कच्चे घरों के बीच पक्की उम्मीदों का सपना इस वर्ष के केन्द्रीय बजट से ग्रामीण क्षेत्रों को काफी आशाएं थी। बात चाहे घर की हो, सड़क की हो या फिर नलजल योज
कच्चे घरों के बीच पक्की उम्मीदों का सपना
इस वर्ष के केन्द्रीय बजट से ग्रामीण क्षेत्रों को काफी आशाएं थी। बात चाहे घर की हो, सड़क की हो या फिर नलजल योजना की, लोगों को उम्मीद थी कि सरकार गाँव के विकास के लिए बजट के पिटारे खोल देगी। इसके पीछे कई कारण भी हैं। आज भी देश के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्र विशेषकर दूर दराज के ग्रामीण क्षेत्र विकास कि योजनाओं में काफी पीछे चल रहे हैं। केवल उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों की बात करें तो इस पहाड़ी इलाके के दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को आवास जैसी अहम योजना भी देरी से पहुँचती है।
इसका एक उदाहरण सैलानी गाँव है। बागेश्वर जिला के गरुड़ ब्लॉक से लगभग 33 किमी दूर, पहाड़ों के बीच बसा यह गांव बाहर से जितना शांत दिखाई देता है, भीतर से उतना ही संघर्षों से भरा है। इस गाँव की पगडंडियों पर चलते हुए सबसे पहले जो बात ध्यान खींचती है, वह हैं मिट्टी, लकड़ी और टिन से बने कच्चे मकान, जिनकी दीवारें समय के साथ जर्जर हो चुकी हैं और छतें हर बारिश में डर पैदा करती हैं। कई बार इसके गिरने का खतरा भी बना रहता है, लेकिन ज्यादातर लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि वह इसकी मरम्मत भी करा सकें।
ग्रामीणों के जीवन स्तर को करीब से समझने के लिए जब हम इस गाँव में पहुँचे, तो हमने देखा कि बड़ी संख्या में परिवार कच्चे मकानों में रहने को मजबूर है। इन्हीं घरों में हम चार पांच परिवारों से भी मिले, जिनकी कहानियां और संघर्ष अलग-अलग होते हुए भी एक साझा सच्चाई सामने लाती है और वह है सरकारी योजनाओं का अभाव। हालांकि विभाग इस बात का दावा करता है कि गांव-गांव तक योजनाएं पहुंच रही हैं, लेकिन सैलानी गाँव में यह दावा कुछ कमजोर ही नजर आता है।
यहां हमारी पहली मुलाकात 76 वर्षीय इंद्र गड़िया से हुई। जिनके चेहरे से योजनाओं के लाभ से वंचित रहने की नाराजगी साफ झलक रही थी। उन्होंने कहा कि आजकल सुविधाओं की बातें बहुत होती हैं, लेकिन गाँव में सही जानकारी समय पर नहीं पहुँचती हैं। हालांकि कागजों पर यह योजनाएँ पूरी नजर आएंगी। अपने कच्चे मकान की हालत को देख कर वह कहते हैं कि मैंने प्रधानमंत्री आवास योजना के बारे में सुना तो जरूर है, लेकिन उसके लिए क्या करना होता है, यह बताने वाला कोई नहीं है। वह कहते हैं कि उनके सभी बच्चे बेहतर ज़िंदगी कि तलाश में गांव छोड़कर शहर पलायन कर चुके हैं।
55 वर्षीय प्रेम मिश्रा की भी कुछ ऐसी ही शिकायत है। वह कहते हैं कि उनका घर लकड़ी का बना है और बारिश के दिनों में घर के अंदर पानी भर जाता है। कई बार उन्होंने गांव के प्रधान से इस समस्या और आवास योजना के बारे में बात की, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। धीरे-धीरे उन्होंने कहना ही छोड़ दिया। वहीं 42 वर्षीय राधा देवी कहती हैं कि पहले भी उन्होंने आवास योजना के लिए प्रयास किया था, लेकिन अब तक उन्हें इसका लाभ नहीं मिल सका है। हालांकि राज्य में हाल में ही संपन्न हुए पंचायत चुनाव में इस गांव में नए प्रधान का चयन हुआ है और उन्हें उम्मीद जगी है कि अब उनका घर मिलने का सपना जरूर पूरा होगा।
वहीं 38 वर्षीय दीपा मिश्रा की कहानी अलग है। वह बताती हैं कि उन्होंने भी गांव के प्रधान से आवास योजना के संबंध में बात की थी, लेकिन जब कोई सकारात्मक मदद नहीं मिली, तो उनके पति ने पैसे जोड़ कर स्वयं घर बना लिया। वह कहती हैं कि घर के बजट में कटौती करके पिछले कई सालों से हम घर के लिए पैसा जमा कर रहे थे। कई बार प्रयास करने के बाद भी जब आवास योजना का लाभ नहीं मिला तो हमने अपने पैसों से ही घर बना लिया। आखिर बच्चे बड़े हो रहे थे, वह कहाँ रहते? हालांकि 45 वर्षीय रूपा देवी के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना लाभकारी सिद्ध होने वाला है। उन्होंने बताया कि कुछ महीने पहले ही उन्होंने आवास योजना के लिए सभी दस्तावेज जमा कर दिया है और उन्हें बताया गया है कि जनवरी-फरवरी तक उन्हें घर बनाने के लिए पहली किस्त मिल जाएगी। उनकी आँखों में एक अलग-सी चमक थी। मानो वर्षों से अधूरी एक इच्छा अब पूरी होने वाली हो। उनके लिए यह घर केवल दीवारों का ढांचा नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य और रोजमर्रा की चिंता से थोड़ी राहत का वादा है।
ये केवल एक सैलानी गाँव की स्थिति नहीं हैं। अन्य राज्यों की तुलना में उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में ऐसी चुनौती और भी जटिल हो जाती है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियाँ, सीमित संसाधन और दूर-दराज़ बसे गाँव योजना के क्रियान्वयन को धीमा कर देते हैं। उदाहरण के तौर पर, पौड़ी जिले के कल्जीखाल क्षेत्र में एक वर्ष में 805 घरों का निर्माण हुआ, जबकि बीरोंखाल जैसे क्षेत्रों में यह संख्या केवल 65 घरों तक सीमित रही। यह अंतर दर्शाता है कि एक ही राज्य के भीतर भी विकास की गति समान नहीं है। देश और राज्य स्तर पर आंकड़े देखें तो ग्रामीण आवास की स्थिति एक बड़ी तस्वीर पेश करती है। ग्रामीण आवास योजना के अंतर्गत देश भर में लगभग 3.79 करोड़ घरों का लक्ष्य रखा गया था, जिनमें से लगभग 2.72 करोड़ घरों का निर्माण पूरा हो चुका है, यानी करीब 72 प्रतिशत लक्ष्य हासिल किया जा चुका है। अब इस योजना का विस्तार कर लक्ष्य को 5.79 करोड़ घरों तक ले जाने की बात की जा रही है।
लेकिन आंकड़ों से परे असली सवाल जमीन पर नजर आने वाली सच्चाई का है। पहाड़ों में रहने वाले परिवारों के लिए पक्का घर न केवल ठंड और बारिश से बचाव का माध्यम है बल्कि यह उन्हें किसी भी समय होने वाले भूस्खलन से बचाव का भी साधन है। यहां की गलियों से गुजरते हुए यह साफ़ महसूस होता है कि जब किसी परिवार को घर मिलने की सूचना मिलती है, तो वह केवल एक सरकारी लाभ नहीं होता है बल्कि उम्मीदों का एक कारवां होता है। वहीं जिन परिवारों तक यह सुविधा नहीं पहुँच पाती, उनके लिए स्थानीय स्तर पर काम करने की आवश्यकता है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि सरकार गांव के विकास को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बनाती है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि इन योजनाओं की जानकारी हर गांव और हर परिवार तक समय पर पहुँचे। इसके लिए स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही तय किये जाने की जरूरत है। साथ ही उन आवाजों को भी सुनने की बहुत जरूरत है जो हाशिये पर होते हैं और अक्सर फाइलों और आंकड़ों के बीच उनकी आवाज कहीं दब जाती हैं क्योंकि यही हाशिये पर रहने वाले लोग कच्चे घरों में भी रहकर पक्की उम्मीदों का सपना देखते हैं, जिसे पूरा करने की जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन के साथ साथ समाज की है। (यह लेखिका के निजी विचार हैं)
- किरण आर्या
गूलर, कपकोट


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