छायावादी काव्य में राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति का स्वरूप

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छायावादी काव्य में राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति का स्वरूप छायावादी काव्य हिंदी साहित्य की उस धारा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें कवियों ने

छायावादी काव्य में राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति का स्वरूप

छायावादी काव्य हिंदी साहित्य की उस धारा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें कवियों ने व्यक्तिगत भावनाओं, रहस्यवाद और प्रकृति के सौंदर्य को केंद्र में रखते हुए भी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना को गहराई से अभिव्यक्त किया है। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में, जब भारत ब्रिटिश उपनिवेशवाद की जकड़न में था, छायावाद के कवियों ने अपनी रचनाओं में एक ऐसी चेतना को जागृत किया जो व्यक्तिगत दुख-दर्द से परे जाकर राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक गौरव और स्वतंत्रता की आकांक्षा को प्रतिबिंबित करती थी। यह युग 1918 से 1936 तक माना जाता है, जिसमें जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और महादेवी वर्मा जैसे कवियों ने अपनी कविताओं में छाया और प्रकाश के माध्यम से जीवन की गहन अनुभूतियों को व्यक्त किया, लेकिन इस छाया में राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना की जड़ें गहरी थीं। छायावाद की यह अभिव्यक्ति न केवल भावुकता से ओतप्रोत थी, बल्कि उसमें एक सूक्ष्म राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रतिरोध भी निहित था, जो औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध भारतीय आत्मा की पुकार बनकर उभरी।

छायावादी काव्य में राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति का स्वरूप
छायावादी कविता दो विश्वयुद्धों के बीच की कविता है। छायावादी काल (1920 ई. - 1936 ई.) में भारतीय जनमानस पर देश को स्वतन्त्र कराने की चेतना पूर्णतः छायी हुई थी। तिलक का उद्घोष 'स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है' और सुभाष की हुंकार 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा' ने जनता को आजादी की लड़ाई की ओर उन्मुख किया। एक ओर तो गाँधी जी असहयोग, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलनों से भारतीय जनता को उद्वेलित कर रहे थे, तो दूसरी ओर क्रान्तिकारियों के बलिदानों से सोई हुई जनता को जगा दिया। काकोरी षड्यन्त्र केस (9 अगस्त 1925 ई.), साण्डर्स हत्याकाण्ड (17 दिसम्बर 1928ई.), असेम्बली बम काण्ड (8 अप्रैल 1929 ई.), भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी (23 मार्च 1931 ई.) जैसे महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम इसी काल के हैं। डॉ. पट्टाभि सीतारमैया के अनुसार- "1931 ई. में करांची कांग्रेस अधिवेशन के समय सरदार भगतसिंह का नाम भारत में उतना ही सर्वप्रिय हो गया था जितना कि गाँधीजी का।"
 
इन परिस्थितियों का प्रभाव छायावादी कवियों पर अनिवार्य रूप से पड़ा और माखनलाल चतुर्वेदी जैसे कवियों ने "पुष्प की अभिलाषा" जैसी रचना लिखी जिसमें एक पुष्प यह अभिलाषा करता है कि मुझे उस रास्ते पर फेंक देना जिस रास्ते पर देश पर बलिदान देने हेतु वीर जा रहे हों -

मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक । 
मातृभूमि पर सीस चढ़ाने जिस पथ पर जावें वीर अनेक ॥
 
प्रसादजी के काव्य संकलन 'लहर' में 'शेरसिंह का आत्म समर्पण' एवं 'पेशोला की प्रतिध्वनि' नामक दो ऐसी कविताएँ संकलित हैं, जो स्वातन्त्र्य चेतना से युक्त हैं। इनमें से प्रथम कविता में 1849 ई. की उस ऐतिहासिक घटना का उल्लेख है, जिसमें सिक्खों की वीर सेना ने अंग्रेजों के दाँत खट्टे किये थे। सिक्खों की उस गौरवगाथा के द्वारा प्रसाद जी ने भारतीय वीरों को अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष के लिए प्रेरित किया है। इसी प्रकार कवि ने 'पेशोला की प्रतिध्वनि' नामक कविता में उदयपुर की 'पिछोला झील को देखकर राणाप्रताप की वीर भूमि मेवाड़ का स्मरण किया है, जिसने मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की। आज मेवाड़ में कौन-सा वीर है जो छाती ठोंककर दृढ़ता के साथ यह कह सके कि मैं इन विदेशियों को यहाँ से मार भगाऊँगा और अपनी मातृभूमि को स्वतन्त्र कराने का उत्तरदायित्व अपने कंधों पर लूँगा। राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत इस कविता में कवि ने प्रश्न किया है कौन देश को स्वतन्त्र कराने का बोझ उठाने को तैयार है-
 
कौन लेगा भार यह ? 
जीवित है कौन 
साँस चलती है किसकी 
कहता है कौन ऊँची छाती कर 
मैं हूँ, मैं हूँ मेवाड़ में 
अरावली श्रृंग सा समुन्नत सिर किसका ? 
बोलो, कोई बोलो अरे क्या तुम सब मृत हो ?

प्रसाद जी ने कामायनी में जगत् की सत्यता का प्रतिपादन कर पलायनवाद एवं निराशावाद का विरोध किया। नवजागरण की बेला में वे कर्मठता, कर्मण्यता का सन्देश देते हुए नवयुवकों को संसार में प्रवृत्त होने एवं देश के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देते हैं। राष्ट्रीय चेतना एवं राष्ट्र जागरण की भावना को जगाये रखने में प्रसाद के इन विचारों की प्रमुख भूमिका है। उनके नाटकों के पात्र त्याग, सेवा, बलिदान की भावनाओं से ओतप्रोत हैं तथा उनमें आत्मगौरव, स्वाभिमान एवं राष्ट्रीय चेतना विद्यमान है।

निश्चय ही छायावादी कवियों ने विदेशी साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारतीय जनमानस को जाग्रत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। निराला की कविता 'जागो फिर एक बार' इसी प्रकार की कविता है।निराला ने राष्ट्र प्रेम के ओजस्वी भावों से दीप्त होकर भारत माता की अद्भुत कल्पना करते हुए उसकी वन्दना इन शब्दों में की है- 

भारति जय विजय करे, 
कनक शस्य कमल धरे । 
लंका पदतल शतदल । गर्जितोर्मि, सागर जल । 
धोता शुचि चरण युगल । स्तव कर बहु अर्थ भरे ॥
 
'जागो फिर एक बार' कविता में निराला ने भारतीयों को उनके अतीत गौरव का स्मरण कराते हुए उनमें स्वातन्त्र्य चेतना भरने का सफल प्रयास किया है -

तुम हो महान 
तुम सदा हो महान 
है नश्वर यह दीन भाव कायरता, कामपरता 
ब्रह्म हो तुम 
पदरज भर भी है नहीं 
भूरा यह विश्व भार 
जागो फिर एक बार। 

सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति छायावादी काव्य में और भी गहन रूप से दिखाई देती है, जहां कवियों ने भारतीय परंपरा, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है। प्रसाद की 'कामायनी' में वैदिक और पौराणिक कथाओं का उपयोग करके सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाया गया है, जो आधुनिक भारत को प्राचीन गौरव से जोड़ता है। यहां सांस्कृतिक चेतना एक प्रकार की आध्यात्मिक खोज बन जाती है, जहां मानव जीवन की सार्थकता भारतीय दर्शन में खोजी जाती है। पंत की कविताओं में, जैसे 'परिवर्तन' में, प्रकृति और मानव की एकता को भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ा गया है, जहां वेदांतिक विचारधारा की झलक मिलती है। पंत ने भारतीय लोकगीतों और ग्रामीण जीवन को छायावादी सौंदर्य से सजाकर सांस्कृतिक चेतना को जीवंत किया है, जो औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्ति की दिशा में एक कदम है। निराला की रचनाओं में सांस्कृतिक चेतना विद्रोही रूप में प्रकट होती है, जहां 'बिल्लेसुर बकरिहा' जैसी कविताओं में लोक-संस्कृति को मुख्यधारा में लाकर सांस्कृतिक लोकतंत्र की बात की गई है। महादेवी वर्मा ने अपनी कविताओं में भारतीय स्त्री की सांस्कृतिक भूमिका को उजागर किया है, जहां मीरा की भक्ति को छायावादी भावना से जोड़कर सांस्कृतिक पुनरुत्थान की बात की है। इस अभिव्यक्ति में छायावाद की विशेषता है कि सांस्कृतिक चेतना को रहस्यमयी और भावुक बनाकर प्रस्तुत किया गया है, जो पाठक की आत्मा को स्पर्श करती है और उसे अपनी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ती है।

कुल मिलाकर, छायावादी काव्य में राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति का स्वरूप एक ऐसा मिश्रण है जहां व्यक्तिगत भावनाएं राष्ट्रीय और सांस्कृतिक आयामों से जुड़कर एक व्यापक दृष्टि प्रदान करती हैं। यह न केवल स्वतंत्रता संग्राम के समय की राजनीतिक चेतना को प्रतिबिंबित करता है, बल्कि भारतीय संस्कृति की गहराई को भी उजागर करता है। छायावादी कवियों ने अपनी रचनाओं में छाया के माध्यम से प्रकाश की खोज की है, जहां राष्ट्रीय दासता की छाया में सांस्कृतिक स्वतंत्रता का प्रकाश छिपा है। यह अभिव्यक्ति हिंदी साहित्य को एक नई ऊंचाई प्रदान करती है, जो आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि यह हमें याद दिलाती है कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि चेतना जागृत करने का माध्यम है।

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