महाकवि की तर्जनी निबंध की समीक्षा कुबेरनाथ राय महाकवि की तर्जनी एक श्रेष्ठ एवं सफल ललित निबन्ध है ललित निबन्ध अपने विषय में गद्य-काव्य में निकट पहुँच
महाकवि की तर्जनी निबंध की समीक्षा | कुबेरनाथ राय
महाकवि की तर्जनी एक श्रेष्ठ एवं सफल ललित निबन्ध है। ललित निबन्ध अपने विषय में गद्य-काव्य में निकट पहुँच जाता है। भावात्मक अभिव्यक्ति और व्यक्तिगत अनुभूति की अभिव्यक्ति इसके केन्द्र में रहती है।
निबन्धों का ऐसा प्रकार, जिसमें भावुकता से ओत-प्रोत किन्तु गहन अध्ययन तथा मौलिक चिन्तन से अनुस्यूत सामान्य से विषयों को भी असामान्य रूप प्रदान करते हुए प्रस्तुत किया जाए, ललित निबन्ध कहलाता है। हिन्दी में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ललित निबन्धों को प्रैढता प्रदान की। उनके कुछ प्रसिद्ध ललित निबन्ध हैं-'आम फिर बौरा गए', शिरीष के फूल 'बसन्त आ गया' 'नया वर्ष आ गया', 'मेरी जन्मभूमि', 'नाखून क्यों बढ़ते हैं', 'एक कुत्ता और एक मैना', 'अशोक के फूल' तथा 'देवदारु' इन वैयक्तिक तथा ललित निबन्धों में ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व को प्रतिपादित किया गया है।
द्विवेदी जी से प्रभावित होकर डॉ. विद्यानिवास मिश्र ने ललित निबन्ध के क्षेत्र में अपना स्थान बनाया है। इनके निबन्धों में गुलाबराय जैसा आकर्षक प्रसंग गर्भत्व है, बख्शी जी जैसा भावात्मकता का सौष्ठव है तथा द्विवेदी जी की भाँति लोक संस्कृति की अमिट छाप है। “विषय विवेचन, चिन्तन मनन, विचार- दृष्टि भाव-भंगिमा, कल्पना-प्रवणता तथा अभिव्यंजना शैली की नवीनता विलक्षणता व विदग्धता के कारण ही श्री विद्यानिवास मिश्र व्यक्ति प्रधान ललित निबन्ध-लेखकों में श्रेष्ठ स्थान के अधिकारी हैं।" "चितवन की छाँह, तुम चन्दन हम पानी, मैंने. सिल पहुँचाई” उनके प्रमुख निबन्ध हैं।
कुबेरनाथ राय अद्यतन ललित निबन्धकारों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। आपने आधुनिक दृष्टि तथा नूतन युगबोध को अपने वैयक्तिक निबन्धों में उजागर किया है। आपका 'प्रिया नीलकण्ठी' निबन्ध संग्रह अत्यन्त लोकप्रिय हुआ है। इन निबन्धों में मानवीय कल्पना के मध्य उपलब्ध रूप-रस-गन्ध स्पर्श शब्द का चरमोत्कर्ष या 'दिगन्त भूमि' विद्यमान है। इनके तीन निबन्ध-संग्रह प्रकाशित हैं-प्रिया नील कण्ठी, रस-आखेटक तथा गन्धमादन।
इनके अतिरिक्त पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने ललित निबन्ध परम्परा को अग्रसित किया और 'कुछ' तथा 'और कुछ' आदि संकलनों में अनुभूतिपूर्ण निबन्धों की रचना की। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के 'पृथ्वीपुत्र' निबन्ध संग्रह में कुछ ललित निबन्ध हैं। डॉ. शिवप्रसाद सिंह का भी इस क्षेत्र में नाम उल्लेखनीय हैं। इन ललित निबन्धों का लालित्य अद्यतन युग की नीरसता एवं अकविताजन्य क्षोभ को समाप्त करने वाला है -
महाकवि की तर्जनी निबन्ध का सारांश
प्रस्तुत ललित निबन्ध का आरम्भ सघन रात्रि की पृष्ठभूमि से होता है। यह त्रेता युग की एक जीव रात्रि है। जबकि ब्रह्मा का दिवस चल रहा है। "उन पर 'ऊर्ध्वमूलः शारवाम्र' की डाली-डाली पर हजारों फूल खिले हुए हैं। आकाश की हर एक डाल गदरा उठी है। आकाश-कुसुमों के नीचे सब कुछ स्तब्ध है। धरती शान्त है।”
रात्रि की इस यथार्थ पृष्ठभूमि से 'ललित' निबन्ध का आरम्भ अत्यन्त आकर्षक बन पड़ा है। सरस्वती और वाणी के वार्तालाप में इन्द्र, आदित्य; सोम आदि की गाथाएँ गाने के स्थान -नर-चरित्र गान करने का निर्णय होता है-
“इन्द्र, आदित्य, सोम का नाम लेते-लेते मैं अब उकता गई हूँ। इन निष्कर्मा भोगियों की अब और प्रशस्ति के गाने नहीं मैं नहीं गाऊँगी। अकेले-अकेले गाओ न सृष्टि कमल पर बैठकर।"
ब्रह्मा स्पष्ट कहते हैं-
“देखो बन्नी ! इस बार मैं एक ऐसे मुख्य की कीर्ति की गान रचना चाहता हूँ, जिसके मन की विवशता के समक्ष देवगण क्या सम्पूर्ण अन्तरिक्ष मंडल सारा का सारा नील व्योम ही छोटा पड़ जाए जिसकी धीरता के सम्मुख विशाल, कठोर हिमालय भी लज्जित हो जाए, सूर्य चन्द्र जिसकी महिमा की आरती उतारें, ऐसे मनुष्य की कीर्ति का गान करने की इच्छा हो रही है। "
ब्रह्म सरस्वती और बाणी को साथ लेकर तमसा के तट पर आ जाते हैं। ब्रह्म के शब्दों में योजना इस प्रकार है-
“कल गंगा-यमुना के मध्य जो छोटी सी तमसा नदी बहती है, उसी के तट पर दो माया चौंध उतरेंगे। उनका अंग मकसत नील होगा। कंठ सुनहला नील हरित, और आँखें महामधु जैसी पीनाम। ये क्रौंच और क्रौंची वृक्ष की शाखा पर बैठकर प्रणय क्रीड़ा करेंगे।”दूसरे दिन प्रातःकाल तमसा तट पर उदुंवर की एक शाखा पर दो क्रौंच पक्षी बैठे हैं और परस्पर चोंच से गरदन मिला रहे हैं ? कुछ दूर बैठा हुआ एक ब्राह्मण (बाल्मीकि) सावित्री जप करते हुए क्रौंच जोड़े को देख रहा है। वह मुग्ध हो रहा है। उसका जप विफल हो रहा है।
नदी के तट पर एक तगार गाध में अचानक उसकी शाखा पर एक पुष्प खिलता है। चारों ओर जिसकी सुगन्ध फैल जाती है। ब्रह्म ऋषि के कंठ में उच्चाटन उपस्थित कर देते हैं। सामने से एक व्याध आता दिखाई देता है। ब्राह्मण के कहने से वाणी और सरस्वती व्याध के मन में क्रौंच के युग्म के प्रति लोभ जागृत करती है। व्याध के बाण से क्रौंच-युग्म के पृथ्वी पर गिरते ही वाण ब्राह्मण (बाल्मीकि) के कंठ में प्रवेश कर क्रोध और करुणा विमिश्रित एक श्लोक उच्चरित करा देने का दायित्व लेती हुई सरस्वती कहती हैं-
“फिर कुछ देर बाद तुम भी ठाट-बाट से अपने हंस मान पर सवार होकर जाना, चाहे प्रत्यक्ष अथवा उसके ध्यान लोक में अवतरण करके और मानो में जो कुछ भाव विभाव या ज्वार-प्रलाभ हो। जो बुद्धि कल रात से विकल किए हैं। जैसे बताकर अपना माल हल्का कर लेता।”
सरस्वती कहती हैं कि मैं उसे पर्याप्त पूँजी दूँगी। जिससे तुम्हारी सुनाई बात को वह काव्य में परिवर्तित कर सके। साथ ही ब्रह्मा कहती हैं- “तुम्हारे इस नित्य किशोर और भुवन मोहन रूप से काम न चलेगा। चेहरे पर बुढ़ापे का रंग मल लेना अन्यथा तुम्हें कोई विधवा के रूप में पहचानेगां ही नहीं है कौन ! यह तुम्हारा ही तो भू-पतित अंश है। प्रत्येक कवि और अब शाप-भ्रष्ट ब्रह्मा होगा।' यह ब्राह्मण व्याध के बाण से पृथ्वी पर पड़े क्रौंच को देखकर करुणा और अमर्ष मिश्रित वाणी प्रथम काव्य-छन्द अनुष्ठय के रूप में वाणी प्रस्फुटित हो पड़ती है- “माँ निषाद प्रतिष्ठाम " "प्रेम भरी अति चाह सों, मदमाती सानन्द । क्रौंचन की जोड़ी हुती निहरत अति सानन्द तिनमें से हति एक को कियो महा अपराध, युग-तक कबहुँ न मिलै तोहि बड़ाई व्याध ॥”
निषाद के अन्दर नियति के कर्ता-धर्ता ब्रह्म ब्राह्मण के चरणों में क्षमा याचना करते हैं और अपने को इतिहास कहते हैं ।
“पर वह ब्राह्मण भी बड़ा दबंग निकला। उसकी तर्जनी उसी प्रकार उठी रही और निर्भय होकर बोला अथवा यों कहिए कि उसके भीतर की सरस्वती बोली- “तो तुम भी सुन लो-यदि तुम इतिहास हो, तो मैं हूँ काव्य, हम और तुम दोनों सतीर्थ हैं। पर जब तुम विवेक भ्रष्ट होते हो । राज्यलिप्सा के नाम पर हजार-हजार मुंडपात करवाते हो । अर्थलोभ के कारण धरित्री का सारा धृत और मधु चाबियों से ऐंठकर ताले में बन्द कर देते हो। न शुद्ध काम-लालसा की सर्ध्यता और संस्कृति कहकर चलाने लगते हो तो मेरी तर्जनी बिना उठे हुए मानती नहीं । मेरा कंठ एक क्रुद्ध श्लोक बोलने को विवश हो जाता है।” कवि सदैव तर्जनी उठाकर समाज की वर्जनाओं और कुंठाओं का विरोध करता आया है और वह नया छान्दस बना रहा।
समसामयिकता
कुबेरनाथ राय ने त्रेता के इस पौराणिक प्रसंग को आधुनिक सन्दर्भ में प्रस्तुत किया है। “मैंने देखा है कि इतिहांस अपने सम्पूर्ण अर्थशास्त्र, राजनीति, कूटनीति के बावजूद राष्ट्र स्वार्थ में लिपटकर पुनः छोटा हो गया, पुनः उसके चेहरे का रंग काला हो गया और उधर आसमान के नील से उत्तर काल की सरस्वती का वाहन नीचे उतरा। वही क्रौंच वैसी ही देह, वही डैने वही चंचु ।” परन्तु इस बार रंग गोया मृत्यु श्वेत था, शुद्ध मृत्यु की नदी में स्नान करके ही उसका काम-लोभी मरकत वर्ण धुल गया और वह निश्चल श्वेत बन गया हो।'
मूल संवेदना
यह निबंध केवल रामकथा की व्याख्या नहीं करता, बल्कि साहित्य-सृजन की मूल प्रक्रिया को उजागर करता है। कवि का दुख देखकर चुप न रहना, उस दुख को शब्दों में उतारना, उसे सार्वजनिक बनाना—यही महाकवि की तर्जनी है। राय जी की भाषा संस्कृतनिष्ठ है, वाक्य लंबे और लयबद्ध हैं, उपमाएँ और प्रतीक इतने सहज हैं कि पढ़ते समय लगता है मानो कोई प्राचीन ऋषि आधुनिक हिंदी में अपनी बात कह रहा हो। भावों की गहराई के साथ सूक्ष्म व्यंग्य और हास्य भी झलकता है, जो निबंध को रसपूर्ण बनाता है।यह रचना हिंदी में रामकथा को धार्मिक सीमा से बाहर निकालकर साहित्यिक और दार्शनिक स्तर पर स्थापित करती है। वाल्मीकि को आदि कवि मानने का आधार यही करुणा-जनित छंद है, जो अन्याय के विरुद्ध उठी आवाज़ का प्रतीक बन जाता है। आज के संदर्भ में भी यह निबंध प्रासंगिक है—जब समाज में दुख और अन्याय देखकर साहित्यकार चुप रहता है तो वह महाकवि नहीं बन पाता। तर्जनी उठानी पड़ती है, चाहे वह श्राप के रूप में ही क्यों न निकले।कुबेरनाथ राय की यह कृति ललित निबंध की पराकाष्ठा है। इसमें ज्ञान, भावना और कला का ऐसा समन्वय है कि पढ़ने वाला न केवल विचार से समृद्ध होता है, बल्कि भाव-विभोर भी हो उठता है। यह निबंध हिंदी साहित्य की अमर धरोहर है, जो हर सच्चे लेखक को याद दिलाता है कि साहित्य की जड़ करुणा में है और उसकी शक्ति तर्जनी में।
निष्कर्ष
लेखक अपने को बीसवीं शती का सामान्य मृदंगवाद्य कहता है और अपने नीरस गद्य-मृदंग को लेकर काल नदी में स्नान करके हजार वर्ष पुराने घाट पर पहुँच गया है।


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