गरुड़ध्वज नाटक का सारांश | लक्ष्मी नारायण मिश्र

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गरुड़ध्वज नाटक का सारांश लक्ष्मी नारायण मिश्र 'गरुड़ध्वज' एक अत्यंत प्रभावशाली ऐतिहासिक नाटक है जो मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद के भारत की तस्वीर पेश

गरुड़ध्वज नाटक का सारांश | लक्ष्मी नारायण मिश्र


पंडित लक्ष्मी नारायण मिश्र द्वारा रचित 'गरुड़ध्वज' एक अत्यंत प्रभावशाली ऐतिहासिक नाटक है जो मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद के भारत की तस्वीर पेश करता है। यह नाटक मुख्य रूप से शुंग वंश के शासनकाल और सम्राट पुष्यमित्र शुंग के समय की राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों पर केंद्रित है। नाटक की कथावस्तु केवल ऐतिहासिक तथ्यों का संग्रह मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान और राष्ट्रीय अखंडता की एक गौरवशाली गाथा है।

प्रथम अंक

गरुड़ध्वज नाटक का सारांश | लक्ष्मी नारायण मिश्र
नाटक के प्रथम अंक की घटना राजधानी विदिशा में घटित होती है, जिसमें विदिशा के वैभव, वंश और राष्ट्र के लिए त्याग करने वाले आचार्य विक्रमादित्य का चरित्र उजागर हुआ है। शुंग वंश का पुष्यमित्र सम्राट के अकर्मण्य हो जाने के पश्चात् विदेशियों द्वारा कुचली जाने वाली प्रजा के आग्रह से शासन अपने हाथ में ले लेता है और 'सम्राट' अथवा 'महाराज' शब्द का सम्बोधन अपने लिए अग्राह्य और घृणित घोषित कर देता है। विक्रम मित्र भी उसी परम्परा का पालन करते आ रहे हैं। नाटक का प्रारम्भ इसी प्रसंग को लेकर होता है। राज्य कर्मचारियों के पारस्परिक हास-परिहास के बीच 'पुष्कर' नामक कर्मचारी के मुख से 'महाराज' शब्द निकल जाता है, जिसके लिए वह प्राणदण्ड के भावी संकट की आशंका से अत्यन्त ही भयभीत हो जाता है। मलयवती तथा काशिराज की कन्या वासन्ती, जिनका उद्धार विक्रम मित्र के सैनिकों ने किया है, आती है और उसके संकट-मुक्ति का आश्वासन देती है। मलयवती पुष्कर को सहस्रदल कमल लाने के बहाने बाहर भेज देती है। वासन्ती को विश्वास नहीं है कि पुष्कर दण्ड से बच जायेगा, क्योंकि उसे विक्रम मित्र की न्यायप्रियता और दृढ़ निश्चय की भली-भाँति जानकारी है। मलयवती और वासन्ती की पारस्परिक बातचीत से पाठकों को यह जानकारी हो जाती है कि विक्रममित्र कितना त्यागी, शूर और दृढ़ निश्चयी है। इसी बीच एक दूसरी प्रासंगिक घटना भी घटित हो जाती है। शुंग वंश के कुमार सेनानी देवभूति श्रेष्ठि की कुमारी कन्या कौमुदी का विवाह-मण्डप से ही अपहरण कर लेता है। इस समाचार से विक्रम मित्र अत्यन्त क्षुब्ध हो जाते हैं। उसके शासन में उनके दो आदमियों द्वारा नीति और धर्म की हत्या की जाय, उन्हें स्वीकार नहीं है। इसे वे राज्य का अपमान मानते हैं। देवभूति शुंग साम्राज्य में काशी के शासक हैं। विक्रम मित्र, देवभूति को कौमुदी समेत पकड़ लाने के लिए मेघरुद्र (कालिदास) के नेतृत्व में सैनिकों को भेजने का आदेश देते हैं।

प्रथम अंक में ही मलयवती और वासन्ती की बातचीत से यह आभास मिल जाता है कि मलयवती का झुकाव कुमार विषमशील की ओर है और वासन्ती अपने जीवन से निराश है। वह आत्महत्या द्वारा इस जीवन को समाप्त कर देना चाहती है। उसे इस लोकापवाद की आत्म-ग्लानि है कि वह एक यवन सेनापति द्वारा भगायी गयी काशिराज की पुत्री है। यद्यपि वह निर्दोष और सर्वथा पवित्र है, किन्तु लोकोपवाद के कारण उसमें आत्महीनता की भावना आ गयी है। कालिदास की रचनाओं और उनके आकर्षक व्यक्तित्व पर वह मुग्ध है।

द्वितीय अंक

नाटक के द्वितीय अंक में राष्ट्रीय एकता के भाव पक्ष पर विशेष जोर दिया गया है। द्वितीय अंक की घटना भी विदिशा प्रासाद के भीतरी कक्ष से सम्बन्धित है। शुंग साम्राज्य कुरु प्रदेश तक फैला है, उसके पश्चिम यवन शासन है, जिसकी राजधानी तक्षशिला (पेशावर) है। उसका शासक अन्तलिखित है। दोनों राज्यों के सीमा के सैनिकों में परस्पर कुछ विवाद हो जाता है, जिसमें शुंग शासक बड़ा कड़ा रुख अपनाता है। इसमें यवन शासक 'अन्तलिखित' और उसका मन्त्री हलोदर (हालिओदर) दोनों आतंकित और क्षुब्ध हो जाते हैं। हलोदर भारतीय जीवन और भारतीय संस्कृति के प्रति अत्यन्त ही आस्था रखता है। वह श्रीकृष्ण का भक्त है। वह दोनों राज्यों की मैत्री को दोनों देशों की प्रजा के लिए कल्याणकारी मानता है और शासक से अनुमति लेकर सन्धि का प्रस्ताव लेकर विदिशा पहुँच जाता है। हलोदर विदिशा में उस समय पहुँचता है, जबकि कालिदास (मेघरुद्र) सेना सहित विक्रम मित्र के आदेश से यवन श्रेष्ठि पुत्री कौमुदी के उद्धार के लिए देवभूति को पकड़ने के लिए जा चुके हैं। कालिदास भी मलयवती और वासन्ती की भाँति ही राजाश्रय में पालित वह व्यक्ति है, जिसका उद्धार विक्रम मित्र ने बौद्धों के विहार से किया। 

विदिशा में विक्रम मित्र से हलोदर की मैत्री वार्ता होती है और भारतीय संस्कृति के नये अध्याय का प्रारम्भ होता है। हलोदर प्रजा के हित की सारी शर्तों को मानते हुए विदिशा में शान्ति का स्तम्भ स्थापित करने का प्रस्ताव रखता है, जिसे विक्रम मित्र मान लेता है। हलोदर अपने कुशल शिल्पियों को शीलभद्र नामक कलाकार के नेतृत्व में इस शुभ कार्य के लिए समर्पित करता है। उसके बाद ही सैनिक देवभूति और कौमुदी को लेकर पहुँच जाते हैं। एकान्त पाकर वासन्ती कालिदास को विजयी कार्तिकेय का सम्बोधन कर माला पहनाकर उनका स्वागत करती है और बिना किसी रक्तपात के विजय प्राप्ति के लिए प्रसन्नता व्यक्त करती है। इसी बीच विक्रम मित्र पहुँच जाते हैं। वासन्ती और कालिदास सहम जाते हैं। विक्रम मित्र वासन्ती से कहते हैं कि तुम्हारे पिता अभी आ रहे हैं और वे तुम्हें लेकर काशी जायेंगे। साथ ही वे कालिदास को भी माँग रहे हैं। वासन्ती आचार्य के पास ही रहने की इच्छा व्यक्त करती है। दूसरी ओर कालिदास भी जाना नहीं चाहते। वे कुमार विषमशील का राज कवि, अन्तरंग सखा बनकर रहने की इच्छा प्रकट करते हैं।

तृतीय अंक

नाटक के तीसरे अंक की घटना अवन्ति में घटित होती है। इसमें गर्दभिल्ल, महेन्द्रादित्य के पुत्र विषमशील के नेतृत्व में भारत के अनेक वीर सेनानी और शासक एकजुट होकर शक क्षत्रपों को पराजित करते हैं और मालवा का उद्धार करके शकों के विरुद्ध इस अभियान में सारे सहयोग और सफलता का श्रेय शुंग सेनापति विक्रम मित्र को है। उनके प्रभाव कलिंग के जैन क्षारबेलि, दक्षिण के स्वाशितफर्णि, विगत, काशिराज आदि अनेक महारथी इस अभियान में सम्मिलित होते हैं। विक्रम मित्र के प्रभाव से जैन आचार्य कालक जिन्होंने शकों को इस देश पर आक्रमण करने के लिए उत्साहित किया है, अपनी गलती का अनुभव करते हैं। उसमें देश के नव-निर्माण की भावना का उदय होता है। वे अवन्ति के निर्माण में जैन मठों में एकत्र सारी सम्पत्ति सोना, चाँदी, दुर्लभ रत्न आदि को समर्पित करने का संकल्प लेते हैं।

अस्सी वर्षीय वृद्ध विक्रम मित्र को कुमार विषमशील की सफलता से अतीव प्रसन्नता होती है। वे स्वेच्छा से साकेत, मगध, विदिशा समेत सारी प्रजा का पालन-भार विषमशील पर छोड़ देते हैं। राज्याभिषेक के उपरान्त विषमशील के समक्ष देवभूति और कौमुदी का मामला न्याय के लिए प्रस्तुत किया जाता है। देवभूति अपने अपराध के लिए स्वयं देश निर्वासन स्वीकार करता है। मलयवती का विवाह कुमार विषमशील से तथा वासन्ती का विवाह कालिदास के साथ सम्पन्न होता है। कालिदास की इच्छानुसार 'विक्रम मित्र' का पूर्वार्द्ध 'विक्रम' और पिता 'महेन्द्रादित्य' का उत्तरार्द्ध 'आदित्य' शब्द मिलाकर विषमशील का नाम विक्रमादित्य रखा जाता है। कौमुदी और देवभूति के देश छोड़ देने से साकेत और पाटलिपुत्र भी अवन्ति के अधिकार में आ जाता है। अवन्ति के इस उद्धार पर नये विक्रम संवत् का प्रवर्तन होता है।

अंततः यह नाटक यह संदेश देने में सफल रहता है कि राष्ट्र की शक्ति उसकी सांस्कृतिक जड़ों में निहित होती है। लक्ष्मी नारायण मिश्र जी ने अपनी तत्सम प्रधान और ओजस्वी भाषा के माध्यम से उस कालखंड को जीवंत कर दिया है, जब भारत अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त कर रहा था। यह नाटक पाठकों में देशप्रेम और अपने इतिहास के प्रति गौरव की भावना जगाता है।

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