मैला आँचल उपन्यास का उद्देश्य

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मैला आँचल उपन्यास का उद्देश्य मैला आँचल स्वयं उपन्यासकार के कथानुसार एक आँचलिक उपन्यास है, जिसमें बिहार के पूर्णिया जिले के एक ग्राम मेरीगंज को कथा

मैला आँचल उपन्यास का उद्देश्य


संसार में प्रत्येक कार्य का एक उद्देश्य होता है। साहित्य (स + हित) अथवा उसका एक अंग उपन्यास (उप + न्यास समीप रखी वस्तु) भी इसका अपवाद नहीं है। कारण ? प्रत्येक उपन्यासकार अपने उपन्यास के माध्यम से कुछ कहना चाहता है। अपनी जीवन-दृष्टि को पाठकों तक पहुँचाना चाहता है। यह कुछ कहना और जीवन दृष्टि को पाठकों तक पहुँचाना ही उपन्यास में उद्देश्य का समावेश कर देता है प्रकारान्तर से, इसी को उपन्यास अथवा उपन्यासकार का कथ्य अथवा सन्देश भी कहते हैं।

एक तथ्य और भी दृष्टव्य है। वह है रचना-विशेष के उद्देश्य (अथवा कथ्य का सन्देश) का निवारण करना, कारण ? उपन्यासकार अपने उद्देश्य को प्रत्यक्ष (यथा भूमिका, स्वटिप्पणी, वर्णन आदि) और परोक्ष (यथा कथा-प्रसंग पात्रादि) दोनों प्रकार से स्पष्ट करता है। कभी-कभी यह भी होता है कि प्रसंग अथवा पात्र कथन, क्रिया-कलाप और मान्यताओं को उपन्यासकार की मान्यता मान लिया जाता है। अतएव अच्छा यह है कि रचना-विशेष के समग्र प्रभाव के आधार पर उसके उद्देश्यों का निश्चय किया जाये ।


मैला आंचल हिंदी उपन्यास का उद्देश्य

'मैला आँचल' के प्रमुख उद्देश्य निम्नांकित हैं- 
  1. सामयिक समस्याओं का प्रस्तुतीकरण समाधान । 
  2. अंचल विशेष का चित्रण करना । 
  3. भारतीय ग्राम्य समाज का अंकन । 
  4. स्वतन्त्रता के आन्दोलन और स्वतन्त्रता-प्राप्ति का प्रभाव । 
  5. स्वतन्त्रता के आन्दोलन और स्वतन्त्रता-प्राप्ति का प्रभाव । 
  6. नवीन जन-चेतना का पक्ष । 
  7. आदर्शोन्मुख यथार्थ की स्थापना । 
  8. जन-शोषक तत्वों पर व्यंग्य करना । 
  9. नूतन शिल्प-प्रयोग करना ।

अंचल विशेष का चित्रण करना

'मैला आँचल', स्वयं उपन्यासकार के कथानुसार, एक आँचलिक उपन्यास है, जिसमें बिहार के पूर्णिया जिले के एक ग्राम मेरीगंज को कथा-क्षेत्र बनाया गया है। उपन्यासकार ने इस क्षेत्र के फूल-शूल धूल-गुलाब, कीचड़ - चंदन, सुन्दरता-कुरूपता सभी को ग्रहण किया है और 'किसी से भी दामन बचाकर निकल नहीं पाया है। यही कारण है कि कथा घटनायें, चरित्र संवाद भाषा, वातावरण और शैली आदि सभी तत्वों से उसने इस अंचल-विशेष का चित्रण किया है। इसके अन्तर्गत अंचल का प्राकृतिक भौगोलिक परिचय, निवासियों का रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज, नृत्य-गीत और भाषादि से लेकर सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक आदि सभी प्रकार की परिस्थितियों तक को उसने सविस्तार प्रस्तुत किया है कहना न होगा कि उपन्यास में हर जगह यह वर्णन-विवरण भरे पड़े हैं जिसके विविध स्तर और पक्ष यहाँ मुखर हुए हैं, समग्र रूप में भी और अलग-अलग भी। मेरीगंज की लोक संस्कृति का चित्रण 'मैला आँचल' में व्यापकता के साथ हुआ है कि इसे वहाँ की संस्कृति के इतिहास का पृष्ठ कहा जा सकता है निःसंदेह उपन्यासकार को अपने अंचल का पूर्ण ज्ञान है। पूर्णतया तल्लीन होकर लेखक ने इस जीवन को अपने कथा में संजोया है।
 

भारतीय ग्राम्य समाज का अंकन

मैला आँचल उपन्यास का उद्देश्य
'मैला आँचल' का दूसरा उद्देश्य है-भारतीय ग्राम्य समाज का अंकन करना । निःसन्देह मैला आंचल बाह्यत तो मेरीगंज नामक गाँव ही हैं किन्तु मूलतः 'पिछड़े गाँवों का प्रतीक' भी है। इसके निवासी, परिस्थितियाँ, विविध समस्याएँ, प्रचलित गुण-दोष आदि कमोवेश रूप में वही हैं जो आज भी भारत के अन्य सामान्य ग्रामों में-विशेषतः पिछड़े ग्रामों में मिलते हैं। निर्धनता अभावग्रस्त जीवन, भूमि-विषयक समस्याएँ, जमींदार और पुलिस अधिकारियों के अत्याचार वर्ग और जातिभेद पारस्परिक ईर्ष्या चुगल-चबाई चोरी छिपा अनैतिक सम्बन्ध आदि ऐसे ही की कथा किसी व्यक्ति विशेष की नहीं, पूरे गाँव की है (यह गाँव ही सच्चे अर्थों में इसका महानायक है। कुछ उदाहरण हैं । वास्तव में प्रस्तुत उपन्यास सन् 1942 के बाद सन् 1948 तक उस गाँव की स्थिति, संगठन, बोलचाल रहन सहन व्यक्ति के मनोविकार भारतव्यापी सामाजिक राजनीतिक तथा आर्थिक आन्दोलन को ग्रहण करने की उस अंचल (गाँव) विशेष की प्रक्रियाओं के संकलित शब्द चित्रों का नाम 'मैला आँचल' है। 

जहाँ तक प्रश्न है, उपन्यासकार की सफलता का बिहार के एक छोटे से गाँव की कहानी जहाँ की आंसुओं से सींची गई धरती पर उपन्यासकार ने प्यार के लहलहाते पौधों की खेती की है। प्रेमचन्द के पश्चात् भारतीय ग्राम्य जीवन का इतना रंगीन ताना बाना रेणु के अलावा और किसी ने नहीं बुना है।' 'इतना ही नहीं वरन् मैला आँचल की सबसे अद्भुत विशेषता यही है कि उसमें मिथिला के निरन्तर बदलते हुए आज के एक गाँव की आत्म गाथा है और यह गाँव सर्वथा विशिष्ट होकर भी केवल मिथिला का ही नहीं जैसे उत्तर भारत का प्रत्येक गाँव है जो सदियों से सोते-सोते अब जाकर अंगड़ाई ले रहा है। भारतीय देहात के मर्म का इतना सरल और भावप्रवण प्रस्तुतीकरण हिन्दी में सम्भवतः पहले कभी नहीं हुआ है। उपन्यास का प्रारम्भ गाँव में यह ) और अन्त (कलीमुद्दीपुर घाट ) भी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसी भाँति दूसरे परिच्छेद में तो गाँव का नायक की भाँति, विस्तृत परिचय प्रस्तुत किया गया है।

सामयिक समस्याओं का प्रस्तुतीकरण और समाधान

प्रस्तुत उपन्यास समस्यामूलक नहीं है। इसी से इसमें उपन्यासकार ने समस्याओं को गौण रूप में ही ग्रहण किया है। फिर भी वे कम नहीं हैं और न ही उपन्यासकार ने उनके चलते-फिरते समाधान प्रस्तुत किये हैं। दूसरी ओर उपन्यासकार ने अंचल या ग्राम्य जीवन से सम्बन्धित राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, वैयक्तिक और भौगोलिक आदि विविध प्रकार की समस्याओं का प्रस्तुतीकरण किया है। चुनाव, दलबन्दी हिंसा-अहिंसा, ऊँच-नीच का वर्ग-भेद, विभिन्न पार्टियों के हथकण्डे, भाई-भतीजावाद आदि। यदि कुछ राजनीतिक समस्यायें हैं तो जाति-भेद, भोगविलास, सामन्तीय संस्कार आदि सामाजिक और निर्धनता, अभावमय जीवन, भूमिहीन कृषक, ऋण, महंगाई, बेगार और ग्राम्य निवासियों की औद्योगीकरण के कारण नगरों की ओर पलायन करने की प्रवृत्ति आदि आर्थिक समस्यायें हैं। इसी प्रकार हीन ग्रन्थि, यौन लिप्सा आदि वैयक्तिक और अनावृष्टि, मलेरिया जैसे रोगों का प्रकोप, दलदल आदि भौगोलिक समस्याओं के प्रमुख उदाहरण हैं। निःसन्देह अधिकाँश समस्यायें सामयिक और अंचल विशेष से सम्बन्धित हैं तो कुछ शाश्वत हैं।

एक बात और दृष्टव्य है। यहाँ पर उपन्यासकार केवल समस्याओं का संकेत करके नहीं रह गया है। कहीं-कहीं उसने समाधान भी प्रस्तुत किये हैं। ये समाधान कहीं तो आदर्श अथवा भावुकता मात्र बनकर रह गये हैं। (यथा विश्वनाथ प्रसाद द्वारा किसानों की भूमि लौटाना और डॉ. प्रशान्त की उपन्यास के अन्त में आदर्शमूलक आत्मस्वीकृति) तो कहीं लेखक की व्यक्तितगत विचारधारा के साक्षी हैं (यथा भाई-भतीजावाद, पार्टी चन्दा हड़पने वालों पर व्यंग्य) कहीं-कहीं घटना और पात्रों के माध्यम से भी समाधान प्रस्तुत कराये गये हैं जैसे कालीचरन का भूमि जोतने वाले की, बलदेव की घटना नेताओं की असलियत जानकर हुई प्रतिक्रिया, बावनदास का निरीह आत्मबलिदान और डॉ. प्रशान्त के ममता को लिखे गये पत्र आदि । इस प्रकार उपन्यासकार ने 'आंचल' में मेले धब्बे देखे तो हैं ही, उनको मानवता की पूतधारा से प्रक्षालित भी किया है। यह प्रक्षालन भी एकदम वाद रहित है।
 

स्वतन्त्रता आन्दोलन और स्वतन्त्रता प्राप्ति का प्रभाव

प्रस्तुत उपन्यास में स्वतन्त्रता आन्दोलन (सन् 1942-1947) और स्वतन्त्रता प्राप्ति (सन् 1947-48) दोनों का विस्तृत चित्रण है। बालदेव, बावनदास, कालीचरन, वासुदेव आदि से लेकर संघ-संचालक, मायादेवी, नाथबाबू चौधरी गंगाप्रसाद सिंह यादव, शशांक जी और गंगुली जी आदि न जाने कितने सक्रिय पात्र (और उनकी कथा विवरण) यहाँ पर आये हैं। इसी प्रकार भारत छोड़ो आन्दोलन जलूस, जेल, आनशन आदि यदि आन्दोलन-काल की घटनाएँ ग्रहण की गयी हैं तो स्वतन्त्रता प्राप्ति और गाँधीजी की मृत्यु स्वातन्त्र्योत्तर काल की इन सबके माध्यम से उपन्यासकार ने जन-साधारण पर स्वतन्त्रता आन्दोलन और स्वन्त्रता-प्राप्ति का प्रभाव दिखाया है विविध राजनैतिक दह उनके नेता और स्वयं सेवक तथा उनके चुनाव, चन्दा, दलबन्दी, विषयक विविध हथकंडो का विस्तृत अंकन लेखक ने किया है। दृष्टव्य बात यह है कि उपन्यासकार ने तटस्थ भाव से ही सारा अंकन किया है। निःसन्देह उसकी प्रशंसा का पात्र जन-साधारण और कर्मठ स्वयंसेवक तो हैं, नेतागण नहीं । कारण? वे (नेतागण) “सब मेले (एम. एल. ए.) होना चाहते हैं। 

गरीबों का काम, मजदूरों का काम जो भी करते हैं, एक ही लोभ से। " जन साधारण तो पहले से भी अधिक दुःखी बन जाता है। यही कारण कि बालदेव का अनशन से और बावनदास का अहिंसा से विश्वास डगमगाने लगता है। सच्चे देशभक्त बावनदास का बलिदान ही मानो जनता पर पड़े स्वतन्त्रता-प्रभाव को एकदम स्पष्ट कर देता है। कथा के अन्त में डॉ. प्रशान्त का कथन भी इसी का परिचायक है - "साम्राज्य लोभी शासकों की संगीनों के साये में वैज्ञानिकों के दल खोज कर रहे हैं ऐटम ब्रेक कर रहा है चारों ओर एक महा अन्धकार ! व्याधों के अट्टहास से आकाश हिला रहा है। नहीं, नहीं, यह अन्धेरा नहीं रहेगा। सवारी ऊपर मानुस सत्य!" इस प्रकार स्वतन्त्रता प्राप्ति और उसके जन-साधारण पर पड़े प्रभाव को स्पष्ट करना भी प्रस्तुत उपन्यास का महत्वपूर्ण उद्देश्य रहा है। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि 'उसने किसी भी विचारधारा को अथवा किसी संस्थागत पक्षपात को अपने जीवनबोध और सौन्दर्यबोध पर हावी नहीं होने दिया है। हिन्दी की कथा साहित्य के तत्कालीन दौर में यह एक बड़ी सफलता थी ।

नवीन जन-चेतना का पक्ष

प्रस्तुत उपन्यास में आद्योपान्त ग्राम्यों में उभर कर प्रकट होने वाली जनचेतना को महत्व प्रदान किया गया है। मेरीगंज गाँव में घटी घटनाएँ, पात्रों के कार्यकलाप, उपन्यासकार के विवरण और उपन्यास में व्याप्त देशकाल आदि इसी के पोषक हैं ! इनके द्वारा लेखक ने युगजन्य दबाव के कारण तीव्रता से बदलती हुई ग्रामगति का चित्र स्पष्ट किया है। मेरीगंज की बदलती हुई राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक स्थिति मानो ग्राम में उठने वाली नवीन जन-चेतना की लहर की सूचक है। संथाल विद्रोह, विश्वनाथ प्रसाद का किसानों को भूमि वापिस करना, रामकिरपालसिंह का तीर्थयात्रा पर जाना, नये युवा रक्त औद्योगीकरण के कारण जूट-मिल में काम करने हेतु नगर की ओर भागना तता सबसे अधिक जमींदारी-विरोध में कालीचरन आदि का 'भूमि का मालिक किसान' जैसी मान्यताओं की स्थापना करना आदि इसी नव जन-चेतना के परिचायक हैं। शहरीय शिक्षित वर्ग के प्रतिनिधि डॉक्टर प्रशान्त के मन में ग्राम्य-सुधार की भावना जागकर, प्यार की खेती करने का निर्णय कराकर तथा मिट्टी और मनुष्य से मुहब्बत की बड़ी बात बताकर मानो उपन्यासकार भी इससे सहमति प्रकट कर देता है ।

आदर्शोमुख यथार्थ की स्थापना

'मैला आँचल' की कथा-क्षेत्र, घटनायें और वातावरण आदि सभी कुछ बिल्कुल यथार्थ हैं। इसमें उपन्यासकार ने वहाँ के जन-जीवन को विस्तार के साथ उनकी अच्छाई-बुराइयों से युक्त रूप में भी अंकित किया है। फिर भी यह यथार्थ नग्न यथार्थ नहीं, वरन् आदर्शोमुख है ? बावनदास का आदर्श चरित्र, प्रशान्त-कमला का आदर्श प्रेम, बालदेव की परोपकार जैसी वृत्तियाँ, तहसीलदार विश्वनाथप्रसाद का हृदय-परिवर्तन, ममता का प्रशान्त के प्रति आदर्शमय मोह आदि । ज्योतिषी का कुकर्मों के कारण लकवा से पीड़ित होना, फुलवा का रोग में पड़ना, महंत का लक्ष्मी को कुदृष्टि से देखने के कारण ही अन्धा होना जैसी घटनाएँ भी इसी श्रेणी में आती हैं। इतना ही नहीं स्वयं उपन्यासकार ने भी प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही रूपों में स्थान-स्थान पर आदर्शों की प्रतिष्ठा की है। 

उपन्यास के अन्त में डॉ. प्रशान्त का विस्तृत कथन इसका सर्वोत्तम प्रमाण है। इस प्रकार प्रस्तुत उपन्यास में यथार्थ और आदर्श दोनों का समन्वय हुआ है । विशेषता यह है कि उपन्यासकार ने न तो यथार्थ को ही कुत्सित बनाया है और न आदर्श स्थापना के लिए नारेबाजी, उपदेशबाजी या वाद विशेष का पक्ष-विपक्ष ग्रहण किया है। इस प्रकार उसने आदर्शोन्मुख की स्थापना की है जो उसका प्रमुख विवरण था ।
 

जन शोषक तत्वों पर व्यंग्य करना

युग प्रवृत्ति के अनुकूल प्रस्तुत उपन्यास में भी स्थान-स्थान पर जन-शोषक तत्वों पर गम्भीर व्यंग्य किए हैं। विशेषता यह है कि इनमें उपन्यासकार ने तो 'कटुता' पर उतारा है और न एक पक्षधर बनकर रहा है। 'इन्क्लाब जिन्दाबाद' इन्क्लाब नाम ही अंग्रेजी राज जिन्दाबाद आदि नारे, बालदेव की बात-बात पर अनशन की धमकी और हिंसावाद का भय दिखाना, नागा बाबा की मठ पर पिटाई और निरीह बावनदास का बलिदान आदि परोक्ष व्यंग्य के प्रमुख उदाहरण हैं। कहीं-कहीं व्यंग्य प्रत्यक्ष होकर भी उभारे गये हैं यथा "उस पार्टी में भी जितने बड़े लोग हैं, मन्त्री बनने के लिए मार कर रहे हैं। सब मेले-मंत्री होना चाहते हैं-" निःसन्देह उपन्यासकार के ये व्यंग्य जोशीले तीखे नहीं हैं मगर " यह उनकी तटस्थ सोद्देश्यता के अनुकूल हैं। इस प्रच्छन्न व्यंग्यतत्व से रचनाकार ग्रामीण यथार्थ के प्रति अपना आलोचनात्मक दृष्टिकोण कलात्मक विधि से अभिव्यंजित करने में सफल हो सका है।"
 

नव शिल्प प्रयोग करना

उपन्यास-शिल्प की दृष्टि 'नव शिल्प-प्रयोग' प्रस्तुत उपन्यास का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। इसकी भाषा एकदम ग्रामीण और कथा- अंचल की है। निःसन्देह उपन्यासकार का इस भाषा पर पूरा-पूरा अधिकार है। यही बात चरितार्थ होती है शैली पर भी । सम्भवतः इससे पहले किसी भी उपन्यास में आँचलिक भाषा-शैली का इतने विस्तार से और गुणयुक्त रूप में प्रयोग नहीं किया गया था । इस प्रकार भाषा और शैली दोनों ही रूपों में यह उपन्यास परम्परा का पालनमात्र न होकर एकदम नव प्रयोग है। इतना ही नहीं वरन् विभिन्न भावों, मनोदशाओं और घटनाओं को तथा बहुत से व्यक्तियों और समूहों के कार्यों और भाववेगों को एक नये रूप में बार-बार 'टेलेस्केप' करने की पद्धति से एक साथ ही गति का और, स्थिरता का, दूरी का और समीपता का, प्रभाव उत्पन्न होता है। पूरा उपन्यास एक फिल्म के समान लगता है जिसके पार्श्व संगीत में मादल और ढोल और लोक-गीतों के मादक स्वर निरन्तर सुनायी पड़ते रहते हैं। कहना न होगा कि यह केवल रेणु (अथवा मैला आँचल की ही विशेषता है। निःसन्देह इसके माध्यम से उपन्यासकार सर्वथा नव शिल्प-प्रयोग किया है।
 
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि 'मैला आँचल' एक सोद्देश्य रचना है जिसके उद्देश्यों में विस्तार है और उसे प्रकट करने में पूर्ण सफलता भी । उपन्यास का कथ्य अथवा सन्देश यहाँ एकदम उभर कर सामने आया है। इसके माध्यम से रचनाकार ने कुछ नहीं, बहुत कुछ कहा है, और वह भी पूरी-पूरी सफलता के साथ। यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

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