मैला आँचल एक आंचलिक उपन्यास है | फणीश्वरनाथ रेणु

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मैला आँचल एक आंचलिक उपन्यास है मैला आँचल एक सफल आंचलिक उपन्यास है फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास 'मैला आँचल' स्वयं उपन्यासकार के शब्दों में एक आंचलिक उपन्

मैला आँचल एक आंचलिक उपन्यास है


आंचलिकता शब्द 'आंचलिक' से बना है जो मूल संज्ञा 'अंचल' से निर्मित है। कुछ आलोचक इसकी व्युत्पत्ति 'आंचल' शब्द से मानते हैं जो भ्रामक है। कारण? 'प्रान्त अर्थ में लक्षणानुसार 'अंचल' शब्द ही रूढ़ हो गया है। आँचल नहीं। इतना ही नहीं, अंचल शब्द (संज्ञा) में ही सम्बन्धार्थी 'इक' पद्धति प्रत्यय लगाकर 'आँचलिक' शब्द-धारा संज्ञा का विशेषण बनाया गया है। यह विशेषण आँचल से भी बन सकता है किन्तु प्राप्त के लिए 'आँचल' शब्द रूढ़ि नहीं।' इस आंचलिक विशेषण में संज्ञासूचक 'ता' जोड़कर 'आँचलिकता' भाववाचक संज्ञा बनी है। साधारणतः आँचलिकता लेखक की अपनी कृति को एक अंचल विशेष की आधारभूमि पर तैयार करने तथा वहाँ के निवासियों के जीवन और प्रगति को विस्तार के साथ चित्रित करने की प्रवृत्ति है।' इसी के आधार पर यह देखा गया है कि 'आँचलिक उपन्यासों को माना जाता है जिनमें किसी विशिष्ट प्रदेश, जनपद या अंचल विशेष का तथा उनमें रहने वाले सभी लोगों अथवा किसी जाति-विशेष के समग्र जीवन सम्पूर्ण चित्रण होता है। उसमें रचनाकार का आग्रह वहाँ की प्रकृति तथा संस्कृति का वैविध्यपूर्ण चित्रण करने के प्रति ही अधिक रहता है। उपन्यासों में किसी अंचल विशेष में प्रचलित रीति-रिवाज खान-पान, विश्वास- आस्थाओं, बोली आदि का चित्रण होता है। इस चित्रण में वहाँ के लोक-जीवन अपनी समग्रता के साथ मुखरित हो उठता है। सारांश यह कि, ऐसे उपन्यासों में उस अंचल-विशेष की सम्पूर्ण भौगोलिक स्थिति प्राकृतिक सुषमा, वहाँ के रहने वालों की सभ्यता-संस्कृति, बोली, तीज-त्यौहार, परम्पराएँ धार्मिक और नैतिक आचार-विचार, विश्वास- आस्था, रीति-रिवाज आर्थिक एवं वर्गगत वैषम्य और संघर्ष, जन-साधारण के पारस्परिक सम्बन्ध, स्त्रियों तथा पुरुषों की स्थानीय विशेषताएँ, व्यसन, मनोरंजन, शिक्षा, जीवन सम्बन्धी दृष्टिकोण राजनीतिक चेतना, रहन-सहन, लोकगीत, लोकनृत्य, लोकभाषा, लोकोक्ति, मुहावरे आदि सभी कुछ अपनी पूर्णता के साथ स्पष्ट हो उठते हैं। हम ऐसे उपन्यासों को पढ़कर वहाँ की स्थिति का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। कहना न होगा कि उपन्यास में इन्हीं सबका प्रकटीकरण करना 'आँचलिकता का समावेश' कहा गया है।
 

मैला आँचल उपन्यास की आंचलिकता

श्री फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास 'मैला आँचल' स्वयं उपन्यासकार के शब्दों में एक आंचलिक उपन्यास है। 9 अगस्त, 1954 को प्रकाशित यह उपन्यास हिन्दी में धूमकेतु की भाँति प्रकट हुआ विविध प्रकार की चर्चा-परिचर्चाओं को विषय बन गया। इसका सबसे बड़ा कारण था—इसकी आंचलिकता। कहा तो यहाँ तक गया है अंचल की जिन्दगी का जितना वैविध्यपूर्ण चित्र इस उपन्यास में हुआ, अन्यथा सम्भव नहीं हो सका है।' निःसन्देह उपन्यासकार ने कथावस्तु, चरित्रांकन, संवाद-योजना वातावरण, उद्देश्य, भाषा-शैली तथा नामकरण आदि विविध तत्वों में आंचलिकता का पूर्ण समावेश प्रस्तुत उपन्यास में किया है।

कथानक में आंचलिकता

मैला आँचल एक आंचलिक उपन्यास है
'मैला आंचल' में कथानक पूर्णिया का है। पूर्णिया बिहार राज्य का एक जिला है मैंने इसके एक हिस्से के एक ही गाँव को-पिछड़े गाँवों का प्रतीक मानकर इस उपन्यास का कथा क्षेत्र बनाया है।' यह गाँव है-मेरीगंज जो 'एक सांकेतिक अथवा प्रतीकात्मक अर्थ भी प्रकट करता है। वह अर्थ है- भारत के ग्रामों का विकासशील जीवन, स्थानीय सीमाओं के भीतर राष्ट्रीय प्रगति का निर्देशन ।' यहाँ पर उपन्यासकार ने किसी व्यक्ति या परिवार की नहीं पूरे गाँव की कहानी कही है। इसमें गाँव में रहने वाले विविध टोले (यथा कायस्थ, राजपूत, मालिका, ततमा, यादव टोले आदि) विविध दल, (कायस्थ, राजपूत, यादव आदि), विविध वर्ग के व्यक्ति (यथा महंत, तहसीलदार, स्वयंसेवक, कृषक जमींदार, ज्योतिषी आदि), की कथाओं से गाँव की सम्पूर्ण कथा को बताया गया है। इसके विविध स्तर और पक्ष है। ये तमाम स्तर और पहलू इस प्रकार कितने ही भिन्न-भिन्न दृष्टि बिन्दुओं से दिखाए गये हैं कि जीवन एक साथ कई किश्तों में हमारे सामने प्रस्तुत होता है, बहुत कुछ चलचित्र की भाँति समग्र होकर भी और अलग-अलग, दूर से भी और पास से भी।' मठ पर नये महन्त को चादर मिलने का आयोजन, विदापति की मृत्यु, तहसीलदार की भूमि-वापिसी, डॉ. प्रशान्त का कमला से प्रेम प्रकरण, बालादास की लक्ष्मी और कालीचरण-लक्ष्मी प्रकरण, भारत माता का जुलुस आदि प्रसंग ऐसे ही कुछ चित्र प्रसंग हैं जिनमें जीवन अपने सहज-प्रवाही रूप में आया है। इतना ही नहीं वरन् स्थान-स्थान पर आई कमला मैया, सदाब्रिज, कुमार- विज्जेमान और कौआ-कैथ आदि लोक कथाएँ भी कथावस्तु में आंचलिकता के समावेश की सूचक हैं। ग्रामविशेष से सम्बन्धित होने के कारण कथा-क्षेत्र सीमित तो है ही किन्तु उसमें विस्तार, गहनता, यथार्थ और, आत्मीयता जैसे गुण भी हैं।

चरित्रों में आँचलिकता

ध्यान से देखें तो स्पष्ट होगा कि प्रस्तुत उपन्यास में किसी एक चरित्र की कथा नहीं है, वरन् यहाँ तो सम्पूर्ण अंचल ही मानो नायक बन बैठा है। उपन्यास में अंकित विभिन्न चरित्र ग्रामांचल के ही किसी न किसी पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं। तहलीलदार-जमींदार विश्वनाथ प्रसाद तथा शिक्षित रक्तहरगौरी, ग्राम कल्याणक बालादेव, समाजवादी वासुदेव, महन्त सेवादास, जनसेवक बावनदास ही नहीं कमला लक्ष्मी, कमला कमली और रामप्यारी आदि इसी प्रकार के चरित्र हैं। अपने गुण दोषों से युक्त ये सभी चरित्र अंचल-निवासियों के विविध जीते-जागते रूपों को प्रकट करते हैं। स्वयं उन्यासकार के शब्दों, 'गाँव के लोग बड़े सीधे दीखते हैं, सीधे का अर्थ यदि अपढ़, अज्ञानी और अंधविश्वासी हो तो वास्तव में सीधे हैं वे । जहाँ तक सांसारिक बुद्धि का सवाल है, वे लोगों को दिन में पाँच बार ठग लेंगे ।" उपन्यासकार ने इनका रहन-सहन, खान-पान, बोल-चाल, आदत-शौक, मनबुद्धि आदि सभी का अंकन पूर्ण तन्मयता और आंचलिकता से युक्त बना कर किया है ये सभी विविध वर्गों, जातियों, सामाजिक स्तर और विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं जो कथचल में व्यस्त हैं। साथ ही साथ इनका अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व भी बना रहा है। इसी से वे स्वयं में पूर्ण हैं। इस प्रकार कह सकते हैं कि उपन्यास के सभी चरित्र आँचलिक विशेषताओं से पूर्ण हैं ।
 

संवाद योजना में आँचलिकता

प्रस्तुत उपन्यास की संवाद योजना एकदम आँचलिक गुणों से परिपूर्ण है। यही कारण है कि यहाँ पर न तो लम्बे-लम्बे भाषण हैं और न ही ज्ञान, स्थानीय प्रदर्शन की ऊहापोह । अधिकांश संवाद संक्षिप्त, यथार्थपरक, स्वाभाविक और जन-संस्कृति के गुणों से युक्त हैं। गोपनीय अथवा देशज शब्दों की प्रमुखता, अंग्रेज़ी-ऊर्दू के सर्व प्रचलित शब्दों के बदले-बिगड़े रूप, स्थानीय सम्बोधन, बात-बात में लोक कथाओं लोक-गीतों, कहावतों, मुहावरों के समावेश आदि इन्हें एक और तो प्रसंग और चरित्र के अनुकूल बनाते हैं और दूसरी ओर एकदम आँचलिकता की विशेषताओं से परिपूर्ण । इसी प्रकार हास्य-व्यंग्य का चुटीलापन और छोटी सरल वाक्य योजना इन्हें पिछड़े अंचल की जनसामान्य में प्रचलित व्यावहारिक भाषा से युक्त बना देती है।
 

वातावरण में आँचलिकता

किसी भी रचना में आँचलिकता का चित्रण सर्वाधिक वातावरण के अन्तर्गत ही किया जा सकता है। 'मैला आँचल' भी इसका अपवाद नहीं है। यही कारण है कि इसमें उपन्यासकार ने कथांचल-मेरीगंज और वहाँ की लोक-संस्कृति और लोक जीवन का विपुल, विविध गहन, सूक्ष्म और सभी मिलाकर प्रभावशाली अंकन किया है. वह भी अत्यन्त आत्मीयता के साथ। वास्तविकता तो यह है कि 'मेरीगंज की लोक-संस्कृति का चित्रण 'मैला आँचल' में इस व्यापकता के साथ हुआ है कि इसे वहाँ की संस्कृति के इतिहास का पृष्ठ कहा जा सकता है। लेखक ने यहाँ पर रहने वालों के जीवन का विस्तृत चित्र अंकित किया है जिसने जन-जीवन अपने विभिन्न दृष्टि कोणों के साथ मुखरित हो उठा है। 'मेरीगंज' की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, प्राकृतिक और भौगोलिक सभी तरह का वातावरण चित्रण यहाँ उपलब्ध है। जाति-भेद, वर्ग-भेद, धनी-निर्धन, नारी का रमणी और भोग्या रूप (यथा लक्ष्मी), अन्धविश्वास (ज्योतिष-कथा), पारस्परिक कलह (संथाल विद्रोह), भोग-विलास (कमला, रामप्यारी, लक्ष्मी-महन्त), शोषण (भूमि हड़पना, बेंगर लेना), निर्धनता, स्वार्थ लिप्सा (विश्वनाथ प्रसाद), अत्याचार (तहसीलदार हर गौरी), मूर्खता, (कूप के गबे होना) आदि सामाजिक जीवन के प्रमुख उदाहरण हैं तो काँग्रेसी बावनदास, गाँधीवादी बालादेव, समाजवादी वासुदेव और जनसंघी संयोजक जी तथा कम्युनिस्ट कालीचरन आदि के माध्यम से अंकित चुनाव, अनशन, अहिंसा, दलबन्दी, पूँजीवाद, भाई-भतीजावाद आदि राजनीतिक स्थिति के परिचायक हैं। इसी प्रकार भूमि संघर्ष वस्त्राभाव, रिश्वतखोरी और निर्धनता आर्थिक, मठ पर प्रचलित कामाचार, होलिकोत्सव आदि धार्मिक, विलायती नाच, ठेठर कम्पनी नाच, विदेशिया नाच, वलचाही नाच, संथाली नाच और विविध लोकगीत सांस्कृतिक, कमला नदी, खेत-खलिहान प्राकृतिक और अनावृत्ति मलेरिया आदि भौगोलिक चित्रण के कुछ उदाहरण हैं। इतना ही नहीं वरन् खानपान (काली, गाँजा, चने की घुंघनी, बिहरदाना, बैरयिनिया ताड़ी दारू, बद्धी, संतोला), पशु-पक्षी, खिखर, खेक, सियारी, खस्सी, गुलेरा, घोड़ा, करैत, सर्प, तिलचट्टे, दहियल, बाछाबाछी) वनस्पति (ताड़ पारवर, साहुड़, गमकोरना, परइन, योजनगंधा), अस्त्र-शस्त्र (खड़, गुलेरा, बलमवर्छा, भाला हंसेरी, हलफाल), परिवहन (घोड़ा, बाछागाड़, हवन्गाड़ी, वेषभूषा, गंजी गमछा, पालिया, टोपी, फर्दी), आभूषण (अनन्त, कनपासा, कंठसर, चूत झझनी, बाजू सिकड़ी), उत्सव-त्यौहार (अनन्त पर्व, जाट जहरिन पर्व, बधवा पर्व) वाद्ययन्त्र (खंजड़ी, ठाक, मादल) आदि का भी विशिष्ट उल्लेख करके आँचलिकता का समावेश किया गया है। 

इसी के भूतवा, प्रकार स्थानीय समाज में प्रचलित हास्य उक्तियाँ (यथा 'चटाक पटपट पड़त सिर पर भगत बाप दालबन्दो भार बन्दो सगुआ) लोकगीत और भजन (बहियाँ पकड़ि जकझोरे श्याम), तुकबन्दी (बाप मरे तो कुअर, माँ मरे तो टुवर), धार्मिक ग्रन्थ (बीजक, रामचरितमानस, प्रेमसागर) शब्दावली और सम्बोधन (महंतजी, महात्मा जी, भंडारी, बाबू जी, डागडर साहब) आदि से भी अंचल का जीता-जागता वातावरण प्रस्तुत किया गया है।” उपन्यास को पढ़ लेने परयह स्पष्ट हो जाता है कि लेखक को अपने अंचल का पूर्ण ज्ञान है । पूर्णतया तल्लीन होकर लेखक ने इस जीवन को अपनी लेखनी में संजोया है।” वास्तविकता यह है कि “सन् 1942 के बाद सन् 1948 तक उस गाँव की स्थिति, संगठन, बोल-चाल, रहन-सहन, व्यक्ति के मनोविकार, भारव्यापी सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक आन्दोलनों को ग्रहण करने की उस अंचल की प्रतिक्रिया के संकलित शब्द चित्रों का नाम 'मैला आँचल' है।"
 

उद्देश्य में आँचलिकता

उपन्यासकार ने स्वयं अपने उपन्यास को “ आँचलिक उपन्यास” कहकर अपनी सर्वोपरि उद्देश्य प्रकट कर दिया है। उपन्यास के कथांचल की विविध समस्याओं का कथातथ्य अंकन, नयी युग-चेतना की व्यापकता (गाँव में हुआ राजनैतिक जागरण) तथा अंचल का मैलापन (पिछड़ापन) आदि दिखाकर उसने अपने इसी उद्देश्य को सार्थक किया है।

भाषा शैली में आँचलिकता

प्रस्तुत उपन्यास में मुख्यतः आँचलिक भाषा का ही प्रयोग किया गया है। इसके लिए उपन्यासकार ने स्थानीय शब्दावली, मुहावरे लोकोक्तियाँ, लोकगीत आदि सभी अंचल विशेष (पूर्णिया) से सम्बन्धित रखे हैं। ध्वननशीलता ने इस भाषा को और भी अधिक आँचलिक स्वरूप प्रदान किया है। यहाँ पर बुढ़िया 'अथवा बां-बां' की तरह टकराती है, लारियाँ 'भर्र-भर्र शरर' दौड़ती हैं, धरती पच-पच करती है, घण्टा ठन-ठन ठनांग और सीटी 'टुटुटुटू' की आवाज से बजती है। सच तो यह है कि, "प्रादेशिक या आँचलिक भाषा के प्रयोग के द्वारा सबसे विचारणीय शैल्पिक उपलब्धी फणीश्वरनाथ रेणु की है।.....उसका इतना प्रभावशाली प्रयोग कि वह उपन्यास का गौण पक्ष न रह कर उसका प्रमुख और सबसे महत्वपूर्ण पक्ष प्रतीत हो, यह रेणु की विशेषता है।” इस प्रकार 'मैला आंचल' की सबसे बड़ी उपलब्धि स्थानीय बोली का प्रयोग है। जहाँ तक प्रश्न है, शैली का 'शैली की दृष्टि से किसी उपन्यास की परम्परा न होकर यह एक नव प्रयोग है—काफी सीमा तक नव प्रयोग। इसके अन्तर्गत वर्णन, विवरण, संवाद, फ्लैश बैंक काव्यात्मक तथा लोककथात्मक आदि विविध शैलियों के द्वारा उपन्यासकार ने आँचलिकता को उभारा है।
 

नामकरण में आँचलिकता

यह है मैला आंचल ! एक आँचलिक उपन्यास कह कर उपन्यासकार ने स्पष्टतः नामकरण में आँचलिकता को मान लिया है। मैला आंचल का शब्दार्थ है- गन्दा आंचल । लाक्षणिक अर्थ है - मैला प्रान्त, प्रदेश या अंचल । इसी अंचल के मैले या पिछड़ेपन को उपन्यासकार ने मूल वर्ण्यविषय माना है। उपन्यास के अन्त में डॉ. प्रशान्त के शब्दों में मानो लेखक ही कहता है. इतना ही नहीं वरन् मैं साधना करूँगा, ग्रामवासिनी भारत माता के मैले आँचल तले।” इतना ही नहीं वरन् “मैला आंचल के सभी पात्र इस मैले आंचल की गन्दगी को दूर करने में प्रयत्नशील हैं पात्र, घटनायें तथा समस्त गाँव इस बात के प्रयत्न में पूर्णतया लीन दिखाई देते हैं कि इस गाँव के मैले को दूरकर इसको एक आदर्श गाँव के रूप में प्रदर्शित किया जा सके।

निष्कर्ष स्वरूप कह सकते हैं कि रेणु जी ने अपने 'मैला आंचल' में आँचलिक कथा, परिवेष जीवन, संस्कृति और भाषा आदि का समावेश पूर्ण रुचि के साथ रुचिकर रूप में किया है। आँचलिक चित्रण की ऐसी संभावनायें सर्वप्रथम इसी उपन्यास में व्यक्त हुई हैं। निःसंदेह यह एक सफल उपन्यास है।

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