टोपी शुक्ला Class 10 Hindi Sanchayan Chapter 3

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टोपी शुक्ला राही मासूम रज़ा 


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टोपी शुक्ला का सारांश

प्रस्तुत पाठ या उपन्यास अंश टोपी शुक्ला , लेखक राही मासूम रज़ा साहब के द्वारा लिखा गया है | लेखक राही साहब ने प्रस्तुत पाठ के माध्यम से बताया है कि बच्चों को जहाँ अपनत्व और प्यार-दुलार मिलता है, वे वहीं रहना पसंद करते हैं | इसीप्रकार टोपी को बचपन में अपने परिवार की नौकरानी और अपने दोस्त की दादी से अपनत्व और प्यार मिलता है | फलस्वरूप, वह उन्हीं लोगों के साथ रहना पसंद करता है | टोपी का एक दोस्त है --- इफ़्फ़न | दोनों के घर अलग-अलग थे | दोनों के धर्म भी अलग थे | फिर भी दोनों में अच्छी दोस्ती और प्रेम का रिश्ता कायम था |  

इस उपन्यास अंश में दो मुख्य किरदार हैं --- एक का नाम 'बलभद्र नारायण शुक्ला' और दूसरे का नाम 'सय्यद जरगाम मुरतुज़ा' | क्रमश: एक को टोपी कहा गया और दूसरे को इफ़्फ़न | इफ़्फ़न के दादा और परदादा बहुत प्रसिद्ध मौलवी थे | वे जीते जी हिन्दुस्तान में रहे थे, लेकिन वसीयत के मुताबिक उनकी लाश को करबला ले जाकर दफ़नाया गया था | इफ़्फ़न के पिताजी उनके खानदान में पहले बच्चे थे, जो हिंदुस्तानी थे और मरने के बाद हिन्दुस्तान में ही दफन किए गए | 

इफ़्फ़न की दादी मौलवी परिवार से संबंध नहीं रखती थी | वह एक ज़मींदार घराने से संबंधित थी | उनके ससुराल में गाने-बजाने को लेकर सख़्त मनाही थी | इफ़्फ़न की दादी अपने बेटे की शादी पर ख़ूब गाने-बजाने की इच्छा मन में पाल रखी थी, किन्तु इफ़्फ़न के दादा के भय से उनकी यह इच्छा सफल न हो पाई | लेकिन इफ़्फ़न की छठी पर उन्होंने जी भर कर जश्न मना लिया था | उन्हें इफ़्फ़न के दादा से केवल एक शिकायत रहती कि वे हमेशा मौलवी ही बने रहते थे | 

प्रस्तुत पाठ के अनुसार, इफ़्फ़न को अपनी दादी से बहुत प्यार और लगाव था | वह इफ़्फ़न को रात के वक़्त कहानियाँ सुनाया करती थीं | इफ़्फ़न की दादी पर पूर्वी भाषा का प्रभाव था | इफ़्फ़न के साथ-साथ टोपी को भी उसकी दादी की भाषा अच्छी लगती थी | टोपी अपनी दादी से नफ़रत किया करता था | उसे इफ़्फ़न के घर जाकर उसकी दादी से बात करना पसंद था | 

प्रस्तुत कथा के अनुसार, एक दिन टोपी ने जैसे ही अपने घर में अपनी माँ को संबोधित करते हुए 'अम्मी' शब्द का इस्तेमाल किया, मानो उसके घर में कोई तूफ़ान आ गया हो | माँ से अधिक उसकी दादी गुस्सा हो गई | तभी आग में घी डालने का काम उसके भाई मुन्नी बाबू ने किया | उसने माँ से झूठ बोल दिया कि टोपी ने कबाब भी खाया | जबकि सच तो यह है कि कबाब मुन्नी बाबू ने खाया था | आख़िरकार, सभी मुन्नी बाबू के झूठ को सच समझ लिया | तत्पश्चात्, टोपी को उसकी माँ से खूब पिटाई पड़ी | 

अगले दिन टोपी ने स्कूल जाकर सारी घटना को इफ़्फ़न से साझा की | तत्पश्चात्, दोनों भूगोल के चौथे पीरियड में स्कूल से भाग निकले | टोपी इफ़्फ़न को संबोधित करते हुए आपस में अपनी दादी को बदलने की बात करता है | तभी इफ़्फ़न कहता है कि ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि उसकी दादी उसके पिताजी की माँ भी थी | तत्पश्चात्, इफ़्फ़न ने उसे दिलासा देते हुए कहता है कि चिंता मत करो, तुम्हारी दादी बूढ़ी हो गई है और बूढ़े लोग जल्दी मर जाते हैं | वह भी जल्दी मर जाएगी | इफ़्फ़न टोपी को दिलासा दे ही रहा था कि इतने में नौकर ने आकर ख़बर दी कि इफ़्फ़न की दादी का स्वर्गवास हो गया है | शाम को जब टोपी इफ़्फ़न के घर गया तो वहाँ चारों तरफ़ सन्नाटा पसरा पडा़ था | लोग इकट्ठे थे | तभी टोपी ने इफ़्फ़न को संबोधित करते हुए कहता है कि --- 

"तोरी दादी की जगह हमरी दादी मर गई होतीं त ठीक भया होता...|" 

इफ़्फ़न ने कोई जवाब नहीं दिया | उसे इस बात का जवाब मालूम ही नहीं था | दोनों दोस्त चुपचाप रोने लगे | 

टोपी शुक्ला
राही मासूम रज़ा
प्रस्तुत पाठ के अनुसार, जब एक दिन इफ़्फ़न के पिताजी का तबादला हो गया | तब टोपी ने यह कसम खाई कि आगे से वह किसी ऐसे लड़के से दोस्ती नहीं करेगा, जिसके पिताजी की नौकरी बदलने वाली हो | इफ़्फ़न के पिताजी का तबादला होने के पश्चात् उस शहर के अगले कलेक्टर के रूप में 'हरिनाम सिंह' थे | उनके तीन लड़के थे | मगर तीनों में से कोई टोपी का मित्र नहीं बन सका | बंगले के माली और चपरासी टोपी को पहले से जानते थे | इसलिए टोपी एक रोज बँगले के अंदर घुस गया | उस वक़्त हरिनाम सिंह के तीनों लड़के क्रिकेट खेल रहे थे | उनके साथ टोपी का झगड़ा हुआ तो उन लोगों ने टोपी के पीछे कुत्ते को लगा दिया | टोपी को इंजेक्शन भी लेना पड़ा था | तब जाकर उसे होश आया | फिर टोपी कभी उस बँगले की ओर नहीं गया | 

तत्पश्चात्, प्रस्तुत पाठ या कथा के अनुसार, टोपी का अकेलापन उसके घर की बूढ़ी नौकरानी 'सीता' के साथ दूर हुआ | सीता टोपी का दुख-दर्द समझती थी और उससे बहुत प्यार किया करती थी | घर के दूसरे सदस्य टोपी को बेकार समझते थे | एक बार घर में सब के लिए सर्दी के मौसम में गर्म कपड़े बने, लेकिन टोपी को मुन्नी बाबू का उतरन कोट थमा दिया गया | जब टोपी ने उस कोट को लेने से इनकार कर दिया और उसे घर की नौकरानी केतकी को दे दिया | तब उसकी दादी अत्यन्त क्रोधित हो उठी | उन्होंने टोपी को गर्म कपड़े के बिना सर्दी गुजारने का हुक्म सुना दिया | 

आगे लेखक 'राही मासूम रज़ा' जी के अनुसार, जब टोपी नवीं कक्षा में दो बार फेल हो गया, तब से उसे घर में और अधिक डाँट सुनना पड़ता था | जब वह पढ़ने बैठता था, उसी वक़्त घर के लोग उसे बाहर से कुछ न कुछ लाने को कहते थे | इसी प्रकार उसकी पढ़ाई सही से नहीं हो पाती थी और उसका परीक्षा परिणाम ख़राब हो जाता था | सच कहें तो स्कूल में भी उसे अध्यापकों से कोई सहयोग नहीं मिला | फेल होने के बाद उसे पिछले दर्जे के छात्रों के साथ बैठना अच्छा नहीं लगता था | घर और स्कूल में किसी ने भी उससे अपनापन नहीं जताया | कोई भी ऐसा नहीं था, जो उसके साथ सहानुभूति रखे , उसे परीक्षा में पास होने के लिए प्रेरित करे | अंतत: उसने खुद ही परिश्रम की और तीसरी श्रेणी में नवीं पास करके दिखा दिया | तत्पश्चात्, टोपी के नवीं पास करने पर उसकी दादी ने कहा कि --- 

" वाह...! भगवान तुम्हें बुरी नज़र से बचाए, रफ़्तार अच्छी है, तीसरे बरस तीसरे दर्जे में पास तो हो गए... |"  


राही मासूम रज़ा का जीवन परिचय 

टोपी शुक्ला पाठ के लेखक राही मासूम रज़ा जी हैं | इनका जन्म 1 सितंबर 1927 को पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के गंगौली गाँव में हुआ था | इनकी मृत्यु 15 मार्च 1992 को हुआ था | इन्होंने गाँव में ही शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद अलीगढ़ युनिवर्सिटी से उर्दू साहित्य में अपनी पीएच.डी. पूर्ण की | तत्पश्चात्, वहीं पर कुछ वर्षों तक अध्यापन कार्य भी करते रहे | फिर रज़ा साहब मुम्बई चले गए, जहाँ पर उन्होंने सैंकड़ों फिल्मों की पटकथा, संवाद और गीत लिखे | प्रसिद्ध धारावाहिक 'महाभारत' की पटकथा, संवाद और गीत लेखन ने उन्हें इस क्षेत्र में सर्वाधिक ख्याति दिलाई | 

राही साहब ने अपने लेखन के माध्यम से जनता को बाँटने वाली शक्तियों, राजनीतिक दलों, व्यक्तियों तथा संस्थाओं का खुलकर विरोध किया है | उन्होंने संकीर्णताओं और अंधविश्वासों, धर्म और राजनीति के स्वार्थी गठजोड़ आदि को भी बेनकाब किया है | राही साहब एक ऐसे कवि-कथाकार थे, जिनके लिए भारतीयता आदमीयत का पर्याय रही | राही साहब के सम्पूर्ण लेखन में आम हिन्दुस्तानी की पीड़ा, दुःख-दर्द, उसकी संघर्ष क्षमता की अभिव्यक्ति है | 

राही साहब की कुछ प्रमुख कृतियाँ हैं --- टोपी शुक्ला, आधा गाँव, कटरा बी आर्जू, असंतोष के दिन, हिम्मत जौनपुरी, नीम का पेड़ (सभी हिन्दी उपन्यास), मैं एक फेरी वाला (कविता संग्रह), मुहब्बत के सिवा (उर्दू उपन्यास), अट्ठारह सौ सत्तावन (हिन्दी-उर्दू महाकाव्य), छोटे आदमी की बड़ी कहानी (जीवनी), मौजे गुल : मौजे सबा, नया साल, रक्से-मय, अजनबी रास्ते : (सभी उर्दू कविता संग्रह) इत्यादि...|| 



टोपी शुक्ला के प्रश्न उत्तर 


प्रश्न-1 इफ़्फ़न टोपी शुक्ला की कहानी का महत्त्वपूर्ण हिस्सा किस तरह से है ? 

उत्तर- प्रस्तुत पाठ के अनुसार, इफ़्फ़न और टोपी एक-दूसरे के बगैर अधूरे थे | दोनों की दोस्ती भी बेहद गहरी थी | टोपी के लिए इफ़्फ़न और उसकी दादी के अलावा कोई प्रिय नहीं था | क्योंकि टोपी को अपने घर के सदस्यों के द्वारा उपेक्षा का भाव झेलना पड़ता था | जबकि इफ़्फ़न अपने मन की बात दादी को या टोपी से साझा करके मन को हल्का कर लेता था | जब इफ़्फ़न की दादी का स्वर्गवास हुआ, तो टोपी यही सोच रहा था कि इफ़्फ़न की दादी की जगह मेरी दादी मर गई होती, तो अच्छा होता | इससे पता चलता है कि इफ़्फ़न टोपी शुक्ला की कहानी का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है | 

प्रश्न-2 इफ़्फ़न की दादी अपने पीहर क्यों जाना चाहती थीं ? 

उत्तर- प्रस्तुत पाठ के अनुसार, इफ़्फ़न की दादी एक ज़मींदार की बेटी थी | जब लखनऊ में उनकी शादी एक मौलवी साहब से हो गई तो वह खुल कर जीने को तरस गई थीं | क्योंकि किसी खुशी के मौके पर भी गाने-बजाने को लेकर सख्त मनाही थी | जबकि इफ़्फ़न की दादी अपने पीहर में दूध, घी, दही का भी सेवन करती थीं | वहाँ उनपर किसी प्रकार की रुकावटें नहीं थीं | इसलिए इफ़्फ़न की दादी अपने पीहर जाना चाहती थीं | 

प्रश्न-3 दादी अपने बेटे की शादी में गाने-बजाने की इच्छा पूरी क्यों नहीं कर पाई ? 

उत्तर- प्रस्तुत पाठ के अनुसार, इफ़्फ़न की दादी का विवाह एक मौलवी साहब से हो गई थी, जिनके परिवार में गाने-बजाने को लेकर सख़्त मनाही थी | इसलिए दादी अपने बेटे की शादी में गाने-बजाने की इच्छा पूरी नहीं कर पाई |  

प्रश्न-4 "अम्मी" शब्द पर टोपी के घरवालों की क्या प्रतिक्रिया हुई ? 

उत्तर- प्रस्तुत कथा के अनुसार, एक दिन टोपी ने जैसे ही अपने घर में अपनी माँ को संबोधित करते हुए 'अम्मी' शब्द का इस्तेमाल किया, मानो उसके घर में कोई तूफ़ान आ गया हो | माँ से अधिक उसकी दादी गुस्सा हो गई | तभी आग में घी डालने का काम उसके भाई मुन्नी बाबू ने किया | उसने माँ से झूठ बोल दिया कि टोपी ने कबाब भी खाया | जबकि सच तो यह है कि कबाब मुन्नी बाबू ने खाया था | आख़िरकार, सभी मुन्नी बाबू के झूठ को सच समझ लिए | तत्पश्चात्, टोपी को उसकी माँ से खूब पिटाई पड़ी | 

प्रश्न-5 दस अक्टूबर सन् पैंतालीस का दिन टोपी के जीवन में क्या महत्त्व रखता है ? 

उत्तर- प्रस्तुत पाठ के अनुसार, दस अक्टूबर सन् पैंतालिस के दिन ही इफ़्फ़न के पिताजी का तबादला हो गया था और वे दूसरी जगह चले गए थे | टोपी अपने सबसे अच्छे और करीबी दोस्त के चले जाने से बहुत दुखी था | इफ़्फ़न की दादी भी मर चुकी थीं, जिनसे टोपी बहुत प्यार किया करता था और अब इफ़्फ़न भी टोपी से दूर चला गया | इसलिए टोपी ने यह कसम खाई कि आगे से वह किसी ऐसे लड़के से दोस्ती नहीं करेगा, जिसके पिताजी की नौकरी बदलने वाली हो | अत: उक्त दिन टोपी के जीवन बहुत महत्त्व रखता है | 

प्रश्न-6 टोपी ने इफ़्फ़न से दादी बदलने की बात क्यों कही ? 

उत्तर- प्रस्तुत पाठ के अनुसार, इफ़्फ़न की दादी टोपी को बहुत प्यार करती थी और टोपी भी अपनी सगी दादी की अपेक्षा इफ़्फ़न की दादी से बहुत प्यार किया करता था | टोपी की दादी का व्यवहार टोपी के प्रति ठीक नहीं था | इसलिए टोपी ने इफ़्फ़न से दादी बदलने की बात कही | 

प्रश्न-7 पूरे घर में इफ़्फ़न को अपनी दादी से विशेष स्नेह क्यों था ? 

उत्तर- प्रस्तुत पाठ के अनुसार, इफ़्फ़न के अब्बू-अम्मी उसे डाँटते थे, उसकी बहनें भी उसे परेशान करती थीं | लेकिन इसके विपरीत इफ़्फ़न की दादी उसे बहुत प्यार व दुलार करती थीं | उसे तरह-तरह की कहानियाँ सुनाती थीं तथा उसकी खूब सहायता करती थीं | इसलिए पूरे घर में इफ़्फ़न को अपनी दादी से विशेष स्नेह था | 

प्रश्न-8 इफ़्फ़न की दादी के देहान्त के बाद टोपी को उसका घर खाली-सा क्यों लगा ? 

उत्तर- प्रस्तुत पाठ के अनुसार, इफ़्फ़न की दादी टोपी से भी उतना ही प्यार करती थीं, जितना वह इफ़्फ़न से करती थीं | टोपी को भी कहानियाँ सुनाया करती थीं | लेकिन इफ़्फ़न की दादी की मृत्यु के पश्चात् टोपी को ऐसा महसूस हुआ कि उस पर से दादी का आशीर्वाद ही उठ गया है | इसलिए इफ़्फ़न की दादी के देहान्त के बाद टोपी को उसका घर खाली-सा लगा | 

प्रश्न-9 इफ़्फ़न की दादी के मायके का घर कस्टोडियन में क्यों चला गया ? 

उत्तर- प्रस्तुत पाठ के अनुसार, इफ़्फ़न की दादी के मायके का घर कस्टोडियन में इसलिए चला गया, क्योंकि 
इफ़्फ़न की दादी के मायके वाले जब पाकिस्तान में रहने लगे तो भारत में उनके घर का कोई मालिक नहीं रह गया | इसलिए वह घर सरकार के कब्जे में चला गया | 



टोपी शुक्ला पाठ का शब्दार्थ



• अलबत्ता - बल्कि
• अमावट -  पके आम के रस को सुखाकर बनाई गई मोटी परत
• तिलवा - तिल का लड्डू
• लफ़्ज - शब्द
• परंपरा - प्रथा
• डेवलपमेंट - विकास
• अटूट - जो टूट न सके 
• वसीयत - अपनी संपत्ति किसी के नाम लिख देना 
• नमाज़ी - नियमित रूप से नमाज़ पढ़ने वाला
• करबला - इस्लाम के अनुसार एक पवित्र स्थान 
• कबाबची - कबाब बनाने वाला
• जुगरापिच्या - भूगोल शास्त्र
• पुरसा - सांत्वना देना
• टर्राव - ज़बान लड़ाना
• गाउदी - भोंदू
• लौंदा - गीली मिट्टी का पिंड
• बेशुमार - बहुत सारी
• बाजी -  बड़ी बहन, आपा, दीदी 
• कचहरी - न्यायालय, कोर्ट 
• पाक -  पवित्र
• मुल्क - देश
• सदका -  एक टोटका
• चेचक - एक संक्रामक रोग जिसमें बुखार के साथ पूरे शरीर पर दाने निकल आते हैं
• पूरबी - पूरब की तरच की बोली जाने वाली भाषा
• कस्टोडियन - जिस संपत्ति पर किसी का मालिकाना हक न हो | 


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