रश्मिरथी खंड काव्य का सारांश | रामधारी सिंह दिनकर

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रश्मिरथी खंड काव्य का सारांश रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी कृति 'रश्मिरथी' हिंदी साहित्य का वह दैदीप्यमान नक्षत्र है जो न केवल काव्य की दृष्टि से ओजपू

रश्मिरथी खंड काव्य का सारांश


रामधारी सिंह दिनकर की कालजयी कृति 'रश्मिरथी' हिंदी साहित्य का वह दैदीप्यमान नक्षत्र है जो न केवल काव्य की दृष्टि से ओजपूर्ण है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक विसंगतियों पर एक गहरा प्रहार भी है। इस खंडकाव्य का केंद्रबिंदु महाभारत का वह पात्र है जिसे समाज ने सदा हाशिए पर रखा—सूतपुत्र कर्ण। दिनकर जी ने इस काव्य के माध्यम से कर्ण के जीवन की उन परतों को उघाड़ा है जहाँ वह केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध लड़ता हुआ एक स्वाभिमानी व्यक्तित्व बनकर उभरता है।

पूरी कथावस्तु में रश्मिरथी यानी 'सूर्य की किरणों के रथ पर सवार' नायक कर्ण के जन्म से लेकर उसकी मृत्यु तक के संघर्षों का चित्रण है। दिनकर जी ने इसे महज एक पौराणिक आख्यान न मानकर उसे आधुनिक संदर्भों से जोड़ दिया है। यहाँ जातिवाद और जन्म के आधार पर श्रेष्ठता तय करने वाली परंपराओं को कड़ी चुनौती दी गई है। जब कर्ण सभा में अपनी वीरता का प्रदर्शन करना चाहता है और उसे उसकी जाति के नाम पर अपमानित किया जाता है, तब कवि की लेखनी से निकला यह आक्रोश कि "जाति-जाति रटते जिनकी पूँजी केवल पाखंड है," सीधे पाठक के हृदय पर चोट करता है। यह काव्य सिद्ध करता है कि मनुष्य अपनी पहचान कुल या गोत्र से नहीं, बल्कि अपनी प्रतिभा और पुरुषार्थ से बनाता है।

'रश्मिरथी' नामक खण्डकाव्य का कथानक सात सर्गों में विभक्त है, जिसका सारांश इस प्रकार है-

प्रथम सर्ग

कर्ण का शौर्य प्रदर्शन - प्रथम प्रथम सर्ग में कर्ण राजकुमारों को प्रतिद्वन्द्विता के लिए चुनौती देता है और अपनी शस्त्र-कलाओं से अर्जुन, द्रोण तथा भीष्म आदि को आश्चर्यचकित कर देता है । फिर द्वन्द्व-युद्ध के लिए अर्जुन को ललकारता है। कृपाचार्य कहते हैं कि अर्जुन राजकुमार है, वह सूतपुत्र कर्ण से नहीं लड़ेगा। कर्ण अपमान का घूँट पीकर रह जाता है। दुर्योधन परिस्थिति से लाभ उठा है। वह कहता है कि शूरों और नदियों का मूल जानना आवश्यक नहीं होता है। जाति-पाँति का नारा केवल कायर और क्रूर लोग लगाया करते हैं। कर्ण भले ही सूतपुत्र हो, भले वह भंगी अथवा चमार हो किन्तु आज उसके आगे सभी राजकुमार फीके हैं। ऐसे बहुमूल्य रत्न का अपमान उचित नहीं है। यदि बिना राज्य के इसे वीरता का अधिकार नहीं है तो मैं अंगदेश का मुकुट इसके मस्तक पर रख रहा हूँ।

दुर्योधन के इस व्यवहार से कर्ण गद्गद हो जाता है और कृतज्ञता के बोझ से दबा हुआ कहता है-
 
भरी सभा के बीच आज तूने जो मान दिया है,
पहले-पहल मुझे जीवन में जो उत्थान दिया है।
उऋण भला होऊँगा उससे चुका कौन-सा दाम?
कृपा करें दिनमान कि आऊँ तेरे कोई काम।

उधर द्रोणाचार्य को कर्ण के शौर्य पर चिन्ता हो जाती है। वे अर्जुन को सजग करते हैं और कर्ण को शिष्य न बनाने का निश्चय करते हैं। फिर भी रंग-भूमि से शंख बजाते हुए कर्ण को साथ लिये कौरव चले जाते हैं। रानियाँ राजमहल चली जाती हैं। सबसे पीछे मन मसोसती कुन्ती जाती है—
 
और हाय, रनिवास चला वापस जब राजभवन को,
सबके पीछे चलीं एक विकला मसोसती मन को।
उजड़ गये हों स्वप्न कि जैसे हार गयी हों दाँव,
नहीं उठाये भी उठ पाते थे कुन्ती के पाँव।

द्वितीय सर्ग

रश्मिरथी खंड काव्य का सारांश
आश्रमवास - द्रोणाचार्य द्वारा धनुर्विद्या न सिखाये जाने का आभास होने पर कर्ण द्रोणाचार्य के गुरु परशुराम के आश्रम में गया, जहाँ परशुराम ने कवच और कुण्डल के कारण ब्राह्मण-कुमार समझा और उसे अपना शिष्य बना लिया।
 
एक दिन वे कर्ण की जंघा पर अपना मस्तक रखकर सो रहे थे। कर्ण गुरु के इस वात्सल्य भाव से भीगा चिन्तन में डूंबा हुआ था, तभी एक जहरीला कीड़ा कर्ण की जांघ में काटने लगा। गुरु की निद्रा भंग न हो इसलिए कर्ण हिला-डुला तक नहीं, किन्तु रक्त की गर्म धारा के स्पर्श होते ही परशुराम जाग पड़े। कर्ण की सहनशीलता देखकर उन्हें उसके क्षत्रिय होने का सन्देह हुआ। वे क्रोधित गम्भीर स्वर में बोले- "तू अवश्य ही क्षत्रिय या किसी अन्य जाति का है।” कर्ण द्वारा स्वयं को सूत-पुत्र (शुद्र पुत्र) स्वीकार कर लेने पर भी उनका क्रोध कम नहीं हुआ और कर्ण को शाप दिया कि “मेरे द्वारा सिखायी गयी ब्रह्मास्त्र विद्या तू अन्त में भूल जायेगा।” यह सुनते ही कर्ण विकल हो उठा। उसकी व्याकुलता देख परशुराम ने बरदान दिया कि तू संसार में महान कहलायेगा तथा भारतवर्ष का इतिहास तेरी गौरव-गाथा गायेगा।

तृतीय सर्ग 

कृष्ण सन्देश- श्रीकृष्ण पाण्डवों के दूत बनकर सन्धि का प्रस्ताव लेकर दुर्योधन के पास जाते हैं। दुर्योधन पाण्डवों को केवल पाँच गाँव भी देने को तैयार नहीं होता, बल्कि उल्टे श्रीकृष्ण को भी बन्दी बना लेना चाहता है। श्रीकृष्ण अपने विराट् रूप का प्रदर्शन करते हैं। सर्वत्र आतंक व्याप्त हो जाता है। श्रीकृष्ण यहाँ से वापस होते समय कर्ण को साथ लाते हैं और उसे समझाते हैं कि तुम्हारे ही बल पर दुर्योधन युद्ध ठान रहा है।
 

चतुर्थ सर्ग

कर्ण के महादान की कथा- खण्डकाव्य के चतुर्थ सर्ग में कर्ण की दानवीरता का बड़ा ही भव्य चित्रण प्रस्तुत किया गया है। कर्ण की दानवीरता का अनुचित लाभ उठाकर इन्द्र अपने पुत्र अर्जुन की रक्षा के लिए कर्ण से उसके कुण्डल माँग लेते हैं। कर्ण इस छल को भली-भाँति समझता है, किन्तु वह सब कुछ जानते हुए भी अपना अन्तिम सुरक्षा कवच दान में देता है। कर्ण छल-छद्म भरी गन्दी कूटनीति पर विश्वास नहीं रखता। वह दूसरों के कपट का उत्तर विशाल उदारता से देता है। कर्ण के इस निर्णय को सुनकर वे ग्लानि से झुक जाते हैं। कर्ण यश की आकांक्षा से ही दान नहीं देता बल्कि वह धन की निरर्थकता को बहुत गहराई तक समझता है। उसने अपने बचपन को साधारण गरीबी के बीच बिताया है। वह उसकी विपन्नता का साक्षी है, राजपद पाने पर भी उसमें दम्भ नहीं है। वह दान देने के लिए ही धन अर्जित करता है।
 

पंचम सर्ग

माता की विनती- पाँचवें सर्ग में कुन्ती स्वयं कर्ण के पास दुर्योधन का दल छोड़कर पाण्डवों का पक्षधर बनने का आग्रह करने के लिए आती है। कर्ण के लिए यह विकट परीक्षा की घड़ी है। जिस माता ने लोक-लज्जा के कारण उसे जल में बहा दिया था, वही आज अपना मातृत्व का अधिकार जताकर उसे दुर्योधन से अलग करने आ रही है। कर्ण के सारे अपमान, कुण्ठा, ग्लानि और कलंक का एक मात्र कारण यही माँ कुन्ती है, जो आज उसके सामने प्रार्थना और याचना की मुद्रा में खड़ी है। कर्ण बड़ी दृढ़ता से इस भावात्मक आघात को झेल लेता है कि भले ही कृष्ण अर्जुन का साथ छोड़ दें, किन्तु वह दुर्योधन का साथ छोड़कर विश्वासघाती नहीं बनेगा । कुन्ती को भी वह खाली हाथ नहीं लौटाता। कर्ण कुन्ती को आश्वासन्न देता है कि वह अर्जुन को छोड़कर शेष चारों भाइयों की रक्षा करेगा और इस प्रकार उसे लेकर कुन्ती के पाँच पुत्र बराबर बने रहेंगे। कर्ण माता कुन्ती के चरण छूकर उन्हें विदा करता है।
 

षष्ठम सर्ग

शक्ति परीक्षण - षड्यन्त्रों, परीक्षाओं और प्रलोभनों के बीच से अपने को बचाता हुआ अपने निश्चय पर अडिग रहकर कर्ण रणक्षेत्र में उतरता है। यद्यपि शर-शैय्या पर लेटे भीष्म पितामह उसे एक बार फिर युद्ध से विरत होने की सलाह देते हैं, किन्तु कर्ण विनम्रतापूर्वक उनकी इस सलाह को अस्वीकार कर देता है और कहता है कि अब युद्ध-भूमि के निर्णय के अतिरिक्त अन्य कोई निर्णय सम्भव नहीं है। छठे सर्ग की कथा में कवि का उद्देश्य कर्ण के इसी अद्भुत शौर्य का बखान करना है। श्रीकृष्ण की कूटनीति से प्रेरित घटोत्कच के संहार के लिए कर्ण को इन्द्र द्वारा प्राप्त एकाघ्नी बाण भी छोड़ देना पड़ता है। यद्यपि घटोत्कच मर जाता है और कर्ण विजयी हो जाता है, किन्तु विजयी होने पर भी एकाघ्नी बाण के अभाव में चिन्तित हो जाता है।
 

सप्तम सर्ग

कर्ण के बलिदान की कथा- सातवें सर्ग में कर्ण के आत्मोसर्ग की कथा है। यद्यपि नीति की दुहाई दोनों पक्ष देते हैं, किन्तु युद्ध-काल में नैतिक घोषणाएँ ताक पर धरी रह जाती हैं, क्योंकि युद्ध का अपना तर्क होता है। कर्ण-जैसा योद्धा भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है कि युद्ध में विजयी होने के लिए युद्ध-कौशल के साथ-साथ एक अलग प्रकार की कूटनीति भी आवश्यक है। फिर भी ऐसी कूटनीति कर्ण को स्वीकार नहीं है। कर्ण अपने चरित्र द्वारा युद्ध की इसी अनैतिकता और अनर्गलता की ओर संकेत करता है; किन्तु युद्ध से विरत होकर नहीं, बल्कि शामिल होकर। कर्ण का बलिदान पाण्डव पक्ष के लिए महान आश्चर्य है।

इस प्रकार रश्मिरथी केवल एक युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के आंतरिक संघर्ष, मित्रता की निष्ठा और विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहने की प्रेरणा का दस्तावेज है। अंततः, यह काव्य हमें सिखाता है कि विजय केवल शस्त्रों की नहीं, बल्कि उस चरित्र की होती है जो अन्याय के समक्ष झुकना स्वीकार नहीं करता।

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