सदा आनंद रहे एहि द्वारे निबंध की समीक्षा विद्यानिवास मिश्र गाँव की होली के आनन्दोल्लास को ललित शैली के माध्यम से चित्रित किया है। होली के दिन द्वार-द्
सदा आनंद रहे एहि द्वारे निबंध की समीक्षा | विद्यानिवास मिश्र
ललित निबन्ध और "सदा आनन्द रहै एहि द्वारे” ललित निबन्धों के क्षेत्र में डॉ. विद्यानिवास मिश्र की गणना प्रथम पंक्ति के निबन्धकारों में की जाती है। आलोच्य में निबन्ध आत्मपरकता, भावात्मकता, लालित्य, लोक-संस्कृति-चेतना, काव्यत्व, प्रसादत्व एवं आकर्षण आदि ललित निबन्ध के सभी गुण विद्यमान हैं। माधुर्य सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है।
प्रतिपाद्य विषय वस्तु
आलोच्य निबन्ध में मिश्र जी ने अपने गाँव की होली के आनन्दोल्लास को ललित शैली के माध्यम से चित्रित किया है। होली के दिन द्वार-द्वार पर 'सदा आनन्द रहै एहि द्वारे' की अलख जगाई जाती है। होली का आत्मीय हुरदंग सम्पूर्ण वातावरण को रसमय बना देता है, अन्त में आधुनिक होली के आनन्दोल्लास पर वे कहते हैं कि वह अब मात्र शिष्टाचार रह गया है आधुनिक सभ्यता ने इसके आह्लादपूर्ण स्वस्थ रूप को विकृत कर दिया है। फिर भी उनका अमरानन्द “सदा आनन्द रहै एहि द्वारे' की अभिलाषा करता है।
विषय वस्तु का विवेचन
प्रारम्भ- विनोद शर्मा के यहाँ फागोत्सव के रंग मिश्र जी को झकझोर देते हैं। विद्यापति का नव वृन्दावन और देव का 'प्रेम पलना' नेत्रों के समक्ष उपस्थित हो जाता है। इसके साथ ही जयदेव का ऋतुराज सम्पूर्ण साज के साथ उपस्थित हो जाता है- “संग नये, त्यों समाज नये । सब साज नये ऋतुराज नये ।”
मिश्र जी को गाँव की होली और अमरानन्द का होली पर घर-घर जाकर “सदा आनन्द रहै एहि द्वारे" का अलख जगाना नेत्रों के समक्ष नृत्य करने लगता है। मिश्र जी गाँव की आह्लादपूर्ण रसमय होली की स्मृति में खो जाते हैं।
ग्राम की होली - मिश्र जी विषय-वस्तु का विस्तार करते हुए भारतीय संस्कृति की प्राणधारा गाँव की होली की स्मृति करने लगते हैं, गाँव में शिवरात्रि से फाग की धूम मचती थी झाँझ और मृदंग का स्वर आकाश को गुंजायमान कर देता था। भोर होते-होते चाचर मची रहती। संवत्सर की चिता में अग्नि प्रज्वलित की जाती, आवाल-वृद्ध प्रत्येक व्यक्ति को एक चुटकी राख देते समय उन्माद का पारावार उमड़ पड़ता। गाँव के प्रत्येक घर परिक्रमा होती । प्रत्येक दरवाजे से चलते समय फगुआ गाया गाता- "सदा आनन्द रहै एहि द्वारे मोहन खेलें फाग।” कुल-गर्व और मर्यादा को ताक में रखकर रस के पारावार में सरावोर हो उठता था। आह्लादमय स्वस्थ प्रेम समस्त मर्यादाएँ तोड़ देते थे। बूढ़े बाबा भी इन दिनों देवर लगने लगते हैं। ऐसे ही रसमय चित्रों से हमारा काव्य भरा हुआ है-
“गोरिन के रँग बूढ़ि गयो साँवरो,
साँवरे के रंग बूढ़ि गई गोरी ।"
ऊधम में,
तरंगनि सीचे।
ऐसो मचो ब्रज
सब अंग-अनंग
त्यों पद्याकर छज्जेन छत्रिन हूँ
छिति छाजन के सर-कीचे।
दै पिचकी तहाँ भजि भागी तहाँ घर, पीछे गुपाल गुलाल
गुलाल उलीचे ।
एकहि संग दोऊ रमते,
सखि वे मैं उन पर हों भइ नीचे।
प्रस्तुत छन्द में होली खेलने का कितना मादक और सहज चित्र उभारा है । सर्वत्र होली का ही आनन्दमय रंग है-
"मारि गयो पिचकारी अचानक ।
थोड़ी सरीर में थोड़ी हिये में । भीग गई
गई सिगरी अँगिया ।
रसधार वही बरजोरी हिये में । चोरत चित्त निचोरत चीर,
सँकोचति सोचति गोरी हिये में ।
भाल गुलाल, कपोल अबीरन, नैनन में रंग, होरी हिये में
परिवर्तन
आज होली का वह आह्लाद पूर्ण वातावरण होली और उसका उल्लास कहाँ से नगरीय एवं यांत्रिक सभ्यता के परिवर्तन उपस्थित कर दिया। होली का उत्सव अब शिष्टाचार मात्र रह गया। होली का स्नेह मिलन ही रहकर पान-सुपाड़ी का रिवाज रह गया। गाँव की सभी फाग-मण्डली तितर-बितर हो गई। अब होली निर्बन्ध आनन्द का सुनहला पर्व नहीं रहा ।
निष्कर्ष
होली का पर्व आनन्द की रूपरसता का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है वह सीमाओं के अन्दर रहते हुए भी शिव-संकल्प के बल पर उन सीमाओं का दृढ़ नकार है और नकार मात्रा होकर रहना भी नहीं जानता, वह पारावार पूरन अपार ब्रह्म राशि के साथ एकाकार होने की प्रक्रिया भी है। इसलिये वह प्रेमाश्रयी है ,उसका विराग भी विषय से है। विषय से नहीं। होली इस मोक्ष का लौकिक अनुभावन है। इसलिए वह जन-जन का उपाय है। लोक रस्में खोकर भी अपने को नवीन पाता है।


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