जबान निबंध का सारांश | बालकृष्ण भट्ट

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जबान निबंध का सारांश | बालकृष्ण भट्ट जबान शीर्षक निबन्ध भट्टजी की निबन्ध शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें रसनेन्द्रिय का महत्व वर्णित है।

जबान निबंध का सारांश | बालकृष्ण भट्ट


बान शीर्षक निबन्ध भट्टजी की निबन्ध शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें रसनेन्द्रिय का महत्व वर्णित है। शरीर पाँच इन्द्रियों से बना हुआ है। जीभ को छोड़कर बाकी की सभी इन्द्रियाँ एक दूसरे के काम में हस्तक्षेप नहीं करती हैं। इसका अभिप्राय यह हुआ कि जवान का सबसे अधिक महत्व है। यह प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में हस्तक्षेप करती है।

जबान समस्त इन्द्रियों में प्रबल है। भट्टजी ने जिह्वा के नियन्त्रित प्रयोग का भी वैशिष्ट्य बताया है तथा संसार में अधिकांश बुराई या क्लेश का कारण जिह्वा को ही माना है।भट्टजी ने जबान को ही समस्त बुराइयों एवं अच्छाइयों की जड़ बताया है। इसका मानव जीवन में अत्यधिक महत्व है। जवान वैसे तो पशुओं के भी होती है परन्तु मानव बौद्धिक जानवर है अतः वह अपनी जवान से बड़ी सतर्कतापूर्वक कार्य करता है। इस निबन्ध में भट्टजी ने पाठकों का ध्यान बकवादियों की अनेक किस्मों की ओर आकृष्ट किया है। भट्टजी के इस निबन्ध में सरलता, स्वच्छता, स्पष्टता, प्रभावोत्पादकता है। भाषा में भावानुकूलता तथा संघटना असमास या मध्यमसमास है। शैली की दृष्टि से यह निबन्ध आत्मपरक, व्यक्तित्व प्रधान एवं कलात्मक है।

जबान का महत्व

शरीर पांच इन्द्रियों के द्वारा निर्मित हुआ है। जीभ को छोड़कर और सभी इन्द्रियाँ एक-दूसरे के काम में कोई दखल नहीं देती हैं। जैसे नेत्र को त्वचा के काम स्पर्श से, या नाक के काम सूँघने से कोई प्रयोजन नहीं ।

जबान की प्रबलता

जबान निबंध का सारांश | बालकृष्ण भट्ट
जबान सभी इन्द्रियों में प्रबल है। यह अपने रस लेने के काम के अतिरिक्त इन्द्रियों के काम शस्य, स्पर्श, रूप, गन्ध सभी में दखल देती है। जैसे यदि भोजन में दुर्गन्ध आती हो तो वह खाया ही नहीं जाएगा बल्कि मिचली तक आने लगेगी और खाया-पीया भी पेट से निकल जाएगा। अंग्रेजी साहबों की बात छोड़ दीजिए जो महीनों की सड़ी से सड़ी मछली को बड़े स्वाद से खाते हैं और उन्हीं की देखा देखी होटलिए हिन्दुस्तानी भाई भी मक्खी की तरह अंग्रेजों की झूठी रकाबियों पर जा टूटते हैं। हमारे यहाँ तो भोजन को सुगन्धित एवं स्वादिष्ट बनाने के लिए उसमें इलायची इत्यादि सुगन्धित वस्तुएँ डाली जाती हैं।
 
नेत्र तथा त्वचा के काम में जबान का दखल-साफ और स्वच्छ पदार्थ देखते ही जीभ से पानी टपकने लगता है। इसी प्रकार स्पर्श के सुख का तीव्र अनुभव जैसा जीभ कर सकती है वैसा दूसरी इन्द्रियाँ नहीं कर सकतीं। भगवान करे कि किसी की भी रसना जीभ रस के अनुभव करने में तेज न हो अन्यथा चटोरी जीभ के कारण लाखों के घर बर्बाद हो जाते हैं और जुआ, शराब, ऐय्यासी इत्यादि अनेक बुराइयाँ हृदय में घर कर लेती हैं। अतः शास्त्र का कथन है कि मनुष्य जब तक जीभ को न जीते तब तक उसका अन्य इन्द्रियों का जीतना व्यर्थ है।

मधुर वाणी के लाभ

हम जिह्वा पर जो भी स्वादिष्ट वस्तु रखते हैं उसका स्वाद जिह्वा पर क्षण भर ही रहता है। गले के नीचे उतरते ही स्वादिष्ट और बेलज्जत भोजन समान हो जाते हैं। स्वाद लेने के अतिरिक्त जिह्वा से लाभ तथा हानि दोनों ही हैं। मधुर जीभ लाखों का फायदा क्षण में ही कर देती है और यदि दुर्भाग्यवश किसी की जवान कड़वी हो तो उससे हानि भी होती है। बदजबान के पास जाने से लोग हिचकते हैं और उसके पास आने पर तो उसे कुत्ते की तरह दुतकारा जाता है। भले ही चाहे उसमें अनेक गुण हों। 

जिह्वा को हम सभ्यता का मुख्य साधन कह सकते हैं। इंसान (मनुष्य) और हैवान (पशु) में यही अन्तर है कि पशु मनुष्य की तरह अपने विचारों को स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं कर सकता, अन्यथा आहार, निद्रा और मैथुन इत्यादि दोनों में समान है। आरम्भ में पढ़ाई बोल कर और सुनकर ही होती थी। बाद में सूत्रों के भाष्य होने लगे। सारांश यह है कि यदि आरम्भ में भाव जिह्वा से प्रकट न किए गए होते तो लेख-शक्ति व्यर्थ ही रहती। जबान को या क्रोध को दबाने का एकमात्र उपाय है धीरे-धीरे बोलना। इससे क्रोध शान्त हो जाएगा।

धर्म में जिह्वा का महत्व

बड़े से बड़ा धर्मात्मा भी यदि मधुरभाषी नहीं है तो उसका जीवन व्यर्थ है। जीभ पर लगाम न रखने के कारण ही मनुष्य झूठ बोलते हैं, झूठी गवाही देते हैं और चुगलखोरी करते हैं। फौजदारी कानून में इनके लिए बड़े-बड़े दंड हैं। कोई अभागा ही इन दंडों में अपने को फँसाएगा ।

गप्पी का स्वभाव

जबान में लगाम से मतलब गप्प न मारना या वाचाल न होना। गप्पी आदमी को आगे-पीछे का या हानि-लाभ का कोई ध्यान नहीं रहता है। गप्प मारने की जिनको आदत पड़ जाती है वे इसमें कोई बुराई नहीं मानते। उन्हें इसमें बड़ा आनन्द आता है। जब गप्प मारने की सामग्री समाप्त हो जाती है तब वे दूसरों को बदनाम करने में लग जाते हैं क्योंकि उनसे चुप नहीं रहा जाता ।

गप्प के तरीके

बकवादी लोग कुछ न कुछ बकते रहते हैं। वे उचित-अनुचित का विचार किए बिना ऐसी बातें कह डालते हैं जिन्हें कहकर वे पछताते हैं । वे मूर्ख स्त्रियों की तरह बेमतलब बात करेंगे जिन्हें तब तक अन्न नहीं पचता जब तक वे बक नहीं लेती हैं। नवाबों के किस्से और चण्डूबाजों की गप्पें तो सर्व विदित ही है। कुछ गप्पी तो दूसरे के न सुनने पर भी अपनी बात कह जाते हैं, कुछ अनादर करने पर क्रुद्ध हो जाते हैं, कुछ लोग गप्प को रोचक बनाकर थोड़ी देर के लिए अपनी ओर आकृष्ट कर लेते हैं। ऐसा करने से उनकी बात सच- सी प्रतीत होने लगती है।
 

जिह्वा के वश में न रहने से हानि

द्रौपदी यदि अपनी जिह्वा को दबा लेती और दुर्योधन से 'अन्धे के अन्धे होते हैं न कहती तो सर्वनाशी महाभारत न होता जिसमें 18 अक्षौहिणी सेना का विनाश हुआ। अतः सिद्ध हुआ कि जीभ पर सावधानी रखने से सभी प्रकार की भलाइयाँ और स्वच्छन्द कर देने से सब तरह की बुराइयों की सम्भावना है।

जीभ के दबाने से अभिप्राय मूक हो जाने से नहीं है। हाँ, विद्यावृद्ध, वयोवृद्ध या संसार की ऊँच-नीच का हम से अधिक अनुभव रखने वालों के सामने चुप हो जाना शालीनता है जिससे कोई यह न समझे कि यह छोटे मुँह बड़ी बात कर रहा है। घण्टों बक-बक करने वालों की बात का मतलब समझ में नहीं आता । कुछ ऐसे भी मूर्ख होते हैं जो हँसते हुए बोलते हैं जिससे उनकी बात समझ में नहीं आती है। कुछ लोग 'सखुन तकिया' (राम तुम्हारा भला करे, समझे इत्यादि) का बहुत प्रयोग करते हैं जिससे बात बिगड़ जाती है। 

मीठी बोली

जो मनुष्य मीठा बोलते हैं उनकी सभी लोग चाह करते हैं। इसके अतिरिक्त जो मनुष्य कड़वा बोलते हैं उनके लिए कहा जाता है कि उनकी वज्र-भाषी कटु वाणी इस बात का सूचक है कि वे नरक झेल कर आए हैं और मृत्यु के पश्चात् भी नरक में जाएँगे। भट्टजी का इन्हीं के विरुद्ध कहना है कि संसार में कुछ सुकृति मनुष्य ऐसे भी हैं जो मीठी वाणी बोलकर दूसरों का मन अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। मीठी वाणी बोलने वाले उन मनुष्यों को धन्यवाद है जो स्वर्ग में मौजूद हैं। भट्टजी अन्त में कहते हैं जिह्वा के सम्बन्ध में हमारे पास जो कुछ था वह सब आपके सामने स्पष्ट कर दिया।

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