रश्मिरथी के आधार पर कर्ण का चरित्र चित्रण रामधारी सिंह दिनकर कर्ण का चरित्र उस संघर्ष का प्रतीक है जहाँ व्यक्ति की जाति या कुल की तुलना में उसके गुणों
रश्मिरथी के आधार पर कर्ण का चरित्र चित्रण | रामधारी सिंह दिनकर
रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा रचित 'रश्मिरथी' आधुनिक हिंदी साहित्य का वह जाज्वल्यमान महाकाव्य है जो महाभारत के उपेक्षित पात्र कर्ण को केंद्र में रखकर न्याय, पुरुषार्थ और मानवीय गरिमा की नई व्याख्या करता है। इस काव्य में दिनकर जी ने कर्ण को केवल एक योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे 'महामानव' के रूप में चित्रित किया है जो जन्म की प्रतिकूलताओं से लड़कर अपनी पहचान स्वयं बनाता है। कर्ण का चरित्र उस संघर्ष का प्रतीक है जहाँ व्यक्ति की जाति या कुल की तुलना में उसके गुणों और कर्मों को प्रधानता दी गई है।
कर्ण रश्मिरथी नामक खण्डकाव्य का कथा नायक है, जो कुन्ती के गर्भ से उत्पन्न, किन्तु लोक-लज्जा परित्यक्त है। सूत-परिवार में पालित होने के कारण वह 'सूत-पुत्र' नाम से ही प्रख्यात है। कर्ण महाभारत का एक अत्यन्त ही वीर योद्धा, दानवीर, दृढ़-प्रतिज्ञ, कर्त्तव्यनिष्ठ, संघर्षशील, तिरस्कार और अपमानों से टूटा हुआ, दीन-दुखियों के प्रति सहानुभूति रखनेवाला, मैत्री-धर्म को निभाने वाला एक सच्चा मानव-प्रेमी है। उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं -
वीर योद्धा
कर्ण यद्यपि सूत-पुत्र कहा जाता है, किन्तु वह महान पराक्रमशाली है। बचपन में ही राजकुमारों से प्रतिद्वन्द्विता के समय उसकी शक्ति और क्षमता को देखकर द्रोणाचार्य को चिन्ता हो जाती है। वे अर्जुन से कहते हैं-
किन्तु आज जो कुछ देखा, उससे धीरज हिलता है।
मुझे कर्ण में चरम वीरता, का लक्षण मिलता है।।
बढ़ता गया कहीं निष्कंटक, यह उद्भटभट बाल।
अर्जुन ! तेरे लिए कभी यह हो सकता है काल ।।
उसके मरणोपरान्त युधिष्ठिर शत्रु होते हुए भी उसकी वीरता का लोहा मानते हैं।
दानवीर
युद्धवीर होने के साथ-साथ कर्ण दानवीर भी है। उसे ऐश्वर्य और सम्पत्ति की कोई कामना नहीं है। वह दान भी यज्ञ के लिए नहीं करता। वह अपने यहाँ से किसी को निराश लौटने देना नहीं चाहता। पुत्र अर्जुन की रक्षा हेतु जब इन्द्र कर्ण से कवच और कुण्डल को माँगने के लिए पहुँचते हैं तो वह सब कुछ जानते हुए भी कवच और कुण्डल दे देता है। इन्द्र के पहुँचने पर कर्ण कहता है-
माँगो माँगो दान, अन्न या बसन, धाम या धन दूँ।
अपना छोटा राज्य या कि या क्षणिक क्षुद्र जीवन दूँ ।।
मेघ भले लौटे उदास हो, किसी रोज सागर से।
याचक फिर सकते निराश पर, नहीं कर्ण के घर से ।।
दृढ़प्रतिज्ञ
कर्ण जो प्रण कर लेता है, उसे अन्त तक निभाता है। वह अर्जुन के वध के लिए कृत-संकल्प है। श्रीकृष्ण, कुन्ती और भीष्म के समझाने पर भी वह अपने इस निश्चय से नहीं हटता ।
दलितों का सहायक, निष्कपट हृदय वाला
कर्ण दीन, दुःखी, दलितों का सहायक, परोपकारी, निष्कपट हृदय वाला बेजोड़ दानी है। वह दयालु इतना है कि शत्रु पर भी दया करता है। छल-छद्म की नीति से पृथक् रहना चाहता है। इन्द्र जब छल से उसका कुण्डल और कवच माँग लेते हैं, उस समय कर्ण कहता है -
देवराज ! छल छद्म स्वार्थ कुछ भी साथ न लाया हूँ।
मैं केवल आदर्श एक उनका बनने आया हूँ।।
आत्मनिर्भर
कर्ण आत्म-शक्ति पर विश्वास रखता है। वह दैवी शक्ति कवच और कुण्डल इन्द्र को देकर अपने को गौरवान्वित मानता है और दृढ़ विश्वास के साथ कहता है-
भुज को छोड़ न मुझे सहारा, किसी और संबल का ।
बड़ा भरोसा था लेकिन इस कवच और कुण्डल का ।।
अब न कहेगी जगत कर्ण को ईश्वरीय भी बल था ।
जीता वह इसलिए कि उसके पास कवच कुण्डल था । ।
आत्महीनता की भावना से प्रेरित संघर्षशील व्यक्तित्व
सब कुछ होते हुए भी कर्ण में संस्कारजनित आत्महीनता की ग्रन्थि विद्यमान है। प्रारम्भ से ही प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझने का आदी है।
कर्त्तव्यनिष्ठ
कर्ण अपने कर्तव्य के प्रति पूर्णतः जागरूक है। दुर्योधन की मित्रता को वह अन्तिम समय तक निभाता है। श्रीकृष्ण, भीष्म, माता कुन्ती सभी की बातों को अपने निश्चय के आगे ठुकरा देता है। भगवान श्रीकृष्ण उसकी मृत्यु के उपरान्त उसे श्रेष्ठ पुरुष मानते हुए कहते हैं-
मगर जो हो, मनुज, सुवरिष्ठ था वह,
धनुर्धर ही नहीं, धर्मिष्ठ था वह।
इस प्रकार अंततः, कर्ण का वध छल से हुआ, लेकिन 'रश्मिरथी' का कर्ण पराजित होकर भी विजयी है। वह एक ऐसा नायक है जिसने नियति से लड़ते हुए यह प्रमाणित कर दिया कि "तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के, पाते हैं जग में प्रशस्ति अपना करतब दिखला के।"


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