लोकगीत की लोकप्रियता में नारियों की भूमिका लोकगीत भारतीय संस्कृति की वह जीवंत धारा हैं जो सदियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से बहती आई है। इन गीतों की
लोकगीत की लोकप्रियता में नारियों की भूमिका
लोकगीत भारतीय संस्कृति की वह जीवंत धारा हैं जो सदियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से बहती आई है। इन गीतों की लोकप्रियता का आधार केवल उनकी सरल भाषा, मधुर लय या विषय-वस्तु ही नहीं है, बल्कि उनमें निहित सामूहिक भावनाओं और जीवन की सच्ची अभिव्यक्ति है। इस लोकप्रियता को बनाए रखने और फैलाने में नारियों की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण रही है। वास्तव में लोकगीतों का अधिकांश हिस्सा नारियों के जीवन-संघर्ष, भावनाओं, उत्सवों और दैनिक क्रियाकलापों से ही उपजा है तथा इन्हें गाने, संरक्षित करने और पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाने का कार्य मुख्य रूप से महिलाओं ने ही किया है।
दैनिक जीवन और श्रम में लोकगीत
ग्रामीण भारत में जहां पुरुष खेतों में श्रम करते थे, वहीं महिलाएं घर-आंगन से लेकर खेतों तक हर कार्य में सक्रिय रहती थीं। धान रोपते समय रोपनी गीत, अनाज पीसते समय चरखा या जांता के गीत, झूला झूलते हुए कजरी, सावन के मल्हार, मेहंदी लगाते हुए विवाह गीत, सोहर, बिदाई गीत, देवी-पूजन के गीत—ये सभी अवसर महिलाओं के द्वारा ही गाए जाते थे। ये गीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं थे, बल्कि सामूहिक श्रम को हल्का बनाने, एक-दूसरे के दुख-दर्द में सहभागिता दिखाने और भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम भी थे। जब महिलाएं समूह में मिलकर गाती थीं तो उनकी आवाजें एक साथ उठतीं, एक लय में बहतीं और आस-पास के गांवों तक गूंजतीं। इसी सामूहिक गायन ने लोकगीतों को व्यापक लोकप्रियता दी। अकेले गाया गया गीत कितना भी सुंदर हो, समूह में गाए गए गीत की गूंज और प्रभाव कहीं अधिक होता है।
लोकगीतों के माध्यम से स्त्री-संवेदना और सामाजिक व्यंग्य
नारियां न केवल लोकगीतों की गायिका रहीं, बल्कि इनकी रचयिता भी रहीं। अधिकांश लोकगीत अज्ञात रचनाकारों के होते हैं, परंतु जिनमें स्त्री-संवेदना की गहरी झलक मिलती है—जैसे बिरहा, विरह-वेदना, ससुराल में होने वाली पीड़ा, मायके की याद, पति के प्रति प्रेम-शिकायत या विद्रोह के स्वर—वे स्पष्ट रूप से महिलाओं के मन से निकले हैं। अवध, बुंदेलखंड, ब्रज, छत्तीसगढ़, गढ़वाल, राजस्थान, हरियाणा, बिहार के अंगिका क्षेत्र—हर जगह महिलाओं ने अपने अनुभवों को गीतों में पिरोया। ये गीत केवल व्यक्तिगत भावनाओं तक सीमित नहीं रहते थे, बल्कि सामाजिक यथास्थिति पर भी व्यंग्य करते थे। विवाह के बाद ससुराल में मिलने वाली अधीनता, दहेज की मार, पति की हिंसा, कन्या-भ्रूण हत्या जैसी व्यथाओं को ये गीत सूक्ष्म लेकिन प्रभावी ढंग से उजागर करते हैं। इस प्रकार महिलाएं लोकगीतों के माध्यम से अपनी आवाज को समाज तक पहुंचाती रहीं और साथ ही लोकगीतों को जीवंत रखा।लोकगीतों की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण उनका उत्सवों और संस्कारों से जुड़ाव भी है। जन्म से लेकर मृत्यु तक के हर संस्कार में महिलाओं की उपस्थिति अनिवार्य होती है। बच्चे के जन्म पर सोहर गाकर आशीर्वाद देना, विवाह में बन्नी-बन्ना के गीत, होली-फाग पर फाग गीत, तीज-त्योहारों पर विशेष गीत—ये सभी अवसर महिलाओं द्वारा ही सजाए-संवारे जाते हैं। इन अवसरों पर गाए जाने वाले गीत पीढ़ियों तक याद रखे जाते हैं क्योंकि इन्हें बार-बार दोहराया जाता है। माताएं बेटियों को, सास बहुओं को, दादी पोतियों को ये गीत सिखाती हैं। इस मौखिक हस्तांतरण में महिलाओं की भूमिका बिना किसी लिखित माध्यम के संस्कृति को जीवित रखने वाली कड़ी के रूप में काम करती है। यदि महिलाएं ये गीत न गातीं, न सिखातीं तो बहुत से लोकगीत समय की धारा में बह जाते।
आधुनिक युग में लोकगीतों की लोकप्रियता और नारी की भूमिका
आधुनिक काल में भी यह भूमिका कम नहीं हुई है। जब रेडियो, दूरदर्शन और अब सोशल मीडिया के युग में लोकगीत फैल रहे हैं तो भी मूल स्रोत वही ग्रामीण महिलाएं हैं जिन्होंने सदियों से इन्हें संजोया। मालिनी अवस्थी जैसी कलाकारों ने लोकगीतों को राष्ट्रीय मंच पर पहुंचाया, परंतु उनकी सफलता का आधार उन अनगिनत अज्ञात ग्रामीण महिलाओं के गायन में छिपा है जिन्होंने कभी मंच की रोशनी नहीं देखी, फिर भी गीतों को जीवित रखा। आज भी गांवों में औरतें खेतों में, आंगन में, त्योहारों पर गाती हैं और नई पीढ़ी को सिखाती हैं।इस प्रकार लोकगीतों की लोकप्रियता का श्रेय मुख्यतः नारियों को जाता है। उन्होंने न केवल इन्हें गाया, रचा और संरक्षित किया, बल्कि इनके माध्यम से अपनी संवेदनाओं, विरोध और आकांक्षाओं को भी समाज के सामने रखा। लोकगीत यदि आज भी जीवंत हैं, यदि आज भी गांव-गांव, घर-घर में गूंजते हैं तो इसका सबसे बड़ा कारण महिलाओं की वह अटूट श्रम-परंपरा, भावुकता और सांस्कृतिक जिम्मेदारी है जो सदियों से इन गीतों को अमर बनाए हुए है। नारी के बिना लोकगीत अधूरे हैं और लोकगीत के बिना भारतीय लोक-संस्कृति की कल्पना भी नहीं की जा सकती।


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