैं। व्यंग्य, कविता, कहानी और रेखाचित्र विधाओं में समान रूप से सक्रिय नील मणि वर्तमान में स्वतंत्र लेखन में संलग्न हैं और आपकी रचनाएँ देश-विदेश की विभिन्न प्रतिष्ठित एवं सरकारी पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं। मेरठ, उत्तर प्रदेश निवासी नील मणि से मोबाइल नंबर 9412708345 पर संपर्क किया जा सकता है।

COMMENTS

Leave a Reply

You may also like this -

Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका