बिरादरी बाहर कहानी की तात्विक समीक्षा | राजेन्द्र यादव

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बिरादरी बाहर कहानी की तात्विक समीक्षा राजेन्द्र यादव पारस बाबू की लड़की ने विजातीय विवाह किया था। दो साल हो गये। पारस बाबू ने पुत्री को देखा भी नहीं।

बिरादरी बाहर कहानी की तात्विक समीक्षा | राजेन्द्र यादव


राजेन्द्र यादव नई कहानी आंदोलन के प्रमुख स्तंभ थे, जिन्होंने स्वतंत्र भारत के बदलते मध्यवर्गीय जीवन, पारिवारिक विघटन, सामाजिक मूल्यों के टकराव और आधुनिकता के संकट को बेबाकी से उकेरा। "बिरादरी बाहर" (उनके संग्रहों में संकलित एक महत्वपूर्ण कहानी) उनकी इसी दृष्टि का प्रतिनिधि नमूना है। यह कहानी मुख्य रूप से परंपरा बनाम आधुनिकता, पुरानी पीढ़ी की असुरक्षा और नई पीढ़ी की स्वतंत्रता के द्वंद्व को केंद्र में रखकर सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को दर्शाती है।

प्रस्तुत कहानी, परम्परा और वर्तमान यथार्थ के मध्य के संघर्ष की कहानी है। पिता परम्परागत मोह में डूबा, समस्त परिवार से अलग-थलग पड़ गया है, यही उसकी 'बिरादरी बाहर' की स्थिति है। पेशकार साहब की भी यही स्थिति है, वे भी दिनभर टाल पर ही पड़े रहते हैं। पारस बाबू की पुत्री ने बिरादरी बाहर, अपने से निम्न जाति से शादी कर ली है। उन्हें यह विजातीय सम्बन्ध किसी रूप में स्वीकार नहीं हो सका और कहाँ पहले परम्परागत मूल्यों को तोड़ने वाला बिरादरी बाहर होता था, वहीं आज परम्परागत मूल्यों का आदर करने वाला 'बिरादरी बाहर' हो गया है। प्रस्तुत कहानी की समीक्षा इस प्रकार की जा सकती है -

कथा संगठन

पारस बाबू की लड़की ने विजातीय विवाह किया था। दो साल हो गये। पारस बाबू ने पुत्री को देखा भी नहीं। उनके दो पुत्र, पुत्र वधुएँ, पत्नी और दो पुत्रियाँ हैं। पत्नी की आँख का मोतियाबिन्द का आपरेशन होने वाला है। उनकी जिद्द थी कि ऑपरेशन से पूर्व एक बार सभी को देख लिया जाये, फिर पता नहीं रोशनी लौटी या नहीं। अतः पारस बाबू की सभी सन्तानें इकट्ठी हो गयी थीं।
 
बिरादरी बाहर कहानी की तात्विक समीक्षा | राजेन्द्र यादव
कथा का प्रारम्भ
, स्वाभाविक, आकर्षक और प्रभावी है—बेंत की मूठ से कुण्डी को तीन बार खटखटाया, तब जाकर अन्दर बत्ती जली और चन्दा ने आकर दरवाजा खोला। भिचे गले से पारस बाबू ने डाँटा–“सबके सब बहरे हो गये हैं। सुनायी नहीं देता।” डर था कहीं आवाज ऊपर न पहुँच जाये ।घर के सभी सदस्य ऊपर ताश खेल रहे थे। थोड़ी देर पश्चात् उनकी छोटी पुत्री चन्दा खाना दे जाती है, जिसमें दो पूड़ियाँ थीं। पारस बाबू के दो पुत्र संजय और विजय तथा दो बेटियाँ मालती और चन्दा हैं। मालती ने ही लव मैरिज की है, जिसमें पारस बाबू को छोड़कर सभी की रजामन्दी हो गयी थी ।

कथा का विकास, पूर्वदीप्ति शैली में होता है। खाना खाते वक्त और उसके बाद उन्हें अपने घर वालों का व्यवहार, पेशकार साहब की कुछ बातें याद हो आती हैं। उन्होंने मालती के विवाह में कितना ऊधम मचाया था। उन्हें हार्ट अटैक भी पड़ गया था। सारी घटनाएँ - किस प्रकार पुत्र ने पिता को समझाया था। संजय का पत्र आया था— लड़के को हम सब बहुत अच्छी तरह जानते हैं, विजय का तो क्लासफेलो ही रहा है। शादी रजिस्ट्री से कराने का इरादा है, लेकिन बाद में अच्छी तरह शानदार पार्टी कर देंगे।” पारस बाबू ने तूफान उठा दिया था। वे टूट चुके हैं, घुटन में जी रहे हैं, उन्होंने पूरी शक्ति से उस विवाह को रोकना चाहा पर सफल न हो सके।

पारस बाबू की बातों पर कोई ध्यान नहीं देता। घर में उल्लासपूर्ण वातावरण है। चन्दा भी खाने की थाली में अचार तक नहीं लायी। वे मन-ही-मन कुढ़ते हैं कि अब तो परिवार में औपचारिक शिष्टाचार भी समाप्त हो गया है। पूड़ियाँ समाप्त हो गयीं और वे इन्तजार करते रहे । ऊपर खाना परोसे जाने की आवाजें आ रही थीं। बहुत इन्तजार करके वे चन्दा को तीखी आवाज लगाते हैं तब वह भागी आती है। वे अपने को दुनिया की नजरों में गिरा हुआ मानते हैं। अगर बेटे ने ये सब किया होता तो शायद उन्हें न खलता । पेशकार के लड़के ने भी तो विदेशी लड़की से शादी की है, वह पेशकार को डाँट भी देती है, पर उसने तो परिस्थिति से समझौता कर लिया है। आज उन्हें इन स्थितियों में अपना व्यक्तित्व तिरस्कृत-सा लगता है। चन्दा जब पूड़ियाँ लेकर आती है तो गुर्राकर कहते हैं- “किसी को ध्यान नहीं है कि यहाँ भी कोई बैठा है-सबके कान फूट गये हैं।” चन्दा ने डरते-सहमते दूर से ही हाथ बढ़ाकर चार पूड़ियाँ थाली में डालीं और ऐसी भागी मानो कोई उसका पीछा कर रहा हो। ऊपर मिठाइयों के लिए आग्रह हो रहा था और पारस बाबू की थाली में अभी सब्जियों का इन्तजार था।

कथानक में दो पीढ़ियों का वैचारिक संघर्ष ध्वनित है। फलतः घटनाएँ वर्णित हैं, कथित हैं। प्रमुख घटना है— मालती का अन्तर्जातीय विवाह, जिसने पारस बाबू को तोड़ दिया और वे इस घटना से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं कर पाये, जिसने उन्हें 'बिरादरी बाहर' कर दिया। यह स्थिति और भी त्रासक है जब परिवार के लोग उनके खाने का भी ध्यान नहीं रखते। यह समस्त जीवन यथार्थ है।

राजेन्द्र यादव 'नई कहानी' के सशक्त हस्ताक्षर हैं और पीढ़ी अन्तर (Generation Gap) को व्यक्त करना नई कहानी की मानसिकता है क्योंकि यह कहानी रूढ़ि, परम्पराओं, अन्धविश्वासों की विरोधी है। यहाँ यह भी ध्वनित है कि पीढ़ी की अपनी बिरादरी बन जाती है, दूसरी पीढ़ी को उससे समझौता करना आवश्यक है वरना वह बिरादरी बाहर कर दी जाती है।कथा सुव्यवस्थित, सुगठित और मार्मिक है, भले ही घटनाएँ पूर्व दीप्ति पद्धति से व्यंजित हैं पर प्रत्यक्ष घटनाओं के साथ ऐसी खप जाती हैं कि सारा क्रिया-व्यापार एक श्रृंखलाबद्ध मालूम होता है। कथा अपनी स्वाभाविक गति से आगे बढ़ती जाती है और हर पड़ाव पर एक नया रूप ले लेती है-सब लोग उनके कमरे के सामने से निकल रहे थे। कुछ ठिठककर घुसर-पुसर हुई। तब चूड़ियों की हल्की खनखनाहट के साथ ही एकदम पास ही उन्हें चौंकाता स्वर सुनायी दिया- “बाबूजी नमस्ते।" मालती का स्वर सुनकर, उमंग कद, उसे छाती से लगा लेने के आवेग को वे अपने आपको कैसे रोके रहे, यह वही जानते हैं । कहानी का अन्त भी प्रभावी और मार्मिक है।
 

पात्र एवं चरित्रांकन

प्रस्तुत कहानी में मुख्य पात्र तो पारस बाबू ही हैं। उनके मित्र पेशकार साहब की भी थोड़ी-सी भूमिका है। पारस बाबू के परिवार में उनके दो पुत्र अजय, विजय, पुत्र वधुएँ, दो पुत्रियाँ— शीला और चन्दा हैं । शीला ने विजातीय लड़के से विवाह किया है—यही पूरी त्रासदी का आधार है।
 
पारस बाबू परम्परागत मोह, मूल्यों, रूढ़ियों से ही चिपके हैं। उन्हें अपनी बेटी का अन्तर्जातीय विवाह कदापि स्वीकार नहीं है, वे यह जानते हैं कि अब समाज में मुँह दिखाने के लायक वे नहीं रह गये हैं। वे तो आत्माहत्या करने तक की सोचते हैं। इसी समय उन पर यह भी प्रतिक्रिया होती है कि कोई किसी का नहीं है, न किसी की प्रतिष्ठा की चिन्ता है, न माँ-बाप की, लड़के अपनी बहुओं-बच्चों में मस्त हैं, लड़कियाँ अपने घर को देखती हैं—विपरीत चिन्तन से जनित क्षोभ, आत्म-संघर्ष, उन्हें अपने ही घर में पराया और बिरादरी बाहर कर देता है और उनमें क्रोध, एकाकीपन, खींझ, बड़बड़ाहट की स्थितियाँ बढ़ती चली जाती हैं।
मालती, संजय, विजय नयी पीढ़ी के पौधे हैं, वे दोनों ही आधुनिकता की स्वच्छ वायु में साँस लेना चाहते हैं। संजय और विजय मालती की शादी बड़े धूमधाम से करते हैं। वे पारस बाबू को भी हर स्थिति में मनाने का प्रयत्न करते हैं क्योंकि वे सामंजस्य और सौहार्द्र बनाये रखना चाहते हैं।
 
समस्त पात्रों को तीन श्रेणी में रखा जा सकता है-परम्परागत रूढ़िवादी-पारस बाबू इसी श्रेणी में आते हैं। उदार आधुनिकतावादी -मालती, विजय, और संजय। तीसरी श्रेणी उन पात्रों की है जो समझौतावादी हैं- पारस बाबू की पत्नी और पेशकार साहब इसी श्रेणी में आते हैं। आत्म-संघर्ष चरित्रांकन का आधार है। टूटते सम्बन्धों के आलोक में अजनबी, अपरिचित-सा जीवन जी रहे पारस बाबू अन्तर्द्वन्द्वों में ही उलझे हैं उन्होंने अपने सोच के कारण ही परिस्थितियों का ताना-बाना अपने चारों तरफ बुन लिया है, जिसने उनके जीवन में घुटन, पीड़ा खड़ी कर दी है। उन्होंने वैयक्तिक प्रतिबद्धता को महत्व दिया, फलतः बिरादरी ने उन्हें बाहर कर दिया । उनका अन्तर्द्वन्द्व ही आज उन्हें मथे डाल रहा है ।

अन्तर्द्वन्द्व

नयी कहानी में अन्तर्द्वन्द्व, संघर्ष गहरा होता है, वह कभी वैयक्तिक निष्ठा के कारण, तो कभी अभिरुचियों की भिन्नता के कारण, कभी परिस्थिति जनित त्रासदियों के कारण, तो कभी अकारण भी होता है । प्रस्तुत कहानी आद्यान्त आत्म-संघर्ष की ही कहानी है। राजेन्द्र यादव ने स्वयं स्वीकार किया है—'बिरादरी बाहर' आज के समय में तीव्र रूप धारण करने वाली, नयी-पुरानी पीढ़ी के शाश्वत द्वन्द्व की कहानी है। समय और सामाजिक स्थितियाँ सदैव नयी बिरादरियाँ बना देती हैं। जिनके सन्दर्भ में पुराने वर्ग और जीवन-मूल्य परिवर्तित हो जाते हैं। बिना सीधे संघर्ष में आये हुए भी यह वर्ग बिरादरी बाहर होता चला जाता है, इस वास्तविकता की अनुभूति क्रमशः अस्तित्व की व्यर्थता की अनुभूति का पर्याय हो जाती है।
 
इस प्रकार जो बिरादरी बाहर हो जाता है, वह एकाकीपन की पीड़ा झेलता है, अन्तर्द्वन्द्व में जीता है, जो पेशकार की भाँति समझौता कर लेता है, वह आसानी से जी लेता है।
 

कथोपकथन

प्रस्तुत कहानी के संवाद (भले ही कम हों) प्रभावी, व्यंजक, सरल, संक्षिप्त, स्वाभाविक, पात्रानुकूल, वातावरण और परिस्थिति के अनुरूप ही हैं। उनमें पात्रों की मनःस्थिति व्यंजित करने की गहरी ताकत है तो कथा विकास की भी पूरी सामर्थ्य है ।

तत्कालीन वातावरण की झलक प्रस्तुत करने वाला संवाद- 
डेस्क पर फैले रजिस्टर में लिखना छोड़कर पेशकार साहब बोले-“आइए, आइए, पारस बाबू, बैठिए । कहिए, डॉक्टर ने क्या बताया, ऑपरेशन हो गया ?” 
“कहाँ पेशकार साहब, ऑपरेशन तो परसों होगा। कल जाकर दाखिल करा देना है। बड़ी परेशानी है, तुम जानो, पैसा-पैसा-पैसा, प्रत्येक आदमी पैसा चाहता है। डॉक्टर से सारी बातें तय हो गयी हैं, सब बात 
— मगर नर्स और कम्पाउण्डर लोग लगे हैं कि उन्हें भी कुछ अलग से मिल जाये। अन्धेर पहले भी था, लेकिन इतना तो हमारे-तुम्हारे जमाने में नहीं था।” 
“अन्धेर की क्या बात है पारस बाबू ? अरे, जिन्दगी-मौत का सवाल होगा, आपको होगा, वे लोग अपना हक क्यों छोड़ें ?”, 
प्रस्तुत कहानी के संवादों में स्वगत भाषण का प्रयोग करके पात्रों की मनोवृत्ति का चित्रण अत्यन्त सजीवता से किया गया है—“अहा रे-मेरी बेटी, अहा रे मेरा बेटा, खूब नाम चमकाया है पुरखों का ।” 
साथ ही उन संवादों में नाटकीयता का भी पुट है। इस तरह स्वगत कथन और संवाद योजना पर्याप्त प्रभावी है, सार्थक और कथा में पूरी तरह खप जाने वाली है ।
 

शीर्षक

कहानी का शीर्षक संक्षिप्त तो है ही, साथ ही जिज्ञासावर्द्धक भी है, कौन बिरादरी बाहर, क्योंकि बिरादरी बाहर - यह जिज्ञासा जगाकर शीर्षक पूरी कथा पढ़ने को बाध्य कर देता है। शीर्षक व्यंजक और कथा संगठन से मेल खाता भी है। आज की परिस्थितियों में पीढियाँ अपनी-अपनी बिरादरी बना लेती हैं, उनका सोच-चिन्तन-व्यवहार, दूसरी पीढ़ी से सर्वथा अलग होता है। ऐसी स्थिति में जो पात्र, चाहे वह परिवार का कितना ही सम्माननीय सदस्य हो-यदि दूसरी बिरादरी से तालमेल नहीं बैठा पाता तो वह बिरादरी बाहर हो जाता है और एकाकी, घुटनभरी, उपेक्षा भरी जिन्दगी जीता है। पारसनाथ की भी यही स्थिति है- मालती के प्रेम विवाह से वे समझौता नहीं कर सके। घर के समस्त सदस्य खुश हैं, मस्त हैं, हँस-खेल रहे हैं, उनकी एक बिरादरी बन गयी है और पारस बाबू बिरादरी से बाहर कर दिये गये हैं, या स्वयं हो गये हैं। यही है, शीर्षक की व्यंजकता और सार्थकता ।
 

वातावरण

प्रस्तुत कहानी, यथार्थ से जुड़ी कहानी है। फलतः वातावरण उसके प्रत्येक अंग से जुड़ा हुआ है। उसको उभारने की पृथक् से कोई आवश्यकता कथाकार को महसूस नहीं होती। कहानी परिस्थितियों पर आधारित हैं, परिस्थितियों ने ही परिवेश को जन्म दिया है। परिवेश निर्माणार्थ मानसिक स्थितियों का सहारा लिया गया है और मानसिक परिवेश का चित्रण अधिक सजगता एवं जागरुकता के साथ हुआ है । प्रस्तुत पंक्तियाँ वातावरण का एक संजीव चित्र उपस्थित करती हैं- “वे तनिक खम्भे की आड़ में खड़े होकर ऊपर देखने लगे--दलान में आड़ी करके दो चारपाइयाँ डाली हुई हैं, बीच में मेज है, उसी पर ताश पड़ते हैं । हाथ उठते-गिरते दीखते हैं। टट्टर की ओर संजय और विजय आमने-सामने बैठे हैं। संजय के बाद हरे ब्लाउज वाली बाँह है, मालती ही होगी। नहीं, शायद गौरी है। विजय के बाद कुर्ते का एक हिस्सा है— उसी नये आदमी की बाँह । ठीक सामने आड़ करके चन्दा इस तरह खड़ी है जैसे जाते-जाते रुक गयी हो। फ्रॉक वाली पीठ ही दिखायी देती है। इसके अलावा सब अनुमान करना पड़ता है।' 

भाषा शैली

नयी कहानी ने आम भाषा को अपनाया, पर उसकी अभिव्यंजना शक्ति को कम नहीं होने दिया, यह कार्य शब्द चयन, वाक्य गठन, व्यंजना, लक्षणा, मुहावरों के माध्यम से किया। प्रस्तुत कहानी की भाषा दैनिक प्रयोग की व्यावहारिक भाषा है, जिसका शब्द चयन विलक्षण है जिसमें सरलता, प्रवाह भी है, सुघड़ता भी है, तत्सम शब्दावली के प्रयोग के साथ प्रचलित विदेशी शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। 
(i) उर्दू शब्दावली-खुशबू, बाजी, गुसलखाने, अन्दाज, पर्दा, अव्वल, दरगुजर, सलीका आदि । (ii) अंग्रेजी शब्दावली - यथास्थान इन शब्दों का भी पर्याप्त प्रयोग हुआ है-नर्स, डेस्क, डॉक्टर, ऑपरेशन, रजिस्ट्रार, कम्पाउण्डर, गारण्टी, लव-मैरिज, क्लासफेलो आदि । 
(iii) मुहावरे - मुहावरे भाषा की अभिव्यंजना शक्ति की वृद्धि में पर्याप्त सहायक होते हैं। इस कहानी में भी पर्याप्त मात्रा में ऐसी स्थिति है। यथा-जिन्दगी-मौत का सवाल होना, नींद हराम करना, अकल पर पत्थर पड़ना, गाँठ बाँधना, मुँह पर कालिख लगाना, खून का घूँट पीना आदि । 
(iv) तत्सम शब्दावली - आचारहीनता, वाचनालय, आत्मीयता, एकाग्र, प्रतिक्रिया, भर्त्सना आदि । 
(v) तद्भव - पाला-पोसा, नाती-पोते, फुलवारी, अनजाने, साँझ आदि । 
(vi) देशज-माँडे, चौखट, आड़, कुंडी, बत्ती, चिनाई, झोंटा । 
(vii) काव्यात्मकता—प्रस्तुत कहानी की भाषा में कहीं-कहीं काव्यात्मकता के भी दर्शन होते हैं- (क) 'अँधेरी बैठक में बैठे-बैठे उन्हें लगा, मानो पेशकार की टाल की कुल्ट्राडियाँ अभी तक उनके दिमाग में बज रही हैं।' 
(ख) 'जिद्दी बच्चे की भाँति चुपचाप सिर झुकाये सुनते रहे ।' 
(ग) 'आज तो जैसे इसके पंख निकल आये हों ।'

कहानी मिश्रित शैली में हैं, जिसमें वर्णनात्मक, विवरणात्मक, नाटकीय कथन पद्धति, संलापात्मक कथन पद्धति, पत्र शैली, व्यंग्यात्मक शिल्प आदि का प्रयोग हुआ है। कुल मिलाकर प्रस्तुत कहानी का शिल्प परिष्कृत, परिमार्जित एवं प्रभावी है, जिसमें उत्तम शिल्प की सभी विशेषताएँ समाहित हैं।
 

उद्देश्य

प्रस्तुत कहानी, एक स्वाभाविक और सहज सामाजिक स्थिति को व्यंजित करती है, जिसे आज की भाषा में घर-घर की कहानी भी कहा जा सकता है। बूढ़ा व्यक्ति घर में फालतू व्यक्ति माना जाता है, उसकी तरफ वह ध्यान नहीं जाता, जो उसी व्यक्ति के प्रति उस समय केन्द्रित था जब वह परिवार का सक्रिय सदस्य था। दूसरे परम्परागत रूढ़ियों को ढोने वाले व्यक्ति, परिवार में ही अजनबी बनकर हाशिये पर पड़ जाते हैं, उसको मानसिक क्लेश भी सहना पड़ता है। अतः यह कहानी दोनों पीढ़ियों को दिशा-निर्देश करती दिखायी दे रही है। परम्परा का अधिक मोह त्यागकर बुजुर्गों को बाकी घरवालों को अपना जीवन जीने देना चाहिए और घरवालों को भी बुजुर्गों की निन्दा नहीं करनी चाहिए। तभी परिवार में सुख-शान्ति निवास कर सकती है।
 

उपसंहार

संक्षेप में कहा जा सकता है कि कथानक की मार्मिकता, नाटकीय प्रारम्भ, शीर्षक की जिज्ञासावर्द्धक स्थिति, यथार्थ चित्रण, प्रभावी चरित्रांकन, मार्मिक संवाद योजना, मनोविश्लेषण प्रधानता, उत्तम शिल्प आदि कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जो इस कहानी को उत्तम कहानी की श्रेणी में समाहित कर देती हैं।

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