प्रयोगवादी काव्य की विकास यात्रा प्रयोगवादी काव्य हिंदी साहित्य की आधुनिक कविता की एक महत्वपूर्ण धारा है, जिसने छायावादी युग की भावुकता और रोमांटिकता
प्रयोगवादी काव्य की विकास यात्रा
प्रयोगवादी काव्य हिंदी साहित्य की आधुनिक कविता की एक महत्वपूर्ण धारा है, जिसने छायावादी युग की भावुकता और रोमांटिकता से हटकर यथार्थवादी और प्रयोगशील दृष्टिकोण को अपनाया। इसकी विकास यात्रा द्वितीय विश्व युद्ध के समय से शुरू होती है, जब सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों ने कविता को नई दिशा दी। 1940 के दशक में हिंदी कविता में एक नई लहर उठी, जिसमें कवि पारंपरिक छंद, अलंकार और भावप्रधानता से मुक्त होकर जीवन की जटिलताओं, मानवीय संघर्षों और सामाजिक विसंगतियों को अभिव्यक्त करने लगे। इस आंदोलन की शुरुआत को अक्सर 1943 में प्रकाशित 'तार सप्तक' संकलन से जोड़ा जाता है, जिसे अज्ञेय ने संपादित किया था। इस संकलन में सात युवा कवियों—अज्ञेय, मुक्तिबोध, नेमीचंद्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरीशचंद्र श्रीवास्तव और रामविलास शर्मा—की कविताएं शामिल थीं, जो प्रयोगवाद की नींव रखती थीं। इन कविताओं में छंद की बंधनमुक्ति, नई प्रतीकों का प्रयोग और व्यक्तिगत अनुभवों की गहन अभिव्यक्ति दिखाई देती है, जो उस समय की कविता को एक नया आयाम देती है।
प्रयोगवाद की जड़ें उस समय की वैश्विक और राष्ट्रीय घटनाओं में गहरी हैं। द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका, भारत की स्वतंत्रता संग्राम की अंतिम लड़ाई और उसके बाद की सामाजिक उथल-पुथल ने कवियों को प्रभावित किया। छायावाद की प्रकृति-प्रेम और रहस्यवाद से ऊबकर कवि शहर की भीड़, गरीबी, शोषण और मानवीय अलगाव की ओर मुड़े। अज्ञेय जैसे कवि ने 'तार सप्तक' के माध्यम से इस नई कविता को 'प्रयोग' का नाम दिया, जिसमें कविता को जीवन की सच्चाई से जोड़ने का प्रयास था। मुक्तिबोध की कविताएं जैसे 'अंधेरे में' या 'ब्रह्मराक्षस' में व्यक्तिगत पीड़ा और सामाजिक विद्रोह की मिश्रित अभिव्यक्ति मिलती है, जो प्रयोगवाद की गहराई को दर्शाती है। इस दौर में कविता की भाषा भी बदली—वह अधिक बोलचाल की, जटिल और प्रतीकात्मक हो गई, जिसमें पश्चिमी प्रभाव जैसे एक्सप्रेशनिज्म और सर्रेलिज्म का स्पर्श था, लेकिन भारतीय संदर्भ में अनुकूलित। शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं में सूक्ष्म भावनाओं का चित्रण और नागार्जुन की लोकभाषा में सामाजिक व्यंग्य ने इस धारा को और समृद्ध किया।
प्रयोगवाद के उद्भव और स्वरूप पर विचार व्यक्त करते हुए रामेश्वर शर्मा ने लिखा है- “प्राचीन रूढ़ियों और संस्कारों से जब मनुष्य ऊब जाता है, तब वह नवीनता की ओर उन्मुख होता है। जीवन और जगत् के सौन्दर्य के मानदंडों के समान साहित्य-सौन्दर्य की अभिव्यक्ति के मानदंड भी बदलते रहते हैं। 'नई कविता' से पहले की हिन्दी कविता रूढ़िबद्ध और परम्पराग्रस्त हो चुकी थी। 'नई कविता' ने अपनी नवीन मान्यताओं से प्राचीनता के प्रति संघर्ष किया। पुरानी कविता समाज के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल रही थी, परिणामतः उस आवश्यकता की पूर्ति के लिए 'नई कविता' का उद्भव हुआ। पुरानी कविता नये भावों के अभिव्यंजन के लिए अक्षम थी; अतः नई कविता को शैली के क्षेत्र में नवीन प्रयोग करने पड़े। सारांश रूप में कहा जा सकता है कि प्रयोगवाद या 'नई कविता' का जन्म नवीन वस्तु और नवीन शैली के आग्रह के फलस्वरूप हुआ। अतः इसमें नवीन उपमानों एवं नवीन प्रतीकों का ग्रहण हुआ।" डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त के शब्दों में- "नई कविता नये समाज के नये मानव की नयी वृत्तियों की नयी अभिव्यक्ति नयी शब्दावली में है, जो नये पाठकों के नये दिमाग पर नये ढंग से नया प्रभाव डालती है।"
हिन्दी साहित्य में 1943 ई. में अज्ञेयजी के सम्पादकत्व में कवियों की कविताओं का एक संग्रह 'तारसप्तक' नाम से प्रकाशित हुआ। इसमें प्रवृत्तिगत साम्य की अपेक्षा पारस्परिक वैषम्य का प्राधान्य है। अतः अज्ञेयजी ने इस संग्रह की भूमिका में लिखा है- “प्रयोगवादी कवि किसी एक स्कूल के नहीं हैं। सभी राही हैं; राही नहीं, राह के अन्वेषी हैं।" इसमें सात कवियों- गजानन मुक्तिबोध, नेमिचन्द्र, भारतभूषण, प्रभाकर माचवे, गिरजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा और अज्ञेय की कविताओं का संग्रह हुआ। इसके पश्चात् 1947 ई. में अज्ञेय ने 'प्रतीक' पत्रिका के माध्यम से प्रयोगवादी साहित्य को बढ़ावा दिया। 1951 ई. में 'दूसरा सप्तक' प्रकाशित हुआ, जिसमें भवानीप्रसाद मिश्र, शकुंत माथुर, हरिनारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय और धर्मवीर भारती की कविताएँ हैं। फिर, 'पाटल' और 'दृष्टिकोण' नामक मासिक पत्रिकाओं में प्रपद्यवादी एवं प्रयोगवादी कविताओं को अधिक महत्त्व मिला। 1954 ई. में डॉ. जगदीश गुप्त के सम्पादन में प्रयोगवादी कविताओं का अर्द्धवार्षिक संग्रह 'नई कविता' नाम से प्रकाशित होने लगा। नई कविता के उदीयमान कवियों में चंद्रकुंवर बर्त्वाल, राजेन्द्र यादव, सूर्यप्रताप, केदारनाथ सिंह, पद्मनारायण, राजेन्द्र किशोर, निशांतकेतु, कुमारेंद्र पारसनाथ सिंह, अवधेशकुमार, चंद्रमौलि उपाध्याय, रामनरेश पाठक, मुरलीमनोहर प्रसाद सिंह, शिवमंगल, लक्ष्मीकांत वर्मा, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, बालकृष्ण राव, विजयदेव नारायण, जगदीश गुप्त, कुँवर नारायण और दुष्यंत कुमार के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। 1959 ई. में तीसरा सप्तक का प्रकाशन हुआ, जिसमें प्रयागनारायण त्रिपाठी, कीर्ति चौधरी, मदन वात्स्यायन, केदारनाथ सिंह, कुँवरनारायण, विजयदेव नारायण साही एवं सर्वेश्वरदयाल सक्सेना- ये सात कवि संकलित हुए।
1960 के दशक तक प्रयोगवाद ने अपनी चरम सीमा छू ली और फिर 'अकविता' जैसे नए आंदोलनों में रूपांतरित हो गया। अकविता में श्रीकांत वर्मा, राजकमल चौधरी जैसे कवियों ने प्रयोगवाद की विरासत को आगे बढ़ाया, लेकिन अधिक विद्रोही और असंगत रूप में। प्रयोगवाद ने हिंदी कविता को पारंपरिक बंधनों से मुक्त किया, जिससे बाद के कवियों जैसे विजय देव नारायण साही या रघुवीर सहाय को नई राह मिली। इसकी विकास यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ था जब यह मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित हुआ, विशेषकर मुक्तिबोध और नागार्जुन के माध्यम से, जहां कविता सामाजिक परिवर्तन का औजार बनी। हालांकि, कुछ आलोचकों ने इसे अत्यधिक जटिल और पाठक से दूर बताया, लेकिन इसने हिंदी कविता की भाषा और विषयवस्तु को समृद्ध किया।अंततः, प्रयोगवादी काव्य की विकास यात्रा हिंदी साहित्य में एक क्रांतिकारी अध्याय है, जो छायावाद की समाप्ति से शुरू होकर आधुनिक कविता की नींव रखती है। इसने कविता को जीवन की सच्चाई से जोड़ा, प्रयोगशीलता को प्रोत्साहित किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए नई संभावनाएं खोलीं। आज भी इसकी छाप हिंदी कविता में दिखाई देती है, जहां यथार्थ और कल्पना का संतुलन महत्वपूर्ण बना हुआ है। यह यात्रा न केवल काव्य की, बल्कि भारतीय समाज की बदलती चेतना की भी कहानी है, जो समय के साथ विकसित होती रही।


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