बँटता हुआ आदमी

SHARE:

बँटता हुआ आदमी बँटता हुआ आदमी आरक्षण की लकीरों में समाज नक़्शे की तरह बँट गया है, आदमी— आदमी से पहले जाति में सिमट गया है। काग़ज़ पर लिखी पहचानें रो

बँटता हुआ आदमी


बँटता हुआ आदमी
आरक्षण की लकीरों में
समाज नक़्शे की तरह बँट गया है,
आदमी—
आदमी से पहले
जाति में सिमट गया है।

काग़ज़ पर लिखी पहचानें
रोटी का हक़ तय करती हैं,
भूख मगर
नाम नहीं पूछती,
वो हर गरीब के पेट में
एक-सी जलती है।

सवर्ण होकर गरीब होना
दोहरी सज़ा जैसा है,
न विशेषाधिकार का सच,
न पीड़ा का कोई कोटा है।

न वो व्यवस्था का दोषी है,
न इतिहास का कर्ता,
फिर भी हर बहस में
उसका दर्द
अवैध ठहराया जाता है।

बँटता हुआ आदमी
कोई कहता है—
“तुम्हारे पुरखे शक्तिशाली थे,”
पर आज की थाली में
वो इतिहास
रोटी बनकर नहीं उतरता।

इसी सड़क पर, उसी कतार में,
हरिजन भी खड़ा है, सवर्ण भी—
दोनों की हथेलियाँ खुरदुरी हैं,
दोनों की जेबें लगभग ख़ाली।

नज़रें मिलती हैं, फिर झुक जाती हैं,
क्योंकि सवाल एक है—
आज घर में
चूल्हा जलेगा या नहीं।

शाम की उसी थकी हुई बेंच पर
पिछड़ा भी बैठा है, अगड़ा भी—
दोनों ने अपने थैले पैरों में रख दिए हैं,
जैसे दिन का बोझ उतार दिया हो।

थैले खुले नहीं,
फिर भी दिख जाता है—
अंदर सपने दबे हैं,
और रोटियाँ गिनती की।

पिछड़ा धीमे से कहता है,
“डर लगता है… बच्चों के कल से,”
अगड़ा जवाब नहीं देता,
बस आँखें झुका लेता है—
उसके डर का नाम भी वही है।

कुछ पल यूँ ही बीतते हैं,
हवा भी रुककर सुनती है,
फिर एक रोटी
बीच से नहीं—
दिल से टूटती है।

आधी-आधी रोटी के साथ
खामोशी भी बाँटी जाती है,
और उसी खामोशी में
दोनों के बीच
कुछ जुड़ जाता है—
जो न किसी नीति में दर्ज है,
न किसी जाति में।

उस पल
वे पिछड़ा–अगड़ा नहीं रहते,
सिर्फ़ दो इंसान होते हैं—
एक-दूसरे का बोझ
बिना कहे हल्का करते हुए।

इधर आरक्षण से उपजी उम्मीदें हैं,
उधर उपेक्षा से उपजा आक्रोश,
बीच में
टूटता हुआ समाज है
और चुप खड़ा इंसान है।

लड़ाई हक़ की नहीं रही अब,
लड़ाई पहचान की हो गई है,
सिस्टम आराम से बैठा है,
भीड़ आपस में भिड़ गई है।

गरीबी अगर साझा सच है,
तो समाधान भी साझा होना चाहिए,
वरना हर नीति
एक नए घाव का
कारण होना चाहिए।

जब तक इंसान को
जाति से तौला जाएगा,
तब तक कोई भी आरक्षण
समाज नहीं,
सिर्फ़ आँकड़े बढ़ाएगा।

ज़रूरत इस बात की है
कि भूख को आधार बनाया जाए,
ना नाम, न जाति का ज़हर घोला जाए,
तभी शायद
आदमी—आदमी के पास
फिर से आ पाए।


- रजत विश्वनाथ त्रिपाठी 

यह कविता समकालीन समाज में व्याप्त जाति, आरक्षण, गरीबी और मानवीय संवेदना के द्वंद्व को अभिव्यक्त करने का प्रयास है।

COMMENTS

Leave a Reply

You may also like this -

Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका