खुद को माफ करना सीखो और आगे बढ़ो

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खुद को माफ करना सीखो और आगे बढ़ो जीवन की यात्रा में हम सब कई बार ऐसे मोड़ पर खड़े हो जाते हैं जहाँ हमारी अपनी ही गलतियाँ हमें सबसे ज्यादा कष्ट देती है

खुद को माफ करना सीखो और आगे बढ़ो

जीवन की यात्रा में हम सब कई बार ऐसे मोड़ पर खड़े हो जाते हैं जहाँ हमारी अपनी ही गलतियाँ हमें सबसे ज्यादा कष्ट देती हैं। कोई पुरानी बात, कोई निर्णय जो गलत साबित हुआ, कोई शब्द जो अनजाने में किसी को चोट पहुँचा गया, या कोई ऐसा व्यवहार जिसके बाद हम खुद से ही नज़रें नहीं मिला पाते—ये सारी घटनाएँ मन के भीतर एक भारी बोझ बनकर बैठ जाती हैं। हम दूसरों को माफ करने में कहीं न कहीं संकोच करते हैं, पर खुद को माफ करना अक्सर उससे भी कठिन लगता है। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि हम खुद से सबसे ज्यादा उम्मीद रखते हैं। हम चाहते हैं कि हम सदा सही रहें, सदा समझदार रहें, सदा बेहतर बनते रहें। जब ऐसा नहीं होता, तो खुद को सज़ा देने की प्रवृत्ति स्वाभाविक-सी हो जाती है।पर यह सज़ा कितनी देर तक चल सकती है? महीनों, सालों, कभी-कभी तो पूरी ज़िंदगी? और इस दौरान क्या होता है? हमारा मन बार-बार उसी पुरानी घटना में लौटता है। हम सोचते हैं—“अगर मैंने वो नहीं किया होता तो…”, “मैं कितना बेवकूफ था”, “मैं इसके लायक नहीं हूँ”। ये विचार न सिर्फ़ दर्द देते हैं, बल्कि हमें वर्तमान में जीने से रोकते हैं और भविष्य की संभावनाओं को भी धुंधला कर देते हैं।

खुद को माफ करना सीखो और आगे बढ़ो
हमारी ऊर्जा, हमारी रचनात्मकता, हमारा आत्मविश्वास—सब धीरे-धीरे इस आत्म-दंड के नीचे दबते चले जाते हैं।खुद को माफ करने का मतलब यह नहीं कि हम अपनी गलती को नकार दें या उसके परिणामों से मुंह मोड़ लें। ठीक इसके उलट—सच्ची माफी तभी शुरू होती है जब हम पूरी ईमानदारी से स्वीकार करते हैं कि हाँ, मैंने गलती की। मैंने किसी को ठेस पहुँचाई, खुद को नुकसान पहुँचाया या कोई ऐसा फैसला लिया जो गलत साबित हुआ। इस स्वीकृति में अपराधबोध होता है, पछतावा होता है, लेकिन साथ ही यह भी समझ आती है कि मैं कोई देवता नहीं हूँ। मैं इंसान हूँ। इंसान गलतियाँ करता है। यही उसकी सीखने की प्रक्रिया है।जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं, तो मन थोड़ा हल्का होता है। फिर आता है वह कठिन लेकिन ज़रूरी कदम—खुद से कहना कि “मैंने जो किया, वो उस समय मेरे पास उपलब्ध समझ, भावनाओं और परिस्थितियों के अनुसार किया। हो सकता है वो सही न रहा हो, लेकिन उस पल में मैंने वैसा ही किया जैसा मैं कर सकता था। अब मैं उससे बेहतर करना चाहता हूँ।” यह वाक्य जितना आसान लगता है, उतना आसान नहीं होता। कई बार मन कहता है—“नहीं, मैं और बेहतर कर सकता था, मैंने कोशिश ही नहीं की।” पर याद रखें, अतीत में हम वही थे जो उस समय थे—पूर्ण नहीं, अधूरे, सीखते हुए, भटकते हुए।

खुद को माफ करने से डर लगता है क्योंकि हमें लगता है कि अगर हमने खुद को माफ कर दिया तो हम दोबारा वही गलती कर बैठेंगे। लेकिन सच तो यह है कि सख्त आत्म-दंड से ज्यादा प्रभावी होता है आत्म-करुणा। जब हम खुद के प्रति दयालु होते हैं, तब हमारा मन सुरक्षित महसूस करता है। सुरक्षित मन में सीखने की क्षमता बढ़ती है। हम सोचते हैं—“अब मैं क्या अलग कर सकता हूँ? अब मैं कैसे बेहतर बन सकता हूँ?” यह सवाल हमें आगे ले जाते हैं, जबकि आत्म-निंदा हमें पीछे धकेलती रहती है।कई बार हमें लगता है कि खुद को माफ करने का हक़ ही नहीं है, खासकर तब जब हमारी गलती से किसी और को गहरा दर्द हुआ हो। लेकिन यहीं पर समझने की ज़रूरत है कि माफी देने और माफी लेने के दो अलग-अलग आयाम हैं। अगर संभव हो तो पीड़ित से माफी माँगें, मरहम लगाने की कोशिश करें, जिम्मेदारी लें। पर अगर वो माफ़ न भी करें, तब भी आपको खुद को सज़ा देते रहना कोई न्याय नहीं है। खुद को माफ करना इसका मतलब नहीं कि हम दूसरे के दर्द को कम करके आँक रहे हैं। इसका मतलब है कि हम अब उस दर्द को और बढ़ाने से बच रहे हैं—अपने और दूसरों दोनों के लिए।

जब हम खुद को माफ करते हैं, तो एक अजीब-सी आज़ादी मिलती है। मन का बोझ हल्का होता है। नींद बेहतर आती है। रिश्तों में हम ज्यादा मौजूद रह पाते हैं। नए काम करने की हिम्मत लौट आती है। हम समझ जाते हैं कि जीवन एक लंबी सीख है, जिसमें असफलताएँ, गलतियाँ और पछतावे भी शामिल हैं। और इन सबके बावजूद हम प्यार के लायक हैं, सम्मान के लायक हैं, आगे बढ़ने के लायक हैं।तो आज से ही छोटा-सा कदम उठाएँ। शीशे के सामने खड़े होकर या मन ही मन खुद से कहें—“मैंने जो किया, वो हो चुका। मैं उससे सीख रहा हूँ। मैं खुद को माफ करता हूँ। अब मैं आगे बढ़ना चाहता हूँ।” यह वाक्य जितनी बार दोहराएँगे, उतना ही मन हल्का होगा। और धीरे-धीरे आप पाएँगे कि वही गलती जो कभी आपको रातों की नींद हराम करती थी, अब सिर्फ एक पुरानी तस्वीर बनकर रह गई है—जिसे देखकर अब दर्द कम, बल्कि समझ ज्यादा आती है।

खुद को माफ करना कोई कमज़ोरी नहीं है। यह सबसे बड़ी ताकत है। क्योंकि जब हम खुद से दोस्त बन जाते हैं, तब दुनिया से लड़ने की असली हिम्मत आती है। तो आज से ही इस दोस्ती की शुरुआत करें। खुद को गले लगाएँ। खुद को कहें—“तू काफी है। तू इंसान है। और इंसान होने का मतलब है—गलती करना और फिर भी प्यार पाने लायक रहना।”आगे बढ़ो। जीवन अभी बाकी है।

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