हिंदी ललित निबंध परंपरा में पंडित विद्यानिवास मिश्र का योगदान

SHARE:

विद्यानिवास मिश्र के ललित निबंध और प्रमुख विशेषताएं हिन्दी की ललित निबन्ध परम्परा को उन्नति के शिखर पर पहुँचाने वाले कुशल शिल्पी के में पं. विद्यानिवा

हिंदी ललित निबंध परंपरा में पंडित विद्यानिवास मिश्र का योगदान


हिन्दी की ललित निबन्ध परम्परा को उन्नति के शिखर पर पहुँचाने वाले कुशल शिल्पी के में पं. विद्यानिवास मिश्र का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने इस विधा को एक ओर बहुत बड़ी संख्या में ललित निबन्ध दिए, वहीं दूसरी ओर अपनी प्रतिभा से हिन्दी के कोटि-कोटि पाठकों के मन में ललित निबन्धों के प्रति आकर्षण भी उत्पन्न किया है। मिश्र जी के ललित निबन्ध लेखन की शुरुआत 1956 से होती है और वे आज तक निरन्तर ललित निबन्धों की रचना कर रहे हैं। दैनिक 'अमर उजाला' से लेकर 'धर्मयुग' और 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' जैसी कॉमर्शिल पत्रिकाओं तक में उनके ललित निबन्ध मिल जायेंगे। इसी प्रकार उनके ललित निबन्धों में कुछ नवीनता अब चाहे न रही हो परन्तु प्रतिवर्ष उनकी एक पुस्तक अवश्य देखने को मिल जाएगी। 

ललित निबंध संग्रहों का विकास

1976 में उनका पहला संग्रह 'चितवन की छाहँ' प्रकाश में आया था और उसके बाद उन्होंने 8-10 निबन्ध संग्रह देकर हिन्दी ललित निबन्ध जगत् को सर्वाधिक ललित निबन्ध दिये हैं। पहले दो ललित निबन्ध संग्रहों में उनका लेखन पद-संरचना के सौष्ठव और माधुर्य गुण सम्पन्न भाषा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। उन्होंने इस दिशा में पण्डित हजारीप्रसाद द्विवेदी का अनुसरण किया है। इस अनुसरण का अर्थ परम्परा को अग्रसर करना भी है। पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने कोमलकान्त पदावली के माधुर्य की परम्परा डाली थी, इन निबन्धों में मिश्रजी ने उसे आगे बढ़ाया है। 'तुम चन्दन हम पानी' शीर्षक से जो निबन्ध प्रकाशित हुए, उनमें संस्कृत साहित्य के सन्दर्भों का प्रयोग बढ़ गया और पाण्डित्य-प्रदर्शन की प्रवृत्ति के कारण वह लालित्य दब गया, जो पहली रचनाओं में मिलता था। तीसरे निबन्ध संग्रह 'आँगन का पंछी और बनजारा मन' में जो परिवर्तन आया उसके सम्बन्ध में स्वयं लेखक ने भूमिका (अपनी सफाई में' शीर्षक से दी गयी) में प्रकाश डाला है-
 
'चितवन की छाँह' मेरे मादक दिनों की देन है, 'कदम की फूली डाल' मेरे विंध्य प्रवास का, जो बाद में आवास ही बन गया। फल है और 'तुम चन्दन हम पानी' मेरे संस्कृत अन्वेषण की देन है। अब जो चौथा संग्रह आपके हाथों में है, दुविधा के क्षणों की सृष्टि है इसलिए इसका शीर्षक भी द्विविधात्मक है। बरसों तक जिस भोजपुरी वातावरण के स्मृतिचित्र उकेरता रहा, उसी में मन चाहे पद पर जब वापिस लौटा तो दो विपरीत भावनाएँ मन में उठीं- अपने आँगन में लौटने की खुशी और घर-पोसू होने की आशंका। इसलिए जहाँ मन 'आँगन का पंछी' बनकर चहका, वहीं उसका 'बनजारा मन' उसे विगत और अनागत दिशाओं में रमने घूमने के लिए अकुलाता भी रहा । "
 
पं. विद्यानिवास मिश्र के अगले निबन्ध संग्रह (मैंने सिल पहुँचाई) के सम्बन्ध में भी उसकी भूमिका (आभार' शीर्षक से दी गयी) में लेखक ने स्वयं यह बताया है -

“प्रस्तुत निबन्ध संग्रह, अगर सच कहने की इजाजत मिले तो, अनिबन्ध संग्रह ('अ' का बड़ा जोर है आजकल) पहली बात तो यह कि अललित है। इसमें भ्रमरानन्दी ढंग की कुछ चिट्ठियाँ हैं, कुछ अध्यापक की जीवन की निष्क्रिय पतंगबाजी है, कुछ संस्कृत के विद्यार्थी की तोता-रटन्त और कुछ राष्ट्रीयता के लिए बेसुरा प्रलाप, कोई प्रतिमा खड़ी करने का संकल्प नहीं है और शक्तिशाली युगानुकूल जीवित माध्यम के लिए कोई सुगबुगाहट भी नहीं है। "

हिंदी ललित निबंध परंपरा में पंडित विद्यानिवास मिश्र का योगदान
मिश्रजी का अगला निबन्ध संग्रह है 'बसन्त आ गया पर कोई उत्कण्ठा नहीं' इसमें 22 निबन्ध संग्रहीत हैं। इसमें लेखक के समकालीन परिवेश से सम्बन्धित कुछ निबन्ध हैं और कुछ ज्वलन्त प्रश्नों पर लेखक के विचारों को प्रस्तुत करते हैं, जैसे-युद्ध और व्यक्तित्व, राष्ट्रभाषा और समस्या, हिन्दी बनाम राजनीति, हिन्दी का विभाजन, अन्धी जनता और लंगड़ा जनतन्त्र । इस संग्रह में चार निबन्ध संस्मरणात्मक पद्धति में लिखे गये हैं (हिमालय ने उन्हें बुला लिया, हिन्दी के अपराजेय योद्धा : भैयासाहब, भाई और निबन्धकार द्विवेदीजी) जिनमें राहुल सांकृत्यायन, श्री नारायण चतुर्वेदी, हजारीप्रसाद द्विवेदी और अज्ञेय जी को आधार बनाया गया है। इसके अन्तिम आठ निबन्ध ('बर्फ और धूप', 'हिप्पपंथ', 'गुजर जाती है धार मुझ पर भी', 'अस्ति की पुकार : हिमालय', 'अभी-अभी हूँ, अभी नहीं”, 'बसन्त आ गया पर कोई उत्कण्ठा नहीं', 'बन्दऊं तब' और 'इन टूटे हुए दियों से काम चलाओ') अच्छे ललित निबन्ध हैं।
 
मेरे राम का मुकुट भीग रहा है' नामक निबन्ध संग्रह में मिश्र जी के सत्रह निबन्ध प्रकाशित हुए हैं। इनमें पहले नौ निबन्ध (मुकुट', 'मेखला', 'नूपुर', 'विंध्य की धरती का वरदान', 'अमरकण्टक की सालती स्मृति', 'राष्ट्रपति की छाया', 'बेतवा के तीर पर', 'होइहें शिला सब चन्द्रमुखी', 'रेवा से रीवा', ‘कलचुरियों की राजधानी गुर्गी', 'रुपहला धुआँ) तो लेखक द्वारा विध्य प्रदेश के भिन्न-भिन्न स्थानों की यात्रा या उत्सवों-आयोजनों में जाने के समय की मधुर स्मृतियों के सँजोये रहने वाले संस्मरणों की पद्धति पर लिखे गये हैं। शेष आठ (मेघदूत का सन्देश', 'स्वाधीनता युग के कठघरे में हिन्दी', 'सावनी स्वाधीनता : एक निर्वासित श्यामा', 'अयोध्या उदास लगती है', 'खामोशी की झील', 'राधा माधव हो गयी', 'बालू के दूह और मेरे राम का मुकुट भीग रहा है) सही अर्थों में ललित निबन्ध हैं, इनमें उन्मुक्त भटकन, लोक संस्कृति की अभिव्यक्ति और साहित्यिक चिन्तक की लाचारी का चित्रण किया गया है। इस संग्रह के ललित निबन्धों के विषय में दी गयी श्री अज्ञेय की यह टिप्पणी दृष्टव्य है—

“ललित निबन्ध नाम रूढ़ हो गया है, पर साहित्य लोक संस्कृति के निकट संस्पर्श से भी आ सकता है, संस्कृत काव्य के गहन ज्ञान से भी और सबसे बढ़कर लेखक के मनोजगत् में विचार-स्मृति और कल्पना के उस योग से जिसे भावना ने एक मधुर सूक्ष्म रंगत दी हो। उनके निबन्ध लालित्य उंड़ेलते नहीं, पाठक के मन में उपजाते हैं, यही उनकी रोचकता का रहस्य है।” 

पं. विद्यानिवास मिश्र के ललित निबन्ध लेखन की परम्परा की अन्तिम कड़ी (अब तक के लेखन के सम्बन्ध में) के रूप में उनका निबन्ध संग्रह है—' कँटीले तारों के आर पार'। इस निबन्ध संग्रह में तेरह निबन्ध संग्रहीत हैं। इनमें सभी उच्चकोटि के ललित निबन्ध हैं। 'मधुवन जाऊँगा रे' लोक जीवन एवं लोक संस्कृति का चित्रण प्रस्तुत करता है। कहीं 'कुम्भपर्व' का सांस्कृतिक सन्दर्भ है, तो कहीं 'उर्दू -मोह का नया मोड़' शीर्षक निबन्ध में लेखक की खीझ का अभिव्यक्तिकरण है। परिशिष्ट रूप में हिन्दी के व्यक्तिव्यंजक निबन्धों का परिचय देकर अपनी इस विषय में मान्यता को भी लेखक ने स्पष्ट कर दिया है।
 
'कँटीले तारों के आर-पार' पं. विद्यानिवास मिश्र का चूँकि आद्यतन निबन्ध संग्रह है। इसीलिए इसकी चर्चा थोड़ा विस्तार के साथ करते हैं। डॉ. आनन्द प्रकाश दीक्षित ने 'आस्तिकता, आस्थावादिता और समष्टि चेतना' को इन निबन्धों का प्रधान स्वर माना है। इस निबन्ध संग्रह के निबन्धों के विषय में डॉ. दीक्षित का अग्र मत दृष्टव्य है-
 
“अन्य निबन्धों में शब्दों को सांस्कृतिक सन्दर्भ में रखकर उनकी अर्थ-छवियों के माध्यम से चिन्तन को उभारने और किसी विचार बिन्दु पर ले जाकर छोड़ने का क्रम है। वहाँ बात का स्तर बहुआयामी ही नहीं क्रमिकता में उदात्त और ऊर्ध्वगतिक भी है। ऐसे स्थलों में मूलार्थ की व्याख्या भी होती है और नवीन चिन्तन के लिए दिशा-निर्देश भी ।"
 
जिस निबन्ध के नाम पर इस निबन्ध संग्रह का नामकरण हुआ है, वह अन्तिम निबन्ध है और उसमें लेखक ने परम्परा और आधुनिकता का प्रश्न उठाया है कि दोनों में उचित तालमेल बैठाना ही उचित होगा । इस संग्रह के निबन्धों की भाषा के विषय में डॉ. दीक्षित की टिप्पणी के साथ ही इस विवेचन प्रसंग का समापन किया जाता है-

“पं. विद्यानिवास मिश्र के इन निबन्धों की भाषा व्यावहारिक, चलती-फिरती और सरल है। उसमें रंग भरती है या तो उनकी सांस्कृतिक चिन्ता या फिर उनके व्यंग्य । व्यंग्य की स्थिति में वे उर्दू पर उतर आते हैं तो सादगी में गाँव-देहात की भाषा को अपना लेते हैं। तर्क की स्थिति में उनकी भाषा धीर-गम्भीर भाव से आगे बढ़ती है तो प्रतिवाद की स्थिति में भाषण शैली में प्रवाहित होने लगती है।

भाषा शैली की विशेषताएँ

पं. विद्यानिवास मिश्र के ललित निबन्ध लेखन की कतिपय वस्तु एवं शिल्प विषयक विशेषताओं का उल्लेख करना भी नितान्त संगत प्रतीत होता है। श्री शिवप्रसाद सिंह ने उनके निबन्धों के प्रधान स्वर में लोकसंस्कृति का दर्शन किया है-
 
“पं. विद्यानिवास मिश्र के निबन्धों को पढ़ने पर जो पहली चीज सामने आती है वह उनकी खॉटी भोजपुरी संस्कृति । XXX उनके निबन्धों में यह लोकसंस्कृति कई रूपों में अपनी सुवास छोड़ जाती है x x x वे लोक परम्परा की शिलाओं पर इतना जमकर तने खड़े हैं कि लोकगीत या लोकसंस्कृति उन्हें लचकाकर ही रह जाती है और इसमें शक नहीं कि यह लोच उनके निबन्धों में एक विलक्षण 'कर्वेचर' पैदा करती है और यह लचीलापन उन्हें पुरानी और नयी दोनों तरह की भाव-भूमियों को बहुत अच्छी तरह समेटने में सफल बनाता है।'
 
इसी क्रम में डॉ. सिंह ने परम्परा के प्रति मोह तथा आधुनिकता एवं मानवतावाद में भी उनकी गहरी आस्था का संकेत किया है। विद्यानिवास जी के लेखन में । अन्त में वे समाहार करते हुए डॉ. विद्यानिवास मिश्र के लेखन की सभी विशेषताओं को निम्न वाक्यों में प्रस्तुत करते हैं- 

“विद्यानिवास जी हिन्दी के एक सिद्धहस्त शैलीकार हैं। गद्य को कवियों का निकष कहा जाता है विद्यानिवास जी ने चोरी-छिपे कविताएँ भी लिखी हैं, एकाध की बानगी आपको इसी संग्रह में मिल भी जायेगी, पर वे हैं मूलतः गद्यकार। इसलिए गद्य उनके लिए निकष नहीं जीवन है। परिणामतः इनकी भाषा में आपको भोजपुरी संस्कारिता, ताप्ती की प्रखर धारा, हिमालय की तलहटी में रहने वाले व्यक्तित्व के उत्तुंग श्रृंग और संस्कृत में पले एक खॉटी ब्राह्मण की वदान्यता से पुष्ट वैदुष्य और सबके ऊपर एक आधुनिक बुद्धिजीवी की अपने ही भीतर के देवता और दैत्य से निरन्तर युद्धरत रहने की सरगर्मी भी मिलेगी।'

पं. विद्यानिवास मिश्र की भाषा का जहाँ तक प्रश्न है, उसमें एक ओर तो संस्कृत के उपसर्गों एवं प्रत्ययों द्वारा गढ़े गये शब्दों का, संधिज एवं सामासिक शब्दों का बहुल प्रयोग देखने को मिल जायेगा दूसरी ओर देशी (भोजपुरी) बोली के प्रयोगों का बाहुल्य (विदेशी) अंग्रेजी और अरबी-फारसी के शब्दों का निःसंकोच प्रयोग भी उनके निबन्धों में प्रायः देखा जा सकता है। लम्बे-लम्बे वाक्यों द्वारा कहीं आवेग, कहीं प्रवाह और कहीं-कहीं आवेश भी देखा जा सकता है इनके लेखन में। लयपूर्ण, सानुप्रासिक गद्य का प्रयोग करते हुए वे लालित्य की सृष्टि करते हैं अपने ललित निबन्धों में। भाषा-शैली के क्षेत्र में उत्तरोत्तर विकास का सूत्र खोजते हुए डॉ. मु.ब.शहा ने निम्न विचार व्यक्त किये हैं-
 
'चितवन की छाँह' से लेकर 'मैंने सिल पहुँचाई' तक मिश्रजी की भाषा अनेक घुमावदार मोड़ लेती है। प्रथम निबन्ध संग्रह में प्राप्त भाषा की छन्दोबद्धता, लय, अलंकारप्रियता, अनुप्रासिकता एवं उद्धरण बहुलता परवर्ती निबन्धों में प्राप्त नहीं होती । क्रमशः उनकी भाषा अधिक गम्भीर सशक्त, वैचारिकता से युक्त, सुबोध पर अधिक सार्थक बनती गयी है।”

पं. विद्यानिवास मिश्र के ललित निबन्धकार रूप पर मुग्ध होकर डॉ. द्वारिकाप्रसाद सक्सैना ने जो विचार व्यक्त किये हैं। उन्हें प्रस्तुत करके हम मिश्रजी का परिचय समाप्त करेंगे- 

“विद्यानिवास मिश्र एक श्रेष्ठ ललित निबन्ध लेखक हैं। आपने इतने रोचक एवं सरस निबन्ध लिखे हैं कि वे हिन्दी साहित्य की अपूर्व निधि बन गये हैं, उनसे भाषा और साहित्य का अद्भुत श्रृंगार हुआ है तथा अभिव्यंजना शैली के क्षेत्र में एक विलक्षण परिवर्तन आया है। XXX आपने-अपने विचारों, भावों और कल्पनाओं से एक ओर विवेच्य विषय को रमणीयता एवं कमनीयता प्रदान की है तथा दूसरी ओर विविध अप्रस्तुत प्रसंगों के बिम्ब प्रतिबिम्बात्मक नियोजन से अपने कथन को अधिकाधिका प्रभावोत्पादक, रोचक एवं आकर्षक बनाने का स्तुत्य प्रयत्न किया है।” ('हिन्दी के प्रतिनिधि निबंन्धकार' पृ. 389-90) 

पं. विद्यानिवास मिश्र ने दो विषय प्रधान निबन्धों के संग्रह भी हिन्दी जगत को प्रदान किये हैं-
  • परम्परा बन्धन नहीं, 
  • निज मन मुकुर । 

इनके अतिरिक्त इधर पिछले वर्षों में जो उनके ललित निबन्ध संग्रह प्रकाशित हुए हैं, उनमें 'कौन तू फुलवा बीननिहारी' में कृष्णभक्ति की अनपायनी कालिन्दी प्रवाहित होती रहती है और कृष्णोपासना, मधुरा भक्ति के रस में आप्लावित लेखक पाठक को वैष्णव संस्कारों में आकण्ठ निमग्न कर देती है। इस संग्रह के बाद यद्यपि हर दूसरे वर्ष विद्यानिवास जी के ललित निबन्धों का एक संग्रह देखने को मिल जाता है परन्तु उनका वह उच्चतर प्रयोगों वाला युग लगता है अब बीत गया है और 'अंगद की नियति' को देखकर तो लगता है कि लेखक शायद अब चूक गया है। या ऐसा भी हो सकता है कि अब लेखक प्रशासनिक पदों और राजनीतिक दाँव-पेचों में या अधिक द्वन्द्व-फन्द में लगे रहने के कारण अनुभूति के रमणीय लोक में विचरण करने योग्य रह ही नहीं गया है। उनके 'गाँव का मन' नामक निबन्ध संग्रह से भी निराशा ही हाथ लगी है। इधर 'शेफाली झर रही है' नामक ललित निबन्ध संग्रह प्रकाशित हुआ है। इसमें भी पुराने ललित निबन्धों जैसी ऊँचाई नहीं है। 

अस्तु, पं. विद्यानिवास मिश्र ने सर्वाधिक निबन्धों की रचना की है संख्या में ही सही अपने निबन्धों द्वारा माँ-भारती की झोली भरी है। निश्चय ही पं. विद्यानिवास मिश्र का हिन्दी ललित निबन्धों की दुनियाँ में बहुत नाम है।

COMMENTS

Leave a Reply

You may also like this -

Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका