सातवें माले का आदमी व्यंग्य कथा वह अब भीड़ का आदमी नहीं रहा था—या यूँ कहें कि उसे लगने लगा था कि वह भीड़ से ऊपर उठ चुका है। उसके पास अब धन था, अकूत धन
सातवें माले का आदमी
वह अब भीड़ का आदमी नहीं रहा था—या यूँ कहें कि उसे लगने लगा था कि वह भीड़ से ऊपर उठ चुका है। उसके पास अब धन था, अकूत धन। इतना धन कि संभालते-संभालते हाथ काँपने लगें; इतना कि पुराने, टूटे-फूटे मकान की दीवारें उसे काटने दौड़ें। वही मकान, जिसमें कभी वह सिर झुकाकर रहता था, अब उसे चिढ़ाने लगा था—जैसे कह रहा हो, अब तू इससे बड़ा हो चुका है।
पर पड़ोसी… पड़ोसी तो वही थे। न कोई सलाम, न कोई ‘जी-हुज़ूर’।
रिश्तेदार भी नहीं बदले। उसे लगा था कि इतने धन के बाद तो रिश्तेदार भी बदल जाएँगे—या तो नए रिश्तेदार बन जाएँगे, या ये पुराने, जो पहले उसे कोई भाव नहीं देते थे, अब देने लगेंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। यह बात उसे बुरी तरह कचोटने लगी।
यह क्या बात हुई?
अब उसके पास धन है, फिर भी पड़ोसी वैसे ही पेश आते हैं जैसे पहले। बल्कि उसे लगता, जैसे कुछ तो उसके ख़िलाफ़ साज़िश रच रहे हों। उसने यह धन किसके लिए कमाया था? इसी दिन के लिए न—जब लोग उसे देखकर उठ खड़े हों, जब रिश्तेदार उसकी तरफ देखकर अपनी आवाज़ धीमी कर लें, जब पड़ोसी उसके नाम के साथ ‘साहब’ जोड़ें।
दिन-रात उसका दिमाग इसी उधेड़बुन में लगा रहता—कैसे इस धन से इज़्ज़त खरीदी जाए। धन तो बहुत कमा लिया था, पर लगता था जैसे असली चीज़ अभी हाथ नहीं आई।
वह झुंझलाकर सोचता—इन लोगों को पता भी है या नहीं कि मैं चाहूँ तो इन्हें बीच बाज़ार बेच सकता हूँ?
वह उन दिनों को याद करता, जब वह औसत-सी ज़िंदगी जी रहा था। उस ज़िंदगी से उसे कोफ़्त होती थी। अपने पड़ोसियों से—कि यार, ये कहाँ से इतना धन कमा लेते हैं। तब वह खुद इन पड़ोसियों को कितना भाव देता था। रात-दिन इसी धुन में रहता कि किसी तरह उनके जैसा पैसा उसके पास भी आ जाए। पड़ोस में जिनके घर बड़े थे, जिनकी गाड़ियाँ चमकती थीं, जिनके बच्चे अंग्रेज़ी में रोते थे—उन्हें देखकर उसके भीतर कुछ फूलता नहीं था, बल्कि सिकुड़ता था। ईर्ष्या थी, दाह था—रोज़ एक जाप, एक विलाप: देख लेना, एक दिन इन सब से ज़्यादा धन कमा कर दिखाऊँगा।
पत्नी चिंतित रहती थी। उसके काम में मन नहीं लगता था। बस रात-दिन पड़ोसियों को गरियाता रहता।
“सब दो नंबर का धंधा है। ये देख रहे हो न शर्मा का बच्चा, वर्मा का साला—सब साले कमीने हैं, दो नंबर के धंधेबाज़। ईमानदारी से आजकल कौन इतना ऊपर पहुँचा है?”
जैसे वह यह सब खुद को बहलाने के लिए बोलता था। और यहीं से उसकी कुंठा ने आकार लेना शुरू किया।
एक दिन उसे सुराख़ मिल गया—दो नंबर के धंधे का सुराख़।
“ब्रोकर के धंधे में आ जाओ। आजकल ब्लैक को व्हाइट करना कला है। दस टके का धंधा है, लेकिन अच्छा-मोटा पैसा कर सकते हो।”
पहला सौदा ऐसे हुआ, जैसे गलती से जीत मिल गई हो।
फिर डीलें मिलती चली गईं। उसे लगा, मेहनत रंग ला रही है। क़िस्मत ने उसका हाथ पकड़ लिया—और फिर पैसा आने लगा।
इतना कि गिनने में समय लगने लगा। पैसा गिनने की मशीन आ गई।इतना कि वह अचानक बहुत व्यस्त रहने लगा।
पर उसकी हसरतें खत्म नहीं हुईं।
एक दिन उसने ऐलान किया—
“मैं सात मंज़िला इमारत बनवा रहा हूँ।”
सात मंज़िला ही क्यों?
ठीक सामने शर्मा-जी की छह मंज़िला इमारत थी।
वह उससे एक मंज़िल ज़्यादा चाहता था।
सिर्फ ऊँचाई नहीं—शर्मा-जी का गुरूर तोड़ना चाहता था।
अब उसके पास अकूत धन था; वह कर सकता था।
जैसे हर मंज़िल उसके पुराने अपमान का बदला हो।
हर फ़र्श पर एक अहंकार बिछा था।
इमारत खड़ी हो गई—चमकदार, ऊँची, आसपास की हर इमारत से ऊँची। शर्मा-जी की इमारत, जो उसे शुरू से चिढ़ाती थी, अब पीछे रह गई। कहीं उसे सुकून मिला। अब वह छत पर टहलता।
नीचे देखता तो लोग उसे बौने लगते।
चलते हुए आदमी—मक्खियों जैसे।
उसे लगता, चाहे तो एक फूँक में सबको उड़ा दे।
पर एक कमी खलने लगी—उस छत पर वह अकेला था।
कोई साथ नहीं चढ़ता था।
सब बहाने बनाते—“अरे, चढ़ा नहीं जाता… घुटने दुखते हैं।”
“लिफ़्ट है न… रस्तोगी जी, आइए तो सही।”
“नहीं यार… आपकी लिफ़्ट का कोई भरोसा नहीं। कभी भी रुक सकती है। क्या पता बीच रास्ते में अटक जाए। हमारे घर की एक मंज़िल की सीढ़ी नहीं चढ़ी जाती।”
कोई तैयार नहीं होता। सब बहाने लगाते। हुआ भी कई बार—वह लिफ़्ट के सहारे चढ़ते वक्त अटक गया। अटका ही रह गया। बड़े मुश्किल से उसके घरवालों ने निकाला। यह बात पूरे इलाके में फैल गई—कि यार, इस आदमी की लिफ़्ट का कोई भरोसा नहीं।
उसे भी लिफ़्ट से डर लगने लगा था। खुद सीढ़ियों से ही जाता। लिफ़्ट जैसे उसे चिढ़ाती थी।
मनो कह रही हो कि ऊपर जाने का रास्ता हमेशा भरोसेमंद नहीं होता।
उसकी कुंठा और बढ़ गई।
ये लोग अपने आपको समझते क्या हैं?
वह उन्हें ऊपर लाना चाहता था, अपना मकान दिखाना चाहता था, छत से शहर दिखाना चाहता था।
पर किसी को फुर्सत ही नहीं थी। सब अपनी रोज़मर्रा में उलझे थे। किसी को इससे कोई मतलब नहीं था कि पड़ोसी अब पैसेवाला हो गया है।
वह बुदबुदाता—
“सब जलते हैं… सब शर्मा के बहकावे में हैं। वही मेरे ख़िलाफ़ लोगों को भड़का रहा है। समाज का अध्यक्ष बन बैठा है न वह।”
अब उसका ग़ुस्सा साफ़-साफ़ नाम लेने लगा—शर्मा। उसे लगने लगा कि एक मंज़िल और बढ़ाकर भी शर्मा का गुरूर वह पूरा नहीं तोड़ सका।
एक दिन पता लगा—शर्मा ने अपनी बेटी का रिश्ता तय कर दिया।
“यार, ये शर्मा का बच्चा… ऐसा क्या जुगाड़ लगाता है? मेरे पास क्यों नहीं आते रिश्ते? इतना पैसेवाला हूँ मैं… मेरे पास तो लड़के के रिश्ते के लिए लोग नाक रगड़ते आने चाहिए थे।”
वह सोचता—ज़रूर यही भड़काता होगा। “ये शर्मा का बच्चा… इसका इलाज करना पड़ेगा।”
फिर उसे एक और तरकीब सूझी।
“नहीं, इसका भी तरीका है। ये शर्मा का बच्चा मोहल्ला समिति का अध्यक्ष बना हुआ है न—इसीलिए ज़्यादा फड़फड़ा रहा है। अब जबकि मैं इस मोहल्ले का सबसे धनी आदमी हूँ, तो यह पद मेरा होना चाहिए।”
उसने तय किया—मैं सम्मान समिति का अध्यक्ष बनूँगा।
यह पद उसे वैधता देगा।
एक शाम वह फिर छत पर चढ़ा। इस बार ऊपर पहुँचते ही उसे डर लगा।
इतनी ऊँचाई पर खड़े होकर पहली बार उसे महसूस हुआ—ऊपर होना हमेशा ताक़त नहीं देता, कभी-कभी गिरने की संभावना भी बढ़ा देता है।
उसने चारों ओर देखा। सब इमारतें छोटी लग रही थीं।
फिर सामने वाले प्लॉट पर उसकी नज़र गई—वहाँ एक नई इमारत खड़ी हो रही थी। एक ठेकेदार नीचे खड़ा मज़दूरों को निर्देश दे रहा था। वह नीचे उतरा।
उसने ठेकेदार को बुलाया। वही ठेकेदार था जिसने उसकी इमारत बनवाई थी।
“किसकी बन रही है ये बिल्डिंग?”
“रस्तोगी साहब की। उनके साले साहब बड़े बिल्डर हैं, वही बनवा रहे हैं।”
“कितनी मंज़िल?”
“दस मंज़िल का प्लान है।”
उसे लगा जैसे उसका साम्राज्य ढहने लगा हो। संभलकर बोला—
“देखिए, आप अपनी ईमारत का काम भी दुबारा शुरू करिए । अगले हफ्ते ही काम शुरू कर दीजिए। चार मंज़िल और बढ़ाइए। और हाँ, लिफ़्ट ठीक कराइए—बार-बार खराब हो जाती है।”
उसे थोड़ी तसल्ली मिली। लेकिन नीचे उतरते ही उसकी साँसें घुटने लगीं। वह वापस अपनी इमारत पर चढ़ गया।
पर उसी रात, उसी छत पर खड़ा वह आदमी पहली बार काँप रहा था।
डर इस बात का नहीं था कि उसकी इमारत गिर जाएगी—डर इस बात का था कि कहीं कोई और रस्तोगी का बच्चा उससे आगे न निकल जाए। उसकी इमारत तो वैसे ही ग्यारह मंज़िल के प्लान के हिसाब से डिज़ाइन थी। क्या हुआ अगर कल कोई और कोठारी,अग्रवाल,श्रीवास्तव का बच्चा और और अपनी इमारत ग्यारह मंज़िल तक ठोक दे? फिर क्या करेगा वह?
शर्मा का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूमने लगा।
साज़िशें।
“नहीं, यह सब शर्मा का किया धरा है … उसकी खुद की औकात नहीं की ६ मजिल से एक और मजिल बढ़ा सके । ज़रूर उस साले ने रस्तोगी को भड़काया होगा। रस्तोगी की खुद की तो क्या औक़ात! इसलिए उसने अपने साले को बुलाया है—मेरे सीने पर मूँग दलने के लिए। बिल्डर है तो कहीं भी ठोक देता है…यहाँ क्या जरोरोअत थी इसी कॉलोनी में l ज़रूर इसके काग़ज़ात अधूरे होंगे।”
वह साज़िशें सोचने लगा।
क्या किया जा सकता है? कैसे काम रोका जा सकता है?
निगम में शिकायत कर दूँ? कोर्ट से स्टे लगवा दूँ?
फिर उसे आशंका घेरने लगी—अगर उसकी अपनी इमारत पर ही स्टे लग गया तो?
इसी आशंका से वह काँपने लगा।
उसे लगने लगा कि नीचे सब उसके ख़िलाफ़ कुछ-न-कुछ रच रहे हैं।
तभी ऊपर से एक हवाई जहाज़ गुज़रा।
उसने घबराकर सिर पर हाथ रख लिया—जैसे कोई बम गिरने वाला हो।
चारों तरफ़ अँधेरा था। नीचे रोशनियाँ जगमगा रही थीं।
ऊपर चाँद बादलों की ओट से उसे घूरता हुआ-सा लगा।
हड़बड़ाहट में वह लिफ़्ट की तरफ़ भागा, फिर रुक गया—कहीं लिफ़्ट फिर अटक गई तो?
वह सीढ़ियों से उतरने लगा।
हर सीढ़ी पर उसे लगा कि वह कुछ खो रहा है—जैसे उसका कमाया हुआ अकूत धन हर सीढ़ी के साथ बिखरता हुआ हवा में उड़ रहा हो।
वह नीचे पहुँचा—बदहवास-सा।
चीखना चाहता था वह। ऊपर चीखता तो शायद उसकी आवाज़ कोई न सुनता। लेकिन किस पर? यहाँ नीचे भी उसे सुनने वाला कोई नहीं था।
नीचे लोग वैसे ही थे—उसकी मनोदशा से बेख़बर।
किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था।
उसके लुटे हुए साम्राज्य पर दो शब्द कहने के लिए कोई उसके पास नहीं रुका।
लोग वैसे ही थे जैसे पहले।
पर वह…
उसे लगा कि उसे सरेआम लूट लिया गया है।
क्या कोई उसकी एफआईआर दर्ज करेगा? वह सबके ख़िलाफ़—इस अँधेरे के ख़िलाफ़, जो इतनी बेचैनी से उसे चिढ़ा रहा था।
उसने आकाश की ओर हाथ बढ़ाया—शायद उस चाँद से शिकायत करने के लिए, जो अब भी बादलों में छिपकर उसे घूर रहा था।
उसने आरोप लगाने चाहे—उस चाँद पर, जो शर्मा के बच्चे को भी उतनी ही चाँदनी दे रहा था जितनी उसे।
और फिर—ये शर्मा, वर्मा, रस्तोगी के बच्चे…
इनसे तो उसे शिकायत है ही।


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