रश्मिरथी खंडकाव्य के आधार पर श्री कृष्ण का चरित्र चित्रण

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रश्मिरथी खंडकाव्य के आधार पर श्री कृष्ण का चरित्र चित्रण श्रीकृष्ण एक प्रतिनायक की भूमिका अदा करते हैं। वास्तव में महाभारत के श्रीकृष्ण का चरित्र केवल

रश्मिरथी खंडकाव्य के आधार पर श्री कृष्ण का चरित्र चित्रण


रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा रचित 'रश्मिरथी' में भगवान कृष्ण का चरित्र एक सामान्य पौराणिक देवता का नहीं, बल्कि एक युगद्रष्टा, कुशल कूटनीतिज्ञ और शांतिदूत का है। इस काव्य में वे पांडवों के मार्गदर्शक तो हैं ही, साथ ही वे मानवीय मूल्यों और न्याय की रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जाने वाले 'लीलाधर' भी हैं।

प्रस्तुत खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण एक प्रतिनायक की भूमिका अदा करते हैं। वास्तव में महाभारत के श्रीकृष्ण का चरित्र केवल एक दार्शनिक का ही नहीं है, बल्कि वे सम्पूर्ण महाभारत के युद्ध समायोजक के रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत होते हैं। यद्यपि वे शस्त्र नहीं उठाते किन्तु पाण्डव शिविर उनकी ही कूटनीति पर आश्रित है। उनके चरित्र की निम्न विशेषताएँ हैं - 

कुशल कूटनीतिज्ञ

रश्मिरथी खंडकाव्य के आधार पर श्री कृष्ण का चरित्र चित्रण
श्रीकृष्ण एक कुशल कूटनीतिज्ञ हैं। पहले तो वे चाहते हैं कि कौरवों और पाण्डवों में समझौता हो जाय, इसलिए वे दूत बनकर दुर्योधन के पास जाते हैं; किन्तु दुर्योधन अपना हठ नहीं छोड़ता तो वे कर्ण को फोड़ कर अपने पक्ष में लाने का प्रयास करते हैं। वे कर्ण को अलग ले जाकर समझाते हैं-

कुन्ती का तू ही तनय ज्येष्ठ । 
बल बुद्धि शील में परम श्रेष्ठ । 
मस्तक पर मुकुट धरेंगे हम। 
तेरा अभिषेक करेंगे हम।। 
आरती समोद उतारेंगे। 
सब मिलकर पाँव पखारेंगे ।।

कर्मयोग के अधिष्ठाता

श्रीकृष्ण सच्चे कर्मयोगी हैं। वे कर्म के आगे धर्म और अधर्म कुछ नहीं मानते। निःस्वार्थ कर्म पर प्रहार करने का आदेश सुन कर जब अर्जुन सोचने लगते हैं कि इससे धर्म कलंकित हो जायेगा तो स्वयं श्रीकृष्ण कहते हैं - 
 
कहूँ जो पाल उसको धर्म है यह, 
हनन कर शत्रु का सत्कर्म है यह । 
क्रिया को छोड़कर चिन्तन में फँसेगा, 
उलट कर काल तुझको ही डसेगा।

अलौकिक गुणों से सम्पन्न

कवि ने 'रश्मिरथी' में श्रीकृष्ण को महाभारत के श्रीकृष्ण की भाँति एक अवतारी पुरुष माना है, जिनमें दैवी शक्ति विद्यमान है। जब श्रीकृष्ण दुर्योधन को समझाने के लिए उसके दरबार में पहुँचते हैं तो दुर्योधन उन्हें बन्दी बना लेना चाहता है। श्रीकृष्ण अपने विराट् रूप का प्रदर्शन करते हैं, जिससे सभा में निस्तब्धता छा जाती है।
 
कवि ने श्रीकृष्ण के चरित्र की उदारता में कहीं भी कमी नहीं आने दी है। श्रीकृष्ण जानते हैं कि पुरुषार्थ केवल विजय में ही नहीं है, शील उससे भी पवित्र और श्रेष्ठ वस्तु है, इसलिए कृष्ण कर्ण के मर जाने पर विशेष प्रसन्न नहीं दिखलाई पड़ते। उनके मन में एक अन्तर्द्वन्द्व उमड़ता दिखलाई पड़ता है -

समस्या शील की सचमुच गहन है। 
समझ पाता नहीं कुछ, क्लान्त मन है ।। 
न तो निश्चित कुछ अवधानता है। 
जिसे तजता उसी को मानता है ।।

इस प्रकार रश्मिरथी' के कृष्ण केवल उपदेशक नहीं, बल्कि कर्मयोगी हैं। वे शक्ति, शांति, बुद्धि और न्याय का अद्भुत समन्वय हैं। दिनकर जी ने उनके माध्यम से यह संदेश दिया है कि जब शांति के सारे मार्ग बंद हो जाएँ, तब धर्म की रक्षा के लिए युद्ध अनिवार्य हो जाता है।

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