Gemini said समकालीन हिन्दी कविता का स्वरूप अत्यंत व्यापक और विविधतापूर्ण है। साठोत्तरी कविता (1960 के बाद) से विकसित होते हुए आज की कविता ने जीवन के
समकालीन हिन्दी कविता का परिचय
समकालीन कविता का मिजाज बदला हुआ है। इस बदले हुए मिजाज के मूल में वे परिस्थितियाँ और परिवेशव्यापी उठा-पटक है, जिनसे प्रेरित होकर कवियों ने कलम चलायी है। समकालीन कविता के स्वरों में मोहभंग, अस्वीकार, आक्रोश, व्यंग्य, यथार्थ जीवन का सीधा साक्षात्कार, जीवन के जटिल प्रसंगों, संघर्षों की अभिव्यंजना, साहसिकता, खरापन, तनाव, छटपटाहट, अपरिचय, अविश्वास, ऊब, मूल्यहीनता और बेलौस, सपाटबयानी पूर्वापेक्षा अधिक है। 'पूर्वापेक्षा अधिक' कहने के पीछे हमारी यह धारणा है कि ये सभी स्वर नई कविता में थे तो, किन्तु बदले हुए परिप्रेक्ष्य की कविता में यह सब-के-सब प्रमुख हो उठे हैं।
समकालीन कविता का आविर्भाव नई कविता के दौर का समाप्त हो जाना नहीं है, अपितु उसके ही कतिपय संदर्भ-स्वरों का व्यापक स्तर पर ईमानदार प्रस्तुतीकरण है। इस कविता में मानव-स्थिति की समझ और पहचान काफी गहरी होती गयी है। यह वह कविता है जिसमें वर्तमान परिवेश की निर्मम वास्तविकताएँ, उनसे उत्पन्न दबाव, तनाव के साथ-साथ मानवीय सम्बन्धों में आयी कृत्रिमता, बेरुखी भी चित्रित हुई है। इस कविता की पहचान का कुछ-कुछ अनुमान दूधनाथ सिंह के इस कथन से हो सकता है- "यह वह कविता नहीं है/यह केवल खून-सनी चमड़ी उतार लेने की तरह है/यह केवल रस नहीं/जहर है जहर।" जाहिर है कि समकालीन कविता में विकसित प्रवृत्तियाँ नये रूप-स्वरूप में हमारे सामने आयी हैं। इस कविताधारा की कतिपय प्रमुख प्रवृत्तियों को निम्नांकित बिन्दुओं के सहारे समझा जा सकता है-
- समकालीन कविता में जो पहली प्रवृत्ति उभरी है, वह रोमानी या छायावादी 'संस्कारों से मुक्ति है। नई कविता नवीन तो थी, यथार्थ तो थी और परिवेश से प्रतिबद्ध भी थी, किन्तु एक सीमा तक छायावादी भावचेतना को अपने में समेटे हुए थी। उसमें छायावादी रोमांस किसी-न-किसी रूप में बराबर जिन्दा रहा है। समकालीन कविता में यह नहीं है। इन कवियों ने उस खिड़की को ही बन्द कर दिया, जहाँ से सौन्दर्य के वे बिम्ब दिखाई देते हैं, जो छायावादी परम्परा में पड़ते हैं।
- समकालीन कविता समाज की मृत मान्यताओं, टूटती हुई परम्पराओं और मोहभंग की कविता है। उसमें आज की विकृत जिन्दगी और सम्बन्धों की खींच-खरोंच व्यक्त हुई है। मोहभंग की जो प्रवृत्ति इस कविता में उपलब्ध है, उसे समकालीन परिवेश की तल्खी से उत्पन्न प्रतिक्रिया माना जा सकता है। धूमिल की निम्नांकित पंक्तियाँ देखिए- मैंने इन्तजार किया ,अब कोई बच्चा भूखा रहकर स्कूल नहीं जाएगा अब कोई छत ,बारिश में नहीं टपकेगी। अब कोई किसी की रोटी नहीं छीनेगा ,कोई किसी को नंगा नहीं करेगा मैं इन्तजार करता रहा ,मगर एक दिन मैं स्तब्ध रह गया ,मेरा सारा धीरज युद्ध की आग से पिघलती हुई बर्फ में बह गया।
- मोहभंग की यही स्थिति लीलाधर जगूड़ी की कविताओं में भी मिलती है, रघुवीर सहाय में, भी उपलब्ध है और राजकमल तो यहाँ तक लिख गये हैं- “आदमी को तोड़ती नहीं है/लोकतांत्रिक पद्धतियाँ/केवल पेट के बल/उसे झुका देती हैं/धीरे-धीरे अपाहिज बना लेने के लिए।"
- समकालीन कविता में जीवन से सीधा साक्षात्कार देखने को मिलता है। आठवें, नवें और दसवें दशक में लिखी गई कविता इसका उदाहरण है। इन दशकों में जो कविता लिखी गयी है, उसमें उत्तेजना, खीझ, असंतोष, निराशा और कड़वाहट का स्वर बहुत अधिक है। आज का कवि जब मनुष्य को दुहरी जिन्दगी जीते हुए देखता है तो वह साक्षात्कृत परिवेश के प्रति अपनी प्रतिबद्धता सूचित करता है। यह प्रतिबद्धता और कुछ नहीं, कवि की सचेत दृष्टि द्वारा परिवेश का सही ग्रहण ही है और यही समकालीन संदर्भों और स्थितियों से सीधा साक्षात्कार है। केदारनाथ सिंह, मलयज, धूमिल, प्रयाग शुक्ल आदि की कविताओं में इस स्थिति को देखा जा सकता है। धूमिल की 'पटकथा' का परिदृश्य इस संदर्भ में उल्लेखनीय है।
- समकालीन कविता जिस परिवेश की देन है, वह काफी भयावह, थोथा और विसंगतिपूर्ण है। कविता के 'मिथ' के टूटने और उसे नये रूप में प्रस्तुत करने की पृष्ठभूमि में अस्वीकार के तेवर साफ झलकते हैं। ध्यान रहे कि अस्वीकार आधे या अधूरे मन से नहीं, सम्पूर्ण बौद्धिक और भावात्मक शक्ति से किया जाता है। यही कारण है कि समकालीन कवियों में अस्वीकार की यह मुद्रा रचनात्मक है, कोरी भावात्मक नहीं है। अस्वीकार की यह प्रवृत्ति दूधनाथ सिंह, चन्द्रकान्त देवताले, सौमित्र मोहन और नवें-दसवें दशक के कवियों में बखूबी देखी जा सकती है। सौमित्र मोहन की 'लुकमान अली' कविता में आया अस्वीकार जीवन की विसंगतियों से जुड़कर निरन्तर एक रचाव की मुद्रा में प्रतिफलित हुआ है। अन्य कवियों के यहाँ भी इस अस्वीकार को देखा जा सकता है।
- समकालीन कविता की प्रमुख प्रवृत्तियों में आक्रोश और विद्रोह की भावना भी पर्याप्त अहमियत रखतीं है। इस कविता में जो आक्रोश और विद्रोह उभरा है, वह भारतीय परिवेश से ही उपजा है। भारतीय समाज में व्याप्त जड़ता, निष्क्रियता, विसंगति और विडम्बनाओं के कारण समकालीन कविता आक्रोशमूलक और विद्रोहपरक हो गयी है। विद्रोह और आक्रोश का यह स्वर बलदेव वंशी, वेणु गोपाल, लीलाधर जगूड़ी, कमलेश, विष्णु खरे, देवेन्द्र कुमार, श्रीराम वर्मा, मत्स्येन्द्र शुक्ल, श्याम विमल और राजेश शर्मा आदि की कविताओं में देखा जा सकता है।
- वर्तमान परिवेश में जो स्वार्थान्धता, भ्रष्टाचारिता, और आपाधापी व्याप्त है, उसको अनुभव के दायरे में बाँधते हुए समकालीन कवियों ने ऐसे तीखे व्यंग्य किये हैं कि उनसे अन्तस् की एक-एक परत छिल जाती है। इस व्यंग्य की पृष्ठिका नयी कविता में ही तैयार हो गयी थी, किन्तु वहाँ व्यंग्य शालीन था। यहाँ आकर व्यंग्य तीखा, मर्मान्तक और आक्रान्त हो गया है। रघुवीर सहाय की ये व्यंग्यपरक पंक्तियाँ देखिए- संसद एक मंदिर है ,जहाँ किसी को द्रोही नहीं कहा जा सकता ,दूध पिये मुँह पोंछे आ बैठे ,जीवनदानी, गोंददानी, सदस्य तोंद सम्मुख कर ,बोले- कविता में देश-प्रेम लाना, हरियाना- प्रेम लाना ,आईसक्रीम खाना है।
- समकालीन कविता में जो परिवेश उभरा है, वह पर्याप्त भयावह और तनावपूर्ण है। परिवेशव्यापी यह तनाव और भयावहता व्यक्ति-व्यक्ति के सम्बन्धों की कृत्रिमता और परिवर्तित मान-मूल्यों के कारण और दहशत भरी हो गयी है। युवा कवि इन स्थितिगत भयावहताओं से भागना नहीं चाहता है, अपितु संघर्ष- आत्मसंघर्ष की भूमि पर खड़ा होकर अन्तिम क्षण तक अपना अस्तित्व बनाये रखना चाहता है। विश्वनाथ तिवारी की 'आखिरी लड़ाई' और 'जिजीविषा', रघुवीर सहाय की 'आत्महत्या के विरुद्ध', श्रीकांत वर्मा की 'समाधिलेख' और दूधनाथ सिंह की 'सुरंग से लौटते हुए' आदि कितनी ही कृतियों में इस स्वर को सुना जा सकता है। ध्यान रहे, यह संघर्ष अकारण नहीं है, इसमें आक्रोश और विद्रोह का मुहावरा भी आकर मिल गया है।
- समकालीन कविता की एक प्रवृत्ति राजनीतिक संदर्भों से साक्षात्कार है। मुक्तिबोध से शुरू हुई यह स्थिति श्रीराम वर्मा, मत्स्येन्द्र शुक्ल, रमेश गौड़, धूमिल, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा और लीलाधर जगूड़ी आदि कवियों तक ही सीमित नहीं रही है। इसे हम नवें और दसवें दशक के युवा कवियों में भी देख सकते हैं। श्याम विमल की ये पंक्तियाँ देखिए- मेरे इस देश में हर बार ,वही होता है वही ,कि आदमी के कद का जो नेता है। आदमी अपने पेट में कछुआ बोता है।
- समकालीन कविता में निर्मम वास्तविकताओं की बेपर्द व्यंजना हुई है। यह व्यंजना किसी एक कवि की कविता की बपौती नहीं है, इसे तो हम बीसवीं सदी के अन्तिम वर्षों में लिखी गई कविताओं में भी देख सकते हैं। नरेन्द्र मोहन, राजेश जोशी, अजय अनुरागी, प्रेमशंकर रघुवंशी, नरेन्द्र तिवारी, सुनील खन्ना, विजयकुमार, परमानन्द श्रीवास्तव, एकान्त श्रीवास्तव, मंजू गुप्ता, आलोक धन्वा, मोहन सपरा, अरुण कमल, अनिल जोशी, अमरजीत और प्रताप सहगल व मलखान सिंह सिसोदिया आदि की कविताएँ इसका प्रमाण हैं।
- समकालीन कविता अनुभव की आँच में तपकर लिखी गई कविता है। इसके कवि अपने अनुभव की ईमानदार अभिव्यंजना के कायल हैं। यही कारण है कि इस कविता की भाषा रोजमर्रा की भाषा है। उसमें साफगोई है, सपाटबयानी है, किन्तु इसका यह अर्थ मान लेना अनुचित होगा कि वह प्रेषणीयता और व्यंजकता के गुणों से शून्य है। केवल कुछ पंक्तियाँ देखिए-आदमी कितना कागज हो रहा है, चुप, प्रश्नों पर पाँव धरता हुआ, मेरा आकार निहायत छोटा पड़ रहा है, गन्दे पैसे पर रेंगता हुआ जैसे कोई जुलूस, जिस्म-जिस्म होकर बिखर रहा है ।
- समकालीन कविता जीवन का पूरा भूगोल और इतिहास प्रस्तुत करती है। परिवेश का इतना सच्चा, निर्मम यथार्थ और साक्षात्कृत जीवन किसी दूसरी कविता में कहाँ है? इतना अवश्य कह सकते हैं कि बीसवीं सदी के अन्तिम दशक में भी कविता लिखी जा रही है और उसकी अपनी पहचान है। अन्तिम दशक की कविता का विश्लेषण करें तो यह कहना उचित लगता है कि कविता जीवित है, चल रही है और चलती रहेगी। कविता विचार तो बनी है, पर भावजगत् से उसका सम्बन्ध पूरी तरह टूट नहीं पाया है।
इस प्रकार समकालीन हिन्दी कविता आज अपने समय का आईना है। यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को समझने और उसे बदलने की एक वैचारिक छटपटाहट है।


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