बाल अधिकार से बिगड़े बच्चे

SHARE:

बाल अधिकार से बिगड़े बच्चे बाल अधिकार की शब्दावली में पले नन्हे हाथ, अब दूसरे नन्हे हाथों की धड़कन जाँचते हैं। पोस्टरों में अब भी मुस्कुराता है सुंदर

बाल अधिकार से बिगड़े बच्चे


बाल अधिकार की शब्दावली में पले नन्हे हाथ,
अब दूसरे नन्हे हाथों की धड़कन जाँचते हैं।
पोस्टरों में अब भी मुस्कुराता है सुंदर केरल,
पर गलियों में डर की नमी फैलती जा रही है।
डाँट एक आपराधिक फुसफुसाहट बन गई,
सीमाएँ—पुरानी नैतिक कथाएँ।
स्कूल रजिस्टरों में सुरक्षित हैं बच्चे,
आँगनों में घायल पड़ी है मासूमियत।
कानून चमकता है फ़ाइलों की रोशनी में,
और समय—बच्चों के ख़िलाफ़ गवाही देता है।

भेद का भ्रम

जब मर्दवादी शौविनिस्ट बढ़ते हैं,
वे दंभ की थाली सजाकर बैठते हैं।
और नारीवादी शौविनिस्ट—
कौशल से कटाक्ष परोसने में मग्न रहते हैं।

एक ओर पेट भर अहंकार,
दूसरी ओर बुद्धि का तीखा ज़हर।
दोनों की रसोई में
मनुष्यता भूखी ही रहती है।

तो बताओ—भेद क्या है?
दंभ का अतिरेक, या चतुरता का उन्माद?"


निष्फल उजास

बाल अधिकार से बिगड़े बच्चे
चाँदनी से झरता हुआ एक मौन मन,
मोगरे की पंखुड़ियों-सी बिखरी श्वेतता।
नव तनों पर न मुरझाने वाली कोमल आभा,
सुगंधहीन सही—
रात का यह गूढ़ विलाप।

धुँधली, सूजी हुई आँखों संग
जब चेहरा भोर की गोद में टिकता है,
दिन का सूर्य
एक हल्की हँसी को झकझोरकर
खेल-खेल में चमक उठता है।

थकी हुई दोपहर के कोनपल-फूल,
मौन में झुके हुए।
ओ तारों!
कितनी शुष्क हैं
तुम्हारी भावनाओं की धरातलें—
यह सोचकर
मेरी मुस्कान भी टूट जाती है।

मेरे उस आत्म-शरीर में
जो कभी खिलना नहीं जानता,
निराशा के धुएँ
क्षण-क्षण परतें बदलते हैं।

हाय!
मेरे विचार, मेरे भाव—
उजास होते हुए भी
कितने निष्फल,
कितने व्यर्थ।

कफ-नभ के ऋतु-गिद्ध
मन के अंधे वन में
आज एक गिद्ध को दुलारने की सनक जागी है,
मेरी नसों में अनजानी उड़ानें काँपती हैं।

उषा की पहली देह से
अगली उषा की अंतिम साँस तक,
खाँसी-पक्षी
कफ के चिपचिपे अंडों से
मेरी आत्मा की गुहाएँ भरते रहते हैं।

काल नभ में ऋतु गिद्ध

सूर्य पर बादलों का रोग उगलते हैं—
और मेरी हर क्षण-दृष्टि
धुँधले स्वप्न की राख बन झरती रहती है।"

संदेह की धरती पर जीवन
संदेह की धरती पर लगता है सुरक्षित सा मन,
अकेलापन भी जैसे पुरानी स्मृतियों का वचन।
मौन खड़ा है समय, बीते कल का साया लेकर,
आश्वासनों की लौ बुझी, धुआँ है चारों तरफ फैलकर।

संघर्ष की भूमि पर वादे जलकर राख हुए,
वर्तमान के आकाश में निराशा के पंख हुए।
हर दिन जीना जैसे धीमे-धीमे हारना,
फिर भी साँसों का बोझ चुपचाप ढोना।

हताश जीवन भी चलने की जिद रखता है,
टूटा मन भी कहीं उम्मीद छुपा रखता है।


- Binoy.M.B,
Thrissur district, pincode:680581,
Kerala state, email:binoymb2008@gmail.com,
phone:9847245605(office)

COMMENTS

Leave a Reply

You may also like this -

Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका