आषाढ़ का एक दिन नाटक का शीर्षक और कथोपकथन नाटक का प्रारम्भ आषाढ़ के दिन होता है उसी प्रकार नाटक का अन्त भी आषाढ़ के दिन ही होता है। वैसे ही मेघ गरजते
आषाढ़ का एक दिन नाटक का शीर्षक और कथोपकथन
किसी भी प्रन्थ का शीर्षक सबसे पहले पाठकों को अपनी ओर आकृष्ट करता है। अतः उपयुक्त शीर्षक का चयन कलाकार की प्रतिभा का द्योतक है। 'आषाढ़ का दिन' शीर्षक निःसन्देह आकर्षक है। पाठक अनुमान लगाता है कि आषाढ़ के प्रथम दिन आकाश में मेघ घिरे होंगे, बकुल पंक्तियाँ उनके नीचे उड़ी होंगी। इस प्रकार के विचारों में स्वाभाविक है कि प्रत्येक के मन में इस शीर्षक को पढ़कर प्रन्थ के अध्ययन की लालसा प्रबल हो उठे। पाठक के मन में ग्रन्थ पढ़ने की लालसा उत्पन्न कर देना श्रेष्ठ शीर्षक की विशेषता है।
वस्तुतः 'आषाढ़ का एक दिन' इस नाटक का एक सार्थक शीर्षक है। आषाढ़ के प्रथम दिवस पर्वत-शिखरों को स्पर्श करती मेघ मालाओं के बीच धारासार वर्षा में नाटक के नायक और नायिका इस नाटिका का आरम्भ करते हैं। उसी दिन मल्लिका तथा कालिदास की जीवन-दृष्टि सामने आती है और उन्हीं गरजते मेघों के बीच मल्लिका अपने आराध्य कालिदास को उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए उसे उज्जयिनी जाने को विवश कर देती है। कवि को आषाढ़ का यह दिन बहुत प्रिय है। आज के दिन उसकी भावना कवित्व में बदलती है, प्रकृति का सौन्दर्य मुखर होता है।
जिस प्रकार नाटक का प्रारम्भ आषाढ़ के दिन होता है उसी प्रकार नाटक का अन्त भी आषाढ़ के दिन ही होता है। वैसे ही मेघ गरजते हैं, वैसी ही धारासार वर्षा होती है, किन्तु प्रेमी तथा प्रेमिका के बीच परिस्थितियाँ बदल जाती हैं और वैसे हर्षोल्लास की अनुभूति के स्थान पर दोनों आषाढ़ के दिन एक-दूसरे से सदा-सर्वथा को पृथक् हो जाते हैं। आषाढ़ का दिन संयोग और वियोग आदि और अन्त, प्रारम्भ और समाप्ति का दिन है। इससे नाटक में संकलनत्रयों में से समय की एकता प्रतिपादित होती है।
कथोपकथन की समीक्षा
नाटक की सारी अभिनेयता पात्रों के परिसंवाद पर निर्भर रहती है। नाटककार को कुछ कहना होता है वह पात्रों के माध्यम से ही बोलता है । परिसंवादों के माध्यम से ही कथा-वस्तु जन्म लेती, पल्लवित होती तथा चरमोत्कर्ष पर पहुँच कर समाप्त होती है। पात्रों के चरित्र का प्रकाशन भी परिसंवादों के माध्यम से होता है । इस दृष्टि से 'आषाढ़ का एक दिन' नाटक की परिसंवाद-योजना की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं--
- संक्षिप्त एवं परस्पर सम्बन्ध- 'आषाढ़ का एक दिन' एक अभिनेय नाटक है। अतः नाटककार ने सर्वत्र संक्षिप्त कथनों का ही प्रयोग किया है। द्वितीय अंक में मातुल तथा तृतीय अंक में मल्लिका के स्वगत कथन एवं कालिदास के आत्माभिव्यक्ति सम्बन्धी कथन इसके अपवाद हैं। अनुस्वार और अनुनासिक के कथन तो एक एक शब्द तक ही सीमित रह गये हैं। इसके अतिरिक्त सभी कथन व्यपार-बद्ध हैं। एक-दूसरे से अनुस्यूत हैं ।
- कथा-वस्तु को अग्रसारित करने की क्षमता- सभी कथनों में कथावस्तु को अग्रसारित करने की क्षमता है । विलोम अपने कथन में अम्बिका को मल्लिका तथा कालिदास के आने की सूचना देता है। निक्षेप के कथन ग्राम-पान्तर में राजपुरुषों तथा कालिदास की आने की सूचना देता है। नाटक के सभी परिसंवाद नाटक की वस्तु का सहज स्वाभाविक रूप से संवहन करते हैं ।
- चरित्र पर प्रकाश डालने वाले कथन- पात्रों के कथन उनके चरित्र पर तो प्रकाश डालते ही हैं साथ ही अन्य पात्रों के चरित्र का भी उद्घाटन करते हैं। मल्लिका के कथन कालिदास के चरित्र को स्पष्ट करते हैं। अम्बिका के कथन उसकी चिन्तित अवस्था द्योतक हैं। मल्लिका के कथनों में कालिदास के प्रति आत्मोत्सर्ग की भावना है। दन्तुल का कथन कालिदास की महत्ता पर प्रतिपादक हैं।
- कवित्वमय कथन- नाटक में मल्लिका, प्रियंगु-मंजरी तथा कालिदास के परिसंवाद अनेक स्थलों पर कवित्वमय हो गये हैं। उनमें गद्य-काव्य जैसा आनन्द आता है ।
- व्यंग्यपरक कथन—अम्बिका, मातुल तथा विलोम के कथनों में सर्वत्र व्यंग्य की प्रधानता है। इससे नाटक को स्फूर्ति मिलती है ।
- हासपरक कथन—अनुस्वार और अनुनासिक के कथनों में हास्य की झलक है।
संक्षेप में नाटक के परिसंवाद सर्वथा उच्च कोटि के नाट्य-शिल्प से ओत-प्रोत हैं। उनमें सभी अपेक्षित विशेषताओं का आधार है।समग्र रूप से, 'आषाढ़ का एक दिन' अपनी भाषाई तरलता और बिम्बात्मकता के कारण गद्य होते हुए भी काव्य का आनंद देता है। संवादों के माध्यम से ही नाटककार ने कालिदास के अंतर्द्वंद्व और मल्लिका की निस्वार्थ भावना को जीवंत किया है। यह नाटक केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि इसमें पात्रों के बीच की दूरियाँ और उनके मन का सूनापन संवादों के उतार-चढ़ाव में साफ महसूस किया जा सकता है। यही कारण है कि इस नाटक का शीर्षक और इसकी संवाद योजना मिलकर इसे हिंदी साहित्य की एक श्रेष्ठ मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक कृति बनाते हैं।


COMMENTS