आह! बर्फ - आ ही गयी वर्ष २०२५ में अत्याधिक वर्षा हुई। पहाड़ों में आपदा से बहुत नुक्सान हुआ। फिर बारिश रुकी तो रुक ही गयी। सूखी सर्दी, तेज धूप, धूल धक
आह! बर्फ - आ ही गयी
वर्ष २०२५ में अत्याधिक वर्षा हुई। पहाड़ों में आपदा से बहुत नुक्सान हुआ। फिर बारिश रुकी तो रुक ही गयी। सूखी सर्दी, तेज धूप, धूल धक्कड़ से वातावरण असंतुलित हो गया। पेड़ पौधे पानी को तरस गए। श्वेत हिम के स्थान पर ऊँची हिमालयी चोटियां काली नज़र आती रहीं, हिमनद तो मानो गायब हो गए। जंगली भालू शीत निंद्रा का आनंद ने ले बस्ती में घूमने लगा। बुरांश बे समय, दो माह पूर्व ही खिल गया। स्थानीय पहाड़ी निवासी और पर्यटक बर्फ देखने को तरस गए।
पूजा पाठ, टोटके, जन्तर मंत्र का, असर आज बसंत पंचमी को दिखा।आकाश में बिजली कड़की, बादल घुमडे और बर्फ के साथ बारिश आ गयी।
दूर महानगरों में बसे पहाड़ियों, पहाड़ की बेटियों को अपना बचपन और बर्फ की मधुर स्मृतियाँ याद आ गयीं। पहाड़ों की रानी की दो बेटियाँ, ‘मेरी दीदी’ ने पहाड़ में बसे परिवार का हाल ले कर बताया की छ: दशक पूर्व दिसम्बर से ही तीन चार फीट ऊँची बर्फ जम जाती थी। “कभी दरवाजे की ऊंचाई तक बर्फ होती, बडी मेहनत से बेलचे से साफ करते थे। अगर उस पर पाला जम जाता तब गेनती से तोड़ी जाती। इतनी बर्फ अब सपना है, बामुश्किल एक दो इंच पड़ती है।”
दीदी ने बताया, पाले से ढकी बर्फ पर टीन का टुकडा रख, हर ढाल पर बच्चे घरेलू स्लेज का आनंद लेते। सारे शहर के ढाल नाप कर घर आते, चाहें मुल्लंगर हो, खच्चर खाना, तार गली या हैंपटन कोर्ट की सड़क हो। हाँ, उस समय ना स्कूटर, ना मोटर साइकल, ना चार पहिया वाहन थे। सड़क खाली, ठण्ड में न हाथ रिक्शा, ना घोड़े। आबादी बहुत कम होती, अधिकतर लोग देहरादून, दिल्ली, लखनऊ चले जाते थे। बस से यात्री ठंड में न आते।
बच्चे बर्फ से भालू, हिरन, स्नोमैन बना कर सजाते। अपना मफ़्लर दस्ताने पहनाते, कच्चे कोयले की आँखें, लाल रंग से मुख। किस का स्नोमैन ऊँचा, होड़ लग जाती, हर घर के बागीचे में घुमा घुमा एक बड़ा बर्फ का गोला बन जाता। अधिक बच्चे मिल जीत जाते।
जीत की खुशी में आइसक्रीम मिलती। वो भी हर परिवार खुद बनाता।“एक लोटे में दूध और शर्करा रख, गुथे आटे से उस पर एक ढक्कन कस दिया जाता। एक कनस्टर में खडा नमक भर, दूध का लोटा रखा जाता। दो चार घंटे, बारी बारी से बच्चे कनस्टर हिलाते।”
फिर ताजी आइसक्रीम सब में बांटी जाती। “दुकान में मिलने वाली कोई आइसक्रीम उस का मुकाबला नहीँ कर सकती। एक बार मार्च माह में बहुत बर्फ पड़ी, चाची ने लोटे में दूध रख उसे एक पहाड़ की खोह में बर्फ में दबा दिया। बहुत खोजा, लोटा नहीं मिला, जब मे जून में बर्फ पिघली, तब लोटा मिला।”
“और दूध?” मैंने आश्चर्य से पूछा।
“वो तो कब का बह चुका था।”
“बर्फ की दिक्कत से बचने को बड़े बड़े पके पीले कद्दू, अखरोट, आलू, चावल, आटा, खडा नमक, कुटु, चौलाई रख लिए जाते। कच्चे पक्के कोयले से हज़रो गोले मिट्टी गोबर मिला कर, कोठरी में इंधन स्वरूप भर लिए जाते। कच्चे कोयले के गोले, दिन भर सगड में अंगार स्वरूप जलते रहते। पत्थर या पक्के कोयले के गोले अंगिठी में खाना पकाने को जलते रहते।”
“और स्कूल, दीदी?”
“चार माह की छुट्टी। कोई गृह कार्य कुछ नहीं। बस खेल ही खेल। एक छोटे टीन में कुछ छेद बना, लकड़ी के टुकड़े रख, जलओ, घुमाओ और घूमते जाओ।”
“दीदी, बहुत अच्छा था ना?”
“हाँ, अच्छा था, कष्ट भी था, पर बुनाई करते, एक दूसरे का स्वेटर का डिजाईन, चुपके से उतार लेते, फिर बर्फ मे नया स्वेटर पहन निकलते, सहेली झगड़ती कि उस की डिजाइन की नकल क्यों करा। अब कोई नहीं पहनते हाथ से बिना स्वेटर।”
“जी, अब टाइम नही है, न हुनर है।”
दीदी पुरानी बात याद कर भावुक हो गयीं और फोन बंद कर दिया।बाहर झाँका माल रोड, गन हिल, वेवर्ली, राधा भवन पर हल्की बर्फ थी। दून घाटी, शिवालिक के उपर सूर्य बादलों के बीच से अपनी किरन बिखेर रहा था।“शायद रात को और बर्फ पड़े।” सोच मैं घूमने निकल पड़ी।
स्मरण : मधु मेहरोत्रा


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