वह तोड़ती पत्थर कविता में सामाजिक यथार्थ | निराला वह तोड़ती पत्थर’ श्रम, स्त्री और यथार्थ का छायावादी-यथार्थवादी संक्रमण (सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
वह तोड़ती पत्थर’ श्रम, स्त्री और यथार्थ का छायावादी-यथार्थवादी संक्रमण(सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता का अकादमिक आलोचनात्मक अध्ययन)
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की प्रसिद्ध कविता ‘वह तोड़ती पत्थर’ हिंदी कविता में सामाजिक यथार्थ, श्रमशील स्त्री और मानवीय गरिमा की सशक्त अभिव्यक्ति है। यह कविता छायावाद के सौंदर्यबोध से निकलकर यथार्थवादी चेतना की ओर अग्रसर होती दिखाई देती है। इलाहाबाद (प्रयाग) के मार्ग पर पत्थर तोड़ती एक स्त्री का दृश्य कवि के लिए केवल दृश्य नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय, वर्गभेद और श्रम के शोषण का प्रतीक बन जाता है।
- विषयवस्तु और सामाजिक संदर्भ - कविता का केंद्र एक श्रमिक स्त्री है, जो भीषण गर्मी में पत्थर तोड़ रही है। कवि विशेष रूप से रेखांकित करता है कि उसके लिए “कोई न छायादार पेड़” नहीं है। यह पंक्ति भारतीय समाज में श्रमिक वर्ग की असुरक्षा और वंचना को स्पष्ट करती है। स्त्री का श्रम सभ्यता की नींव है, किंतु वही सभ्यता उसे आश्रय तक नहीं देती। यह विरोधाभास कविता का मूल सामाजिक तनाव है।
- स्त्री-छवि का पुनर्निर्माण - परंपरागत हिंदी कविता में स्त्री प्रायः सौंदर्य, प्रेम या करुणा की मूर्ति रही है। निराला इस रूढ़ छवि को तोड़ते हैं। यहाँ स्त्री न तो दया की पात्र है, न सौंदर्य की वस्तु, बल्कि संघर्षशील श्रमिक है। “गुर हथौड़ा हाथ” जैसी पंक्तियाँ उसे श्रम की प्रतीकात्मक शक्ति प्रदान करती हैं। उसकी देह सौंदर्य नहीं, कर्म का उपकरण है। इस प्रकार कविता स्त्री को सामाजिक क्रियाशीलता के केंद्र में प्रतिष्ठित करती है।
- प्रकृति-चित्रण और प्रतीकात्मकता - छायावादी कवि होते हुए भी निराला यहाँ प्रकृति को सौंदर्य का साधन नहीं, बल्कि कठोर यथार्थ का साक्षी बनाते हैं। धूप, गर्मी, जलती धरती—ये सभी प्रकृति-तत्व श्रमिक जीवन की कठोरता को तीव्र करते हैं। धूप यहाँ जीवनदायिनी नहीं, दाहक शक्ति है। पत्थर केवल भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि सामाजिक कठोरता और जड़ता का प्रतीक बन जाता है।
- दृष्टि और संवेदना का द्वंद्व - कविता में कवि का ‘देखना’ विशेष महत्व रखता है— “देखते देखा मुझे तो एक बार…” यह दृष्टि केवल नेत्रों की नहीं, संवेदना की है। समाज उस स्त्री को देखकर भी नहीं देखता, जबकि कवि की दृष्टि में उसकी चुप्पी, उसका श्रम और उसका आत्मसम्मान बोलने लगता है। यहाँ कवि की मानवीय संवेदना सामाजिक उदासीनता के विरुद्ध खड़ी होती है।
- भाषा और शिल्प - कविता की भाषा सरल, सीधी और कथात्मक है। अलंकारिक सजावट न्यूनतम है, जिससे यथार्थ की तीक्ष्णता बनी रहती है। “वह तोड़ती पत्थर” का आवर्तन (refrain) श्रम की निरंतरता और जीवन की कठोर पुनरावृत्ति को रेखांकित करता है। मुक्त छंद कविता को गद्यात्मक प्रवाह देता है, जो दृश्यात्मकता को सजीव बनाता है।
- छायावाद से यथार्थवाद की ओर - यह कविता छायावाद के आत्मकेंद्रित सौंदर्य से बाहर निकलकर सामाजिक यथार्थ की ओर बढ़ने का संकेत देती है। यहाँ ‘मैं’ गौण है और ‘वह’ (श्रमिक स्त्री) केंद्र में है। इस दृष्टि से ‘वह तोड़ती पत्थर’ को हिंदी कविता में प्रगतिशील चेतना का अग्रदूत कहा जा सकता है।
निष्कर्ष
‘वह तोड़ती पत्थर’ केवल एक दृश्य-कविता नहीं, बल्कि भारतीय समाज की संरचनात्मक असमानताओं पर गंभीर टिप्पणी है। निराला ने श्रमशील स्त्री को कविता का नायक बनाकर साहित्य को अभिजात्य सीमाओं से बाहर निकाला। यह कविता आज भी श्रम, स्त्री और मानवीय गरिमा के प्रश्नों पर उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी अपने समय में थी।
- Binoy.M.B,
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