क्या टूटी सड़कें ही गाँव से गुजरेंगी? हर गाँव की साँसें उसके रास्तों से जुड़ी होती हैं। यह रास्ते केवल मिट्टी और पत्थरों का बँधा हुआ मार्ग नहीं होते,
क्या टूटी सड़कें ही गाँव से गुजरेंगी?
हर गाँव की साँसें उसके रास्तों से जुड़ी होती हैं। यह रास्ते केवल मिट्टी और पत्थरों का बँधा हुआ मार्ग नहीं होते, बल्कि उससे गुजरने वाले हजारों लोगों के जीवन की धड़कन होते हैं। वे उनकी दिन-प्रतिदिन की मुश्किलों और भविष्य की उम्मीद का मिश्रण होते हैं। बात जब गाँव की सड़कों विशेषकर उत्तराखंड जैसे पहाड़ी इलाकों के ग्रामीण क्षेत्रों की होती है तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। उत्तराखंड के बागेश्वर जिला स्थित डूंगरी गाँव में सड़क की समस्या इसी जज़्बात को सामने लाती है, जहाँ वर्षों पहले जो काम होना चाहिए था, वह अब तक पूरा नहीं हुआ।
लोग कहते हैं कि उनकी आवाज नीति निर्धारकों तक पहुँच नहीं पाती है, जिसके कारण वह अपने क्षेत्र को बेहतर बनाने की दौड़ में पीछे छूट जाते हैं। उनके प्रयासों का परिणाम केवल टूटी राहों के रूप में मिलता है, न कि बेहतर जीवन की रूपरेखा के रूप में। रेत तथा पत्थरों से ढंकी इन ऊँची-नीची धूलभरी सड़कों ने डूंगरी गांव के लोगों के दैनिक जीवन को कठिन बना दिया है। घरों से बुजुर्ग, युवा और बच्चे प्रत्येक दिन उसी दर्द को झेलते हैं जिसमें सड़कें अक्सर गड्ढों से भरी रहती हैं। हर साल बारिश के मौसम में यह दिक्कत और भी बढ़ जाती है। कई बार इन मार्गों पर से होकर गुजरना इतना खतरे भरा हो जाता है कि लोग अस्पताल पहुँचने में देरी का सामना करते हैं, ज़िंदगी से जूझते हुए घर लौटते हैं, या बुनियादी चीज़ों तक नहीं पहुंच पाते।
उत्तराखंड का भौगोलिक स्वरूप पहाड़ों, घाटियों और संकरी दरारों से बना है। ऐसे में सड़कें हर गांव को जोड़ने का एक जीवनदायिनी कड़ी होती हैं। लेकिन इन कड़ियों की मजबूती रोज़मर्रा की आवश्यकता बनती जा रही है, उसी तरह लोगों को अपने घर से शहर तक पहुँचने, इलाज कराने, बच्चों को स्कूल भेजने और रोजगार के साधन खोजने की अपेक्षा बढ़ती जा रही है। गाँव की सड़कों पर अधूरे काम, गड्ढों और कमजोर निर्माण के कारण यह कड़ी अक्सर टूटती नजर आती है। जहां सरकार की योजनाओं के तहत कई परियोजनाओं उत्तराखंड में ग्रामीण मार्गों को जोड़ने और सुधारने के लिए चल रही हैं, वहाँ हकीकत और लोगों की दास्तान अक्सर विपरीत रहती है।
आंकड़े बताते हैं कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के अंतर्गत पिछले तीन सालों में उत्तराखंड में लगभग 1481 किलोमीटर लंबी सड़कों का निर्माण हुआ है, और 519 नई मार्ग तथा 195 पुल बने हैं, जिससे कई गाँव बेहतर तरीके से विकास के साथ जुड़े हैं। वहां की ज़िंदगी अपेक्षाकृत आसान हुई है। इन उपलब्धियों के बावजूद राज्य में अभी भी कई कठिनाइयाँ हैं। कुछ हिस्सों में सड़कों के निर्माण के बावजूद गुणवत्ता की कमी, सही सामग्री का अभाव और पर्याप्त रखरखाव न होने के कारण सड़कें बरसात के दौरान जल्दी क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इसी वजह से वर्ष 2025 में भारी बारिश की वजह से 166 ग्रामीण सड़कें बंद हो गयी थीं और कई पुल क्षतिग्रस्त हो गए थे। इससे ग्रामीण जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था। इस तरह की कठिन परिस्थितियों के चलते गर्भवती महिलाओं के लिए स्वास्थ्य केंद्र तक पहुँचना एक बड़ा सवाल बन जाता है। अस्पताल जाने के लिए कई किमी ऊबड़-खाबड़ रास्तों को पार करना पड़ता है, जिससे संभावित जीवन-संघर्ष और तनाव का सामना करना पड़ता है।
गाँव की 36 वर्षीय रूपा देवी बताती हैं कि सड़क तक पहुँचने के लिए गर्भवती महिलाओं को 30 से 40 किमी पैदल यात्रा करनी पड़ती है और अगर गाँव तक एंबुलेंस बुलानी हो तो कई बार उन्हें घंटों इंतज़ार करना पड़ता है। ऐसे हालात में समय पर इलाज न मिलने के कारण संकट की स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। बुजुर्ग योगेश सिंह कहते हैं कि कई बार लोग बागेश्वर जाकर अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से मिलकर उन्हें गाँव में सड़क की बदतर स्थिति से अवगत करा चुके हैं। लेकिन इसका कोई लाभ नहीं हुआ। यह जरूर है कि आश्वासन मिलते रहे हैं, लेकिन काम नहीं हुआ। फिर गाँव वालों ने मिलकर खुद ही सड़कों के गड्ढे भरने का काम शुरू कर दिया। आज भी कई स्थानों पर यही भावना है कि लोग सुधार चाहते हैं और अपनी आवाज़ उठाते हैं, लेकिन उनकी बात कहीं खो जाती है।
यह भी देखा गया है कि योजनाओं के क्रियान्वयन में कई बार धनराशि का सही उपयोग नहीं होता। लोगों का कहना है कि कुछ परियोजनाओं के लिए धन प्राप्त होने पर वह अपेक्षित काम में नहीं लग पाता। ऐसे में अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाते और मार्गों की स्थिति जस की तस बनी रहती है। बारिश, मलबा तथा प्राकृतिक प्रभावों से होने वाले नुकसान के कारण कई स्थानों पर सड़कों के टूटने की समस्या रहती है। उदाहरण के तौर पर उत्तरकाशी जिले के कई गाँवों में बारिश के बाद सड़कें बंद हो जाती हैं जिस कारण दैनिक क्रियाओं में बाधा आती है, और लोगों को दूसरे स्थान तक पहुँचने के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
इन सब कठिनाइयों के बावजूद सरकार और प्रशासन कई प्रयास करने का प्रयास करते रहे हैं ताकि लोगों को बेहतर जीवन सुविधा प्राप्त हो सके। केंद्रीय और राज्य सरकार के सहयोग से उत्तराखंड में PMGSY-4 के तहत 8750 किलोमीटर ग्रामीण मार्गों का विस्तृत सर्वे पूरा किया जा चुका है, जिससे आने वाले समय में और अधिक गांवों को सड़क नेटवर्क से जोड़ा जा सकेगा। इन आंकड़ों और प्रमाणों के बीच, गांव वालों का दर्द इस सत्य को दर्शाता है कि कनेक्टिविटी केवल भौतिक मार्ग ही नहीं है, बल्कि यह जीवन, सम्मान और अवसरों का पैमाना भी है। सड़कें जिन्हें हम केवल मिट्टी और पत्थर की राह मानते हैं, वे न केवल हर व्यक्ति के जीवन की उम्मीदों का मार्ग है बल्कि रोजगार की तलाश, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य तक पहुँचना, और अगली पीढ़ी के बेहतर भविष्य की आकांक्षा भी है।
यह संघर्ष केवल डूंगरी गाँव तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तराखंड में अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में समान परिस्थितियाँ देखने को मिलती हैं। जहाँ कठिन रास्तों ने लोगों की उम्मीदों को पहाड़ों की तरह खड़ा कर दिया है। लेकिन हर कठिनाई के बीच, यह सच भी है कि सकारात्मक बदलाव के प्रयास जारी हैं। जो लोग रोज़मर्रा की इन राहों पर चलते हैं, उनकी आवाज़ यही मांगती है कि इन मार्गों को स्थाई और मजबूत बनाया जाए, ताकि जीवन की कठिनाइयाँ कम हों, और वे अपने सपनों की ओर बिना किसी अतिरिक्त बोझ के बढ़ सकें।(यह लेखिका के निजी विचार हैं)
- आंचल
बागेश्वर, उत्तराखंड


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