बीच बहस में कहानी की तात्विक समीक्षा निर्मल वर्मा कहानी किसी बाहरी घटनाक्रम की तुलना में मनुष्य के आंतरिक द्वंद्व, अकेलेपन और आधुनिक सभ्यता के बिखराव
बीच बहस में कहानी की तात्विक समीक्षा | निर्मल वर्मा
निर्मल वर्मा की कहानी 'बीच बहस में' नई कहानी आंदोलन की एक युगांतकारी रचना मानी जाती है। यह कहानी किसी बाहरी घटनाक्रम की तुलना में मनुष्य के आंतरिक द्वंद्व, अकेलेपन और आधुनिक सभ्यता के बिखराव को अधिक गहराई से चित्रित करती है।
प्रस्तुत कहानी 'कथ्यं रहित' कहानी है। समूची कहानी मानसिक आवेशों और संवेगों के आधार पर उमड़ती व्यथा की कहानी है, जिसमें जीवन के अनेक यथार्थ, अनुभूत सत्य, भाव-विचार, मानसिक त्रासदी, अपने समूचे यथार्थ के साथ फूटे हैं। मानव-मन की गहरी पर्तों में जाकर कथाकार ने उनकी सीवन को उधेड़ा है । प्रस्तुत कहानी का मूल्यांकन हम परम्परागत तत्वों के आधार पर करेंगे।
शीर्षक
शीर्षक संक्षिप्त, भावपूर्ण एवं व्यंजक हैं। कथा के अन्त में पिता, जिसका पुत्र तीमारदारी कर रहा था बात करते-करते चला जाता है। पुत्र अत्यधिक अन्तर्वेदना के साथ कहता है- आगे-आगे बोलिए ! नहीं आप इस तरह नहीं जा सकते - बहस के बीच में इस प्रकार शीर्षक की सार्थकता पूरी तरह सिद्ध हो जाती है ।
कथानक
पात्रों के बिना नामोल्लेख का यह कथ्यहीन कथानक अपनी निजी भाव-भूमि पर टिका है । वह अस्पताल में है, क्योंकि उसके पिता बीमार है। डॉक्टर ने बताया है कि हमें कभी-भी तैयार रहना चाहिए। वह छुट्टी लेकर आया है। उसकी पत्नी और बच्चे हैं। उसकी माँ है। उसका एक छोटा भाई है । वे प्रतिदिन उसका खाना लाते हैं और वृद्ध को देखने भी आते हैं। नर्सों हैं—उनमें से एक नर्स केरल की है वह उससे निकटता अनुभव करती है। इसी प्रकार वह अस्पताल में रहता है। वहाँ उसका जीवन घुटन से भरा है। वहीं उसके पिता की मृत्यु हो जाती है |
यह कथ्यहीन कहानी है। जिसमें कथा का विकास भावात्मक धरातल पर ही होता है जिसमें एक अजीब-सा बिखराव है। कथा काफी लम्बी है और कथ्य हीनता उसकी रोचकता में बाधक है। कथा-विन्यास में अत्यधिक कलात्मकता का समावेश और भावात्मकता से युक्त वैचारिकता ने कथा को एक संकुचित जमीन प्रदान की है। डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ के अनुसार, 'निर्मल वर्मा की अधिकतर कहानियों की जमीन संकुचित और एक आयामी है।'
पात्र एवं चरित्रांकन
प्रस्तुत कहानी में एक परिवार के चार पात्र और एक नर्स ही प्रमुख हैं। चारों में से किसी का भी नामोल्लेख नहीं है । उनको उनकी विभिन्न संज्ञाओं से प्रस्तुत किया गया है। 'वह' उसके पिता-वृद्ध, माता, भाई और केरल की नर्स । वे सभी पात्र अकेलापन, मानसिक घुटन और पीड़ा से युक्त हैं। ये चरित्र आत्म निर्वासित से प्रतीत होते हैं। प्रमुख पात्र 'वह' और केरल की नर्स के चरित्र में अकेलापन एक अभिशाप या आतंक के रूप में मुखर हुआ है। 'वह' पूरी तरह सेवा करना चाहता है, कभी-कभी लगाव का भी अनुभव करता है, पर एक खोखलापन, खालीपन, मानसिक संत्रास आदि से पीड़ित है। एक वाक्य उसकी मानसिकता का एक चित्र प्रस्तुत करता है - "कोई भी आदमी चौबीस घण्टों अपने रिश्तों की याद नहीं रख सकता।"
वृद्ध अपने जवानी के दिनों में अफसर रहा है। उसने क्लब-संस्कृति का रसपान किया है। पर कहानी में उसका चरित्र अकेलेपन की मानसिकता के साथ ही फूटा है।
सम्बन्धों में ठहराव
माँ और भाई के चरित्र से व्यक्त होता है। नर्स का लगाव उससे (वह) है, पर यह मात्र महानुभूति है या अपने अकेलेपन एकाकीपन को भरने का प्रयास – यह ध्वनित होता है स्पष्ट नहीं है डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ के अनुसार- 'निर्मल रिश्तों के उलझाव और टूटन की मनःस्थितियों को व्यस्त करने वाले कहानीकार हैं।'
भाषा शैली
कला के प्रति निर्मल वर्मा में एक विशेष प्रकार का मोह है। डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ के अनुसार — 'कला की स्वायत्तता की माँग के तहत उनकी कहानियाँ जनसाधारण से बहुत दूर जा पड़ी हैं भाषा के क्षेत्र में वे निखरे हुए कलाकार प्रतीत होते हैं।'
- शब्द चयन- प्रस्तुत कहानी की भाषा परिष्कृत परिमार्जित, गठी हुई भावाभिव्यंजना में पूर्ण समर्थ है।
- तत्सम शब्दावली - हास्यास्पद, मायावी, निराश्रित, मन्त्रमुग्ध, प्रतीक्षा, विरक्ति आदि शब्दों का पर्याप्त प्रयोग हुआ है।
- बोली के शब्द और देशज शब्दावली-यद्यपि इस कहानी में इन शब्दों के प्रयोग के लिये कम अवकाश है, फिर भी कुछ शब्द इस प्रकार के आ गये हैं जो उत्कृष्ट कोटि की भाव-व्यंजना में पूर्ण सहायक हैं—बेतुकी, बेरोक-टोक, ओछा-सा, हड़बड़ाकर, गलियारे, फुस-फुसाकर आदि ।
- अरबी-फारसी के शब्द-वे शब्द जो हम प्रतिदिन प्रयोग करते हैं-फ्रिक, कोशिश, आराम, हौंसला अजीब किस्म रिश्ते।
- अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग—इस प्रकार के शब्दों का भी पर्याप्त प्रयोग हुआ है। डॉक्टर, क्यूविकल स्टाफ रूम, गो-अवे, फादर, सिस्टर ।
- मुहावरों का प्रयोग—मुहावरों के प्रयोग से भाषा की अभिव्यंजना-शक्ति में पर्याप्त वृद्धि हुई है और भाषा के भाव व्यक्त करने की सामर्थ्य प्राप्त हुई है— फटी-फटी आँखें, डोर अरसा पहले छूट चुकी थी, शब्द दोनों के ऊपर से निकल गये मरते के साथ मरता कोई नहीं, खून उबलने लगा, किसी ने हथौड़ा मारा । व्यंजक वाक्यों की योजना-ये वाक्य भाव, विचारों के व्यंजक तो हैं ही, इनमें अर्थ गौरव भी समाया हुआ ।जब उम्र की दुपहर शुरू होती है और एक तितीरी-सी चमक में माँ-बाप पराये हो जाते हैं .पहली बार ख्याल आया कि बूढ़े के साथ उसका अपना बचपन भी झर रहा
- काव्यात्मक एवं अलंकारिक भाषा-प्रस्तुत कहानी की भाषा में कहीं-कहीं काव्यात्मक और आलंकारिता के भी दर्शन होते हैं, जिसमें आलंकारिता के साथ-साथ बिम्ब और प्रतीक का सौन्दर्य भी फूटा है। मात्र दो उदाहरण पर्याप्त रहेंगे। प्रतीकात्मकता—जैसे साँसों के झुरमुट में एक काला साँप निकल आया है बिम्ब-एक क्षण के लिए टूटा-सा भ्रम रोशनी के शहतीर-सा उसकी देह में बिंध गया ।
शैली
प्रस्तुत कहानी में कई शैलियों का प्रयोग हुआ है। स्थानाभाव के कारण कुछ उदाहरण प्रस्तुत करना ही संगत रहेगा-
- मनोविश्लेषणात्मक शैली।
- प्रलापात्मक शैली-जब वह अस्पताल के रोगियों को देखकर मानसिक प्रलाप की स्थिति में आ जाता है ।
- वर्णनात्मक शैली - यह दो बिस्तरों का कमरा था
- व्यंजना प्रधान शैली- 'आप मेरी फिक्र मत करो।” उसने कहा- "मैं आराम से हूँ ।" "मुझे मालूम है।" वृद्ध से कहा ।
- काव्यात्मक आलंकारिक शैली-उदाहरण भाषा खण्ड में दिया गया चित्रात्मक शैली-वह शैली भाव-चित्र उपस्थित करने में प्रयुक्त हुई है ।
- व्यंग्यात्मक शैली - "तुम्हें सबके लिए हमदर्दी है क्यों ?"
- दृश्यात्मक शैली – कमरे का वह दृश्य जब वृद्ध को नहलाया जा रहा है। इसी शैली में प्रस्तुत किया गया है।
इस प्रकार शिल्प और कला की दृष्टि से इस कहानी का अपना विशिष्ट स्थान है।
देशकाल और वातावरण
समूची कहानी का घटना क्षेत्र अस्पताल ही है । अतः वातावरण के दो रूप उभर कर सामने आये हैं-
- तत्कालीन मानसिकता का सजीव चित्रण—इस चित्रण में यह कहानी अनूठी है। पिता-पुत्र सम्बन्ध, पति-पत्नी सम्बन्ध, भाई-भाई सम्बन्ध की चीर-फाड़ बड़ी बेबाकी से यह कहानी करती है।
- अस्पताल का वातावरण-इसका भी चित्रण हुआ है। डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ के अनुसार, 'इनकी कहानियों में कमरे की एकान्तिकता के साथ पार्क, रेस्तरां, बार, होटल आदि के माध्यम से समाज का एक छोटा-सा टुकड़ा ही इन कहानियों में उभरता है।'
कथोपकथन और संवाद
कला के प्रति अधिक आग्रह होने के कारण प्रस्तुत कहानी के संवादों में कुछ विशिष्टता है-
संक्षिप्त—संवाद संक्षिप्त हों और अपने में पूर्ण हों तभी प्रभावकारी होते हैं—
"क्या बात है आप सो रहे हैं ?" नर्स ने कुछ खींजकर कहा।
"नहीं ! जरा धीरे बोलिए। वे सो रहे हैं।"
भाव-व्यंजक — इस प्रकार के संवादों की भी कमी नहीं है— “तुम नीचे सोओगे ?” वृद्धि ने कहा ।
आप मेरी फिक्र मत करें।” उसने कहा- "मैं आराम से हूँ।”
“मुझे मालूम है।” वृद्ध ने कहा ।
इसके साथ ही प्रस्तुत कहानी के संवाद कथा को गति देने वाले हैं, क्योंकि कथ्यहीन कथा, संवादों के माध्यम से ही सरकती हैं। वे काव्यात्मक और आलंकारिक भी है और चरित्रांकन में भी पूर्ण सहायक हैं।
डॉ. रामदेव शुक्ल के अनुसार - "निर्मल वर्मा की कहानियाँ अन्य कहानीकारों की रचनाओं की तरह बहुत नहीं बोलतीं। उनकी शक्ति उनके मौन संकेतों में छिपी है जो हमारे समय को, संस्कृति को, भाषा को, मनुष्य की पहचान को और इन सबके ऊपर मँडराती काली छाया को भी दिखा देना चाहते हैं।"
संघर्ष और अन्तर्द्वन्द्व
श्री राजनीश कुमार के अनुसार - "नयी कहानी पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर आये सम्बन्धों के बदलाव को रूपायित करती है।" इस कहानी में भी सम्बन्धों का बदलाव (परिवार में) देखा जा सकता है। बदलाव में आन्तरिक संघर्ष का होना स्वाभाविक है।मानसिक त्रास और आन्तरिक संघर्ष के एक चित्र को प्रस्तुत पंक्तियाँ प्रकट करती हैं-
"तुम फर्श पर इस तरह दिखा-दिखाकर लेटते हो, जैसे बहुत बड़ा त्याग कर रहे हो।" बूढ़े ने कहा। वह उचककर बैठ गया।
आप जानते हैं, आप क्या कह रहे हैं ?" उसकी आवाज थर-थर काँपने लगी-
“मैं आपको दिखाने के लिए फर्श पर लेटता हूँ ! आपका दिमाग तो ठीक है ?"
इस प्रकार चाहे वे रोगी पिता हों, चाहे खाना लेकर प्रतिदिन आने वाली माँ, चाहे उसका छोटा भाई और केरल की नर्स-सभी आन्तरिक संघर्ष से पीड़ित हैं।
मनोविश्लेषण
मानसिक पीड़ा, संघर्ष, घुटन, टूटन, भटकाव, अकेलापन, अजनबीपन खीझ, झुंझलाहट आक्रोश, प्रेम, दया आदि न जाने कितने भावों की स्पष्ट व्यंजना हुई है। प्रस्तुत पंक्तियाँ सविशेष रूप से उल्लेख करना पर्याप्त रहेगा-
बाहर जाते हुए वह देहरी पर रुक गई।
उसे इशारे से बाहर बुलाया।
"मैंने
वह रुकी, जैसे अपने शब्दों पर उसकी दो फटी-फटी आँखों को तोल रही हो-"मैंने डॉक्टर से बात की थी।" उसने दबे स्वर में कहा।
"जी" उसने कहा ।
"इन्हें आप पता न चलने दें
कोई फायदा नहीं है।”
"जी" उसने कहा।
एक साथ भय, विस्मय, संकोच, कृतज्ञता, बेबसी आदि के भाव फूट पड़ते हैं।
प्रारम्भ और अन्त
कहानी का प्रारम्भ घटना से होता है और प्रभावपूर्ण और व्यंजक है जो एक दम जिज्ञासा, कुतूहल जागृत करने में पूर्ण समर्थ है-
“उसने अपना बिस्तर खोला और तहाकर फर्श पर बिछा दिया'
वह चौकन्ना हो गया। दरवाजे पर रात की नर्स आकर खड़ी हो गई थी।" वह पूछती है, “अब कैसा है तुम्हारा मरीज ?" यह प्रारम्भ कथ्य की ओर संकेत भी कर देता है। अन्त भी इतना प्रभावकारी और व्यंजक है कि पाठक की चेतना को देर तक प्रभावित किये रहता है।
"बोलिए ! नहीं आप इस तरह नहीं जा सकते उनके अंग-अंग की जगाने की बेतहाशा कोशिश करने लगा ! यू कांट गो, लाइक दिस स्पीक स्पीक
कौन है, मेहमान कौन ? कौन बाकी है, कौन जा चुका है ?"
बहस के बीच में
आप सुनते हैं
स्पीक
स्पीक
स्पीक !
दरवाजे पर नर्स खड़ी थी। टॉर्च के दायरे में दो गुँथी हुई देहों को देखकर यह समझ न पाई, मरीज
प्रभावान्विति
प्रस्तुत कहानी इतनी लम्बी है, और इतने अधिक मानसिक उलझावों को लेकर चली है कि सामान्य पाठक पर एक समग्र-प्रभाव डालने में पूर्णतः समर्थ नहीं है क्योंकि निर्मल वर्मा की कहानियां उपेन्द्र नाथ अश्क के अनुसार) आम आदमी के लिये नहीं हैं। सम्बन्धों का बिखराव, अजनवीपन, एकाकीपन के साथ उभरा मानसिक बिखराव, अनेक स्थलों पर तो सामान्य पाठक की पकड़ में भी नहीं आता, प्रभावैक्य को कैसे खोजा जा सकता है।
उद्देश्य
उनकी कहानियाँ किसी विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति नहीं करतीं। कुल मिलाकर यदि कहना ही पड़े तो इतना अवश्य कहा जा सकता है कि मानसिक भटकाव, बदलते हुए सम्बन्धों की त्रासदी. एकाकीपन, अकेलेपन की पीड़ा अवश्य सविशेष रूप से इस कहानी में उभारी गयी है। यदि इतना मात्र ही कथाकार का' उद्देश्य है तो यह कदापि स्तुत्य नहीं है। इस दृष्टि से डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ ने बहुत सारे सवाल उठाये हैं- भूख, बेकारी, व्यवस्था-विरोध आदि सच्चाईयाँ कहानीकार को क्यों नहीं दिखाई देती हैं ?
उपसंहार
उत्कृष्ट कलात्मकता, भाषा की उज्जवल छटा और भावों की गहरी बुनावट, संवेदनाओं का बिखरा-निखरा रूप, इस कहानी की कुछ ऐसी विशेषतायें हैं, जो भले ही आम पाठक को रास न आयें, कहानी-कला के क्षेत्र में एक प्रयोग है, जिसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता।
इस प्रकार यह कहानी अस्तित्ववाद (Existentialism) से प्रभावित है। इसमें यह दिखाया गया है कि मनुष्य अपनी नियति में अकेला है। भाषा संवाद का माध्यम तो है, लेकिन वह मनुष्य के आंतरिक सत्य को व्यक्त करने में असमर्थ है। "बीच बहस में" होने का अर्थ है—जीवन के अर्थ की तलाश करना, जो कभी पूरी नहीं होती।'बीच बहस में' केवल एक कहानी नहीं, बल्कि आधुनिक बोध का एक दस्तावेज है। यह पाठक को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम वास्तव में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, या हम सब अपनी-अपनी व्यक्तिगत बहसों और अकेलेपन के टापू पर जी रहे हैं।


COMMENTS