बिरादरी बाहर कहानी का सारांश | राजेन्द्र यादव

SHARE:

बिरादरी बाहर कहानी का सारांश राजेन्द्र यादव बदलती सामाजिक परिस्थितियाँ नई बिरादरियाँ (नए सामाजिक समूह या मूल्य) पैदा करती हैं। पुरानी पीढ़ी और उसके

बिरादरी बाहर कहानी का सारांश | राजेन्द्र यादव

राजेन्द्र यादव की "बिरादरी बाहर" कहानी सामाजिक परिवर्तन, जाति व्यवस्था और पीढ़ीगत संघर्ष पर आधारित है।परिवेश बदलने के साथ-साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं,सामाजिक दशाओं में परिवर्तन होता है और पुराने मूल्य विस्थापित होते हैं, नये मूल्यों की स्थापना होती है। राजेन्द्र यादव की कहानी 'बिरादरी बाहर' इसी बदलाव को रेखांकित करने वाली सशक्त कहानी है। इस कहानी के प्रमुख पात्र पारस बाबू हैं, जो परम्परागत मूल्यों और रूढ़ियों को छोड़ नहीं पा रहे हैं। मालती उनकी पुत्री है और अन्तर्जातीय विवाह करना चाहती है। लेकिन पारस बाबू इसका विरोध करते हैं। परिणामतः उन्हीं का पूरा परिवार उनके विरोध में खड़ा हो जाता है। परिवार के सभी सदस्य उनके प्रति उपेक्षा भाव रखते हैं।

बिरादरी बाहर कहानी का सारांश | राजेन्द्र यादव
पारस बाबू जब घूम-टहलकर आते हैं और बेंत की मूठ से कुंडी को तीन बार खटखटाते हैं तब जाकर दरवाजा खुलता है। ऐसा इसलिए होता है कि परिवार के सभी सदस्य अपने में मग्न हैं। सब ऊपर बैठकर ताश खेल रहे हैं। पारस बाबू को अपनी उपेक्षा कष्ट देती है। इसलिए चंदा को डाटते हैं। ऊपर बैठे लोग खूब जोर-जोर से बातें कर रहे हैं। इसमें मालती की भी आवाज है। मालती ने पारस बाबू के विरोध के बावजूद गैर जाति के लड़के से विवाह रचा लिया है। 

आज वह भी उपस्थित है। पारस बाबू अपनी उपेक्षा से क्षुब्ध हैं। घर का वातावरण उल्लासमय है। बहुत देर प्रतीक्षा करने के बाद चंदा खाना ले आयी। उसमें दो पूड़ियाँ और सब्जी है, नमक और अचार गायब है। पूड़ी खा चुकने के बाद भी कोई पूछता नहीं है कि और लेंगे कि नहीं। घर वालों के इस अशिष्ट व्यवहार पर पारस बाबू कुढ़ते रहते हैं। लोक लाज की चिन्ता उन्हें बहुत सताती है। मालती को देखते हैं तो उनका क्रोध भड़क उठता है, बड़बड़ाते रहते हैं। पेशकार की परिस्थितियों से अपनी तुलना करते हैं तो मन और खिन्न हो उठता है, क्योंकि पेशकार अपनी परिस्थितियों से समझौता कर लेते हैं किन्तु पारस बाबू ऐसा नहीं कर पाते हैं। पत्नी भी इनके विरोध में है। 

कुल मिलाकर पारस बाबू परिवार में अकेले पड़ गये हैं जिसके कारण उनका स्वभाव उग्र हो गया है। इसी उग्रता के चलते एक दिन दिल का दौरा भी पड़ जाता है। निष्कर्षतः कह सकते हैं कि प्रस्तुत कहानी में सर्जक-मनीषी राजेन्द्र यादव ने समाज में व्याप्त एक बड़ी समस्या का चित्रण किया है।व्यक्ति, परिवार और समाज किस प्रकार एक छोटी-सी घटना से प्रभावित होता है, इसी का यथार्थ बिम्बांकन यहाँ प्रस्तुत है।

कहानी के माध्यम से राजेन्द्र यादव यह दिखाते हैं कि बदलती सामाजिक परिस्थितियाँ नई बिरादरियाँ (नए सामाजिक समूह या मूल्य) पैदा करती हैं। पुरानी पीढ़ी और उसके मूल्य धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाते हैं, और वे "बिरादरी बाहर" हो जाते हैं। यह न केवल जाति के ढाँचे की आलोचना है, बल्कि पुरानी और नई पीढ़ी के बीच के गहरे संघर्ष, पारिवारिक विघटन और समाज में आ रहे परिवर्तनों का भी जीवंत चित्रण है।

यह कहानी नई पीढ़ी की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत चुनाव को सकारात्मक रूप से देखते हुए भी पुरानी पीढ़ी की असहायता और छटपटाहट को संवेदनशीलता से उकेरती है।

COMMENTS

Leave a Reply

You may also like this -

Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका