आकाशदीप कहानी की तात्विक समीक्षा जयशंकर प्रसाद प्रेम, प्रतिशोध और कर्तव्य के बीच चलने वाले मानवीय अंतर्द्वंद्व का सूक्ष्म चित्रण करती है चम्पा बुद्ध
आकाशदीप कहानी की तात्विक समीक्षा | जयशंकर प्रसाद
जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित 'आकाशदीप' कहानी हिंदी साहित्य की एक कालजयी और भावपूर्ण रचना है, जो प्रेम, प्रतिशोध और कर्तव्य के बीच चलने वाले मानवीय अंतर्द्वंद्व का सूक्ष्म चित्रण करती है। यह कहानी केवल एक रोमांचक समुद्री यात्रा की कथा मात्र नहीं है, बल्कि यह पात्रों के मनोविज्ञानी विश्लेषण और उनकी वैचारिक उलझनों की गहराई तक ले जाती है। कहानी का आरंभ समुद्र के अशांत परिवेश में दो बंदियों—चंपा और बुद्धगुप्त—की मुक्ति के संघर्ष से होता है, जो अंततः एक नए द्वीप (चंपा द्वीप) पर पहुँचते हैं। यहाँ से कहानी प्रेम और घृणा के उस जटिल मोड़ पर मुड़ती है, जहाँ चंपा अपने पिता के कथित हत्यारे बुद्धगुप्त से प्रेम तो करने लगती है, लेकिन अपने प्रतिशोध की भावना को भी पूरी तरह त्याग नहीं पाती।
कथावस्तु
प्रस्तुत कहानी मध्यकालीन भारतीय संस्कृति और उसके प्रभाव की गौरव गाथा है। इस कथा का कथानक ऐतिहासिक होते हुए भी कल्पना के मिश्रण से मिश्रित कथानक हो गया है । इस प्रकार इस कहानी में कथानक की ऐतिहासिकता तथा कल्पना और मौलिकता के द्वारा मध्यकालीन भारत में भारत की उन्नत सामुद्रिक शक्ति और उसके बल पर भारतीयों द्वारा बसाए हुए उपनिवेशों का सुन्दर चित्रण है ।
कहानीकार ने कहानी का आरम्भ रोचक संवाद शैली के द्वारा किया है। इसको नाटकीय संलाप शैली भी कहते हैं। इस शैली का आरम्भ राधिका रमणसिंह जी ने 'कानों में कँगना' कहानी में सबसे प्रथम किया था और प्रसाद जी ने इस शैली का कलात्मकपूर्ण विकास किया है। क्रमशः कहानी स्वाभाविक रीति से स्वतः विकसित होती चली जाती है। चम्पा और बुद्धगुप्त को बन्दी जीवन से स्वतन्त्रता के जीवन की ओर अग्रसर करने में कहानीकार का कौशल प्रशंसनीय है। दो-तीन दिन की घटनाओं को भी सुन्दर आकर्षक रीति से इस प्रकार विकसित किया गया है कि पाठक कथा में तल्लीन हुआ घटना के क्रम के साथ ही साथ अग्रसर होता जाता है । पाठक की उत्सुकता अपनी मातृभूमि से दूर विदेश में चम्पा और बुद्धगुप्त के जीवन के विषय में बढ़ती ही चली जाती है। उनके विषय में पाठक के हृदय की आशंका उसकी उत्सुकता को प्रेरित करती चलती है। इस प्रकार कथानक का विकास कलात्मक रीति से अग्रसर होता जाता है।
घटनाक्रम के अनुसार पाँच वर्ष का मध्य का समय कहानी-कला में काल व्यवधान के रूप में उपस्थित होता है, क्योंकि बालि, जाबा, सुमात्रा दीपों के वाणिज्य पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करने और अधिकार जमाने के लिए बुद्धगुप्त को पर्याप्त समय लगता है। कहानीकार ने कहानी के विकासक्रम से इस सुदीर्घ काल के व्यवधान को दूर कर बड़े कौशल से घटनाओं को एक सूत्र में पिरोया है और पाठक की कल्पना को गतिशील बनाने के लिए सब कुछ उस पर ही छोड़ दिया है। अपने पिता की मृत्यु के प्रतिरोध का संकल्प लिए हुए चम्पा का हृदय जब बुद्धगुप्त की वीरता पर मुग्ध होकर उसकी ओर आकर्षित होता है तब उसके हृदय में एक अन्तर्द्वन्द्व आरम्भ हो जाता है। धीरे-धीरे चम्पा और बुद्धगुप्त के समय पर मिलन के साथ कथानक आगे चलता गया है और चम्पा एक समाज-सेविका बन जाती है।
पात्र योजना एवं चरित्र चित्रण
इस कहानी के नायक बुद्धगुप्त, नायिका चम्पा, पोतनायक मणिभद्र आदि इने-गिने पात्र ही कहानी में स्थान प्राप्त कर सके हैं।
चम्पा का चरित्र – चम्पा एक साहसपूर्ण स्त्री, सहृदय प्रेमिका, त्याग की मूर्ति-जन-सेविका और पितृ-भक्त पुत्री के रूप में कहानी में प्रकट होती है। वन्दिनी होते हुए भी जिस मुखरता और साहस में वह अपने विचार प्रकट करती है, उससे हृदय का साहस, शौर्य और प्रतिभा व्यंजित होती है। मुक्ति के प्रयास के लिए एक युवती का वार्तालाप उसके साहस का परिचायक है। चम्पा असाधारण है जिसमें भीरूता का नाम नहीं । साधारण स्त्रियाँ तो ऐसे कठिन अवसर पर रोने-धोने के सिवाय कुछ नहीं कर सकती हैं, परन्तु चम्पा की प्रतिभा, साहस और शौर्य उस आँधी और तूफान से आन्दोलित सागर की तरंगों में डगमगाती नाव पर अपनी मुक्ति का उपाय खोजती हैं। उसने अपने इन गुणों के कारण ही एक अज्ञात बन्दी को अपना सहयोगी बना लिया । नाव के दस नाविक और प्रहरियों को वह अपनी शक्ति और प्रतिभा के सामने तुच्छ समझती है।
चम्पा बन्दी के द्वारा शस्त्र माँगने पर सहसा उसे अपना शस्त्र दे देती है और उसके बाद दूसरे नाविक से उसे ले लेती है। यह उसकी कुशलता और निर्भीकता का परिचायक है। अब उनकी नाव अज्ञात दीप के तट पर पहुँचती है, तब चम्पा उस दीप के तट पर पहुँचती है।
चम्पा को अपने आत्म-गौरव और अपने सतीत्व का सबसे अधिक ध्यान रहता है। जब वह जलपोत के अध्यक्ष मणिभद्र के फन्दे में फँस जाती है और मणिभद्र उसके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर घृणित प्रस्ताव करने लगता है, तब उस चम्पा का आत्म-गौरव जाग उठता है, क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो उठती है। वह मणिभद्र को अनेक प्रकार से धिक्कारती है। इस प्रकार वह वन्दिनी होते हुए भी अपने सतीत्व को कलंकित नहीं होने देती है।
चम्पा में गुणग्राहकता का गुण है। वह बुद्धगुप्त की शूरता और वीरता का हृदय से आदर करती है। वह उसकी युद्ध-कला पर मुग्ध होती है और उसकी ओर आकर्षित होती है। यह सब होते हुए भी चम्पा को पूर्ण विश्वास है कि बुद्धगुप्त ही उसके पिता का घातक है, उसके पिता की मृत्यु का मुख्ण कारण है। अतः बुद्धगुप्त के शरीर के गठन, शूरता और साहस से उस पर मुग्ध होते हुए भी प्रतिशोध के लिए गुप्त रूप अपने पास कटार भी रखती है। उसके हृदय और मन में एक महान् अन्तर्द्वन्द्व मचा हुआ है, जिससे वह बहुत से समय तक दुविधा में पड़ी रहती है, पर अन्त में उसका हृदय विजय प्राप्त करता है। फलतः वह अपना कृपाण
अतुल जल में फेंक देती है और इसके साथ ही प्रतिशोध की भावना को भी समाप्त कर देती है। समुद्र फिर वह शुद्ध और सरल हृदय से बुद्धगुप्त की सच्ची सहयोगिनी बनने का प्रयत्न करती हैं।
चम्पा का हृदय भावुक होते हुए भी विशुद्ध प्रेम और अहिंसा के गुणों से ओत-प्रोत है। वह अपने सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार से वज्र-हृदय हत्या व्यवसायी, जलदस्यु बुद्धगुप्त के हृदय का पूर्ण परिवर्तन कर देती है। चम्पा ने पिता के मोह से उत्पन्न छल-कपट और प्रतिशोध की भावना को प्रेमाग्नि में सहर्ष आहुति दे दी। इससे प्रभावित होकर ही बुद्धगुप्त ने उस दीप का नाम चम्पा दीप रख दिया और उससे तथा उसके पिता की उस स्मृति में एक प्रकाश-गृह का निर्माण कराकर चम्पा के नाम को इतिहास में अमर कर दिया।
नारी हृदय का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण और मधुर गुण है सेवावृत्ति, जिसने नारी को दिव्य रूप प्रदान करने में सबसे अधिक सहयोग दिया है। चम्पा का यह त्यागमय जन-सेवावृत्ति परायणता का गुण अपनी चरम सीमा पर लक्षित हो रहा है। वह बुद्धगुप्त पर मुग्ध है और एक क्षण भी उसके बिना नहीं रह सकती, तब भी बुद्धगुप्त के द्वारा विवाह और स्वदेश गमन के प्रस्ताव को सुनकर अस्वीकार कर देती है। वह 'वसुधैव कुटुम्बकम' के आदर्श को मानकर आजीवन आदिवासियों की सेवा में ही लगी रहने की दृढ़ अभिलाषा प्रकट करती है। दीप निवासियों के प्रति सत्पथ प्रदर्शन और सहानुभूति की भावना में कार्य करते हुए अपने सम्पूर्ण जीवन को बिताने का आदर्श चम्पा के महान् त्याग और सेवावृत्ति का परिचायक है। अतः वह दूसरों के उद्धार के लिए अर्थात् मानवता के उद्धार के लिए अपनी जन्म-भूमि, अपना वैवाहिक सुखमय जीवन और लौकिक वैभव सहर्ष बलिदान कर देती है।
चम्पा वास्तव में कलाकार प्रसाद जी की कल्पित स्त्री पात्र है जिसे उन्होंने आदर्श, प्रतिभा सम्पन्न, वीर नारी के रूप में प्रस्तुत कर भारत के अतीत गौरव को उज्ज्वल किया है।
इस प्रकार इस कहानी में चम्पा के चरित्र का विकास चरम बिन्दु को प्राप्त करने में सफल रहा है। अन्य पात्रों के व्यक्तित्व भी पूर्ण स्वतन्त्र, समर्थ और कलात्मक हैं ।
परिसंवाद और कथोपकथन
इस कहानी में पात्रों का परिचय, भावों की अभिव्यक्ति और विचारों का प्रकाशन संवादों के द्वारा पूर्ण मनोवैज्ञानिक रीति से हुआ है । कथोपकथनों में शैली की गम्भीरता के साथ स्वाभाविकता है। जहाँ भावों का स्पष्टीकरण कुछ क्लिष्ट-सा प्रतीत होता है, वहाँ नाटकीय शैली ने उसे स्पष्ट कर दिया है। इस कहानी में नाटकीयता का इतना अधिक अंश है कि कहानी पढ़ने में ही रंगमंच का सा आनन्द सहृदय पाठकों को होने लगता है। कथोपकथन की इस कलात्मक कुशलता के कारण ही इस कहानी को बहुत थोड़े परिवर्तन से ही एकांकी नाटक के रूपमें दिखाया जा सकता है।
देशकाल एवं वातावरण
प्रस्तुत कहानी मध्यकालीन भारत के सभ्यता और संस्कृति के आदर्शमय वातावरण को उपस्थित करने में अनुपम है। चम्पा दीप में भारत की उच्च सभ्यता और संस्कृति के प्रचार और प्रसार के द्वारा भारत से बाहर विदेशों में भी भारतीय वातावरण उत्पन्न करने का सफल प्रयत्न हुआ है। ऐतिहासिकता के साथ यथार्थ और आदर्श का सम्मिश्रण कर कल्पना द्वारा आदर्श मानवता का सजीव चित्रण है।
भाषा एवं शैली
प्रसाद जी पहले कवि हैं फिर नाटककार और उसके पश्चात् कहानीकार। अतः इस कहानी की भाषा साहित्यिकता और कल्पना के कारण अन्य कहानियों की अपेक्षा कुछ क्लिष्ट है, परन्तु उसमें भावानुकूलता और सरस प्रवाह है। उचित अवसर पर भाषा में ओज और माधुर्य गुणों के कारण संस्कृत तत्सम शब्दों से अपूर्व भावों को व्यक्त करने में प्रसाद जी ने विशेष सफलता प्राप्त की है।
इस कहानी में विविध शैलियों का सुन्दर सम्मिश्रण दृष्टिगोचर होता है—
- वर्णनात्मक शैली भारत के अतीत का गौरवमय चित्रण करने में ऐतिहासिक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।
- नाटकीय संलाप शैली या संवाद शैली वहाँ कहानी का आरम्भ इस शैली में होने से रोचकता और आकर्षण है। कथा के मध्य भाग में भी इस शैली के द्वारा नाटकीयता का गुण आ गया है।
- पात्रों के चरित्र-चित्रण में मनोवैज्ञानिक शैली का सफल, सुन्दर और कलात्मक प्रयोग हुआ है ।
- विचारात्मक गम्भीर शैली मानसिक भावों के अन्तर्द्वन्द्व के स्पष्टीकरण से इस शैली के द्वारा विचारों का उत्कर्ष चित्रित किया गया है।
उद्देश्य
प्रस्तुत कहानी 'आकाशदीप' में भारतीय संस्कृति और भारतीय सभ्यता के प्रभाव का अतीत काल में सुदूर पूर्व तक विस्तार दिखलाना ही मुख्य उद्देश्य है।साथ ही भारत के कहानीकार के समय की हीन दशा के साथ अतीत के गौरव की तुलना करना द्वितीय उद्देश्य है।
कहानी का शीर्षक
प्रस्तुत कहानी का शीर्षक रहस्यपूर्ण और आकर्षक है।चम्पा दीप में दीप स्तम्भ पर आलोक जलाकर मानो स्वयं तो आकाशदीप के समान जलते हुए कहानी के दोनों प्रधान पात्र अपूर्व त्याग का प्रकाश प्रसारित कर विश्व को मार्ग प्रदर्शन करते हैं । इस भावना को लक्ष्य में रखकर ही प्रस्तुत कहानी का शीर्षक आकाशदीप रखा गया है। इस प्रकार वह शीर्षक आकर्षक, रोचक और सार्थक है ।
कहानी की विशेषताएँ
प्रस्तुत कहानी मध्यकालीन भारतीय इतिहास की एक गौरव गाथा है ।
- इस कहानी में ऐतिहासिकता के साथ कल्पना का सुन्दर सम्मिश्रण है ।
- कहानी के कथानक का आरम्भ सुन्दर, नाटकीय, संलाप शैली के द्वारा होने से रोचक है।
- कथानक का विकास पूर्ण कलात्मक है ।
- कथानक का काल व्यवधान को कुशलतापूर्ण घटनाओं के सूत्र में पिरोकर दूर कर लिया गया है।
- इस कहानी में वर्णनात्मक शैली, ऐतिहासिक शैली, नाटकीय संलाप या संवाद शैली, मनोवैज्ञानिक शैली, विचारात्मक शैली आदि शैलियों की विविधता ने कहानी को सफलता प्रदान की है।
- चम्पा प्रसाद जी की कल्पित स्त्री पात्र है। इसे उन्होंने अपने आदर्श प्रतिभा सम्पन्न वीर नारी के रूप में प्रस्तुत कर भारत के अतीत गौरव को उज्जवल किया है।
- चम्पा के त्यागमय चरित्र में मानवता का सजीव चित्रण है ।
- प्रस्तुत कहानी भारत के अतीत गौरवमय वातावरण को पाठक के हृदय पटल पर अंकित करने में हुई है।
- कला की दृष्टि से प्रस्तुत कहानी भारत की नहीं अपितु विश्व की सफल कहानियों में एक उच्च स्थान रखती है।
इस प्र्कार 'आकाशदीप' केवल एक प्रेम कथा नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं और नैतिक मूल्यों की कहानी है। जयशंकर प्रसाद ने चंपा के माध्यम से यह दिखाया है कि महान प्रेम वही है जो बलिदान की वेदी पर खुद को समर्पित कर दे।


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