चरित्र चित्रण की दृष्टि से मैला आँचल उपन्यास की समीक्षा

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चरित्र चित्रण की दृष्टि से मैला आँचल उपन्यास की समीक्षा आँचलिक उपन्यासों में पात्र योजना की अपनी कुछ विशेषताएँ होती हैं। इनमें न तो प्रेमचन्द के सामा

चरित्र चित्रण की दृष्टि से मैला आँचल उपन्यास की समीक्षा


आँचलिक उपन्यासों में पात्र योजना की अपनी कुछ विशेषताएँ होती हैं। इनमें न तो प्रेमचन्द के सामाजिक उपन्यासों की तरह पात्र योजना में आदर्श नायक कीस्थापना होती है और न ही वृन्दावन लाल वर्मा के उपन्यासों के समान ऐतिहासिक आदर्श नायक को सामने लाया जाता है। आँचलिक उपन्यास किसी अंचल विशेष से सम्बन्ध रखता है। अतः वहाँ के पात्रों को यथार्थ रूप में प्रस्तुत करना ही आँचलिक उपन्यासकार की महत्वपूर्ण सफलता है। इसमें आदर्श नायक की खोज का दुराग्रह नहीं होना चाहिए।

बिहार के पूर्णिया जिले का मेरीगंज गाँव 'मैला आँचल' उपन्यास की कथा का केन्द्र बिन्दु है । जो आलोचक रेणु जी की तुलना प्रेमचन्द से करने लगते हैं, उन्हें मैला आँचल की पात्र योजना में दोष दिखाई देना लगता है। रेणु ने मेरीगंज अंचल की विसंगतियों के फैले दागों को उभारा है। अतः उन्होंने समस्त वर्ग के पात्रों को उभारा है । गाँव में कायस्थ, राजपूत, ब्राह्मण, यादव, संथाल आदि सभी जातियों के पात्र हैं। डॉक्टर प्रशान्त गाँव के मलेरिया सेन्टर के इन्चार्ज हैं । विश्वनाथ प्रसाद गाँव के जमींदार और तहसीलदार हैं। उनकी अहम् भूमिका कथानक में प्रस्तुत हुई है। उनकी पुत्री कमला रोग ग्रस्त है। डॉ. प्रशान्त से उसका प्रणय-स्थापित हो जाता है। दोनों का प्रेम शारीरिक सम्बन्ध और फिर विवाह का रूप ले लेता है। सुराजी बालदेव बाहर से आकर यादव टोली में रहता है। वह चबन्नियाँ सदस्य बनाता है। गाँव के सभी पात्रों का कथानक में पर्याप्त स्थान है। महन्त सेवादास, रामदास, कोठारिन, लक्ष्मी आदि सभी व्यभिचार और यौन भावना के शिकार हैं।

'मैला आँचल' के सभी पात्र अपनी आँचलिक विशेषताओं से पूरित हैं। सभी पात्रों की अपनी विशेषताएँ हैं। वे न तो किसी पात्र से आक्रान्त हैं और न उपन्यासकार का उद्देश्य ही उनके चरित्र के उत्कर्ष या अपकर्ष को प्रकट करता है। वे जैसे भी हैं, उनको उसी रूप से प्रस्तुत किया गया है।

मैला आँचल उपन्यास की पात्र योजना के सम्बन्ध में डॉ. हेमराज का निम्नलिखित कथन दृष्टव्य है— 
“मैला आँचल के पात्रों में विविधता है। वे समाज के सभी वर्गों और स्तरों के हैं। हम उन्हें एक सिम्तों में देखते हैं। उनके प्रति गहरे सहानुभूति भाव भी जागृत होते हैं। वे हमारे मन पर आस्था की छाप छोड़ जाते हैं। सभी पात्र जीते-जागते हाड़-मांस के पुतले हैं। बालदेव और कालीचरन, लक्ष्मी और महन्त सेवादास, तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद, डॉक्टर और कमला एक सीमा एक जीवन्त हैं।"
 

यौन भावना के शिकार

'मैला आँचल' उपन्यास के समस्त पात्र यौन-भावना के शिकार हैं। चरित्र की दृष्टि से सभी दागदार हैं। डॉ. प्रशान्त, कमला, समाज-सेवक बालदेव, कोठारिन लक्ष्मी, कालीचरन, चर्खा सेन्टर की मंगलादेवी ये सभी पात्र जहाँ एक ओर समाज-सेवी हैं, वहाँ दूसरी ओर व्यक्तिगत जीवन में कलंक से युक्त हैं। ये अपने मैले आँचल को ढकते नहीं हैं, अपितु खुलकर उसका प्रदर्शन ही करते हैं। अपनी मलिनता की ही प्रदर्शनी लगाने वाले इन पात्रों के बीच में से भारतीय आदर्श के अनुसार चलने वाले नायक-नायिका की खोज इस उपन्यास में करना ठीक नहीं है। 

चरित्र चित्रण की दृष्टि से मैला आँचल उपन्यास की समीक्षा
मेरीगंज गाँव के सभी जातियों, वर्गों और स्तरों के पात्र 'मैला आँचल' उपन्यास में हैं। पात्रों की भीड़ इतनी अधिक हो गई है कि पाठक उपन्यास को पढ़ते हुए न तो उनकी स्मृति में लाने पाता है और न कथानकं से उनका तारतम्य ही संबद्ध कर पाता है। गाँव की आबादी पोलिदा टोली, तन्त्रिया टोली, यदुर्वशी छत्री टोली, गहलौत छत्री टोली, कुर्मी छत्री टोली, अमात्य ब्राह्मण टोली, धनुकधारी, संथाल छत्री टोली, कुशवाहा टोली और रैदास टोली में बँटी हुई हैं। कुछ लोग बाहर के भी हैं, जैसे चन्नन पट्टी का बालदेव सुराजी यादव टोली में आकर रहने लगा है। बावनदास पक्का सुराजी है। मंगलादेवी चर्खा सेन्टर पर नियुक्त हुई हैं। इनका बालदेव से खुला प्रेम व्यापार चलता है। डॉ. प्रशान्त जो मलेरिया सेन्टर का इन्चार्ज है। तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद की पुत्री से प्रेम-लीला चलती है। चलित्तर करमार और सोमा डाकू का आतंक भी कथानक से अपना महत्व लिए हुए है। यादव टोली का कालीचरण अपनी वीरता और साहसिक कार्यों के लिए प्रसिद्ध है।

राजपूतों और कायस्थों में पुश्तैनी दुश्मनी चली आ रही है। यादवों के दल ने भी जोर पकड़ा है। ब्राह्मण, कायस्थों और राजपूतों के बीच में तीसरी शक्ति का काम करते हैं। तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद का गाँव में अत्यधिक दबदबा है। बूढ़े ज्योतिषी जी गाँव के मलेरिया सेन्टर को एक अमंगल के रूप में देखते हैं। कांग्रेस, सोशलिष्ट, कम्युनिष्ट और राष्ट्रीय स्वंय सेवक के कार्यकर्ताओं की भी हलचल है। इनमें कांग्रेसियों और सोशलिस्टों में खुली प्रतियोगिता है।
 
मेरीगंज के कथानक में आये सभी पात्र एक दूसरे के चरित्र (आँचल) को उभारने में कमी नहीं रखते है। ब्राह्मण सहदेव मिश्र फुलिया से फँसे हुए हैं। वह खलासी जी के साथ भाग जाती है। गाँव आने पर सहदेव मिश्र की भी अगवानी करती है और खलासी जी को छोड़कर दूसरे के घर बैठ जाती है। स्त्री पात्रों में कोई भी ऐसा पात्र नहीं है जिसका कि व्याभिचार के कारण आँचल मैला न हो।

मेरीगंज गाँव का मठ कथा में विशेष हलचल का केन्द्र है। यहाँ के महन्त यौन-सम्बन्ध में लगे रहते हैं । मठ व्यभिचार का केन्द्र बना हुआ है। महन्त सेवादास का कोठारिन लक्ष्मी से अवैध यौन-सम्बन्ध है । वे अन्धे होकर मरते हैं। उनके मरने पर उनके शिष्य रामदास और बाहर से आये लरसिंहद में महन्त की गद्दी के लिए संघर्ष चलता है। रामदास नये-नये महन्त बनते हैं। उनका भी कोठारिन लक्ष्मी से अवैध यौन-सम्बन्ध रहता है। वे बाद में रर्मापयरिया को दासिनी के रूप में रखकर यौन-सम्बन्ध स्थापित करते हैं। लक्ष्मी बालदेव से यौन-सम्बन्ध स्थापित करती है।

आलोच्य उपन्यास में मुख्य कथा डॉ. प्रशान्त की है जो मलेरिया सेन्टर के इंचार्ज हैं। तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद की लड़की कमला अस्वस्थ्य रहती है। वे उसे देखने आते हैं। प्रतिदिन दवा देते हैं। प्रतिदिन का मेल-जोल बढ़कर यौन-सम्बन्ध में परिवर्तित हो जाता है। कमला के लड़का होता है। डॉ. प्रशान्त और कमला का विवाह हो जाता है।

निष्कर्ष

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि 'मैला आँचल' उपन्यास की पात्र योजना एक आँचलिक उपन्यास की दृष्टि से सर्वथा सफल है। पात्रों के चरित्र-विकास द्वारा किसी आदर्श की स्थापना का प्रश्न ही नहीं उठता। अंचल की संस्कृति, समस्याएँ एवं लोक-संस्कृति और जीवन पात्रों के माध्यम से प्रकाशित हो गई है। जो पात्र अपने चरित्र में जैसा है, उसको उसी रूप में प्रस्तुत किया गया है कोई भी पात्र ऐसा नहीं है जिसका आँचल मैला न हो। कुछ पात्र परस्पर के लड़ाई-झगड़ों से ग्रस्त हैं।अधिकांश पात्र यौन विकार के शिकार हैं। अत: पात्र - यौजना की दृष्टि से 'मैला आँचल' सर्वथा सफल उपन्यास कहा जायेगा।

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